Study Material : माटी की मूरतें सारांश, समीक्षा और प्रश्नोत्तर | Matee kee Mooraten Summary, Review and Q&A नेट-जेआरएफ (NET-JRF) और स्नातक/स्नातकोत्तर (BA/MA) परीक्षाओं की दृष्टि से
आवारा मसीहा का परिचय (Introduction to Aawara Masiha)
विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित ‘आवारा मसीहा’ सुप्रसिद्ध बंगाली उपन्यासकार शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की कालजयी जीवनी है। लेखक ने इस जीवनी को तीन प्रमुख पर्वों—दिशहारा, दिशा की खोज और दिशांत में विभाजित किया है। इस कृति को पूरा करने में विष्णु प्रभाकर को लगभग 14 वर्ष का लंबा समय और अथक परिश्रम लगा।
विष्णु प्रभाकर ने शरत बाबू के जीवन के अनछुए पहलुओं को उजागर करने के लिए बिहार, बंगाल और बर्मा (म्यांमार) की यात्रा की और उनके समकालीनों से भेंट की। जीवनी लिखने के दौरान उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, क्योंकि कुछ लोग शरत के “अवारा” जीवन को अनुकरणीय नहीं मानते थे। लेखक ने इस जीवनी को केवल कल्पना के आधार पर नहीं, बल्कि प्रामाणिक दस्तावेजों, पत्रों और साक्षात्कारों के आधार पर लिखा है।
जीवनी के प्रमुख पात्र (Major Characters of the Biography)
परिवार के सदस्य
शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय (नायक) – इस जीवनी के मुख्य पात्र, जिन्हें लेखक ने ‘अवारा’ और ‘मसीहा’ के रूप में चित्रित किया है।
मोतीलाल चट्टोपाध्याय – शरत् के पिता, जो स्वभाव से यायावर और कल्पनाशील थे, लेकिन जीवन भर अभावों से जूझते रहे।
भुवनमोहिनी – शरत् की माता, जिन्होंने अभावों में भी परिवार को संभाला और शरत् को अपार स्नेह दिया।
केदारनाथ गंगोपाध्याय – शरत् के नाना, जो भागलपुर में रहते थे और जिनके घर शरत् का बचपन अभावों और कठोर अनुशासन में बीता।
अनिला देवी – शरत की बड़ी बहन, जिनके घर (गोविन्दपुर) शरत् अक्सर जाते थे।
प्रकाशचन्द्र और प्रभासचन्द्र (स्वामी वेदानन्द) – शरत के छोटे भाई। प्रभास बाद में संन्यासी हो गए थे।
बचपन और लेखन की प्रेरणा के पात्र
राजू (राजेन्द्रनाथ) – शरत के बचपन के सबसे प्रिय साथी, जो उनके उपन्यासों के प्रसिद्ध पात्र ‘इन्द्रनाथ’ का आधार बने।
कुसुमकामिनी – शरत की छोटी नानी, जिन्होंने उन्हें साहित्य पढ़ने की प्रेरणा दी और शरत् के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
धीरू – शरत के बचपन की संगिनी, जिसे आधार बनाकर शरत ने ‘देवदास’ की पारो और ‘बड़ी दीदी’ की माधवी जैसे पात्रों का सृजन किया।
जीवनसंगिनियाँ-
शान्ति देवी – शरत की पहली पत्नी, जिनका रंगून में प्लेग के कारण देहांत हो गया था।
हिरण्मयी देवी – शरत की जीवनसंगिनी, जो अंत तक उनके साथ रहीं और जिन्हें शरत् ने अपने वसीयतनामे में अपनी पत्नी स्वीकार किया।
साहित्यिक और राजनीतिक पात्र (Literary and Political Figures)
रवीन्द्रनाथ ठाकुर – शरत के गुरु और प्रेरणास्रोत, जिनके साथ उनके वैचारिक मतभेद भी रहे।
देशबन्धु चित्तरंजन दास – शरत के राजनीतिक गुरु, जिनके प्रभाव में वे कांग्रेस के सक्रिय सदस्य बने।
सुभाषचन्द्र बोस – देशबन्धु के शिष्य और शरत् के प्रिय मित्र, जिनके प्रति शरत् की गहरी सहानुभूति थी।
सुरेन्द्रनाथ गंगोपाध्याय – शरत् के मामा और बालसखा, जिन्होंने शरत् के जीवन के तथ्यों को संकलित करने में विष्णु प्रभाकर की मदद की।
अन्य महत्वपूर्ण सहयोगी
उमाप्रसाद मुकर्जी – शरत् के अंत समय के एकांत बंधु और उनके वसीयतनामे के गवाह।
फणीन्द्रनाथ पाल – ‘यमुना’ पत्रिका के संपादक, जिन्होंने शरत् की रचनाओं को प्रकाशित कर उन्हें ख्याति दिलाई।
मणीन्द्रनाथ राय (मणी मामा) – शरत् के मामा और सहपाठी, जो अक्सर उनके विद्रोही स्वभाव के कारण उनसे नाराज रहते थे।
नील दीदी और विलासी – शरत् के जीवन के वास्तविक पात्र, जिन्होंने उनके उपन्यासों की मार्मिकता को जन्म दिया।
आवारा मसीहा संक्षिप्त सारांश (Aawara Masiha: A Brief Summary)
प्रथम पर्व – दिशहारा (बचपन और भटकन)
यह खंड शरतचन्द्र के जन्म, उनके परिवार और उनके बचपन की शरारतों एवं शुरुआती संघर्षों पर केंद्रित है।
जन्म और परिवार – शरतचन्द्र का जन्म 15 सितंबर 1876 को हुगली जिले के देवानन्दपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता मोतीलाल एक मेधावी लेकिन अव्यावहारिक व्यक्ति थे, जो अक्सर बेरोज़गार रहते थे। उनकी माता भुवनमोहिनी एक धैर्यवान और स्नेही महिला थीं, जिन्होंने अभावों में परिवार को संभाला।
बचपन की शरारतें – शरत बचपन से ही निडर, साहसी और शरारती थे। उन्हें पतंग उड़ाने, मछली पकड़ने और तितलियाँ पकड़ने का शौक था। उनके बचपन के साथी राजू (इन्द्रनाथ) का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा, जो उनके उपन्यासों के साहसी पात्रों का आधार बना।
साहित्यिक संस्कार – शरत को साहित्य के प्रति रुचि अपनी नानी कुसुमकामिनी से मिली कुसुमकामिनी शरत् के सबसे छोटे नाना अघोरनाथ की पत्नी थीं। वे अपने समय की एक विदुषी महिला थीं, जिन्होंने छात्रवृत्ति परीक्षा पास की थी और स्वयं ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के हाथों पुरस्कार प्राप्त किया था।
साहित्यिक गोष्ठियाँ – जिस दिन कुसुमकामिनी की रसोई बनाने की बारी नहीं होती थी, वे अपने घर की बैठक या छत पर एक छोटी-सी साहित्यिक गोष्ठी आयोजित करती थीं। इस गोष्ठी में वे ‘बंगदर्शन’, ‘मृणालिनी’, ‘वीरांगना’, ‘ब्रजांगना’, ‘मेघनाद वध’ और ‘नीलदर्पण’ जैसी महान रचनाएँ सस्वर पढ़कर सुनाती थीं।
साहित्य का पहला पाठ – बालक शरत् इन गोष्ठियों में बड़े आदर और आश्चर्य के साथ बैठते थे।शरत् ने “साहित्य का पहला पाठ” इन्हीं गोष्ठियों में पढ़ा था। यहीं उन्होंने पहली बार अनुभव किया कि लेखक एक साधारण मनुष्य से ऊपर होता है।
जीवनीकार के अनुसार, शरत् चन्द्र के “शिक्षा का आदि पर्व” कुसुमकामिनी की इसी अनौपचारिक पाठशाला में शुरू हुआ था। अपराजेय कथाशिल्पी शरत्चन्द्र के निर्माण में कुसुमकामिनी के इस योगदान को अमिट माना गया है। जो उन्हें बंकिमचन्द्र की रचनाएँ पढ़कर सुनाती थीं।
दुख और अभाव – पिता की अकर्मण्यता के कारण परिवार को बार-बार ननिहाल (भागलपुर) शरण लेनी पड़ती थी, जहाँ शरत को कठोर अनुशासन और अपमान का सामना करना पड़ा। माँ की मृत्यु और फिर पिता के निधन ने उन्हें पूरी तरह झकझोर दिया।
द्वितीय पर्व – दिशा की खोज (बर्मा प्रवास और लेखन का उदय)
इस खंड में शरत के घर छोड़कर चले जाने और बर्मा (रंगून) में उनके जीवन के संघर्षों एवं एक महान लेखक के रूप में उनके उदय का वर्णन है।
बर्मा पलायन – आजीविका की तलाश में शरत 1903 में रंगून चले गए। वहाँ उन्होंने रेलवे और लोक निर्माण विभाग (PWD) में क्लर्क के रूप में नौकरी की।
लेखन की शुरुआत – बर्मा में ही उनकी प्रसिद्ध रचना ‘बड़ी दीदी’ का प्रकाशन कलकत्ता की ‘भारती’ पत्रिका में उनके नाम के बिना हुआ, जिससे वे रातों-रात प्रसिद्ध हो गए। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भी इस रचना की प्रशंसा की थी।
विवाह और निजी जीवन – शरत का पहला विवाह शान्ति देवी से हुआ था, जिनकी प्लेग से मृत्यु हो गई। बाद में उन्होंने हिरण्मयी देवी को अपनी जीवनसंगिनी बनाया, जो अंत तक उनके साथ रहीं।
मानवीय संवेदना – रंगून में उन्होंने अछूतों, दलितों और पतितों की सेवा की। वे स्वयं अफीम का सेवन करते थे और उन्हें एक “आवारा” व्यक्ति माना जाता था, लेकिन एकांत में वे विज्ञान, दर्शन और समाजशास्त्र का गहन अध्ययन करते थे
तृतीय पर्व – दिशांत (प्रसिद्धि, राजनीति और महाप्रयाण)
यह खंड शरत के भारत लौटने, उनकी बढ़ती लोकप्रियता, राजनीतिक सक्रियता और उनके जीवन के अंतिम समय का चित्रण करता है।
कलकत्ता वापसी – शरत 1916 में सदा के लिए कलकत्ता लौट आए और हावड़ा के शिवपुर तथा बाद में सामताबेड़ में बस गए।
साहित्यिक सफलता – उनके उपन्यास जैसे ‘चरित्रहीन’, ‘श्रीकांत’, ‘देवदास’, ‘गृहदाह’ और ‘शेष प्रश्न’ ने लोकप्रियता के सभी कीर्तिमान तोड़ दिए। उन्होंने समाज की रूढ़ियों को चुनौती दी और “पतित” मानी जाने वाली नारियों में छिपी उच्च मानवता को उभारा।
राजनीति और देशप्रेम – शरत देशबन्धु चित्तरंजन दास के प्रभाव में सक्रिय राजनीति में आए और हावड़ा जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने। उनका क्रांतिकारी उपन्यास ‘पथेर दाबी’ ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया था।
रवीन्द्रनाथ और शरत – शरत रवीन्द्रनाथ टैगोर को अपना गुरु मानते थे, यद्यपि असहयोग आंदोलन और चरखे जैसे विषयों पर दोनों में वैचारिक मतभेद थे।
अंतिम समय – जीवन के अंतिम वर्षों में वे स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं, विशेषकर लीवर कैंसर से ग्रसित रहे। 16 जनवरी 1938 को कलकत्ता के एक नर्सिंग होम में उनका देहावसान हो गया।
निष्कर्ष
‘आवारा मसीहा’ केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं है, बल्कि एक ऐसे कलाकार की गाथा है, जिसने स्वयं दुख भोगा ताकि वह दूसरों की पीड़ा को अपनी लेखनी से स्वर दे सके। विष्णु प्रभाकर ने शरत के “अवारा” और “मसीहा” दोनों रूपों को संतुलित ढंग से प्रस्तुत किया है
आवारा मसीहा की समीक्षा समीक्षा (A Review of Aawara Masiha)
विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित ‘आवारा मसीहा’ केवल शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की जीवनी ही नहीं, बल्कि हिन्दी साहित्य में जीवनी-लेखन का एक मानदण्ड (Milestone) है,। स्रोतों के आधार पर इस कालजयी कृति की समीक्षा निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से की जा सकती है-
1. गहन शोध और प्रामाणिकता
लेखक ने इस जीवनी को लिखने के लिए 14 वर्ष (1959-1973) का लंबा समय लगाया। उन्होंने शरत के जीवन के सूत्रों को खोजने के लिए बिहार, बंगाल और बर्मा की व्यापक यात्राएँ कीं, उनके समकालीनों से साक्षात्कार किए और विवश होकर ज्योतिषियों व विश्वविद्यालय के पुराने कैलेंडरों तक का सहारा लिया ताकि शरत के बिखरे हुए जीवन-क्रम को व्यवस्थित किया जा सके। यहाँ तक कि बंगाल के विद्वानों ने भी स्वीकार किया कि जो कार्य वे अपनी भाषा में न कर सके, वह विष्णु प्रभाकर ने हिन्दी में कर दिखाया।
2. शीर्षक की सार्थकता – ‘आवारा’ और ‘मसीहा’ का द्वंद्व
लेखक ने इस नाम के माध्यम से शरत के व्यक्तित्व के दो विपरीत ध्रुवों को जोड़ा है। ‘आवारा’ वह व्यक्ति है जिसके पास गुण तो हैं पर दिशा नहीं, और जैसे ही उसे ‘दिशा’ मिल जाती है, वह ‘मसीहा’ बन जाता है,। यह जीवनी दिखाती है कि कैसे एक भटका हुआ, अफीम का सेवन करने वाला और बदनाम गलियों में रहने वाला व्यक्ति अपनी लेखनी से पीड़ित मानवता और अपमानित नारियों का उद्धारक बन गया।
3. वस्तुनिष्ठता और सहानुभूति का संतुलन
विष्णु प्रभाकर ने शरत को न तो देवता बनाया और न ही शैतान, उन्होंने उन्हें एक ‘मनुष्य’ के रूप में प्रस्तुत किया है। जो अपनी कमजोरियों और महानताओं के साथ जीवित है। लेखक का उद्देश्य केवल ऐतिहासिक तथ्य जुटाना नहीं था, बल्कि उन तथ्यों के पीछे की ‘प्रेरणा’ और ‘सत्य’ को खोजना था। उन्होंने शरत के जीवन से जुड़ी परस्पर विरोधी बातों और अफवाहों के बीच से वास्तविक शरतचन्द्र को निकालने का सफल प्रयास किया है।
4. जीवन दर्शन और सामाजिक चेतना
समीक्षा की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण है कि यह जीवनी शरत के माध्यम से तत्कालीन समाज की रूढ़ियों पर प्रहार करती है। लेखक ने दिखाया है कि कैसे शरत ने सतीत्व से ऊपर नारीत्व को स्थान दिया। यह पुस्तक शरत के उस विद्रोही स्वभाव को रेखांकित करती है। जिसने समाज के ‘भले लोगों’ की पाखंडी नैतिकता को चुनौती दी और ‘पतित’ मानी जाने वाली महिलाओं में छिपी उच्च मानवीय संवेदनाओं को उजागर किया।
5. कलात्मक संरचना और भाषा-शैली
जीवनी को तीन पर्वों (दिशहारा, दिशा की खोज, दिशांत) में विभाजित करना शरत के जीवन के विकास को एक कथात्मक प्रवाह प्रदान करता है। लेखक ने अपनी भाषा को इतना सहज और पारदर्शी रखा है कि वह शरत के अपने साहित्य की सादगी से मेल खाती है। उन्होंने कल्पना का सहारा न लेकर शरत के मित्रों के संस्मरणों और स्वयं शरत की भाषा का यथासंभव उपयोग किया है, जिससे जीवनी में प्राणशक्ति आ गई है।
6. साहित्यिक एवं ऐतिहासिक महत्व
यह जीवनी केवल शरतचन्द्र का जीवन-चरित्र नहीं है, बल्कि तत्कालीन बंगाल के नवजागरण, रवीन्द्रनाथ टैगोर के साथ उनके जटिल संबंधों और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके गुप्त व प्रकट योगदान का ऐतिहासिक दस्तावेज भी है। यह दिखाती है कि एक महान कलाकार का निर्माण किन अभावों और अपमानों की भट्ठी में तपकर होता है।
‘आवारा मसीहा’ हिन्दी की उन जीवनियों में से है जहाँ जीवनीकार और उसका नायक एकाकार हो गए हैं। विष्णु प्रभाकर ने एक शोधार्थी की तटस्थता और एक कथाकार की संवेदना के साथ शरतचन्द्र के ‘अवारा’ जीवन को ‘मसीहा’ की गरिमा प्रदान की है
रवीन्द्रनाथ टैगोर
शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय और रवीन्द्रनाथ टैगोर के बीच के जटिल संबंधों को गहरी श्रद्धा, वैचारिक मतभेद और पारस्परिक साहित्यिक प्रशंसा के एक अनूठे मिश्रण के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। जहाँ शरतचन्द्र अंत तक रवीन्द्रनाथ को अपना “गुरु” मानते रहे, वहीं राजनीति, समाज और कला पर उनके अलग-अलग दृष्टिकोणों के कारण उनके संबंधों की बार-बार परीक्षा हुई।
1. गुरु-शिष्य का अटूट बंधन
शरतचन्द्र रवीन्द्रनाथ टैगोर को सर्वोच्च साहित्यिक अधिकार और अपना व्यक्तिगत गुरु मानते थे। उन्होंने स्वयं को टैगोर का “परम शिष्य” कहा था। सार्वजनिक मतभेदों के बावजूद, शरतचन्द्र का हमेशा यह मानना था कि उनकी साहित्यिक सफलता काफी हद तक टैगोर की रचनाओं के गहन अध्ययन का परिणाम थी, विशेष रूप से उनके बर्मा प्रवास के दौरान।
2. प्रतिभा के प्रति पारस्परिक सम्मान
रवीन्द्रनाथ टैगोर उन पहले लोगों में से थे जिन्होंने शरतचन्द्र की असाधारण कहानी कहने की शक्ति को पहचाना था। शरतचन्द्र की प्रारंभिक रचना ‘बड़ी दीदी’ को पढ़कर टैगोर ने लेखक को एक “असाधारण शक्तिशाली लेखक” के रूप में सराहा था।
3. वैचारिक और राजनीतिक मतभेद
उनके बीच सबसे महत्वपूर्ण टकराव असहयोग आंदोलन और चरखे के उपयोग को लेकर हुए।
चरखा – जहाँ शरतचन्द्र अनुशासन के कारण खादी पहनते और सूत कातते थे, वहीं वे इसे स्वतंत्रता का वास्तविक मार्ग नहीं मानते थे। उन्होंने गांधी और टैगोर से स्पष्ट कहा था कि “सैनिक, न कि चरखे” आज़ादी दिलाएंगे।
राजनीतिक दर्शन – टैगोर पहले आंतरिक मानसिक मुक्ति में विश्वास करते थे, जबकि शरतचन्द्र—क्रांतिकारियों से प्रभावित होकर—मानते थे कि राजनीतिक स्वतंत्रता ही सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
4. साहित्यिक संघर्ष और “पथेर दाबी” की घटना
यह संबंध तब गंभीर तनाव में आ गया जब ब्रिटिश सरकार ने शरतचन्द्र के क्रांतिकारी उपन्यास पथेर दाबी पर प्रतिबंध लगा दिया।
शरतचन्द्र ने इस प्रतिबंध के विरोध के लिए टैगोर की सहायता माँगी, लेकिन टैगोर ने एक लंबा पत्र लिखकर मना कर दिया और समझाया कि जब एक लेखक राज्य पर प्रहार करता है, तो उसे राज्य के प्रतिशोध को सहने के लिए तैयार रहना चाहिए।
शरतचन्द्र को इससे गहरी मानसिक चोट लगी। उन्हें लगा कि “राष्ट्र का कवि” लेखक के विरोध करने के अधिकार का समर्थन करने के बजाय अंग्रेजों की “सहनशीलता” की प्रशंसा कर रहा है।
वे साहित्य में आधुनिकता और यथार्थवाद पर भी असहमत थे। टैगोर ने शरतचन्द्र द्वारा समाज के “निचले” या “पतित” वर्गों (जैसे चीतपुर की गलियां) के चित्रण की आलोचना की थी। टैगोर का तर्क था कि कला सुंदरता के “निर्मल मंदिर” की होनी चाहिए, न कि सड़कों के कीचड़ की।
5. सामाजिक और वर्गीय विषमता
स्रोत इस बात को रेखांकित करते हैं कि टैगोर एक अभिजात (Aristocratic) पृष्ठभूमि से आए थे, जबकि शरतचन्द्र एक “आवारा” थे जो समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों के बीच जीवन बिताते थे,। टैगोर ने भी स्वीकार किया कि सामाजिक स्थिति और उम्र के इस अंतर ने शुरू में उन्हें एक-दूसरे से दूर रखा।
6. अंतिम सुलह और सम्मान
इन तमाम तनावों के बावजूद, बंगाली साहित्य के इन दो दिग्गजों ने अंततः अपने मतभेदों को भुला दिया। शरतचन्द्र के 60वें जन्मदिन पर, टैगोर ने एक अत्यंत भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की और शरतचन्द्र की महान प्रतिभा तथा हर बंगाली घर में उनके प्रतिष्ठित स्थान को स्वीकार किया। 1938 में शरतचन्द्र की मृत्यु के बाद, शोकग्रस्त टैगोर ने एक कविता लिखी जिसमें कहा गया कि भले ही वह व्यक्ति शारीरिक रूप से चला गया हो, लेकिन राष्ट्र के हृदय में “प्रेम के आसन” पर उनका स्थान अमर है।
विस्तार पूर्वक प्रश्नोत्तर (Detailed Questions and Answers)
प्रश्न -1 शरत् चन्द्र की वह कौन सी प्रसिद्ध रचना थी जिसे ब्रिटिश सरकार ने जब्त कर लिया था?
1. प्रकाशन और जब्ती का घटनाक्रम
प्रकाशन: ‘पथेर दाबी’ पहले ‘बंगवाणी’ पत्रिका में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुई थी और 31 अगस्त 1926 को यह पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई।
जब्ती: इसके प्रकाशित होने के लगभग चार महीने बाद, जनवरी 1927 में ब्रिटिश सरकार ने इसे राजद्रोह (Sedition) के आरोप में जब्त कर लिया। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, इस पुस्तक के लगभग हर पृष्ठ पर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह का प्रचार पाया गया था।
2. लेखक की अडिगता और साहस
इस उपन्यास को छापने से पहले कई प्रकाशक डर रहे थे। सुधीरचन्द्र सरकार ने इसे छापने के लिए एक हज़ार रुपये अग्रिम दिए थे, लेकिन उनके वकील ने चेतावनी दी कि इसे बिना बदलाव के छापने पर जेल हो सकती है।
जब शरत् बाबू से कुछ राजद्रोही अंशों को बदलने के लिए कहा गया, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, “मैं एक शब्द भी नहीं बदलूंगा। कॉमा तक नहीं बदलूंगा। इच्छा हो तो छापो, नहीं तो मत छापो”। अंततः सर आशुतोष मुकर्जी के पुत्रों ने इसे छापने का जोखिम उठाया।
3. क्रांतिकारियों के लिए “बाइबल”
पुलिस कमिश्नर ने स्वयं शरत् बाबू से कहा था कि इस पुस्तक ने क्रांतिकारियों को “पागल” बना दिया है।
ब्रिटिश पुलिस को अक्सर क्रांतिकारी ठिकानों की तलाशी के दौरान दो चीजें अनिवार्य रूप से मिलती थीं: गीता और ‘पथेर दाबी‘। यह पुस्तक स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत बन गई थी।
4. रवीन्द्रनाथ टैगोर और ‘पथेर दाबी‘ विवाद
जब ब्रिटिश सरकार ने पुस्तक पर प्रतिबंध लगाया, तो शरत्चन्द्र ने रवीन्द्रनाथ टैगोर से इस प्रतिबंध के विरुद्ध विरोध जताने का अनुरोध किया।
टैगोर ने विरोध करने से मना कर दिया और एक लंबा पत्र लिखकर समझाया कि जब कोई लेखक राज्य की शक्ति पर प्रहार करता है, तो उसे राज्य के प्रतिशोध के लिए तैयार रहना चाहिए। टैगोर का मानना था कि अंग्रेजों ने पुस्तक को केवल जब्त किया है और लेखक को जेल नहीं भेजा, यह उनकी “सहनशीलता” है।
टैगोर के इस उत्तर से शरत् बाबू को गहरी मानसिक पीड़ा हुई, क्योंकि उन्हें लगा कि उनके गुरु ने लेखक के अभिव्यक्ति के अधिकार का समर्थन नहीं किया।
5. लोकप्रियता और प्रभाव
प्रतिबंध के कारण पुस्तक की मांग इतनी बढ़ गई कि उस समय इसकी एक-एक प्रति पचास से सौ रुपये तक में बिकी, जबकि यह बहुत ऊँची कीमत थी।
उपन्यास का नायक ‘सव्यसाची‘ भारतीय साहित्य के सबसे सशक्त क्रांतिकारी पात्रों में से एक माना जाता है, जिसे शरत् बाबू ने अपने जीवन के अनुभवों और क्रांतिकारी मित्रों (जैसे बिपिन बिहारी गांगुली) के आधार पर गढ़ा था।
संक्षेप में, ‘पथेर दाबी’ केवल एक उपन्यास नहीं था, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक साहित्यिक दस्तावेज़ था जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को हिला दिया था
प्रश्न 2 – शरत् चन्द्र ने बर्मा (रंगून) प्रवास के दौरान कुल कितने वर्ष वहाँ बिताए?
1. शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय के जीवन का बर्मा (रंगून) प्रवास लगभग 13 वर्षों (1903 – 1916 ई०) का था, जिसे जीवनीकार विष्णु प्रभाकर ने उनके जीवन के ‘द्वितीय पर्व: दिशा की खोज‘ के रूप में चित्रित किया है। यह समय शरत् के एक साधारण क्लर्क से ‘मसीहा’ कथाकार बनने की यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव था। इस विषय की विस्तृत जानकारी—
१. बर्मा आगमन और शुरुआती संघर्ष (१९०३ ई०)
शरत्चन्द्र जनवरी 1903 में एक लोहे का ट्रंक और बिस्तर लेकर जहाज से रंगून पहुंचे।
वहाँ वे शुरू में अपने मौसा अघोरनाथ चटर्जी (जो रंगून में एडवोकेट थे) के घर ठहरे।
नौकरी की तलाश में उन्होंने शुरू में बर्मा रेलवे के ऑडिट ऑफिस में काम किया, जो लगभग डेढ़ साल तक चला।
२. जीवन का ‘बोहेमियन‘ और ‘आवारा‘ दौर
रेलवे की नौकरी छूटने के बाद वे कुछ समय तक दिशाहीन होकर भटकते रहे। वे कभी ‘पेगू’ तो कभी उत्तरी बर्मा के जंगलों में ‘पूँगी’ (बौद्ध साधु) बनकर घूमते रहे।
उन्होंने रंगून के ‘मिस्त्री पल्ली’ जैसे बदनाम और गरीब इलाकों में समय बिताया, जहाँ वे अछूतों और सताए हुए लोगों के दुःख-दर्द के साथी बने। यही अनुभव बाद में उनके उपन्यासों का आधार बने।
३. स्थायी नौकरी और साहित्यिक उदय
अंततः उन्हें ‘एग्जामिनर, पब्लिक वर्क्स एकाउंट्स‘ (जो बाद में एकाउंटेंट जनरल का कार्यालय बना) में स्थायी क्लर्क की नौकरी मिली। उनका वेतन ५० रुपये से शुरू होकर ९० रुपये तक पहुँचा।
बर्मा में रहते हुए ही उनकी रचना ‘बड़ी दीदी‘ कलकत्ता की ‘भारती’ पत्रिका में उनके नाम के बिना छपी, जिसने बंगाल में तहलका मचा दिया और वे प्रसिद्ध हो गए।
यहीं उन्होंने ‘रामेर सुमति‘, ‘पथ निर्देश‘ और ‘बिन्दो का लल्ला‘ जैसी कालजयी कहानियाँ लिखीं।
४. व्यक्तिगत त्रासदी और विवाह
बर्मा प्रवास के दौरान ही शरत् का पहला विवाह शान्ति देवी से हुआ, लेकिन रंगून में फैली प्लेग की महामारी में उनकी पत्नी और नन्हे पुत्र की मृत्यु हो गई।
बाद में उन्होंने हिरण्मयी देवी (मोक्षदा) को अपना जीवनसाथी बनाया, जो अंत तक उनके साथ रहीं।
५. बर्मा छोड़ने का कारण (१९१६ ई०)
बर्मा में १३ वर्ष बिताने के बाद, अप्रैल १९१६ में वे सदा के लिए भारत (कलकत्ता) लौट आए।
वापसी के दो मुख्य कारण थे: उनका खराब स्वास्थ्य (हृदय रोग और अन्य बीमारियाँ) और कार्यालय में अपने उच्च अधिकारी (मेजर बनार्ड) के साथ हुआ भयंकर झगड़ा और हाथापाई, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
निष्कर्षत- बर्मा के ये १३ वर्ष शरत् के लिए केवल आजीविका का साधन नहीं थे, बल्कि यहीं उन्होंने ‘चरित्रहीन‘, ‘श्रीकांत‘ और ‘पथेर दाबी‘ जैसे उपन्यासों की कच्ची सामग्री (अनुभव) एकत्र की थी। यह उनके जीवन का वह समय था जब उन्होंने समाज के निचले तबके और ‘पतित’ नारी के भीतर छिपे देवता को पहचाना।
प्रश्न .3 बर्मा में शरत् चन्द्र ने किस सरकारी विभाग में नौकरी की थी?
उत्तर – विष्णु प्रभाकर की जीवनी ‘आवारा मसीहा‘ के अनुसार, बर्मा (रंगून) में शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय की सरकारी नौकरी का विवरण अत्यंत रोचक है। यह उनके जीवन का वह समय था जब वे एक साधारण क्लर्क की भूमिका निभाते हुए विश्व प्रसिद्ध लेखक बनने की तैयारी कर रहे थे।
1. नौकरी की प्राप्ति और विभाग का नाम
शरत्चन्द्र ने बर्मा में ‘एग्जामिनर, पब्लिक वर्क्स एकाउंट्स‘ (Examiner, Public Works Accounts) के कार्यालय में नौकरी की थी। इस विभाग में उन्हें नौकरी दिलाने में मणीन्द्रकुमार मित्र (डिस्ट्रिक्ट एग्जामिनर) का महत्वपूर्ण योगदान था, जो शरत् के मधुर कण्ठ और संगीत के प्रशंसक थे। बाद में, १० वर्षों की सेवा के दौरान उनका यह विभाग ‘एकाउंटेंट जनरल‘ (Accountant General) के कार्यालय में सम्मिलित (Merge) हो गया था।
२. पद और वेतन का विकास
शुरुआत: उन्होंने इस विभाग में ३० रुपये मासिक वेतन पर एक अस्थायी क्लर्क के रूप में कार्य शुरू किया था।
स्थायीकरण: संतोषजनक कार्य के कारण तीन महीने के भीतर ही वे स्थायी हो गए और उनका वेतन बढ़कर ५० रुपये, फिर ६५ रुपये हो गया।
अंतिम वेतन: जब उन्होंने १० वर्ष बाद इस पद से इस्तीफा दिया, तब उनका वेतन ९० रुपये मासिक तक पहुँच चुका था।
३. कार्य और जीवन का संतुलन
दफ्तरी अनुशासन बनाम विद्रोही मन: शरत् का मन दफ्तर के बंधे-बंधाए नियमों में नहीं लगता था। वे अक्सर काम छोड़कर शतरंज खेलने, संगीत या साहित्य-चर्चा में मग्न हो जाते थे।
अध्ययन और लेखन: दफ्तर के बाद वे अपना अधिकांश समय रंगून की प्रसिद्ध ‘बर्नार्ड लाइब्रेरी‘ में बिताते थे, जहाँ उन्होंने समाजशास्त्र, दर्शन और विज्ञान की हज़ारों पुस्तकें पढ़ीं। इसी नौकरी के दौरान उन्होंने अपनी कालजयी रचना ‘चरित्रहीन‘ और ‘नारी का इतिहास‘ लिखना शुरू किया था।
समाज सेवा: दफ्तर के बाबू होने के बावजूद वे अक्सर ‘मिस्त्री पल्ली’ (गरीबों की बस्ती) में जाकर मज़दूरों के लिए प्रार्थना-पत्र लिखते थे और बीमारों की सेवा करते थे।
४. नौकरी का अंत: मेजर बनार्ड के साथ संघर्ष
शरत्चन्द्र की इस नौकरी का अंत अत्यंत नाटकीय रहा। दफ्तर के काम में उनकी लापरवाही और उच्च अधिकारियों के प्रति उनके स्वतंत्र रवैये के कारण अक्सर तनातनी रहती थी।
घटना: एक दिन ऑफिस सुपरिटेंडेंट मेजर बनार्ड ने शरत् से एक फाइल मांगी। शरत् ने कहा कि वह उनके पास नहीं है, लेकिन खोज करने पर वह शरत् की दराज़ में ही मिली। इस बात पर मेजर बनार्ड और शरत् के बीच तीखी बहस और हाथापाई हो गई।
परिणाम: इस झगड़े में शरत् के कपड़े खून से तर हो गए। यद्यपि गलती बनार्ड की मानी गई और उस पर जुर्माना हुआ, लेकिन शरत् ने अपमानित महसूस करते हुए अप्रैल १९१६ में नौकरी से इस्तीफा दे दिया और सदा के लिए भारत लौट आए।
निष्कर्षत- पब्लिक वर्क्स एकाउंट्स की यह नौकरी शरत् के लिए केवल आजीविका का साधन नहीं थी, बल्कि इसी कालखंड में उन्होंने समाज के निचले वर्गों का अनुभव प्राप्त किया, जो बाद में उनके साहित्य की आधारशिला बना।
प्रश्न 4 – ‘आवारा मसीहा’ किस विश्वविख्यात भारतीय साहित्यकार की जीवनी है?”
विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित ‘आवारा मसीहा‘ सुप्रसिद्ध बंगाली उपन्यासकार शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय की कालजयी जीवनी है। हिन्दी साहित्य में इस जीवनी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न केवल एक महान लेखक का जीवन-वृत्तांत है, बल्कि जीवनी-लेखन की कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण भी है।
१. शरत् चन्द्र की लोकप्रियता
शरत् चन्द्र की गणना भारत के उन विरल उपन्यासकारों में की जाती है, जो सही अर्थों में देशभर में अत्यंत लोकप्रिय थे। उनकी लगभग सभी रचनाओं का अनुवाद भारत की सभी प्रमुख भाषाओं में हुआ और उन्हें पाठकों द्वारा बार-बार, बड़े चाव से पढ़ा गया।
२. जीवनी की आवश्यकता और सृजन
आश्चर्य की बात यह थी कि शरत् बाबू की इतनी प्रसिद्धि के बावजूद, उनकी कोई संतोषजनक जीवनी स्वयं उनकी मातृभाषा (बंगला) में भी उपलब्ध नहीं थी। इस अभाव को पूरा करने का बीड़ा हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर ने उठाया। उन्होंने इस जीवनी को पूरा करने के लिए १४ वर्ष (१९५९-१९७३ ई०) तक अथक परिश्रम किया।
३. शोध और प्रामाणिकता
विष्णु प्रभाकर ने इस जीवनी को प्रामाणिक बनाने के लिए शरत् के जीवन से जुड़े हर स्थान (बिहार, बंगाल और बर्मा) की यात्रा की। उन्होंने शरत् के समकालीनों से साक्षात्कार किए, उनके पत्रों का अध्ययन किया और यहाँ तक कि पुराने स्कूल-कॉलेज के रजिस्टर और विश्वविद्यालय के कैलेंडरों तक को खँगाला ताकि तिथियों और घटनाओं की सत्यता जाँची जा सके।
४. शीर्षक ‘आवारा मसीहा‘ का अर्थ
लेखक ने इस नाम के माध्यम से शरत् के व्यक्तित्व के क्रमिक विकास को दर्शाया है।
‘आवारा‘ उस भटके हुए युवक का प्रतीक है जिसके पास गुण तो हैं पर कोई निश्चित दिशा नहीं है।
‘मसीहा‘ उस रूप का प्रतीक है जब वही व्यक्ति अपनी लेखनी के माध्यम से पीड़ित मानवता और अपमानित नारियों का उद्धारक बन जाता है।
५. वैश्विक पहचान और सम्मान
यह जीवनी केवल हिन्दी तक सीमित नहीं रही। इसका अनुवाद अंग्रेज़ी, बंगला, मलयालम, पंजाबी, सिंधी, उर्दू, तेलुगु और गुजराती जैसी कई भाषाओं में हो चुका है। इसे ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ और ‘पाब्लो नेरुदा सम्मान’ जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से भी नवाजा गया है
निष्कर्षत – ‘आवारा मसीहा’ शरत् चन्द्र के जीवन के अज्ञात पहलुओं को उजागर करने वाली एक ऐसी गाथा है जो एक कलाकार के ‘आवारा’ बचपन से लेकर ‘मसीहा’ बनने तक के संघर्षपूर्ण सफर को प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करती है।
प्रश्न 5 – लेखक विष्णु प्रभाकर ने शरत् चन्द्र की जीवनी लिखने में कितने वर्ष का समय लगाया?
विष्णु प्रभाकर द्वारा शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय की जीवनी ‘आवारा मसीहा‘ को पूरा करने में लगे १४ वर्ष (१९५९-१९७३ ई०) की अवधि हिंदी साहित्य में शोध और साधना का एक अनूठा उदाहरण है। लेखक ने इस लंबी अवधि और इसके पीछे के संघर्षों का विवरण पुस्तक की भूमिका में विस्तार से दिया है।
शरत् के जीवन की जटिलता और गोपनीयता: शरत् बाबू स्वभाव से अकिंचन और रहस्यमय थे। वे अपने निजी जीवन के बारे में अक्सर परस्पर विरोधी और कपोल-कल्पित कहानियाँ सुनाया करते थे। लेखक के अनुसार, उनका जीवन इतना उलझा हुआ और विशृंखल था कि घटनाओं का सही क्रम बैठाना एक “दुष्कर कार्य” था।
व्यापक भौगोलिक शोध: विष्णु प्रभाकर ने शरत् के जीवन के सूत्रों को खोजने के लिए केवल पुस्तकालयों का सहारा नहीं लिया, बल्कि उन्होंने उन सभी स्थानों की यात्रा की जहाँ शरत् रहे थे। वे बिहार, बंगाल और बर्मा (रंगून) के उन गाँवों और गलियों में गए जहाँ शरत् का बचपन और युवावस्था बीती थी।
प्रामाणिकता के लिए संघर्ष: लेखक ने शरत् के समकालीनों, मित्रों और रिश्तेदारों से साक्षात्कार किए। कई बार उन्हें एक ही घटना के बारे में दो व्यक्तियों से बिल्कुल अलग जानकारियाँ मिलीं। तिथियों की पुष्टि के लिए उन्हें ज्योतिषियों की शरण लेनी पड़ी, पुराने स्कूल-कॉलेज के रजिस्टर टटोलने पड़े और विश्वविद्यालय के दशकों पुराने कैलेंडर देखने पड़े।
सामाजिक और भाषा संबंधी बाधाएँ: विष्णु प्रभाकर स्वयं बंगाली नहीं थे और शुरू में वे बंगला भाषा भी अच्छी तरह नहीं जानते थे। कई लोगों ने उन्हें यह कहकर हतोत्साहित किया कि “तुम शरत् की जीवनी नहीं लिख सकते” या “एक आवारा व्यक्ति का जीवन किसी के लिए अनुकरणीय नहीं हो सकता”।
साहित्यिक प्रतिबद्धता: विष्णु प्रभाकर एक ‘मसिजीवी’ (लेखन पर निर्भर) लेखक थे, इसलिए १४ वर्ष तक एक ही प्रोजेक्ट पर समय और धन खर्च करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी। उन्होंने कल्पना का सहारा न लेकर केवल प्रामाणिक तथ्यों के आधार पर शरत् के “वास्तविक रूप” को उजागर करने का संकल्प लिया था, जिसमें समय लगना अनिवार्य था।
निष्कर्षत – यह १४ वर्ष केवल लेखन के नहीं थे, बल्कि एक ऐसी “दिशा की खोज” के थे जिसने शरत्चन्द्र के ‘आवारा’ व्यक्तित्व के भीतर छिपे ‘मसीहा’ को दुनिया के सामने पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया। जैसा कि लेखक ने स्वयं कहा है, इस कार्य को पूरा करने में उन्हें जो “आस्था और आनंद” मिला, वही उनका वास्तविक पारिश्रमिक था।
प्रश्न – 6 शरत् चन्द्र के पिता का जीवन कैसा था?
विष्णु प्रभाकर की जीवनी ‘आवारा मसीहा‘ के अनुसार, शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय के पिता मोतीलाल चट्टोपाध्याय का व्यक्तित्व अत्यंत जटिल और विरोधाभासों से भरा था। शरत् के जीवन और उनके साहित्यकार बनने की प्रक्रिया में उनके पिता का गहरा प्रभाव रहा है।
१. स्वभाव और व्यक्तित्व
मोतीलाल चट्टोपाध्याय स्वभाव से यायावर (घुमक्कड़) और स्वप्नदर्शी व्यक्ति थे। उनके मन में एक कलाकार और शिल्पी बसता था, जिसके कारण वे नौकरी की ‘दासता’ और दफ्तर के नियमों को सहन नहीं कर पाते थे। वे अक्सर अपने उच्च अधिकारियों से झगड़कर नौकरी छोड़ दिया करते थे और अभावों में रहने के बावजूद अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करते थे।
२. अधूरी कला-साधना
मोतीलाल को साहित्य और कला में गहरी रुचि थी। वे कविता, कहानी, उपन्यास और नाटक सभी कुछ लिखने का शौक रखते थे, लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि वे कभी कोई रचना पूरी नहीं कर सके। वे अपनी रचनाएँ बहुत सुंदर अक्षरों में शुरू करते थे, लेकिन बीच में ही उन्हें अधूरा छोड़ देते थे। उनके इसी ‘अधूरेपन’ ने बालक शरत् के मन में यह टीस पैदा की कि वे अपने पिता की कहानियों को पूरा करें, जो बाद में उनके लेखक बनने की प्रेरणा बनी।
३. आर्थिक संघर्ष और पारिवारिक प्रभाव
मोतीलाल की व्यावहारिक अकर्मण्यता के कारण परिवार को हमेशा घोर गरीबी और अभावों का सामना करना पड़ा। उनके पास जीविका का कोई स्थायी साधन नहीं था, जिसके कारण शरत् की माता भुवनमोहिनी को अक्सर मजबूर होकर अपने पिता (केदारनाथ) के घर भागलपुर में शरण लेनी पड़ती थी। इस स्थिति ने शरत् के बचपन को अपमान और असुरक्षा से भर दिया, जिसका चित्रण उनके साहित्य में बार-बार मिलता है।
४. बच्चों के साथ संबंध
कठोर अनुशासन के बजाय मोतीलाल बच्चों के साथ बराबरी का व्यवहार करते थे। वे बच्चों की शरारतों में उनकी गुप्त सहायता करते थे और उन्हें सुंदर अक्षर लिखना सिखाते थे। वे अफ़सोस जताते थे कि उनके बच्चे अभावों में जी रहे हैं, लेकिन उनकी ‘सौंदर्य-भावना’ उन्हें ठोस प्रयासों से दूर रखती थी।
५. जीवन का दुखद अंत
पत्नी भुवनमोहिनी की मृत्यु के बाद मोतीलाल पूरी तरह टूट गये और एकाकी जीवन बिताने लगे। जीवन के अंतिम वर्षों में वे पागलों की तरह धूल-मिट्टी में लिपटे इधर-उधर घूमते थे और उनके पास दो वक्त के भोजन तक का प्रबंध नहीं था। १ जनवरी १८९२ को भागलपुर में अत्यंत विपन्नता की स्थिति में उनका निधन हो गया।
निष्कर्षत – मोतीलाल चट्टोपाध्याय ने शरत्चन्द्र को विरासत में गरीबी और अस्थिरता तो दी ही, साथ ही वह संवेदनशील हृदय और सृजनात्मक प्रतिभा भी दी, जिसने आगे चलकर शरत् को ‘कथा-शिल्पी’ बनाया।
प्रश्न-7 शरत् चन्द्र के मन में लेखक बनने की प्रेरणा सबसे पहले किसे पढ़कर जागी?
विष्णु प्रभाकर की जीवनी ‘आवारा मसीहा’ के अनुसार, शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय के मन में लेखक बनने की प्रेरणा और रवीन्द्रनाथ टैगोर को अपना ‘गुरु’ मानने की शुरुआत ‘आँख की किरकिरी‘ (चोखेर बाली) को पढ़कर ही हुई थी।
१. ‘बंगदर्शन‘ में पाठ और प्रभाव
जब शरत् किशोर अवस्था में थे, तब ‘बंगदर्शन’ पत्रिका का नवीन संस्करण प्रकाशित होना शुरू हुआ था। इसमें रवीन्द्रनाथ टैगोर की युगांतरकारी रचना ‘चोखेर बाली‘ (आँख की किरकिरी) धारावाहिक रूप में छप रही थी। शरत् ने इसे पढ़ा और उन्हें एक “गहरे आनंद की अनुभूति” हुई, जिसे वे जीवन भर नहीं भूल सके।
२. जीवन-दर्शन में बदलाव
इससे पहले शरत् का मन अक्सर भूत-प्रेतों की कहानियों से प्रभावित रहता था। लेकिन टैगोर की इस रचना ने उनके सामने “प्रकाश और सौंदर्य का एक नया जादू-भरा संसार” खोल दिया। लेखक ने शरत् की तुलना टॉलस्टॉय से की है, जो पुश्किन को पढ़कर वैसे ही अभिभूत हुए थे जैसे शरत् टैगोर को पढ़कर हुए।
३. गुरु-शिष्य संबंध की शुरुआत
‘आँख की किरकिरी’ पढ़ने के बाद ही शरत् के मन में यह भाव जागा कि “मैं इनसे बहुत कुछ सीख सकता हूँ। वे आज से मेरे गुरु हुए”। सूत्रों के अनुसार, शरत् जीवन के अंतिम क्षण तक टैगोर को अपना गुरु मानते रहे और उनकी सफलता के पीछे टैगोर की रचनाओं का गहरा अध्ययन था।
४. टैगोर बनाम बंकिमचन्द्र
शरत् के मन में टैगोर के प्रति गुरु-भाव जागने का एक बड़ा कारण साहित्यिक विद्रोह भी था। जहाँ बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास ‘कृष्णकांत का वसीयतनामा’ में नायिका रोहिणी के प्रणय को स्वीकार न करते हुए उसकी “हत्या” करा दी थी, वहीं टैगोर ने ‘आँख की किरकिरी‘ में एक विधवा के प्रेम और उसकी आकांक्षाओं को स्वाभाविक रूप में चित्रित किया। टैगोर की इसी “संस्कार-मुक्ति” और साहस ने शरत् को सबसे अधिक प्रभावित किया।
५. साहित्यिक निर्माण में योगदान
शरत् की साहित्यिक शिक्षा का आरंभ उनकी छोटी नानी कुसुमकामिनी की देखरेख में हुआ था, जो उन्हें ‘बंगदर्शन’ पढ़कर सुनाती थीं। ‘आँख की किरकिरी’ का उनके ऊपर इतना गहरा प्रभाव था कि बाद में जब उन्होंने ‘पथेर दाबी’ और ‘शेष प्रश्न’ जैसे उपन्यास लिखे, तो उनमें भी वही निर्भीकता और सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार दिखाई दिया जो उन्होंने सबसे पहले टैगोर की इस रचना में महसूस किया था।
निष्कर्षत – ‘आँख की किरकिरी’ वह पहली रचना थी जिसने शरत्चन्द्र के भीतर छिपे महान कथाकार को दिशा दी और उन्हें साहित्य की दुनिया में अपना ‘मसीहा’ (गुरु टैगोर) खोजने में मदद की।
प्रश्न 8 – शरत् चन्द्र ने अपनी मैट्रिक की परीक्षा किस वर्ष और किस महीने में उत्तीर्ण की थी?
जीवनी ‘आवारा मसीहा‘ के अनुसार, शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय की मैट्रिक (जिसे उस समय ‘एंट्रेंस’ या ‘प्रवेशिका’ परीक्षा कहा जाता था) की परीक्षा की तिथि और वर्ष हिंदी साहित्य के शोध की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। लेखक ने इस तथ्य को स्थापित करने के लिए विश्वविद्यालय के पुराने दस्तावेजों को खंगाला था।
1. प्रचलित भ्रांति और लेखक का शोध
शरत् बाबू के लगभग सभी पुराने जीवनीकारों ने यह उल्लेख किया था कि उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा दिसम्बर १८९४ में उत्तीर्ण की थी। हालाँकि, विष्णु प्रभाकर इस तथ्य से असहमत थे। उन्होंने शोध के दौरान कलकत्ता विश्वविद्यालय जाकर उस समय के पुराने विश्वविद्यालय कैलेंडर और रजिस्टरों की जाँच की।
2. वास्तविक तिथि: फरवरी १८९४
लेखक ने पाया कि प्रवेशिका (मैट्रिक) की परीक्षाएं वास्तव में सोमवार, १२ फरवरी १८९४ को आरंभ हुई थीं। परीक्षा का परिणाम अधिक से अधिक अप्रैल १८९४ तक घोषित हो गया होगा।
3. भ्रम का कारण
विष्णु प्रभाकर ने स्पष्ट किया कि पुराने जीवनीकारों को भ्रम क्यों हुआ। दरअसल, उस समय के विश्वविद्यालय कैलेंडर में परीक्षा का परिणाम दिसम्बर महीने में छापा जाता था। बाद के लेखकों ने कैलेंडर में छपी उस तारीख (दिसम्बर १८९४) को ही परीक्षा उत्तीर्ण करने की वास्तविक तिथि मान लिया।
4. लेखक का तर्क
लेखक ने एक बहुत ही व्यावहारिक तर्क दिया कि यदि शरत् ने दिसम्बर १८९४ में मैट्रिक पास किया होता, तो वे उसी वर्ष (१८९४ में ही) कॉलेज में प्रवेश कैसे पा सकते थे?। चूँकि उन्होंने १८९४ के शैक्षणिक सत्र में ही कॉलेज में दाखिला लिया था, इसलिए यह स्पष्ट है कि उन्होंने परीक्षा वर्ष के शुरुआती महीनों (फरवरी) में ही दी थी।
5. परीक्षा परिणाम और आगे की राह
परिणाम: शरत् बाबू ने मैट्रिक की परीक्षा द्वितीय श्रेणी (Second Division) में उत्तीर्ण की थी।
कॉलेज प्रवेश: मैट्रिक पास करने के बाद उनके सामने कॉलेज की फीस भरने की गंभीर समस्या थी। उनकी छोटी नानी कुसुमकामिनी ने उनकी मदद की और उन्हें घर के छोटे बच्चों का ट्यूटर (शिक्षक) नियुक्त करवा दिया, जिससे मिलने वाले पैसों से वे अपनी कॉलेज की फीस और किताबों का खर्च उठा सके।
निष्कर्षत- विष्णु प्रभाकर ने अपनी पैनी शोध दृष्टि से यह सिद्ध किया कि शरत् बाबू ने फरवरी १८९४ में अपनी मैट्रिक की परीक्षा दी थी, न कि दिसम्बर में, जैसा कि पहले माना जाता था।
प्रश्न – शरत् चन्द्र की पहली पत्नी का नाम क्या था, जिनकी मृत्यु प्लेग के कारण हुई थी?
जीवनी ‘आवारा मसीहा‘ के अनुसार, शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय की पहली पत्नी शांति देवी और उनकी मृत्यु से जुड़ी घटनाएँ उनके जीवन के सबसे दुखद अध्यायों में से एक हैं।
१. परिचय और विवाह की पृष्ठभूमि
पारिवारिक पृष्ठभूमि: शांति देवी रंगून (बर्मा) में रहने वाले एक बंगाली मिस्त्री यज्ञेश्वर की पुत्री थीं।
विवाह का कारण: शांति के पिता ने कुछ पैसों के लालच में उसका विवाह एक शराबी और चरित्रहीन बूढ़े व्यक्ति (घोषाल) से तय कर दिया था। एक रात उस व्यक्ति के डर से शांति भागकर शरत् बाबू के पास शरण लेने पहुँची और उनसे अपनी रक्षा की गुहार लगाई।
शैव विवाह: शरत् बाबू ने शुरू में उसके लिए दूसरा वर ढूँढने का प्रयास किया, लेकिन जब कोई रास्ता नहीं निकला, तो उन्होंने स्वयं उससे विवाह करने का निश्चय किया। समाज ने इस विवाह को औपचारिक मान्यता नहीं दी थी, लेकिन शरत् के लिए वह उनकी जीवनसंगिनी थी।
२. दांपत्य जीवन और त्रासदी
सुखद समय: विवाह के बाद शरत् के अव्यवस्थित जीवन में पहली बार किसी नारी का कोमल स्पर्श आया और उनके जीवन की धारा आनंद की ओर मुड़ गई।
प्लेग का प्रकोप: विवाह के लगभग दो वर्ष बाद ही रंगून में प्लेग की महामारी फैली, जिसने भारी तबाही मचाई।
बीमारी और मृत्यु: शांति देवी इस महामारी की चपेट में आ गईं और उन्हें तीव्र ज्वर हो गया। शरत् बाबू ने अपने मित्र गिरीन्द्रनाथ सरकार की सहायता से डॉक्टरों को बुलाया, लेकिन डॉक्टरों ने स्पष्ट कर दिया कि प्लेग के कारण उनके बचने की कोई आशा नहीं है।
अंतिम क्षण: मृत्यु से पूर्व शांति देवी ने शरत् बाबू के चरणों की धूल माँगी और उनसे अपने कष्टों के लिए क्षमा माँगी; इसके कुछ ही क्षणों बाद उनका देहांत हो गया।
३. पुत्र का शोक और प्रभाव
पुत्र की मृत्यु: इसी प्लेग की महामारी के दौरान शांति देवी के साथ-साथ शरत् बाबू का एकमात्र नन्हा पुत्र भी चल बसा।
लेखक पर प्रभाव: इस दोहरी त्रासदी ने शरत् बाबू को अंदर तक झकझोर दिया। वे इतने दुखी हुए कि कुछ समय के लिए उन्होंने लिखना और चित्र बनाना छोड़ दिया और बावलों की तरह इधर-उधर घूमने लगे।
निष्कर्षत- शांति देवी का साथ शरत् बाबू के जीवन में बहुत कम समय के लिए रहा, लेकिन इस घटना ने उनकी मानवीय संवेदनाओं को और गहरा कर दिया, जो आगे चलकर उनके साहित्य में ‘दुख’ और ‘पीड़ा’ के चित्रण में दिखाई देता है।
प्रश्न – शरत् चन्द्र की दूसरी पत्नी का नाम क्या था, जो उनकी मृत्यु के बाद २२ वर्षों तक जीवित रहीं?
उत्तर – जीवनी ‘आवारा मसीहा‘ के अनुसार, शरत्चन्द्र की दूसरी पत्नी हिरण्मयी देवी (पूर्व नाम मोक्षदा) था—
१. परिचय और पृष्ठभूमि
हिरण्मयी देवी का जन्म नाम मोक्षदा था। वे मेदिनीपुर जिले के निवासी कृष्णदास अधिकारी की कन्या थीं, जो जीविका की तलाश में बर्मा (रंगून) आए थे। वे रूपवती नहीं थीं, लेकिन उनके हृदय में स्नेह और करुणा का असीम भंडार था।
२. विवाह का घटनाक्रम
प्रारंभिक परिचय: मोक्षदा के पिता ने शरत् बाबू से उनका विवाह करने की प्रार्थना की थी, लेकिन शरत् तब इसके लिए तैयार नहीं थे।
सेवा और समर्पण – रंगून में जब शरत् बाबू गंभीर रूप से बीमार पड़े, तब मोक्षदा ने उनकी निस्वार्थ सेवा की, जिससे शरत् के मन में उनके प्रति कृतज्ञता और स्नेह जाग उठा।
विवाह – मोक्षदा के पिता उन्हें शरत् के पास छोड़कर भारत लौट गए थे। अंततः शरत् ने उनसे शैव रीति से विवाह किया और उनका नाम बदलकर ‘हिरण्मयी‘ रख दिया, क्योंकि शरत् का मानना था कि वे खरे सोने (हिरण्य) के समान शुद्ध हृदय वाली हैं।
३. वैवाहिक जीवन और स्वभाव
समर्पित पत्नी: हिरण्मयी देवी एक अत्यंत साधारण, सरल और धार्मिक महिला थीं। उन्होंने एक ‘मसीहा’ कथाकार की पत्नी होने का गौरवपूर्ण निर्वाह किया और शरत् के स्वास्थ्य तथा खान-पान का पूरा ध्यान रखा।
कलकत्ता में घर: शरत् बाबू ने कलकत्ता के अश्विनी दत्त रोड पर अपना मकान हिरण्मयी देवी के बार-बार अनुरोध करने पर ही बनवाया था, ताकि उनके स्वास्थ्य का बेहतर ध्यान रखा जा सके।
साहित्यिक प्रेरणा: शरत् ने स्वीकार किया था कि हिरण्मयी देवी के सान्निध्य और उनकी तपस्या ने ही उन्हें प्राणवान साहित्य रचने की शक्ति दी।
४. सार्वजनिक विवाद और शरत् की स्वीकृति
लंबे समय तक बंगाली समाज यह मानता रहा कि शरत् अविवाहित (बाल ब्रह्मचारी) हैं और हिरण्मयी देवी मात्र उनकी जीवन-संगिनी हैं, पत्नी नहीं। विवाह की शास्त्रसम्मत वैधता को लेकर भी विवाद रहे। हालांकि, शरत् बाबू ने अपने वसीयतनामे (Will) में स्पष्ट रूप से उन्हें अपनी ‘पत्नी‘ स्वीकार किया और अपनी पूरी संपत्ति उनके नाम कर दी।
५. शरत् की मृत्यु के बाद का जीवन
लंबी अवधि: हिरण्मयी देवी शरत् चन्द्र की मृत्यु (१६ जनवरी १९३८) के बाद लगभग २२ वर्षों तक जीवित रहीं ।
निधन: उनका देहावसान ३१ अगस्त १९६० (१५ भाद्र, १३६७ बंगाब्द) को हुआ।
निष्कर्षत- हिरण्मयी देवी शरत् चन्द्र के जीवन का वह स्थिर आधार थीं, जिन्होंने उनके ‘आवारा’ व्यक्तित्व को स्थायित्व दिया और उनके अंतिम समय तक उनकी सबसे बड़ी संबल बनी रहीं।
प्रश्न – शरत् चन्द्र ने किस उपन्यास के माध्यम से अपने जीवन के अनुभवों को छद्म रूप में व्यक्त किया है?
उत्तर – जीवनी ‘आवारा मसीहा‘ के अनुसार, ‘श्रीकान्त‘ शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय की वह कालजयी रचना है जिसे एक ‘आत्म-जीवनीमूलक उपन्यास‘ माना जाता है। इसमें शरत् बाबू ने अपने जीवन के अनेक रोमांचक और वैविध्यपूर्ण अनुभवों को कल्पना के साथ पिरोकर प्रस्तुत किया है।
1. नायक ‘श्रीकान्त‘ और लेखक का साम्य
उपन्यास का नायक ‘श्रीकान्त’ शरत् बाबू के समान ही ‘आवारा‘ (घुमक्कड़) स्वभाव का है। यद्यपि शरत् बाबू ने स्पष्ट कहा था कि ‘श्रीकान्त’ उनकी सीधे तौर पर आत्मकथा नहीं है, फिर भी वे स्वीकार करते थे कि इसमें जीवन के उन पक्षों का वर्णन है, जिनसे उनका व्यक्तिगत परिचय रहा है और उन पात्रों को लिया गया है जिनका उन्होंने निकट से अध्ययन किया था। लेखक और नायक की प्रकृति में अद्भुत समानता के कारण ही लोग इसे उनकी आत्मकथा मान लेते थे।
2. वास्तविक पात्रों का छद्म रूप में चित्रण
‘श्रीकान्त’ के लगभग सभी प्रमुख पात्रों का आधार शरत् बाबू के जीवन के वास्तविक व्यक्ति रहे हैं-
इन्द्रनाथ: यह पात्र शरत् के बचपन के सबसे प्रिय और साहसी मित्र राजेन्द्रनाथ (राजू) पर आधारित है। राजू के साथ बिताए गए गंगा के साहसिक अभियानों को शरत् ने इन्द्रनाथ के माध्यम से अमर कर दिया।
राजलक्ष्मी: राजलक्ष्मी के पात्र के लिए उन्होंने अपनी बचपन की संगिनी धीरु को आधार बनाया। राजलक्ष्मी की तपस्या और उसका ‘श्रीकान्त’ के प्रति प्रेम शरत् की अपनी अनुभूतियों का प्रतिबिंब है। यह चित्रण इतना सजीव था कि लोग उनकी पत्नी हिरण्मयी देवी को ही राजलक्ष्मी समझने लगे थे।
अन्नदा दीदी: शरत् बाबू ने स्वीकार किया है कि अन्नदा दीदी का पात्र भी वास्तविक था, जिसने उनके किशोर मन पर गहरा प्रभाव डाला था।
अभया: बर्मा प्रवास के दौरान शरत् बाबू एक ऐसी महिला से मिले थे, जिसने अपने अत्याचारी पति को छोड़ दिया था। उसी अनुभव के आधार पर उन्होंने ‘अभया‘ के विद्रोही चरित्र को गढ़ा।
कमललता: ‘श्रीकान्त’ के चौथे पर्व की वैष्णवी कमललता का आधार शरत् के किशोर जीवन के वे अनुभव हैं जब वे कृष्णपुर गाँव के रघुनाथदास गोस्वामी के अखाड़े में जाया करते थे।
3. अनुभवों का कलात्मक रूपांतरण
शरत् बाबू का मानना था कि उपन्यास में घटनाओं से अधिक महत्व चरित्र-सृजन का होता है। उन्होंने अपने जीवन की बिखरी हुई घटनाओं को कलात्मक रूप देने के लिए कल्पना का सहारा लिया। उन्होंने स्वयं कहा था कि जैसे एक छात्र अपने गाँव पर निबंध लिखते समय आस-पास के गाँवों के सुंदर दृश्यों को भी उसमें जोड़ देता है, वैसे ही एक साहित्यकार सत्य के साथ कल्पना मिलाकर रचना को पूर्ण बनाता है।
4. छद्म नाम और गोपनीयता
दिलचस्प तथ्य यह है कि शरत् बाबू अपने आरंभिक लेखन में अपना नाम छिपाने के लिए ‘एस.टी.सी. लारा‘ (S.T.C. Lara) जैसे छद्म नाम का प्रयोग करते थे, जहाँ ‘लारा’ उनके बचपन का पुकारने का नाम (अर्थात् आवारा या शरारती लड़का) था। वे अपने जीवन की गुप्त व्यथाओं को सीधे कहने के बजाय उपन्यासों के पात्रों के माध्यम से व्यक्त करना अधिक सहज समझते थे।
निष्कर्षत – ‘श्रीकान्त’ शरत्चन्द्र के ‘आवारा’ बचपन से लेकर उनके ‘मसीहा’ बनने तक की यात्रा का एक साहित्यिक दस्तावेज़ है, जिसमें उन्होंने समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों और अपने स्वयं के द्वंद्वों को छद्म पात्रों के माध्यम से स्वर दिया है।
प्रश्न – श्रीमती निरुपमा देवी ने शरत् चन्द्र से अपनी रचनाओं में किन चरित्रों की आलोचना न करने का अनुरोध किया था?
उत्तर – जीवनी ‘आवारा मसीहा‘ के अनुसार, श्रीमती निरुपमा देवी और शरत्चन्द्र के बीच का संबंध अत्यंत गहरा, संवेदनशील और साहित्यिक प्रेरणा से भरा था। निरुपमा देवी ने शरत्चन्द्र से विधवा चरित्रों की आलोचना न करने का जो अनुरोध किया था, वह न केवल एक सामाजिक विनती थी, बल्कि उनके व्यक्तिगत जीवन और शरत् के साहित्य-सृजन की नैतिकता से भी जुड़ी थी।
१. निरुपमा देवी का परिचय और स्थिति
निरुपमा देवी भागलपुर के एक संभ्रांत और रूढ़िवादी परिवार की बाल विधवा थीं। वे शरत्चन्द्र के मित्र विभूतिभूषण की बहन थीं और स्वयं एक प्रतिभाशाली लेखिका थीं। उस युग के कठोर सामाजिक नियमों के कारण एक विधवा का सार्वजनिक जीवन और लेखन बहुत सीमित था
।
२. अनुरोध का कारण
व्यक्तिगत पीड़ा: निरुपमा देवी स्वयं विधवा जीवन के कष्टों और अपमान को झेल रही थीं। वे नहीं चाहती थीं कि शरत् अपनी लेखनी से विधवाओं के चरित्र पर कोई ऐसा कटाक्ष करें जो उनकी पहले से ही आहत संवेदनाओं को और अधिक चोट पहुँचाए।
सामाजिक संकोच: शरत् उस समय समाज की रूढ़ियों पर तीखे प्रहार कर रहे थे। निरुपमा को भय था कि शरत् का ‘विद्रोही’ लेखन विधवाओं के प्रति समाज की दृष्टि को और अधिक नकारात्मक बना सकता है।
३. शरत्चन्द्र का वचन
निरुपमा देवी ने पत्र लिखकर शरत् बाबू से यह प्रार्थना की थी, जिसके उत्तर में शरत् ने उन्हें वचन दिया था: “तुम्हारे मन को आघात पहुँचाकर ऐसा कुछ कभी नहीं लिखूँगा”। जीवनीकार विष्णु प्रभाकर के अनुसार, शरत् के जीवन और साहित्य की विवेचना करते समय इस वचन को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह उनके कई चरित्रों के निर्माण की आधारशिला बना।
४. संबंध और साहित्यिक प्रभाव
प्रेरणा और मार्गदर्शन: शरत्चन्द्र ने निरुपमा देवी को न केवल एक सखी माना, बल्कि उन्हें ‘मनुष्य’ बनाने और साहित्य में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित भी किया। वे उनकी रचनाओं का संशोधन करते थे और उन्हें अपनी सगी शिष्या से भी अधिक मानते थे।
चरित्रों का आधार – शरत् के साहित्य में विधवाओं के प्रति जो अगाध सहानुभूति और सम्मान दिखता है, उसके पीछे निरुपमा देवी की स्मृति और उनका यह अनुरोध एक बड़ा कारण था। ‘पल्ली समाज’ की रमा या ‘चरित्रहीन’ की सावित्री जैसे चरित्रों में विधवाओं की जिस ‘उच्च मानवता’ और ‘पीड़ा’ का चित्रण है, वह इसी वचन का निर्वाह जान पड़ता है।
मौन वेदना – शरत् के मन में निरुपमा के प्रति एक मूक और असफल प्रेम था। वे मानते थे कि समाज के विधवा-विवाह विरोधी नियमों के कारण कई महान और सुंदर जीवन निष्फल हो जाते हैं।
निष्कर्षत – निरुपमा देवी का यह अनुरोध शरत्चन्द्र के लिए केवल एक वादा नहीं था, बल्कि उनकी लेखनी के लिए एक नैतिक बंधन बन गया। इसी कारण शरत् ने अपने साहित्य में विधवाओं को ‘आलोचना’ का पात्र बनाने के बजाय, समाज के सताए हुए ‘मसीहा’ के रूप में प्रतिष्ठित किया।
प्रश्न – देशबन्धु चित्तरंजन दास ने अपनी किस पत्रिका के लिए शरत् चन्द्र से कहानी लिखने का आग्रह किया था?
उत्तर
१. ‘नारायण‘ पत्रिका का उद्देश्य
देशबन्धु चित्तरंजन दास ने ‘नारायण‘ नामक मासिक पत्रिका का संपादन और प्रकाशन आरम्भ किया था। यह पत्रिका उस समय की प्रसिद्ध पत्रिका ‘सबुज पत्र’ की प्रतिद्वंद्वी मानी जाती थी। देशबन्धु का मानना था कि रवीन्द्रनाथ टैगोर पर पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव बहुत अधिक है, जो बंगाल की राष्ट्रीय चेतना के विकास के लिए उचित नहीं है। वे ‘नारायण’ के माध्यम से बंगाल की अपनी मौलिक संस्कृति और प्राचीन परंपराओं को बढ़ावा देना चाहते थे।
२. शरत् चन्द्र को आमंत्रण और ‘स्वामी‘ का सृजन
देशबन्धु ने एक दिन शरत् चन्द्र को पत्र लिखकर अपनी पत्रिका ‘नारायण’ के लिए कहानी लिखने का विशेष आग्रह किया। शरत् बाबू ने उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए विशेष रूप से उनके लिए एक कहानी लिखी। दिलचस्प तथ्य यह है कि शरत् बाबू ने इस कहानी के नामकरण का अधिकार भी देशबन्धु को ही सौंप दिया था। चित्तरंजन दास ने ही उस कहानी का नाम ‘स्वामी‘ रखा। इस कहानी का नायक वैष्णव आदर्शों का जीवंत रूप माना जाता है।
३. ‘कोरा चेक‘ (Blank Check) की ऐतिहासिक घटना
जब ‘स्वामी’ कहानी प्रकाशित हो गई, तब देशबन्धु ने शरत् चन्द्र के प्रति अपनी कृतज्ञता और उनके साहित्य के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए एक कोरा चेक भेजा। उन्होंने शरत् बाबू को पत्र में लिखा कि वे इस चेक में अपनी इच्छानुसार कोई भी राशि भर लें, क्योंकि उनकी रचना का मूल्य धन से नहीं आंका जा सकता। शरत् बाबू इस असीम विश्वास और स्नेह से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उस चेक में केवल 100 रुपये ही भरे। उन्होंने माना कि देशबन्धु जैसे महाप्राण व्यक्ति का स्नेह उनके लिए किसी भी धनराशि से कहीं बढ़कर है।
४. संबंधों में प्रगाढ़ता
इसी प्रसंग के बाद देशबन्धु चित्तरंजन दास और शरत् चन्द्र के बीच साहित्यिक मित्रता एक गहरे राजनीतिक संबंध में बदल गई। शरत् बाबू देशबन्धु के प्रभाव में सक्रिय राजनीति में आए और बाद में हावड़ा जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी चुने गए। ‘नारायण’ पत्रिका के माध्यम से शुरू हुआ यह साहित्यिक नाता देशबन्धु की मृत्यु तक एक अटूट मित्रता के रूप में बना रहा।
संक्षेप में, ‘नारायण’ पत्रिका न केवल शरत् चन्द्र की ‘स्वामी’ जैसी श्रेष्ठ रचना के प्रकाशन का माध्यम बनी, बल्कि इसने भारतीय साहित्य के ‘मसीहा’ और देश के महान नेता ‘देशबन्धु’ को एक-दूसरे के अत्यंत निकट ला दिया।
निष्कर्ष – यह प्रसंग शरत् चन्द्र के ‘मसीहा’ रूप को दर्शाता है, जहाँ उनके लिए मानवीय संबंध और कलाकार की गरिमा, धन-दौलत से कहीं ऊपर थी। इसके बाद ही शरत् चन्द्र देशबन्धु के प्रभाव में सक्रिय राजनीति और असहयोग आंदोलन की ओर आकर्षित हुए।
जीवनी ‘आवारा मसीहा‘ के अनुसार, ‘शिशु‘ नामक हस्तलिखित पत्रिका शरत्चन्द्र के प्रारंभिक साहित्यिक जीवन और उनके निर्माण काल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी।
१. पत्रिका का स्वरूप और उद्देश्य
हस्तलिखित और सचित्र: यह एक सचित्र मासिक पत्रिका थी जो पूरी तरह हाथ से लिखी जाती थी।
साहित्यिक चेतना – शरत्चन्द्र ने भागलपुर में अपने तरुण मामाओं के बीच बंगला भाषा और साहित्य के प्रति जो अनुराग पैदा किया था, यह पत्रिका उसी का परिणाम थी। उस समय शिक्षित बंगाली समाज में अंग्रेजी का गहरा प्रभाव था, लेकिन शरत् ने अपने परिवार के लड़कों को अपनी मातृभाषा में लिखने के लिए प्रेरित किया।
२. संपादन और कार्यभार
गिरीन्द्रनाथ का संपादन – यद्यपि इस साहित्यिक प्रयास के पीछे मुख्य शक्ति शरत्चन्द्र थे, लेकिन इस हस्तलिखित पत्रिका के संपादक उनके दस वर्षीय मामा गिरीन्द्रनाथ बने थे। इसका मुख्य कारण यह था कि गिरीन्द्रनाथ का हस्तलेख (handwriting) अत्यंत सुंदर था।
सहयोग का अभाव – उन दिनों परिवार के बड़े बुजुर्ग या अध्यापक ऐसे रचनात्मक कार्यों में सहयोग नहीं देते थे; वे चाहते थे कि बच्चे केवल अंग्रेजी सीखने पर ध्यान दें।
३. पत्रिका की सामग्री
बाल कविताएँ – इसमें बच्चों के स्तर की बंगला और अंग्रेजी कविताएँ होती थीं। जैसे ‘बांदर’ (बंदर) के साथ ‘चादर’ की तुकबंदी वाली कविता: “बांदर बांदर, छिड़लो केन चादर” ।
अंग्रेजी रचनाएँ – इसमें अंग्रेजी में भी छोटी कहानियाँ/कविताएँ लिखी जाती थीं, जैसे एक शेर और चूहे की कहानी: “A lion killed a mouse, then went to his house” ।
४. शरत्चन्द्र की प्रसिद्ध रचना ‘बोझा‘
प्रथम प्रकाशन – शरत्चन्द्र की प्रारंभिक महत्वपूर्ण कहानियों में से एक, ‘बोझा‘, इसी हस्तलिखित पत्रिका ‘शिशु’ में प्रकाशित हुई थी।
नाम छिपाने की प्रवृत्ति – शरत् बाबू में बचपन से ही अपना नाम छिपाने (अनाम रहने) की प्रवृत्ति थी। उन्होंने ‘बोझा’ कहानी अपने नाम के बजाय अपने प्रिय मामा सुरेन्द्रनाथ के नाम से प्रकाशित की थी। जब सुरेन्द्रनाथ को पता चला और उन्होंने इस बारे में पूछा, तो शरत् ने हँसकर बात टाल दी।
निष्कर्ष – ‘शिशु’ पत्रिका केवल एक घरेलू प्रयास नहीं थी, बल्कि यह वह मंच था जहाँ शरत्चन्द्र ने अपने कथा-शिल्प का अभ्यास शुरू किया और जहाँ उनके भीतर का महान लेखक पहली बार कागज़ पर उतरना शुरू हुआ।
भागलपुर का ‘आदमपुर क्लब‘ शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय के जीवन का वह केंद्र था जहाँ उनकी भावी जीवन की प्रवृत्तियाँ (जैसे अभिनय, संगीत और समाज सेवा) अंकुरित और पल्लवित हुईं।
1. क्लब का स्वरूप और शरत् का जुड़ाव
प्रवृत्तियों का केंद्र – जीवनीकार के अनुसार, किशोर शरत् ने इसी क्लब में अपने भावी जीवन की प्रवृत्तियों को पनपते देखा था। यहाँ वे अपने मित्र राजू (राजेन्द्रनाथ) के साथ अक्सर समय बिताते थे।
विद्रोही स्वभाव – यह क्लब तत्कालीन भागलपुर के रूढ़िवादी बंगाली समाज (जिसके नेता शरत् के नाना केदारनाथ थे) के विरुद्ध एक प्रगतिशील और विद्रोही स्वर का प्रतीक था।
२. अभिनय और रंगमंच (नाटक विभाग)
पुनर्जन्म – शरत् बाबू को बचपन से ही नाटक का शौक था, लेकिन आदमपुर क्लब की एक ‘प्रवृत्ति’ के रूप में इसका पुनर्जन्म हुआ।
प्रमुख सदस्य – राजा शिवचन्द्र के पुत्र कुमार सतीशचन्द्र इस दल के प्राण थे, जिनकी संगीत और नाटक में असाधारण रुचि थी।
शरत् का अभिनय – क्लब के नाटक विभाग ने कई सफल नाटक मंचित किए, जिनमें शरत् बाबू ने अपनी अभिनय प्रतिभा का लोहा मनवाया। उन्होंने:
‘मृणालिनी‘ नाटक में ‘मृणालिनी’ (नारी पात्र) की भूमिका निभाई।
‘बिल्वमंगल‘ में ‘चिंतामणि’ और ‘जना‘ नाटक में ‘जना’ की सशक्त भूमिकाएँ निभाईं।
‘अलीबाबा‘ नाटक में उन्होंने ‘मुस्तफ़ा’ का पात्र इतनी निपुणता से निभाया कि दर्शक उन्हें पहचान भी नहीं सके।
अभिनय की गहराई – उनके अभिनय में जो गंभीरता, संयम और तेजस्विता थी, उसकी तुलना उस समय कलकत्ता की प्रसिद्ध अभिनेत्रियों से की जाती थी।
३. समाज सेवा और विद्रोही तेवर
शवदाह और सामाजिक बहिष्कार – आदमपुर क्लब के सदस्य केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं थे। जब कट्टरपंथियों ने राजा शिवचन्द्र के संबंधी कान्तिकुमार के शवदाह में शामिल होने से इनकार कर दिया, तब आदमपुर क्लब के सदस्यों ने ही आगे बढ़कर यह संस्कार संपन्न किया।
परिणाम – इस साहसी कार्य के कारण क्लब के सदस्यों को जाति से च्युत (जाति-बहिष्कृत) कर दिया गया और समाज में भारी ‘दलादली’ (गुटबाजी) शुरू हो गई। शरत् बाबू भी इस विद्रोह और लांछना के भागी बने।
४. संगीत और अन्य गतिविधियाँ
क्लब में नियमित रूप से संगीत का अभ्यास होता था। शरत् बाबू यहाँ हारमोनियम, बेहाला (वायलिन), बांसुरी और तबला बजाने में दक्ष हुए।
वे क्लब की बैठकों में कहानियाँ गढ़कर सुनाने की अपनी जन्मजात प्रतिभा का उपयोग करते थे, जो बाद में उनके महान कथाकार बनने का आधार बनी।
निष्कर्ष – आदमपुर क्लब वह पाठशाला थी जहाँ शरत् ने न केवल कलात्मक कौशल सीखे, बल्कि समाज के ‘भले लोगों’ के पाखंड को चुनौती देना और पीड़ितों की सेवा करना भी सीखा। यही ‘आंवारा’ प्रवृत्तियाँ आगे चलकर उनके साहित्य में ‘मसीहा’ के रूप में प्रकट हुईं।
१. मुजफ्फरपुर आगमन और प्रारंभिक जीवन
संन्यासी वेश – शरत्चन्द्र घर छोड़ने के बाद कुछ समय तक साधु-संतों के साथ रहे और अंततः संन्यासी के वेश में मुजफ्फरपुर पहुँचे। वहां वे शुरू में एक धर्मशाला में ठहरे और अपनी पहचान ‘बिहारी’ बताकर छिपाई।
संगीत और पहचान: धर्मशाला की छत पर बैठकर गाते समय उनकी भेंट निशानाथ बंदोपाध्याय से हुई, जो उनके मधुर कंठ से प्रभावित होकर उन्हें अपने घर ले आए। यहीं से उनका मुजफ्फरपुर के बंगाली समाज में प्रवेश हुआ।
२. महादेव साहु और ‘बोहेमियन‘ जीवन
सघन मित्रता – मुजफ्फरपुर में शरत् की भेंट एक धनी ज़मींदार युवक महादेव साहु से हुई। साहु शरत् के संगीत और उनके गल्प सुनाने की अद्भुत क्षमता के कायल हो गए।
व्यसन और स्वच्छंदता – शरत् और साहु के बीच ऐसी मित्रता हुई कि वे शराब, शिकार और वेश्यागमन जैसे व्यसनों में एक-दूसरे के साथी बन गए। जीवनीकार के अनुसार, मुजफ्फरपुर का यह जीवन “हर दृष्टि से बोहेमियन” था।
सामाजिक तिरस्कार – शरत् के शराब पीने और देर रात तक बाहर रहने के कारण उन्हें सभ्य परिवारों (जैसे शिखरनाथ के घर) से अपमानित होकर निकलना पड़ा, जिसके बाद वे महादेव साहु के पास ही रहने लगे।
३. प्रेम का द्वंद्व और संघर्ष
नीरदा की खोज – शरत् मुजफ्फरपुर अपनी कथित प्रेमिका नीरदा की तलाश में भी आए थे, जो भागलपुर से भागकर यहाँ रहने लगी थी। नीरदा ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया और एक आबकारी दरोगा से शिकायत कर शरत् की भयंकर पिटाई भी करवाई।
राजबाला से परिचय – यहीं उनका परिचय राजबाला नाम की सुंदरी से भी हुआ, जिसके प्रति वे आकर्षित हुए और उसके ‘रूप-जाल’ में फंस गए।
४. साहित्यिक सृजन
हैरानी की बात यह है कि इस उच्छृंखल और चंचल जीवन के बीच भी शरत् के भीतर का कलाकार शांत नहीं था। वे नदी के तट पर अकेले बैठकर घंटों लिखते थे।
उन्होंने इसी प्रवास के दौरान ‘काशिनाथ‘ और ‘चरित्रहीन‘ जैसे उपन्यासों की प्रारंभिक रूपरेखा तैयार की थी।
५. पिता की मृत्यु और प्रवास का अंत
मृत्यु का समाचार – जब शरत् मुजफ्फरपुर में इसी ‘बोहेमियन’ जीवन में डूबे हुए थे, तभी अचानक भागलपुर से एक तार आया कि उनके पिता मोतीलाल की मृत्यु हो गई है।
वापसी – इस समाचार ने उनके स्वच्छंद जीवन को अचानक रोक दिया। वे अपने पिता के प्रति अगाध स्नेह रखते थे और उसी क्षण भागलपुर के लिए रवाना हो गए।
निष्कर्ष – मुजफ्फरपुर का कालखंड शरत् के जीवन का वह ‘विषैला’ मंथन था जिससे बाद में उनके साहित्य का ‘अमृत’ निकला। उन्होंने यहाँ समाज के सबसे निचले और बदनाम तबकों को निकट से देखा, जो बाद में उनके अमर पात्रों का आधार बने।
1. अनुवाद का समय और ऐतिहासिक संदर्भ
शरत्चन्द्र की रचनाओं का गुजराती में सबसे पहले अनुवाद सन् 1925 के आसपास हुआ था। यह वह समय था जब शरत् बाबू अपनी रचनाओं के माध्यम से पूरे भारत में एक ‘मसीहा’ कथाकार के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे और उनके पात्र देश-भर की जनता के जीवन का अंग बन गए थे।
2. महात्मा गांधी का आदेश
दिलचस्प बात यह है कि यह अनुवाद किसी प्रकाशक की व्यावसायिक पहल नहीं थी, बल्कि स्वयं महात्मा गांधी के आदेश पर किया गया था। यद्यपि गांधीजी और शरत् बाबू के बीच चरखे और असहयोग आंदोलन की कार्यप्रणाली को लेकर वैचारिक मतभेद थे, फिर भी गांधीजी शरत् की लेखन कला और समाज के प्रति उनकी गहरी संवेदना के प्रशंसक थे।
3. अनुवादक: महादेव देसाई
गांधीजी के आदेश का पालन करते हुए यह अनुवाद श्री महादेव देसाई ने किया था। महादेव देसाई महात्मा गांधी के निजी सचिव और उनके अत्यंत विश्वसनीय साथी थे। एक उच्च कोटि के विद्वान और साहित्यकार होने के नाते, उन्होंने शरत् बाबू की संवेदनाओं को गुजराती भाषा में उतारा।
4. अनूदित रचनाएँ
महादेव देसाई ने शरत् की जिन प्रमुख रचनाओं का गुजराती में अनुवाद किया, वे निम्नलिखित हैं-
- स्वराज बाबू: यह रचना शरत् के राजनीतिक और सामाजिक विचारों को दर्शाती है।
- बिन्दू का लल्ला (बिन्दुर छेले): यह कहानी पारिवारिक संबंधों और वात्सल्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
- राम की सुमति (रामेर सुमति): इसे शरत् की सबसे लोकप्रिय कहानियों में गिना जाता है, जो एक देवर और भाभी के पवित्र और मर्मस्पर्शी संबंधों पर आधारित है।
- मंझली दीदी (मेज दीदी): यह कहानी भी बंगाली परिवार के भीतर की संवेदनाओं और नारी के त्याग को चित्रित करती है।
5. अनुवाद का महत्व
- भाषा की सीमाएं लांघना: इन अनुवादों के माध्यम से शरत् बाबू का साहित्य बंगाल की सीमाओं को लांघकर गुजरात के घर-घर तक पहुँचा।
- अखिल भारतीय पहचान: शरत् बाबू को जितनी ख्याति बंगाल में मिली, उतनी ही लोकप्रियता उन्हें गुजराती, मलयालम और अन्य भारतीय भाषाओं में भी प्राप्त हुई।
निष्कर्ष – महात्मा गांधी द्वारा इन रचनाओं के अनुवाद का आदेश देना यह सिद्ध करता है कि शरत्चन्द्र का साहित्य केवल मनोरंजन के लिए नहीं था, बल्कि वह समाज को समझने और मानवीय संवेदनाओं को जगाने का एक सशक्त माध्यम था, जिसे गांधीजी जैसा महामानव भी स्वीकार करता था।
१. शेक्सपियर – चरित्र चित्रण के सर्वोच्च मानक
शरत् बाबू का मानना था कि शेक्सपियर से बढ़कर कोई दूसरा लेखक इस पृथ्वी पर पैदा नहीं हुआ जो स्त्री-पुरुष के चरित्र की इतनी सूक्ष्म और गहरी समझ रखता हो। जब उनके उपन्यासों के पात्रों (जैसे ‘विराजबहू’) की स्वाभाविकता पर सवाल उठाए जाते थे, तो वे अक्सर शेक्सपियर का उदाहरण देते हुए कहते थे कि जिन्होंने शेक्सपियर को अच्छी तरह पढ़ा है, वे जानते हैं कि संसार में मानवीय स्वभाव के संबंध में कुछ भी असंभव नहीं है।
२. ‘शुचिता‘ के बंधनों से मुक्ति
शरत् बाबू शेक्सपियर को उन महान लेखकों की श्रेणी में रखते थे (जैसे मैक्सिम गोर्की और लियो टॉल्स्टॉय) जिन्होंने जीवन को उसकी संपूर्णता में देखा था। उनके अनुसार-
- शेक्सपियर जैसे लेखक केवल ‘सुंदर’ या ‘पवित्र’ के चित्रण तक सीमित नहीं रहे।
- उन्होंने समाज के उन पहलुओं और चरित्रों को भी अपनी कला का विषय बनाया जिन्हें समाज ‘अपवित्र’ या ‘घृणित’ मानता था।
- शरत् के अनुसार, वास्तविक जीवन को देखने के लिए इन लेखकों ने स्वयं को शुचिता-अशुचिता (purity vs impurity) के चक्कर में नहीं फँसाया।
३. मानवीय संवेदना और यथार्थवाद
शेक्सपियर के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा का एक बड़ा कारण उनका यथार्थवाद था। शरत् बाबू का मानना था कि शेक्सपियर ने मनुष्य के अंतर्मन की उन परतों को खोला है जहाँ देवत्व और पशुत्व दोनों विद्यमान हैं। वे शेक्सपियर की रचनाओं को केवल साहित्य नहीं, बल्कि मनुष्य के ‘अन्तःकरण‘ की प्रयोगशाला मानते थे।
४. शरत् के अपने लेखन पर प्रभाव
शरत् बाबू ने स्वीकार किया था कि उन्होंने जीवन के निचले स्तरों, वेश्याओं और समाज के सताए हुए वर्गों के बीच रहकर जो अनुभव प्राप्त किए, उन्हें साहित्य में पिरोने का साहस उन्हें शेक्सपियर जैसे महान लेखकों के अध्ययन से मिला। वे मानते थे कि जिस प्रकार शेक्सपियर के पात्र रक्त-मांस के जीवित मनुष्य लगते हैं, वैसा ही प्रभाव उत्पन्न करना एक कथाकार की सबसे बड़ी सफलता है।
निष्कर्ष – शरत्चन्द्र के लिए शेक्सपियर केवल एक विदेशी लेखक नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे ‘मसीहा‘ थे जिन्होंने संसार को यह सिखाया कि साहित्य का केंद्र ‘नीति’ (morality) से कहीं अधिक ‘मनुष्यता’ (humanity) होनी चाहिए।
1. मिस्त्री पल्ली में निवास और सेवा
रंगून में शरत् बाबू अक्सर ‘मिस्त्री पल्ली‘ (कारीगरों और मज़दूरों की बस्ती) जैसे गरीब इलाकों में जाकर रहते थे। वहाँ के निवासी अशिक्षित और अभावग्रस्त थे। शरत् उनके लिए निम्नलिखित कार्य करते थे-
- वे मज़दूरों के लिए दफ्तर से छुट्टी के प्रार्थना-पत्र (अर्जी), घर पत्र और मनीऑर्डर लिखते थे।
- बस्ती के लोगों के आपसी झगड़ों में वे ‘पंच‘ की भूमिका निभाते और विवाद सुलझाते थे।
- उनकी संवेदना इतनी गहरी थी कि वे समाज द्वारा तिरस्कृत लोगों के बीच रहने में ही आनंद पाते थे।
2. ‘होमोपैथ डाक्टर‘ के रूप में पहचान
शरत् बाबू को चिकित्सा शास्त्र में गहरी रुचि थी। वे अपने पास हमेशा होमोपैथी दवाओं का एक बैग रखते थे-
- जब भी बस्ती में कोई बीमार पड़ता, वे दवाओं का बैग उठाकर घर-घर जाकर रोगियों की सेवा और इलाज करते थे।
- मज़दूरों के बीच वे ‘डाक्टर बाबू‘ या ‘बामुन दा‘ के रूप में प्रसिद्ध थे, जो न केवल दवा देते थे बल्कि खुद रोगियों की परिचर्या (सेवा) भी करते थे।
- वे अक्सर अपनी जेब से पैसे खर्च कर मरीज़ों के लिए फल, दूध और साबूदाना जैसी पथ्य सामग्री का प्रबंध करते थे।
3. महामारी के दौरान साहस
रंगून में जब प्लेग की महामारी फैली, तब शरत् बाबू ने अपनी जान की परवाह किए बिना असहाय रोगियों की सेवा की। जहाँ अपने सगे-संबंधी भी मरीज़ों को छोड़कर भाग रहे थे, वहाँ शरत् अनजान लोगों के पास जाकर उनके सिर पर ‘आइस बैग’ रखते और उनके लिए दवाइयों का प्रबंध करते थे। उन्होंने कई लावारिस लाशों का विधि-विधान से दाह-संस्कार भी किया।
4. ‘बामुन दा‘ संबोधन का गौरव
समानुभूति: शरत् मानते थे कि मनुष्य चाहे कितना भी पतित या व्यसनी क्यों न हो, उसके भीतर की मानवता कभी नष्ट नहीं होती। वे शराबियों और मज़दूरों के बुरे दिनों में उनके साथ खड़े रहते थे।
सम्मान: उनकी इसी करुणा और निःस्वार्थ सेवा के कारण समाज के निचले तबके के लोग उन्हें अपना रक्षक मानते थे और अत्यंत सम्मान के साथ ‘बामुन दा‘ कहकर पुकारते थे।
संकीर्तन दल: उन्होंने मज़दूरों के बीच से व्यसनों को दूर करने के लिए एक संकीर्तन दल का गठन भी किया था, ताकि वे संगीत के माध्यम से अपने जीवन को सुधार सकें।
निष्कर्ष – ‘बामुन दा’ केवल एक संबोधन नहीं था, बल्कि उन हज़ारों पीड़ितों की कृतज्ञता थी जिन्होंने शरत् के भीतर के ‘मसीहा’ को पहचान लिया था। यही अनुभव बाद में उनके साहित्य (जैसे ‘श्रीकांत’ और ‘चरित्रहीन’) के पात्रों और संवेदनाओं का आधार बने।
१. क्रांतिकारियों को गुप्त आर्थिक सहायता
शरत् बाबू क्रांतिकारियों के प्रति अगाध सहानुभूति रखते थे और मुक्त मन से उनकी आर्थिक सहायता करते थे। स्रोत बताते हैं कि वे जानते थे कि ये लोग देश की मुक्ति के लिए अपना सर्वस्व त्याग चुके हैं, इसलिए वे खतरा उठाकर भी उनसे संपर्क रखते थे।
२. क्रांतिकारियों के साथ गुप्त भेंट और आश्रय
आलू वाले का प्रसंग: एक बार एक क्रांतिकारी पुलिस की आंखों में धूल झोंकने के लिए ‘आलू वाले’ का भेष बनाकर उनके घर आया था। शरत् बाबू ने सावधानी बरतते हुए उसे घर के भीतर बुलाया, उसकी व्यथा सुनी और उसे आवश्यक धन दिया।
लाल बिहारी को आश्रय: हावड़ा डकैती मामले का अभियुक्त लाल बिहारी जब जेल से फरार हुआ, तो शरत् बाबू ने न केवल उसे अपने घर में आश्रय दिया, बल्कि उसे अपना अनुचर बनाकर नियमित वेतन भी देते रहे।
बिपिन बिहारी गांगुली से संबंध: प्रसिद्ध क्रांतिकारी बिपिन बिहारी गांगुली शरत् के ममेरे मामा लगते थे। वे अक्सर गुप्त रूप से शरत् बाबू के पास आते थे। शरत् बाबू बताते थे कि बिपिन जब भी आता था, हाथ में पिस्तौल लेकर आता था और शरत् उसे आर्थिक सहायता प्रदान करते थे।
३. अहिंसा बनाम सशस्त्र क्रांति पर विचार
शरत् बाबू महात्मा गांधी के प्रति आदर रखते थे, लेकिन अहिंसा और चरखे के माध्यम से स्वाधीनता प्राप्त करने के सिद्धांत में उनका पूर्ण विश्वास नहीं था।
वे मानते थे कि अहिंसा एक महान विचार हो सकता है, लेकिन स्वाधीनता उससे कहीं अधिक पवित्र और आवश्यक है।
जब पुलिस द्वारा महिलाओं पर अत्याचार की बात आती थी, तो वे अहिंसक प्रतिरोध के बजाय सक्रिय विरोध के पक्षधर थे। उनका मानना था कि महिलाओं की मर्यादा की रक्षा के लिए यदि अहिंसा के सिद्धांत की ‘हत्या’ भी करनी पड़े, तो वह उचित है।
४. ‘पथेर दाबी‘: क्रांतिकारियों की “बाइबल”
उनका उपन्यास ‘पथेर दाबी‘ उनके क्रांतिकारी विचारों का साहित्यिक प्रतिबिंब था। ब्रिटिश पुलिस अधिकारियों के अनुसार, यह पुस्तक क्रांतिकारियों के बीच इतनी लोकप्रिय थी कि वे इसे ‘गीता‘ के साथ अनिवार्य रूप से अपने पास रखते थे। उपन्यास का नायक ‘सव्यसाची’ शरत् बाबू द्वारा देखे गए क्रांतिकारियों के गुणों का पुंज था।
५. राजबंदियों का सार्वजनिक सम्मान
जब राजबंदी जेलों से मुक्त हुए, तो समाज और यहां तक कि कांग्रेस का एक धड़ा भी उनसे दूरी बना रहा था। ऐसे में शरत् बाबू ने आगे बढ़कर हावड़ा में राजबंदियों का भव्य अभिनंदन किया। उन्होंने घोषणा की कि ये लोग देश की मुक्ति के वास्तविक अग्रदूत हैं और सरकार का इनसे डरना ही इनकी तपस्या की सफलता का प्रमाण है।
निष्कर्ष – शरत् चन्द्र केवल एक कथाकार ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे ‘गुप्त मसीहा‘ थे, जिन्होंने अपनी लेखनी और अपनी संपत्ति दोनों को क्रांतिकारियों के चरणों में समर्पित कर दिया था।
१. माता-पिता के व्यक्तित्व का प्रतिबिंब
‘शुभदा’ के मुख्य पात्र शरत् के माता-पिता, मोतीलाल और भुवनमोहिनी, के वास्तविक जीवन पर आधारित हैं-
- हारान बाबू (पिता का प्रतिबिंब): उपन्यास के पात्र हारान बाबू शरत् के पिता मोतीलाल की तरह ही ‘अकर्मण्य’ (idle) और ‘यायावर’ स्वभाव के थे। जब घर में गरीबी के कारण उनकी पत्नी (शुभदा) उन पर झुँझलाती थी, तो वे चुपचाप घर से निकल जाते और देर तक बाहर रहते थे, ठीक जैसे मोतीलाल जी किया करते थे।
- शुभदा (माता का प्रतिबिंब): शरत् की माता भुवनमोहिनी ‘शुभदा’ की तरह ही एक ‘प्रेम-प्लावित आत्मा’ थीं। उन्होंने अपने पति से कभी सुख नहीं पाया, फिर भी एक समर्पित हिंदू नारी की तरह वे अपने पति की सेवा और परिवार के भरण-पोषण के लिए खुद को खपाती रहीं। स्रोत बताते हैं कि शरत् ने अपनी माँ का ऋण चुकाने के लिए ही ‘शुभदा’ जैसे महान नारी पात्र का सृजन किया था।
२. चरम निर्धनता का चित्रण
‘शुभदा’ में शरत् ने अपने परिवार की उस भयानक दरिद्रता की झाँकी दी है जिसे उन्होंने देवानन्दपुर में स्वयं भोगा था।
- उपन्यास में चित्रित गरीबी कोई काल्पनिक रचना नहीं है, बल्कि उनके दैनिक जीवन के ‘दुख-दैन्य’ का वास्तविक अनुभव है।
- इसमें समाज के उस अपमान और असुरक्षा को स्वर दिया गया है जो एक निर्धन परिवार को समाज के ‘भले लोगों’ से झेलना पड़ता है।
३. रचना और प्रकाशन का इतिहास
- शरत् चन्द्र ने इस उपन्यास की रचना लगभग २२ वर्ष की आयु में (१८९८ ई० के आसपास) की थी।
- पांडुलिपि को नष्ट करने का प्रयास: दिलचस्प बात यह है कि शरत् बाबू ने जीते जी इस उपन्यास को प्रकाशित नहीं होने दिया। उन्होंने एक बार अपने सेवक रामकृष्णा को इसे जला देने का आदेश भी दिया था, क्योंकि उन्हें डर था कि इसके प्रकाशित होने से किसी व्यक्ति (संभवतः उनकी सखी निरुपमा देवी) को मानसिक पीड़ा पहुँच सकती है।
- रामकृष्णा ने उस पांडुलिपि को जलाया नहीं बल्कि छिपाकर रख लिया, जिसके कारण शरत् की मृत्यु के बाद यह कालजयी रचना पाठकों तक पहुँच सकी।
४. साहित्यिक महत्व
‘शुभदा’ शरत्-साहित्य की आधारशिला मानी जा सकती है क्योंकि इसमें उनके बाद के उपन्यासों की सभी विशेषताएं—जैसे मूक नारी को स्वर देना और समाज द्वारा तिरस्कृत लोगों में मनुष्यता खोजना—अपने बीज रूप में विद्यमान हैं।
निष्कर्ष – ‘शुभदा’ केवल एक उपन्यास नहीं है, बल्कि शरत् चन्द्र द्वारा अपने माता-पिता के प्रति व्यक्त की गई एक मार्मिक श्रद्धांजलि है, जिसमें उन्होंने अपने परिवार की यातनाओं को साहित्यिक अमरता प्रदान की है।
१. पिता की साहित्यिक अभिरुचि और शैली
मोतीलाल चट्टोपाध्याय एक स्वप्नद्रष्टा और शिल्पी मन के व्यक्ति थे। उन्हें कहानी, उपन्यास, नाटक और कविता लिखने का बहुत शौक था। उनकी लेखन शैली अत्यंत कलात्मक थी; वे एक सुंदर नई निब और बढ़िया कागज पर मोती जैसे अक्षरों में अपनी रचनाएँ आरंभ करते थे।
२. ‘अधूरेपन‘ की प्रवृत्ति
मोतीलाल की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि वे कभी कोई रचना पूरी नहीं कर सके [५२]। उनकी रचना का आरंभ जितना प्रभावशाली और महत्वपूर्ण होता था, उसका अंत उतना ही महत्वहीन या गायब होता था। वे अक्सर एक रचना को बीच में ही छोड़कर नई रचना शुरू कर देते थे। यहाँ तक कि बच्चों के लिए बनाया जाने वाला भारत का मानचित्र भी वे इसलिए अधूरा छोड़ देते थे क्योंकि उनके मन में यह संशय आ जाता था कि क्या वे हिमालय की गरिमा को सही ढंग से अंकित कर पाएंगे।
३. शरत् के लिए प्रेरणा का स्रोत
शरत् के लेखक बनने की प्रक्रिया में उनके पिता के इसी ‘अधूरेपन’ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई-
- अधूरी कहानियों की खोज: बालक शरत् ने अपने पिता की टूटी हुई अलमारी से उनकी लिखी हुई अधूरी कहानियाँ खोज निकाली थीं।
- लेखक बनने की तड़प: उन अधूरी कहानियों को पढ़ते समय शरत् अक्सर परेशान होकर सोचते थे कि “बाबा इन्हें पूरा क्यों नहीं करते?”। वे मन ही मन उन कहानियों के अंत की कल्पना करते और सोचते कि “काश, मैं इस कहानी को लिख पाता” ।
- प्रेरक शक्ति: पिता की यही ‘अकर्मण्यता’ और उनकी रचनाओं का ‘अधूरापन’ शरत् के भीतर छिपी सृजन प्रतिभा के लिए सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति बन गया।
४. विरासत में मिला स्वभाव
साहित्य के साथ-साथ शरत् को अपने पिता से यायावर (घुमक्कड़) स्वभाव और सौंदर्य-बोध भी विरासत में मिला था। शरत् ने अपने पिता की तरह ही जीवन को बहुत करीब से देखा और उन्हीं के समान अपने कमरे और लेखन सामग्री को बहुत करीने और सजाकर रखने की कला सीखी थी।
निष्कर्ष – मोतीलाल ने शरत् को वह साहित्यिक धरातल दिया जहाँ से उन्होंने अपनी कल्पना की उड़ान शुरू की। जहाँ पिता ने केवल ‘आरंभ’ करना सीखा था, शरत् ने उन अधूरे सपनों को ‘पूर्णता’ प्रदान कर विश्व साहित्य का एक ‘मसीहा’ बनने का गौरव प्राप्त किया।
१. बिहार (बचपन और ‘बोहेमियन’ जीवन की खोज)
- भागलपुर: यह शरत् के ननिहाल (मामा-बाड़ी) का स्थान था जहाँ उनका बचपन और किशोरावस्था का बड़ा हिस्सा बीता। लेखक यहाँ उन गलियों, स्कूलों और आदमपुर क्लब जैसे स्थानों पर गये जहाँ शरत् की प्रतिभा विकसित हुई थी।
- मुजफ्फरपुर: यहाँ शरत् ने अपने जीवन का अत्यंत स्वच्छंद और ‘बोहेमियन’ समय बिताया था। लेखक ने यहाँ उन लोगों को ढूँढा जिन्होंने शरत् को एक सन्यासी या गायक के रूप में देखा था।
२. बर्मा/रंगून (साहित्यिक साधना और नौकरी का काल)
- शरत् चन्द्र लगभग १३ वर्ष तक बर्मा में रहे थे। विष्णु प्रभाकर विशेष रूप से रंगून गये ताकि वे उस वातावरण को समझ सकें जिसमें शरत् ने ‘चरित्रहीन’ और ‘श्रीकान्त’ जैसे कालजयी उपन्यासों की रचना की थी।
- उन्होंने ‘मिस्त्री पल्ली‘ (मज़दूरों की बस्ती) और उन कार्यालयों (पब्लिक वर्क्स एकाउंट्स) का दौरा किया जहाँ शरत् कार्यरत थे। उन्होंने रंगून में शरत् के समकालीनों और पड़ोसियों से भी साक्षात्कार किए।
३. बंगाल (ख्याति और अंतिम समय का केंद्र)
- कलकत्ता: यहाँ शरत् के साहित्यिक उत्कर्ष और सक्रिय राजनीति का दौर बीता। लेखक ने कलकत्ता में शरत् के प्रकाशकों और रवीन्द्रनाथ टैगोर के परिवार से जुड़े साक्ष्यों को एकत्रित किया।
- सामताबेड़ (पाणित्रास): यह रूपनारायण नदी के किनारे स्थित वह स्थान है जहाँ शरत् ने अपना मकान बनाया था और जीवन के अंतिम १२ वर्ष बिताए थे। लेखक ने यहाँ उस ‘तपोवन’ नुमा माहौल को स्वयं महसूस किया जिसने शरत् के बाद के साहित्य को प्रभावित किया था।
यात्रा और शोध का उद्देश्य
लेखक का मानना था कि शरत् चन्द्र का जीवन इतना “विशृंखल और उलझा हुआ” था कि बिना उन स्थानों पर गये और उनके संपर्क में आए लोगों से मिले, घटनाओं का सही क्रम बैठाना असंभव था। उन्होंने उन वातावरणों में “रमने की कोशिश” की जिनमें शरत् जिये थे ताकि वे शरीर-रचना के बजाय शरत् के “चेतन तत्व” या वास्तविक रूप को पाठकों के सामने ला सकें।
इन यात्राओं के दौरान उन्हें कई बार अपमान और हतोत्साहित करने वाली प्रतिक्रियाएँ भी मिलीं (जैसे कुछ लोगों ने उन्हें ‘चरित्रहीन’ की जीवनी न लिखने की सलाह दी), लेकिन वे अपनी शोध-यात्रा में अडिग रहे।
१. कुन्तलीन पुरस्कार प्रतियोगिता
कलकत्ता के प्रसिद्ध व्यवसायी एच० बसु, जो ‘कुन्तलीन’ सुगंधित तेल के निर्माता थे, उन्होंने अपनी वस्तुओं के प्रचार के लिए ‘कुन्तलीन पुरस्कार‘ नामक एक वार्षिक साहित्यिक प्रतियोगिता शुरू की थी। इस प्रतियोगिता में देश के नामी लेखक निर्णायक होते थे और सर्वश्रेष्ठ कहानी को २५ रुपये का पुरस्कार दिया जाता था।
२. कहानी का सृजन और मामा का नाम
- सृजन की पृष्ठभूमि: शरत् बाबू कलकत्ता में अपने मामाओं के साथ रह रहे थे। उनके मामा गिरीन्द्रनाथ ने उन्हें इस प्रतियोगिता में लिखने के लिए बहुत प्रोत्साहित किया। शरत् बाबू शुरू में हिचकिचा रहे थे क्योंकि उन्हें लगा कि बड़े लेखकों के सामने उन्हें कौन पूछेगा।
- अन्तिम क्षण में लेखन: प्रतियोगिता की अंतिम तिथि के अंतिम दिन उन्होंने ‘मन्दिर‘ नामक कहानी लिखी। वे इसे लेकर गिरीन्द्रनाथ के साथ ठीक उसी समय ‘कुन्तलीन’ कार्यालय पहुँचे जब कार्यालय बंद हो रहा था।
- नाम छिपाने का कारण: शरत् बाबू को विश्वास नहीं था कि वे पुरस्कार जीत सकेंगे। यदि वे हार जाते, तो उन्हें ग्लानि और लज्जा का अनुभव होता। इसी लज्जा और ‘अनाम’ रहने की अपनी पुरानी प्रवृत्ति के कारण उन्होंने कहानी पर अपना नाम न लिखकर अपने मामा सुरेन्द्रनाथ गांगुली का नाम डाल दिया।
३. ऐतिहासिक परिणाम
- प्रथम पुरस्कार: जब प्रतियोगिता का परिणाम घोषित हुआ, तो लगभग १५० कहानियों में शरत् चन्द्र की कहानी ‘मन्दिर’ को प्रथम पुरस्कार मिला।
- यश और ग्लानि: आधिकारिक रूप से पुरस्कार भागलपुर के सुरेन्द्रनाथ गांगुली को मिला। मित्रों ने सुरेन्द्र को बधाई दी, लेकिन सुरेन्द्र का मन ग्लानि से भर उठा क्योंकि वे जानते थे कि वे इस यश के वास्तविक अधिकारी नहीं हैं।
- शरत् की उदासीनता: जब शरत् बाबू को सफलता का पता चला, तो वे अपनी पहचान उजागर करने के प्रति उदासीन रहे। उन्होंने मामा सुरेन्द्र से केवल इतना कहा कि यदि पुरस्कार में कुछ राशि मिली है, तो उनके लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर की काव्य-ग्रंथावली खरीदकर भेज दें।
४. बाद में रहस्योद्घाटन
वर्षों बाद जब शरत् बाबू एक ख्यातिप्राप्त लेखक बन गए, तब उनकी भेंट ‘भारतवर्ष’ के संपादक जलधर सेन से हुई, जो उस प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में शामिल थे। जलधर सेन ने ‘मन्दिर’ की बहुत प्रशंसा की और कहा कि उन्होंने तभी पहचान लिया था कि यह लेखक भविष्य में यशस्वी होगा। तब शरत् बाबू ने मुस्कुराते हुए स्वीकार किया कि वह कहानी वास्तव में उन्होंने ही लिखी थी।
निष्कर्ष – ‘मन्दिर’ कहानी शरत् बाबू की पहली ऐसी रचना थी जिसने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई, भले ही वह पहचान शुरू में उनके मामा के नाम के पीछे छिपी रही। यह घटना उनके उस संकोची स्वभाव को दर्शाती है जिसके कारण वे अपनी सर्वश्रेष्ठ रचनाओं को भी दूसरों के नाम से प्रकाशित कर दिया करते थे।
१. परिचय और आकर्षण का कारण
- पृष्ठभूमि: महादेव साहु एक धनी जमींदार युवक थे। वे बंगाली संस्कृति से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने बंगाली लिखना-पढ़ना सीख लिया था और बंगाली वेशभूषा ही पहनते थे।
- आकर्षण: शरत् बाबू के प्रति उनके आकर्षण के दो मुख्य कारण थे: शरत् का मधुर कंठ और उनकी गल्प (कहानी) गढ़कर सुनाने की अद्भुत क्षमता। महादेव साहु शरत् की गप्पें सुनकर मुग्ध हो जाते थे।
२. ‘बोहेमियन‘ जीवन शैली
- व्यसन और शौक: शरत् और महादेव साहु के बीच की मित्रता इतनी प्रगाढ़ थी कि वे शराब पीना, शिकार खेलना और वेश्यागमन जैसे कार्यों में एक-दूसरे के साथी बन गए थे।
- अमीरी ठाट-बाट: साहु हमेशा मुसाहबों (चमचों) से घिरे रहते थे और पानी की तरह पैसा बहाते थे। शरत् के लिए साहु का साथ आर्थिक सुविधा और एक ‘मनचाहा मीत’ मिलने जैसा था।
३. वैचारिक प्रभाव और नास्तिकता
- ईश्वर पर अविश्वास: शरत् बाबू उस समय ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते थे। महादेव साहु उनसे इतने प्रभावित थे कि वे भी कहने लगे, “शरत् दादा कहते हैं कि ईश्वर नहीं है, इसलिए सचमुच ही ईश्वर नहीं है। मैं भी मानता हूँ कि ईश्वर नहीं है”।
४. सामाजिक प्रतिक्रिया
- दोषारोपण: इस मित्रता को समाज अच्छी दृष्टि से नहीं देखता था। साहु के संबंधी कहते थे कि शरत् ने साहु को बिगाड़ दिया है, जबकि दूसरा दल कहता था कि साहु की अमीरी ने शरत् को पथभ्रष्ट किया है।
- घर छोड़ना: शरत् पहले शिखरनाथ के घर रहते थे, लेकिन साहु के साथ रात-रात भर शराब पीकर लौटने के कारण उन्हें वहां अपमानित होना पड़ा, जिसके बाद वे पूरी तरह महादेव साहु के पास रहने चले गए।
५. इस दौर की साहित्यिक साधना
हैरानी की बात यह है कि इस उच्छृंखल जीवन के बीच भी शरत् के भीतर का कलाकार शांत नहीं था-
- वे साहु के घर की चकाचौंध से दूर नदी के तट पर अकेले बैठकर घंटों लिखते थे।
- इसी प्रवास के दौरान उन्होंने ‘चरित्रहीन‘ उपन्यास की पांडुलिपि पर काम किया और ‘कशिनाथ‘ तथा ‘देवदैत्य‘ (असमाप्त) जैसी रचनाओं की रूपरेखा तैयार की।
निष्कर्ष – महादेव साहु के साथ शरत् का यह संबंध केवल मौज-मस्ती तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने शरत् को समाज के उन पात्रों और अनुभवों से परिचित कराया, जिन्हें उन्होंने आगे चलकर अपने विश्वप्रसिद्ध साहित्य में उतारा। यह प्रवास उनके पिता मोतीलाल की मृत्यु का समाचार मिलते ही अचानक समाप्त हो गया।
‘राजू’ या ‘इन्द्रनाथ’ वास्तविक परिचय
‘राजू’ का वास्तविक नाम राजेन्द्रनाथ मजूमदार था। उनके पिता रामरतन मजूमदार भागलपुर में डिस्ट्रिक्ट इंजीनियर थे। राजू शरत् के नाना के घर (गांगुली परिवार) का पड़ोसी था। दोनों परिवारों के बीच ज़मीन को लेकर मनमुटाव था और शुरू में शरत् और राजू के बीच पतंगबाज़ी की भीषण प्रतियोगिता होती थी।
२. व्यक्तित्व की विशेषताएँ
- शारीरिक बनावट: वे श्याम वर्ण के थे, उनका चेहरा चौड़ा था, हाथ घुटनों तक लंबे (आजानबाहु) थे और मुख पर चेचक के हल्के निशान थे।
- अदम्य साहस: राजू असीम साहस और अद्भुत प्रत्युत्पन्नमति (presence of mind) के धनी थे। वे मौत से भी नहीं डरते थे और शरत् के सभी दुस्साहसिक कार्यों के गुरु और प्रेरणास्रोत थे।
- कलाकार और संगीत प्रेमी: वे न केवल साहसी थे, बल्कि संगीत और अभिनय में भी पारंगत थे। वे बांसुरी, हारमोनियम, क्लैरिनेट और तबला बहुत सुंदर बजाते थे। अभिनय में उनकी प्रतिभा ऐसी थी कि ‘पागलिनी’ की भूमिका में उनके अभिनय को लोग दशकों तक याद करते रहे।
३. साहित्य में ‘राजू‘ का स्थान
- इन्द्रनाथ (श्रीकान्त): शरत् बाबू ने अपने विश्वप्रसिद्ध उपन्यास ‘श्रीकान्त‘ के पहले पर्व में राजू को ‘इन्द्रनाथ‘ के नाम से अमर कर दिया है। ‘इन्द्रनाथ’ का पात्र पूरी तरह राजू के साहसी कार्यों पर आधारित है, जैसे तूफानी रातों में गंगा में नाव खेना या मछुआरों से मछली चोरी करना।
- लालू: शरत् ने बच्चों के लिए लिखी गई कहानियों में अपने इसी मित्र को ‘लालू‘ के नाम से चित्रित किया है।
४. ‘रॉबिनहुड‘ जैसा चरित्र
- परोपकार: वे अभावग्रस्त लोगों के सच्चे मित्र थे और बदमाशों के लिए साक्षात् ‘यम’ थे।
- साहसिक कार्य: जब समाज के ‘भले लोग’ डर के मारे किसी लावारिस लाश को छूने से इनकार कर देते थे, तब राजू आगे बढ़कर उसका दाह-संस्कार करते थे। उन्होंने एक क्रूर अंग्रेज़ अफ़सर को सड़क पर रस्सी बांधकर गिराया और उसकी पिटाई की क्योंकि वह बेकसूर मुसाफ़िरों को मारता था।
५. संन्यास और विदाई
राजू का मन बचपन से ही वैराग्य की ओर था। उन्होंने गंगा तट पर श्मशान के पास एक ‘ध्यान-घर’ बना रखा था जहाँ वे ईश्वर की ज्योति के दर्शन करते थे। सन् १८९७ के आसपास, एक रात अपने पिता द्वारा पीटे जाने के बाद, वे घर-बार और ज़मीन-ज़ायदाद छोड़कर सदा के लिए गायब हो गए और संन्यासी बन गए। बाद में कुछ लोगों ने उन्हें हरिद्वार के अखाड़ों में देखने का दावा किया, पर वे फिर कभी लौटकर नहीं आए।
निष्कर्ष – शरत् चन्द्र के जीवन में राजू का स्थान एक ‘मसीहा’ और ‘गुरु’ जैसा था। शरत् ने स्वयं लिखा था कि उन्होंने अपनी ज़िंदगी में राजू जैसा उच्च आदर्शों वाला आदमी फिर कभी नहीं देखा। राजू ने ही शरत् को सिखाया कि दुनिया के सामाजिक मूल्यों से ऊपर ‘सहज मानवीय करुणा‘ होती है।
१. प्रकाशन का संदर्भ
‘यमुना’ पत्रिका के संपादक फणीन्द्रनाथ पाल शरत् बाबू के साहित्य के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। जब शरत् बाबू रंगून से कलकत्ता आए, तो वे अपने साथ ‘चरित्रहीन’ के लगभग ७०-८० प्रारंभिक पृष्ठ लेकर आए थे। फणीन्द्रनाथ पाल ने इन पृष्ठों को सुना और वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इसे ‘यमुना’ में धारावाहिक रूप में छापने का आग्रह किया। अंततः इसे ‘यमुना’ में धारावाहिक (serially) रूप में प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया।
२. अभूतपूर्व ‘सेंसेशन‘ और विवाद
- ‘चरित्रहीन’ का प्रकाशन शुरू होते ही बंगाल के साहित्यिक और सामाजिक जगत में भारी उथल-पुथल मच गई। उपन्यास की नायिका साविली (मेस की नौकरानी) और किरणमयी जैसे चरित्रों के चित्रण के कारण तत्कालीन रूढ़िवादी समाज ने इसे ‘अश्लील‘ और ‘अनैतिक‘ घोषित कर दिया था।
- विवाद इतना गहरा था कि संपादक फणीन्द्रनाथ पाल ने शरत् बाबू को तार (Telegram) भेजकर कहा था: “‘Charitraheen creating alarming sensation’ (चरित्रहीन अलार्मिंग सेंसेशन पैदा कर रहा है)”।
३. ग्राहक संख्या पर प्रभाव
- शरत् बाबू स्वयं इस बात को समझते थे कि यदि किसी धारावाहिक उपन्यास को लेकर विवाद खड़ा होता है, तो लोग उसे पढ़ने के लिए और अधिक उत्सुक होते हैं। उन्होंने माना कि निंदा और विवाद से ग्राहक संख्या बढ़ती है, टूटती नहीं।
- शरत् चन्द्र की रचनाओं (विशेष रूप से ‘चरित्रहीन’) के कारण ‘यमुना’ पत्रिका की ग्राहक संख्या, जो पहले केवल २०० थी, बढ़कर २००० हो गई थी।
४. संपादक का जोखिम और सफलता
पत्रिका की सफलता का एक बड़ा कारण फणीन्द्रनाथ पाल का साहस भी था। ‘साहित्य’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका के संपादक सुरेशचन्द्र समाजपति ने ‘चरित्रहीन’ की प्रशंसा तो की थी, लेकिन सामाजिक कोप के डर से उसे छापने की हिम्मत नहीं की थी। फणीन्द्रनाथ पाल ने समाज की गालियों और अपमान की चिंता न करते हुए इसे ‘यमुना’ में स्थान दिया, जिसने अंततः पत्रिका को बंगाल के घर-घर तक पहुँचा दिया।
निष्कर्ष – ‘चरित्रहीन’ उपन्यास ने ‘यमुना’ को न केवल आर्थिक रूप से समृद्ध किया, बल्कि उसे उस समय की अग्रणी साहित्यिक पत्रिकाओं की श्रेणी में खड़ा कर दिया।
१. राजनीतिक जीवन की सामग्री का आधार
- शचीनन्दन चट्टोपाध्याय की पुस्तक: विष्णु प्रभाकर के अनुसार, शरत् चन्द्र के राजनीतिक सक्रियता वाले कालखंड को समझने और लिखने में शचीनन्दन चट्टोपाध्याय की पुस्तक सबसे महत्वपूर्ण सहायक सिद्ध हुई।
- प्रमुख राजनीतिक घटनाएँ: इस पुस्तक और अन्य स्रोतों के माध्यम से लेखक ने शरत् बाबू के राजनीति में प्रवेश, देशबन्धु चित्तरंजन दास के साथ उनके प्रगाढ़ संबंध, और हावड़ा जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यों का विवरण जुटाया।
२. शरत्चन्द्र का राजनीतिक व्यक्तित्व
शचीनन्दन की पुस्तक और विष्णु प्रभाकर के शोध ने शरत् के राजनीतिज्ञ रूप के कई पहलुओं को उजागर किया-
- असहयोग आंदोलन: शरत् बाबू गांधीजी के असहयोग आंदोलन से गहराई से जुड़े थे, यद्यपि उनके मन में चखे और अहिंसा की पूर्ण व्यवहारिकता को लेकर संशय था।
- सशस्त्र क्रांतिकारियों का समर्थन: वे कांग्रेस के आधिकारिक पद पर रहते हुए भी गुप्त रूप से सशस्त्र क्रांतिकारियों (जैसे बिपिन बिहारी गांगुली) को आर्थिक सहायता और आश्रय प्रदान करते थे।
- ‘पथेर दाबी‘ का प्रभाव: उनका उपन्यास ‘पथेर दाबी’ उनके राजनीतिक विचारों का चरम बिंदु था, जिसे ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था क्योंकि वह क्रांतिकारियों की “बाइबल” बन गया था।
३. जीवनी लेखन की प्रामाणिकता
विष्णु प्रभाकर ने केवल शचीनन्दन चट्टोपाध्याय की पुस्तक पर ही निर्भरता नहीं रखी, बल्कि सामग्री की पुष्टि के लिए निम्नलिखित प्रयास भी किए-
- अन्य स्रोत: उन्होंने शरत् के प्रारंभिक जीवन के लिए उनके मामा सुरेन्द्रनाथ गांगुली और बर्मा प्रवास के लिए योगेन्द्रनाथ सरकार की रचनाओं का भी सहारा लिया।
- व्यापक शोध: लेखक ने बिहार, बंगाल और बर्मा की यात्राएँ कीं और शरत् के समकालीनों (जैसे सुभाषचन्द्र बोस के साथी और अन्य राजनेता) से साक्षात्कार किए ताकि राजनीतिक घटनाओं का सही क्रम बैठाया जा सके।
निष्कर्ष शचीनन्दन चट्टोपाध्याय की पुस्तक वह आधारशिला थी जिसके ऊपर विष्णु प्रभाकर ने शरत् बाबू के राजनीतिक ‘मसीहा’ वाले रूप का महल खड़ा किया। यह पुस्तक उन दुर्लभ अभिलेखों में से एक थी जिसने एक साहित्यकार के भीतर छिपे उस प्रखर देशभक्त को दुनिया के सामने लाने में मदद की जो देश की स्वतंत्रता के लिए कुछ भी बलिदान करने को तैयार था।
१. उपेक्षितों और ‘पतितों’ के प्रति सहानुभूति
शरत् बाबू ने अपने साहित्य में वेश्याओं, ‘चरित्रहीन’ कहे जाने वाले व्यक्तियों और समाज द्वारा बहिष्कृत लोगों को न केवल स्थान दिया, बल्कि उन्हें मानवीय गरिमा भी प्रदान की। उनका मानना था कि मनुष्य का बाहरी आचरण या उसके अपराध ही उसका पूर्ण परिचय नहीं हैं; उनके भीतर एक ऐसी ‘मनुष्यता’ छिपी होती है जो सभी अभावों और पापों से परे होती है। उन्होंने घोषणा की थी कि “सतीत्व ही नारीत्व नहीं है” और गिरकर उठने का रास्ता सबके लिए खुला रहना चाहिए।
२. ‘मिट्टी की गंध‘ और यथार्थवाद
जहाँ रवीन्द्रनाथ टैगोर का साहित्य अक्सर दार्शनिक और विश्लेषणात्मक होता था, वहीं शरत् ने साहित्य में ‘माटी की गंध‘ बसाकर उसे घर-घर पहुँचा दिया। उनके पात्र कल्पना की उपज मात्र नहीं थे, बल्कि उनके अपने जीवन के अनुभवों और समाज के निचले स्तरों के सूक्ष्म पर्यवेक्षण पर आधारित थे। उन्होंने स्वयं कहा था कि उनके ९० प्रतिशत चरित्रों का आधार सत्य है।
३. समाज की रूढ़ियों पर प्रहार
शरत् चन्द्र ने अपने उपन्यासों के माध्यम से उस “प्रीतिहीन, धर्महीन और क्षमाहीन समाज” से बार-बार कड़े सवाल पूछे जो केवल नियमों की दुहाई देकर मानवीय कल्याण को भूल गया था। उन्होंने दिखाया कि कैसे सामाजिक कठोरता महान और सुंदर जीवनों को निष्फल कर देती है। उनकी रचनाएँ (जैसे ‘पल्ली समाज’ और ‘चरित्रहीन’) समाज की ‘झूठी नैतिकता’ के ढोंग को उजागर करती थीं।
४. भाषा की सरलता और हृदय की गहराई
शरत् बाबू की बात कहने की शैली अत्यंत सुमधुर, सहज और सरल थी, जिसने पाठकों के हृदय के साथ सीधा संबंध स्थापित किया। उनकी भाषा में एक ऐसी ‘अंतःस्पर्श’ शक्ति थी जो पाठक को पात्रों के सुख-दुख के साथ एकाकार कर देती थी।
५. महापुरुषों के विचार
- रवीन्द्रनाथ टैगोर: उन्होंने माना कि शरत् ने बंगाली हृदय के रहस्यों में डूबकर सुख-दुख और मिलन-विछोह का ऐसा चित्रण किया जिससे जनता स्वयं को पहचान सकी। उन्होंने शरत् को बंगाली वेदना का केंद्र माना।
- श्री अरविन्द: उन्होंने शरत् की रचनाओं में “विशाल मेधा” और “दुख तथा पीड़ा के प्रति सहानुभूति से भरे हृदय” की अमिट छाप देखी।
निष्कर्ष – शरत् चन्द्र एक ऐसे ‘मसीहा‘ के रूप में उभरे जिन्होंने अपने ‘आवारा’ जीवन के अनुभवों को पीड़ित मानवता की सेवा और उनके अधिकारों की आवाज़ उठाने में लगा दिया। यही कारण है कि उनके पात्र देश-भर की जनता के जीवन का अंग बन गए और वे जनमानस के अत्यंत प्रिय लेखक बने।
१. साहित्य साधना के प्रथम श्रोता
बर्मा प्रवास के दौरान शरत् बाबू जब भी कुछ नया लिखते थे, तो दफ्तर में प्रतिदिन उसे सबसे पहले योगेन्द्रनाथ सरकार को ही सुनाते थे। जब शरत् ने ‘रामेर सुमति’ लिखना शुरू किया, तो योगेन्द्रनाथ ही एकमात्र व्यक्ति थे जो इस रहस्य को जानते थे और शरत् के कहने पर अपना काम छोड़कर बड़े चाव से उसे सुनते थे। इसी प्रकार ‘पथ निर्देश’ कहानी का लेखन भी प्रतिदिन दफ्तर में उन्हीं को पढ़कर सुनाया जाता था।
२. कृतियों पर प्रभाव और सुझाव
योगेन्द्रनाथ केवल श्रोता नहीं थे, बल्कि एक जागरूक पाठक की तरह शरत् की रचनाओं पर अपनी राय भी देते थे।
- ‘पथ निर्देश‘ विवाद: इस कहानी के अंत को लेकर शरत् और योगेन्द्रनाथ के बीच तीखा वाद-विवाद हुआ था। योगेन्द्रनाथ का मानना था कि वैष्णव आदर्शों के अनुसार कहानी का अंत अलग होना चाहिए। शरत् बाबू ने शुरू में विरोध किया, लेकिन अंततः अपने मित्र की बात मानकर कहानी का अंत बदल दिया।
- प्रतिभा का प्रचार: योगेन्द्रनाथ ने ही शरत् की प्रतिभा को अन्य सहकर्मियों के बीच प्रचारित करने की कोशिश की थी, हालांकि शुरू में किसी ने यह विश्वास नहीं किया कि उनके बीच रहने वाला एक साधारण क्लर्क इतनी उत्कृष्ट कहानियाँ लिख सकता है।
३. चित्रकला के साक्षी
योगेन्द्रनाथ सरकार शरत् चन्द्र की चित्रकला साधना के भी प्रमुख गवाह थे। उन्होंने शरत् द्वारा बनाए गए ‘नारद मुनि’ और ‘महाश्वेता’ जैसे तैलचित्रों की सूक्ष्मता, तकनीक और उनके निर्माण के पीछे शरत् के धैर्य का विस्तृत वर्णन अपनी रचनाओं में किया है।
४. साहित्यिक गोष्ठियों में सहयोग
रंगून के ‘बंगाल क्लब’ की साहित्यिक गोष्ठियों में शरत् बाबू अपनी संकोची प्रवृत्ति के कारण स्वयं निबंध पढ़ने से बचते थे। एक बार शरत् के अनुपस्थित रहने पर उनके द्वारा भेजे गए विशाल निबंध को योगेन्द्रनाथ सरकार ने ही पूरी सभा के सामने दो घंटे तक खड़े होकर पढ़ा था, जिसकी सभी ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की थी।
५. जीवनी लेखक के लिए महत्व
जीवनीकार विष्णु प्रभाकर ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि शरत् चन्द्र के बर्मा-प्रवास की प्रामाणिक कहानी लिखने के लिए वे जिस एक व्यक्ति के सबसे अधिक ऋणी हैं, वे योगेन्द्रनाथ सरकार ही हैं। योगेन्द्रनाथ की पुस्तक ‘बिदेशे शरत्‘ (विदेश में शरत्) इस जीवनी के प्रथम दो खंडों की रचना का प्रमुख आधार बनी।
निष्कर्ष – योगेन्द्रनाथ सरकार वे व्यक्ति थे जिन्होंने शरत् के गुमनामी और संघर्षपूर्ण बर्मा-जीवन के दौरान उनके भीतर छिपे ‘मसीहा’ और महान कथाकार को सबसे पहले पहचाना और प्रोत्साहित किया है।
‘शेष परिचय‘ शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय की वह महत्वपूर्ण रचना है जिसे वे अपने जीवन के अंतिम समय में लिख रहे थे, परंतु अपनी मृत्यु के कारण उसे पूरा नहीं कर सके-
१. रचना की स्थिति और शरत् बाबू का वचन
शरत् बाबू ने इस उपन्यास को शुरू करते समय अपने प्रकाशक ह़रिदास बाबू को विश्वास दिलाया था कि वे इसे नियमित रूप से लिखेंगे, लेकिन गिरते स्वास्थ्य के कारण वे केवल १५ परिच्छेद ही लिख पाए। मृत्युशैया पर भी उनकी यह अंतिम इच्छा थी कि उन्हें ‘शेष परिचय’ समाप्त करने का समय मिले। उन्होंने कहा था, “मुझे छोड़कर उसे और कोई पूरा न कर सकेगा” ।
२. राधारानी देवी द्वारा समापन
शरत् चन्द्र की मृत्यु के बाद इस अधूरे उपन्यास को पूरा करने का उत्तरदायित्व सुप्रसिद्ध कवयित्री श्रीमती राधारानी देवी पर पड़ा। उपन्यास को पूरा करने के संबंध में शरत् बाबू के मामा सुरेन्द्रनाथ और राधारानी देवी के बीच कई बार गंभीर चर्चाएँ हुई थीं। स्रोतों में राधारानी देवी को शरत् की परम शिष्या के रूप में भी दर्शाया गया है।
३. कथानक और मुख्य समस्या (थीम)
- वास्तविक घटना पर आधारित: यह उपन्यास भागलपुर की एक सत्य घटना पर आधारित है।
- सविता का चरित्र: इसकी नायिका ‘सविता’ अपने पति के प्रति पूरी तरह समर्पित है, फिर भी वह अचानक एक दिन एक दूर के रिश्तेदार के साथ घर छोड़कर चली जाती है। वह अपने पति और पुत्री की मर्यादा और समाज के कलंक की परवाह नहीं करती।
- रहस्यमय पदखलन: इस कहानी की सबसे बड़ी गुत्थी यह है कि सविता जिस व्यक्ति के साथ जाती है, उसे वह रंचमात्र भी प्यार नहीं करती। उपन्यास में इसी जटिल मनोवैज्ञानिक प्रश्न को उठाया गया है कि आखिर उसका यह ‘पदखलन’ क्यों हुआ।
- अकारण निरर्थकता: उपन्यास में एक स्थान पर सविता स्वयं कहती है, “वह एकाएक संपूर्ण अकारण निरर्थकता में हो जाता है”।
४. साहित्यिक चुनौती
जीवनीकार के अनुसार, शरत् बाबू जटिल सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समस्याएँ उठाने में विश्वास करते थे, समाधान देने में नहीं। चूँकि यह उपन्यास उनके द्वारा अधूरा छोड़ दिया गया था, इसलिए इसमें दी गई समस्याओं को तो समझा जा सकता है, परंतु सविता के आचरण का वह ‘समाधान’ जिसे राधारानी देवी ने पूरा किया, उसे शरत् बाबू का अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता।
निष्कर्ष – ‘शेष परिचय’ शरत् चन्द्र के कथा-साहित्य की एक अनसुलझी पहेली जैसा है, जिसे उनकी शिष्या राधारानी देवी ने उनकी स्मृतियों और चर्चाओं के आधार पर पूर्णता प्रदान करने का साहसी प्रयास किया।
१. प्रस्थान की पृष्ठभूमि और अपमान का दंश
पिता की मृत्यु के बाद शरत् चन्द्र कलकत्ता में अपने मामाओं के यहाँ रहकर नौकरी की तलाश कर रहे थे। वहां उनका जीवन अगाध गरीबी और अपमान से भरा था-
- उन्हें घर के साधारण नौकरों की तरह काम करना पड़ता था और भीतर आने से पहले खाँसना पड़ता था ताकि घर की स्त्रियाँ ओझल हो जाएँ।
- एक बार उन्होंने अपने मामा का ब्रश इस्तेमाल कर लिया था, जिसे देखकर मामा ने घृणावश उस ब्रश को बाहर फेंक दिया। इस अपमान ने शरत् के मन को गहराई तक आहत किया और उन्हें लगा कि ऐसे जीवन से सड़क या जंगल कहीं बेहतर है।
२. बर्मा जाने का आकर्षण
उन दिनों कलकत्ता में बर्मा (बर्मा) के बारे में यह अफवाह फैली थी कि वहाँ सड़कों पर रुपया बिखरा पड़ा है और जहाज़ से उतरते ही बंगालियों को साहब लोग नौकरी पर रख लेते हैं। इसके अतिरिक्त, उनके मौसा अघोरनाथ चटर्जी रंगून में एक सफल वकील थे, जिन्होंने वर्षों पहले उन्हें वहाँ आने का निमंत्रण दिया था।
३. रहस्यमयी प्रस्थान
शरत् बाबू ने अपनी इस यात्रा की सूचना किसी मित्र को नहीं दी क्योंकि उन्हें डर था कि वे उन्हें रोक लेंगे। उनके पास जहाज़ के किराये के पैसे भी नहीं थे, जिसे उन्होंने किसी तरह उधार माँगा। जनवरी १९०३ २४ (दिसंबर १९०२ की तिथि का भी उल्लेख है) की एक सुबह ४ बजे वे भवानीपुर के घर से स्टीमर घाट के लिए निकले। जहाज़ का किराया चुकाने के बाद उनकी जेब में मात्र एक-दो रुपये शेष बचे थे।
४. जहाज़ की यात्रा और ‘भारत दर्शन‘
जहाज़ की चार दिनों की यात्रा शरत् के लिए ‘भारत दर्शन’ जैसी थी, जहाँ उन्होंने मज़दूरों, प्रेमियों और रोजी की तलाश में भागते लोगों के वास्तविक जीवन को निकट से देखा। इसी यात्रा के दौरान उन्होंने एक भयानक समुद्री चक्रवात (साइक्लोन) का अनुभव भी किया, जिसका वर्णन बाद में उनके साहित्य में मिलता है।
५. रंगून में आगमन और ‘क्वारंटीन‘ (Corontine)
रंगून पहुँचते ही उन्हें प्लेग की महामारी के डर के कारण शहर से आठ मील दूर ‘क्वारंटीन’ (Corontine) में रहना पड़ा। वहाँ ८-१० दिनों तक झोपड़ियों में रहने और स्वयं खाना बनाने के कष्ट झेलने के बाद वे रंगून शहर में प्रवेश पा सके।
६. मौसा के घर पहुँच और नया आरम्भ
जब शरत् अपने मौसा अघोरनाथ के घर पहुँचे, तो उनकी स्थिति एक भिखारी जैसी थी—मैले कपड़े, फटी कमीज़ और कंधे पर गमछा। अपने मौसा को देखते ही वे फफक कर रो पड़े। मौसा ने उन्हें सहानुभूतिपूर्वक अपनाया और यहीं से शरत् के जीवन का वह संघर्षपूर्ण १३ वर्ष का बर्मा-प्रवास शुरू हुआ, जिसने उन्हें एक महान लेखक के रूप में विकसित होने का आधार दिया।
निष्कर्ष – शरत् चन्द्र का बर्मा जाना केवल रोजगार की खोज नहीं थी, बल्कि कलकत्ता के अपमानजनक वातावरण से एक पलायन था। इसी एकाकीपन और संघर्ष ने उनके भीतर के ‘मसीहा’ को जन्म दिया, जिसने आगे चलकर ‘श्रीकान्त’ और ‘चरित्रहीन’ जैसी कालजयी कृतियाँ रचीं।
१. ‘सप्त सरोज’ (Sapt Saroj) संकलन
संकलन वास्तव में ‘सप्त सरोज‘ है यह मुंशी प्रेमचन्द की सात प्रसिद्ध कहानियों का एक संग्रह था, इस संकलन में कहानियों का क्रम इस प्रकार था-
- बड़े घर की बेटी
- सौत
- सज्जनता का दंड
- पंच परमेश्वर
- नमक का दारोगा
- उपदेश
- परीक्षा
इस प्रकार, ‘बड़े घर की बेटी‘ इस संग्रह की पहली कहानी थी।
२. शरत् चन्द्र की सम्मति और प्रशंसा
प्रेमचन्द के इस कहानी संग्रह पर अपनी सम्मति देते हुए शरत् बाबू ने प्रेमचन्द की बहुत प्रशंसा की थी। वे प्रेमचन्द के यथार्थवाद और उनकी कथा-कला के कायल थे।
३. रवीन्द्रनाथ ठाकुर के साथ तुलना पर विवाद
यद्यपि शरत् बाबू प्रेमचन्द के प्रशंसक थे, लेकिन उन्होंने इसी प्रसंग में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। ‘सप्त सरोज’ की भूमिका में श्री मदन द्विवेदी ने लिखा था कि प्रेमचन्द का साहित्य रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाओं से टक्कर लेता है।
- शरत् बाबू की आपत्ति: शरत् चन्द्र ने स्पष्ट रूप से लिखा कि प्रेमचन्द की तुलना रवीन्द्रनाथ ठाकुर के साथ करना अनुचित है।
कारण: उनके अनुसार, रवीन्द्रनाथ का साहित्य एक अलग धरातल पर है और प्रेमचन्द की अपनी एक अलग मौलिक विशेषता है। वे दो महान रचनाकारों के बीच इस प्रकार की सीधी तुलना को उचित नहीं मानते थे।
४. ऐतिहासिक महत्व
यह प्रसंग दिखाता है कि शरत् चन्द्र न केवल एक महान सृजक थे, बल्कि एक निष्पक्ष और गंभीर आलोचक भी थे। उन्होंने ‘बड़े घर की बेटी’ जैसी कहानियों के महत्व को स्वीकार किया और प्रेमचन्द को एक श्रेष्ठ कथाकार माना, लेकिन साथ ही साहित्यिक मर्यादा और तुलना के मानकों के प्रति भी वे सजग थे।
निष्कर्ष – ‘सप्त सरोज’ संकलन और उसकी पहली कहानी ‘बड़े घर की बेटी’ का उल्लेख शरत् चन्द्र के जीवन में प्रेमचन्द के साहित्य के प्रति उनके सम्मान और आलोचनात्मक विवेक को रेखांकित करने के लिए आता है।
१. ‘आवारा‘ और ‘मसीहा‘ के बीच का सूक्ष्म अंतर
लेखक विष्णु प्रभाकर के अनुसार, ‘आवारा’ और ‘मसीहा’ दो अलग-अलग शब्द हैं, लेकिन उनके बीच केवल एक ही बारीक अंतर है: ‘दिशा‘ (Direction)।
- आवारा: लेखक का मानना है कि एक आवारा व्यक्ति में भी वे सभी मानवीय गुण और संवेदनाएं होती हैं जो एक महापुरुष में होती हैं, लेकिन उसके जीवन में कोई स्पष्ट दिशा या लक्ष्य नहीं होता। शरत् का प्रारंभिक जीवन गरीबी, अपमान और उपेक्षा के बीच बीता, जिससे वे विद्रोही होकर स्वच्छंद और ‘बोहेमियन’ (आवारा) जीवन जीने लगे।
- मसीहा: लेखक के अनुसार, जिस दिन एक आवारा व्यक्ति को अपने जीवन की सही दिशा मिल जाती है, वह ‘मसीहा’ बन जाता है। शरत् बाबू के जीवन में यह दिशा उनके लेखन और पीड़ित मानवता के प्रति उनकी गहरी सहानुभूति के रूप में सामने आई।
२. विद्रोही स्वभाव से मानवता का रक्षक
शरत्चन्द्र ने अपने बचपन और युवावस्था में समाज के कठोर नियमों का अपमान झेला था, जिसके कारण वे तत्कालीन समाज के “भले लोगों” के पाखंड के प्रति विद्रोही हो गए। उन्होंने समाज के उन निचले स्तरों (जैसे वेश्याओं, मजदूरों और तिरस्कृत लोगों) के बीच रहकर जीवन को देखा, जिन्हें ‘सभ्य’ समाज घृणित मानता था।
- उनके इसी ‘आवारा‘ भ्रमण ने उन्हें वह अनुभव दिए जिससे वे जान सके कि “मनुष्यत्व सतीत्व से भी बड़ी वस्तु है”।
- बाद में, उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से इन्हीं उपेक्षित लोगों को मानवीय गरिमा प्रदान की और वे ‘पीड़ित मानवता के मसीहा‘ कहलाए।
३. जीवन के विरोधाभासों का समन्वय
विष्णु प्रभाकर ने शरत् को केवल एक ‘देवता’ या केवल एक ‘पतित’ के रूप में नहीं देखा। उन्होंने अनुभव किया कि शरत् बाबू का व्यक्तित्व अत्यधिक जटिल और विरोधाभासों से भरा था।
- वे एक ओर अफीम खाते थे और शराब पीते थे, लेकिन दूसरी ओर गरीबों की सेवा के लिए रात-रात भर जागते थे।
- लेखक का उद्देश्य यह दिखाना था कि शरत् का ‘आवारापन‘ (यायावरी) ही उनके ‘मसीहा‘ (सर्जक) बनने की आधारशिला था। बिना उस स्वच्छंदता के वे समाज के उन मर्मस्पर्शी सत्यों को नहीं खोज पाते जो बाद में उनके साहित्य का ‘अमृत’ बने।
४. एक दिशाहीन युवक की सार्थक यात्रा
जीवनी का नाम यह दर्शाता है कि कैसे एक युवक, जिसका जीवन एक समय नष्ट होता हुआ प्रतीत होता था, अंततः अपनी प्रतिभा और सहानुभूति के कारण पूरे देश का प्रिय कथाकार और समाज का मार्गदर्शक बन गया। लेखक ने शरत् के जीवन को “चेतन तत्व” के स्तर पर समझने के लिए यह नाम चुना, जो उनके शरीर-रचना (anatomy) से कहीं अधिक उनके व्यक्तित्व की गहराई को प्रकट करता है।
निष्कर्ष – ‘आवारा मसीहा’ नाम शरत्चन्द्र के उस जीवन-वृत्त का प्रतीक है जहाँ दिशाहीनता (आवारगी) संघर्ष की भट्टी में तपकर दिशापूर्ण सेवा (मसीहापन) में परिवर्तित हो गई।
1. अखिल भारतीय लोकप्रियता (Pan-Indian Fame)
- भाषा की सीमाएं लांघना: शरत् बाबू भारत के ऐसे विरल उपन्यासकार थे जिनकी रचनाएं भाषा की सभी सीमाएं लांघकर सच्चे मायनों में ‘अखिल भारतीय’ हो गई थीं।
- सर्वाधिक अनुवादित: उनकी प्रायः सभी रचनाओं का अनुवाद भारत की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं (जैसे—हिन्दी, गुजराती, मलयालम, पंजाबी, सिन्धी, उर्दू, तेलुगु आदि) में हो चुका था।
- जनमानस के अंग: उनकी रचनाएँ और उनके पात्र देश-भर की जनता के जीवन के अंग बन गए थे। स्थिति यह थी कि विद्यार्थियों की पाठ्यपुस्तकों के नीचे, गृहणियों के तकियों के नीचे और यहाँ तक कि बनियों की दुकानों पर भी शरत् के उपन्यास (जैसे ‘श्रीकांत’ और ‘देवदास’) मिल जाते थे।
2. बौद्धिक और संस्थागत सम्मान
- टैगोर द्वारा सम्मान: कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने स्वयं शरत् की प्रतिभा का अभिनंदन किया था और उन्हें ‘बंगाली वेदना का केंद्र’ माना था। टैगोर ने माना था कि शरत् ने बंगाली हृदय के रहस्यों को जनता के सामने इस तरह रखा कि वे स्वयं को उनमें पहचान सके।
- विश्वविद्यालयी मान्यता: उन्हें कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा ‘जगत्तारिणी स्वर्ण पदक’ (1923) और ढाका विश्वविद्यालय द्वारा ‘डी. लिट्.’ (1936) की मानद उपाधियाँ प्रदान की गई थीं।
- महापुरुषों की दृष्टि में: श्री अरविन्द ने उनकी रचनाओं में “विशाल मेधा” और “मानवता के प्रति अगाध सहानुभूति” देखी थी। आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय जैसे वैज्ञानिक भी उनके साहित्य के बड़े प्रशंसक थे।
3. अंतरराष्ट्रीय ख्याति (International Recognition)
- विदेशी भाषाओं में अनुवाद: उनके उपन्यास ‘श्रीकांत‘ (प्रथम पर्व) का अनुवाद अंग्रेजी और इतालवी भाषाओं में हो चुका था।
- रोम्यां रोलां की प्रशंसा: प्रसिद्ध फ्रांसीसी मनीषी और नोबेल पुरस्कार विजेता रोम्यां रोलां ने शरत् को “प्रथम श्रेणी का उपन्यासकार” मानकर उनके साहित्य की सराहना की थी।
- नोबेल पुरस्कार की चर्चा: उनकी ख्याति इतनी व्यापक थी कि उस समय उनके नाम की चर्चा नोबेल पुरस्कार के संभावित भारतीय उम्मीदवारों के रूप में भी होने लगी थी।
4. मृत्यु पर अभूतपूर्व शोक
- जब 16 जनवरी, 1938 को उनका निधन हुआ, तो कलकत्ता नगर में शोक की ऐसी लहर उठी जो किसी उपन्यासकार के लिए विरल थी।
- दल के दल लोग सड़कों पर जमा हो गए, समाचार पत्रों ने विशेष संस्करण निकाले और रेडियो से निरंतर घोषणाएँ होती रहीं। उनके अंतिम दर्शन के लिए बंगाल के सभी गणमान्य साहित्यकार, राजनेता और हज़ारों साधारण नागरिक उमड़ पड़े थे।
निष्कर्ष- शरत् चन्द्र की मृत्यु के समय वे केवल एक लेखक नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य के ‘मसीहा‘ और ‘अपराजेय कथाशिल्पी’ के रूप में स्थापित हो चुके थे, जिनका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर था।
लघु प्रश्नोत्तर (Short Questions and Answers)
प्रश्न – ‘आवारा मसीहा’ किस विश्वविख्यात भारतीय साहित्यकार की जीवनी है?
उत्तर – शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय।
प्रश्न – शरत् चन्द्र की जीवनी ‘आवारा मसीहा’ के लेखक कौन हैं?
उत्तर – विष्णु प्रभाकर।
प्रश्न – लेखक विष्णु प्रभाकर ने शरत् चन्द्र की जीवनी लिखने में कितने वर्ष का समय लगाया?
उत्तर – १४ वर्ष।
प्रश्न – लेखक के अनुसार ‘आवारा’ और ‘मसीहा’ शब्दों के बीच क्या संबंध है?
उत्तर – आवारा मनुष्य को जिस दिन ‘दिशा’ मिल जाती है, वह मसीहा बन जाता है।
प्रश्न – शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय का जन्म किस गाँव में हुआ था?
उत्तर – देवानन्दपुर।
प्रश्न – शरत् चन्द्र के पिता का नाम क्या था?
उत्तर – मोतीलाल।
प्रश्न – शरत् चन्द्र के मन में लेखक बनने की प्रेरणा सबसे पहले किसे पढ़कर जागी?
उत्तर – रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचना ‘आँख की किरकिरी’।
प्रश्न – शरत् चन्द्र ने अपनी मैट्रिक की परीक्षा किस वर्ष और किस महीने में उत्तीर्ण की थी?
उत्तर – फरवरी १८९४ में।
प्रश्न – शरत् चन्द्र की वह कौन सी प्रसिद्ध रचना थी जिसे ब्रिटिश सरकार ने जब्त कर लिया था?
उत्तर – पथेर दाबी।
प्रश्न – शरत् चन्द्र ने बर्मा (रंगून) प्रवास के दौरान कुल कितने वर्ष वहाँ बिताए?
उत्तर – १३ वर्ष।
प्रश्न – बर्मा में शरत् चन्द्र ने किस सरकारी विभाग में नौकरी की थी?
उत्तर – एग्जामिनर, पब्लिक वर्क्स एकाउंट्स (Public Works Accounts)।
प्रश्न – शरत् चन्द्र की पहली पत्नी का नाम क्या था, जिनकी मृत्यु प्लेग के कारण हुई थी?
उत्तर – शांति देवी।
प्रश्न – शरत् चन्द्र की दूसरी पत्नी का नाम क्या था, जो उनकी मृत्यु के बाद २२ वर्षों तक जीवित रहीं?
उत्तर – हिरणमयी देवी।
प्रश्न – शरत् चन्द्र ने किस उपन्यास के माध्यम से अपने जीवन के अनुभवों को छद्म रूप में व्यक्त किया है?
उत्तर – श्रीकान्त।
प्रश्न – शरत् चन्द्र के अनुसार, गाँव के कुत्तों की आर्थिक और शारीरिक स्थिति किसका सूचक होती है?
उत्तर – गाँव के लोगों की आर्थिक स्थिति का (थर्मामीटर)।
प्रश्न – श्रीमती निरुपमा देवी ने शरत् चन्द्र से अपनी रचनाओं में किन चरित्रों की आलोचना न करने का अनुरोध किया था?
उत्तर – विधवा चरित्रों की।
प्रश्न – शरत् चन्द्र की किस रचना को हेनरी वुड के उपन्यास ‘ईस्टलीन’ (East Lynne) पर आधारित माना जाता है?
उत्तर – अभिमान।
प्रश्न – देशबन्धु चित्तरंजन दास ने अपनी किस पत्रिका के लिए शरत् चन्द्र से कहानी लिखने का आग्रह किया था?
उत्तर – नारायण।
प्रश्न – चित्तरंजन दास द्वारा दिए गए कोरे चेक (Blank Check) पर शरत् चन्द्र ने कितनी राशि भरी थी?
उत्तर – १०० रुपये।
प्रश्न – शरत् चन्द्र ने भागलपुर में अपने मामा के घर रहते हुए किस हस्तलिखित पत्रिका का संपादन किया था?
उत्तर – शिशु।
प्रश्न – भागलपुर में शरत् चन्द्र किस प्रसिद्ध क्लब के सदस्य थे, जहाँ उनके जीवन की प्रवृत्तियाँ पनपीं?
उत्तर – आदमपुर क्लब।
प्रश्न – शरत् चन्द्र के पिता मोतीलाल की मृत्यु के समय वे किस शहर में ‘बोहेमियन’ जीवन जी रहे थे?
उत्तर – मुजफ्फरपुर।
प्रश्न – शरत् चन्द्र ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर को किस उपाधि से संबोधित किया और उन्हें अपना मार्गदर्शक माना?
उत्तर – गुरु (कविगुरु)
प्रश्न – शरत् चन्द्र की कौन सी प्रसिद्ध कहानी एक गरीब किसान और उसके बैल के मार्मिक संबंध पर आधारित है?
उत्तर – महेश।
प्रश्न – महात्मा गांधी के आदेश पर महादेव देसाई ने शरत् की किन रचनाओं का गुजराती में अनुवाद किया था?
उत्तर – स्वराज बाबू, बिन्दू का लल्ला, राम की सुमति, और मंझली दीदी।
प्रश्न – शरत् चन्द्र के अनुसार, मनुष्य का स्वभाव और चरित्र समझने में विश्व का कौन सा लेखक सर्वश्रेष्ठ है?
उत्तर – शेक्सपियर।
प्रश्न – बर्मा प्रवास के दौरान शरत् चन्द्र को किस विशेष कार्य के लिए ‘बामुन दा’ कहकर पुकारा जाता था?
उत्तर – गरीबों की सेवा और होम्योपैथिक दवाओं से इलाज करने के कारण।
प्रश्न – शरत् चन्द्र ने किस क्रांतिकारी विचारधारा का समर्थन किया और उन्हें गुप्त रूप से सहायता दी?
उत्तर – सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन।
प्रश्न – शरत् चन्द्र की किस कृति के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने उसमें अपने माता-पिता के जीवन के दुखों को चित्रित किया है?
उत्तर – शुभदा।
प्रश्न – शरत् चन्द्र के पिता मोतीलाल की कौन सी साहित्यिक प्रवृत्ति शरत् को विरासत में मिली थी?
उत्तर – साहित्य सृजन की प्रवृत्ति (यद्यपि वे अपनी रचनाएँ अधूरी छोड़ देते थे)।
प्रश्न – विष्णु प्रभाकर ने शरत् चन्द्र की जीवनी लिखने के लिए किन-किन स्थानों की यात्रा की थी?
उत्तर – बिहार, बंगाल और बर्मा।
प्रश्न – शरत् चन्द्र की जीवनी लिखने के प्रस्ताव को स्वीकार करने का मुख्य कारण विष्णु प्रभाकर ने क्या बताया?
उत्तर – शरत् चन्द्र के साहित्य के प्रति उनका गहरा अनुराग।
प्रश्न – शरत् चन्द्र के मैट्रिक परीक्षा में फेल होने की अफवाहों को लेखक ने विश्वविद्यालय के किस दस्तावेज से गलत सिद्ध किया?
उत्तर – विश्वविद्यालय के पुराने कैलेंडर और रजिस्टर से।
प्रश्न – शरत् चन्द्र ने अपनी किस रचना के लिए अपने मामा सुरेन्द्रनाथ गांगुली का नाम उपयोग किया था?
उत्तर – मन्दिर।
प्रश्न – शरत् चन्द्र की रचना ‘पथेर दाबी’ के सरकारी तौर पर जब्त होने की सही तारीख क्या थी?
उत्तर – जनवरी १९२७।
प्रश्न – शरत् चन्द्र के मामा और बचपन के मित्र का नाम क्या था, जिन्होंने उनकी जीवनी के लिए महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की?
उत्तर – सुरेन्द्रनाथ गांगुली।
प्रश्न – मुजफ्फरपुर प्रवास के दौरान शरत् चन्द्र का परिचय किस धनी जमींदार युवक से हुआ था?
उत्तर – महादेव साहु।
प्रश्न – शरत् चन्द्र के बचपन का वह कौन सा मित्र था जिसे उन्होंने अपनी रचनाओं में ‘राजू’ या ‘इन्द्रनाथ’ के रूप में अमर कर दिया?
राजू (इन्द्रनाथ)।
प्रश्न – शरत् चन्द्र की कौन सी रचना ‘यमुना’ पत्रिका की ग्राहक संख्या बढ़ाने में अत्यंत सहायक सिद्ध हुई?
उत्तर – चरित्रहीन।
प्रश्न – शरत् चन्द्र ने ‘शेष प्रश्न’ उपन्यास में किस मुख्य विषय पर व्यापक विचार-विमर्श प्रस्तुत किया है?
उत्तर – आधुनिक सामाजिक विचारधारा और पुराने मूल्यों का टकराव
प्रश्न – रत् चन्द्र के राजनीतिक जीवन की अधिकांश सामग्री विष्णु प्रभाकर को किसकी पुस्तक से प्राप्त हुई थी?
उत्तर – शचीनन्दन चट्टोपाध्याय।
प्रश्न – शरत् चन्द्र के साहित्य की मुख्य विशेषता क्या मानी जाती है, जिसके कारण वे जनमानस के अत्यंत प्रिय थे?
उत्तर – मार्मिक संवेदना और पीड़ित मानवता के प्रति सहानुभूति।
प्रश्न – शरत् चन्द्र के बर्मा प्रवास के दौरान उनके सबसे घनिष्ठ और साहित्य प्रेमी मित्र कौन थे?
उत्तर – योगेन्द्रनाथ सरकार।
प्रश्न – शरत् चन्द्र की उस अधूरी रचना का नाम क्या है जिसे उनकी मृत्यु के बाद राधारानी देवी ने पूरा करने का प्रयास किया?
उत्तर – शेष परिचय।
प्रश्न – शरत् चन्द्र ने किस वर्ष कलकत्ता (कोलकाता) को हमेशा के लिए छोड़कर रंगून की राह ली थी
उत्तर – जनवरी १९०३ में।
प्रश्न – शरत् चन्द्र की कौन सी कहानी ‘सत्य सरोज’ संकलन में पहले स्थान पर संकलित थी?
उत्तर – बड़े घर की बेटी (प्रेमचन्द की कहानी पर सम्मति देते समय उल्लेखित)
प्रश्न – शरत् चन्द्र ने ‘भारतवर्ष’ पत्रिका के संपादक रायबहादुर जलधर सेन को उनके साहित्यिक योगदान के लिए क्या श्रेय दिया?
उत्तर – उन्हें रचनाएँ लिखने के लिए निरंतर प्रेरित और विवश करने का श्रेय।
प्रश्न – शरत् चन्द्र के अनुसार, एक सफल लेखक के लिए केवल लिखते जाना ही नहीं, बल्कि और क्या आवश्यक है?
उत्तर – रुकने या संयम बरतने की कला।
प्रश्न – शरत् चन्द्र की जीवनी का नाम ‘आवारा मसीहा’ रखने के पीछे लेखक का क्या उद्देश्य था?
उत्तर – यह दिखाना कि कैसे एक दिशाहीन युवक पीड़ित मानवता का रक्षक बना।
प्रश्न – शरत् चन्द्र की मृत्यु के समय उनकी साहित्यिक ख्याति का स्तर क्या था?
उत्तर – वे भारत के सबसे लोकप्रिय और अनुवादित उपन्यासकार बन चुके थे।
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