मनोविज्ञान (Psychology) अध्याय 23: परिवेशीय तनाव | Environmental Stress

Class 10 (NIOS) – मनोविज्ञान (Psychology)  मनोविज्ञान (Psychology) अध्याय 23: परिवेशीय तनाव | Environmental Stress

यह पाठ पर्यावरणीय मनोविज्ञान के अंतर्गत मानव और प्रकृति के बीच के जटिल संबंधों का विश्लेषण करता है। इसमें पर्यावरणीय तनाव को व्यक्ति और उसके परिवेश के बीच एक अवांछित आदान-प्रदान के रूप में परिभाषित किया गया है, जो मुख्य रूप से वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण जैसी समस्याओं से उत्पन्न होता है। स्रोत इस बात पर जोर देता है कि मानवीय गतिविधियाँ, जैसे कि संसाधनों का अंधाधुंध दोहन और शहरी भीड़भाड़, न केवल शारीरिक बीमारियों को जन्म देती हैं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवहार को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं। इसके अतिरिक्त, यह ग्लोबल वार्मिंग और ग्रीन हाउस प्रभाव के खतरों के प्रति सचेत करते हुए भविष्य के लिए पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी व्यवहार अपनाने का आह्वान करता है। लेखक के अनुसार, मानव जाति की भलाई के लिए प्रकृति के साथ एक सहजीवी और संतुलित संबंध बनाए रखना अनिवार्य है। अंततः, यह लेख पाठकों को संसाधनों के संरक्षण और प्रदूषण कम करने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी निभाने के लिए प्रेरित करता है।

परिवेशीय तनाव: एक विस्तृत अध्ययन

हमारा परिवेश या पर्यावरण हमारे जीवन की गुणवत्ता और खुशहाली में एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मनोविज्ञान के इस अध्याय में हम यह समझेंगे कि कैसे हमारे आसपास का वातावरण हमारे व्यवहार को प्रभावित करता है और आधुनिक युग में बढ़ता प्रदूषण और अन्य कारक हमारे लिए परिवेशीय तनाव का कारण बन रहे हैं।

1. परिवेशीय तनाव क्या है?

परिवेशीय तनाव व्यक्ति और उसके पर्यावरण के बीच एक अवांछित आदान-प्रदान है। जब हमारा पर्यावरण हमसे ऐसी मांगें करता है जिन्हें पूरा करना कठिन होता है, तो तनाव की स्थिति उत्पन्न होती है। इसमें केवल भौतिक जगत ही नहीं, बल्कि वह सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण भी शामिल है जिसमें हम दूसरों के साथ अंतःक्रिया करते हैं।

2. मानव और प्रकृति के बीच बदलते संबंध

इतिहास के विभिन्न चरणों में मानव और प्रकृति के संबंधों को तीन दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है:

  • प्रकृति के अधीन मानव: प्राचीन काल में मनुष्य प्रकृति को ही अपना स्वामी मानता था। सूरज, चंद्रमा, पशु-पक्षियों और पेड़ों की पूजा की जाती थी और उन्हें डराने वाली शक्तियों के रूप में देखा जाता था।
  • प्रकृति पर मानव का प्रभुत्व: विज्ञान और तकनीक के विकास के साथ मानव ने प्रकृति पर नियंत्रण करना शुरू कर दिया। आज हम अंगों का प्रत्यारोपण (Transplant) और हर मौसम में सब्जियां उगाने जैसी उपलब्धियां हासिल कर चुके हैं। लेकिन इस प्रभुत्व ने ग्लोबल वार्मिंग और ओजोन परत में कमी जैसी गंभीर समस्याएं भी पैदा की हैं।
  • सहजीवी संबंध (Symbiotic Relationship): यह सबसे संतुलित दृष्टिकोण है, जो सिखाता है कि मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे पर निर्भर हैं। हमें अपनी सीमाओं को पहचानना चाहिए और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना जिम्मेदारी से संसाधनों का उपयोग करना चाहिए।

3. प्रदूषण और परिवेशीय तनाव के प्रकार

प्रदूषण पर्यावरण में होने वाला वह अवांछित परिवर्तन है जो जीवन को हानिकारक रूप से प्रभावित करता है। इसके मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं:

  • वायु प्रदूषण: यह हवा की गुणवत्ता में असंतुलन है। भोपाल गैस त्रासदी इसका एक भयानक उदाहरण है। वायु प्रदूषण से 50-90 प्रतिशत कैंसर, अस्थमा, उच्च रक्तचाप और आँखों की रोशनी कम होने जैसी बीमारियां होती हैं। इसके मुख्य कारण बढ़ता औद्योगीकरण, वाहनों का धुआं और पेड़ों की कटाई हैं।
  • जल प्रदूषण: पानी में हानिकारक तत्वों का मिलना जल प्रदूषण कहलाता है। भारत में लगभग 20 प्रतिशत संक्रामक बीमारियां (जैसे हेपेटाइटिस, दस्त, आँतों के कीड़े) प्रदूषित जल के कारण होती हैं। घरेलू कचरा और कारखानों का रासायनिक पानी सीधे नदियों में डालना इसका सबसे बड़ा कारण है।
  • ध्वनि प्रदूषण: अत्यधिक शोर जो शारीरिक परेशानी पैदा करे, ध्वनि प्रदूषण है। इससे बहरापन, हृदय संबंधी विकार, एकाग्रता में कमी और चिड़चिड़ापन हो सकता है।
  • भीड़ (Crowding): भीड़ एक मनोवैज्ञानिक तनाव है, जहाँ व्यक्ति को स्थान की कमी और निजता के उल्लंघन का अनुभव होता है। भीड़भाड़ वाले इलाकों में अपराध (जैसे जेब कटना) और तनाव अधिक पाया जाता है, जिससे उच्च रक्तचाप और क्रोध बढ़ता है।
  • ग्रीनहाउस प्रभाव (Global Warming): कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी गैसें सूरज की गर्मी को सोख लेती हैं, जिससे धरती का तापमान बढ़ रहा है। इससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं और समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, जो कई द्वीपों के डूबने का कारण बन सकता है।

4. सतत विकास (Sustainable Development)

सतत विकास का अर्थ है—“ऐसा विकास जो भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं से समझौता किए बिना आज की जरूरतों को पूरा करे”। इसका मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों (जैसे कोयला, तेल, पानी) को बचाना है ताकि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उपलब्ध रहें।

5. हम कैसे योगदान दे सकते हैं?

पर्यावरण को बचाने के लिए हर छात्र छोटे-छोटे कदम उठा सकता है:

  1. पानी की बर्बादी रोकें और बिजली बचाएं।
  2. सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें और अधिक से अधिक पेड़ लगाएं।
  3. प्लास्टिक की जगह कपड़े या कागज के थैलों का प्रयोग करें।
  4. सामानों का दोबारा उपयोग (Reuse) और रीसायकल (Recycle) करें।

निष्कर्ष: ‘चाहत’ और ‘आवश्यकता’ में अंतर

महान दार्शनिक प्लेटो के अनुसार, खुश रहने के लिए हमें अपनी असीमित इच्छाओं और वास्तविक आवश्यकताओं के बीच अंतर समझना चाहिए। आवश्यकताएं (जैसे हवा, पानी, भोजन) सीमित हैं, लेकिन इच्छाएं अनंत हैं। बिना जरूरत के सामान खरीदना न केवल पैसे की बर्बादी है, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों का शोषण भी है। साधारण जीवन जीना और मन में संतुष्टि रखना ही परिवेशीय तनाव को कम करने का सही मार्ग है।

पर्यावरणीय तनाव, प्रदूषण के प्रकार और उनके प्रभाव


तनाव या प्रदूषण का प्रकारपरिभाषामुख्य कारक या स्रोतस्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक प्रभावनिवारण के उपायस्रोत
वायु प्रदूषणवायु की गुणवत्ता में असंतुलन, जो जीवित प्राणियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।बिजली की खपत, औद्योगिकीकरण, वाहन यातायात, धूम्रपान, पेड़ों की कटाई, CO2, NO2, SO2, और SPM।आंख-नाक-गले में जलन, दमा, खांसी, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, कैंसर (50-90%), मिर्गी, स्मृति बाधाएं, और समय से पहले मृत्यु।पेड़ लगाना, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना, CO2 उत्सर्जन कम करना, और बिजली की बचत करना।[1]
जल प्रदूषणपानी में अवांछित तत्वों का मिलना जो इसे मानव, पशुओं और जलीय जीवों के लिए हानिकारक बना देता है।घरेलू कचरा, औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि रसायन (फास्फेट), और नदियों में दूषित जल का सीधा विसर्जन।हेपेटाइटिस A और B, दस्त, आंतों के कीड़े, और संक्रामक बीमारियाँ (20% पानी से संबंधित)।पानी की बर्बादी रोकना, रसायनों को नालियों में न बहाना, फास्फेट रहित साबुन का उपयोग करना, और जल संरक्षण।[1]
ध्वनि प्रदूषणध्वनि की तीव्रता, तीव्रता, या स्वर की पिच में अवांछित वृद्धि जो शारीरिक परेशानी पैदा करती है।वाहनों का शोर, संगीत, रेलवे फाटक, और सड़क निर्माण कार्य।कान के पर्दे की कमजोरी, सुनने की क्षमता में कमी, एकाग्रता में कमी, आक्रामक व्यवहार, नींद की कमी, और चिड़चिड़ापन।शोर के स्तर को नियंत्रित करना और शोर वाले क्षेत्रों में कार्य करने से बचना।[1]
भीड़भाड़ (Crowding)एक निर्धारित स्थान पर व्यक्तियों की संख्या का व्यक्तिपरक अनुभव जो असुविधा और तनाव पैदा करता है।उच्च जनसंख्या घनत्व, बसें, बाजार, स्थानीय रेल, और जेलें।क्रोध, आक्रामकता, उच्च रक्तचाप, तेज हृदय गति, व्यक्तिगत स्वतंत्रता की कमी, और सामाजिक अलगाव।स्थान का उचित प्रबंधन और व्यक्तिगत स्थान (Personal Space) का सम्मान।[1]
ग्रीनहाउस प्रभाव / ग्लोबल वार्मिंगवातावरण में गैसों (CO2, मीथेन, CFC) द्वारा सूरज की गर्मी को रोकने से धरती के तापमान में निरंतर वृद्धि।जीवाश्म ईंधन का जलना, वनों की कटाई, कोयला जलाना, और प्रशीतन के लिए क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) का उपयोग।समुद्र स्तर में वृद्धि (द्वीपों का डूबना), चरम मौसम, कृषि चक्र में व्यवधान, और ओजोन परत की क्षति।पेड़ लगाना, CFC के उपयोग पर रोक, CO2 कम करना, और बिजली बचाने वाले उपकरणों का उपयोग।
पर्यावरणीय तनाव, प्रदूषण के प्रकार और उनके प्रभाव

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