चित्रकला अध्याय 3: 13वीं शती (AD) से 18वीं शती (AD) तक कला का इतिहास तथा मूल्यांकन | History and Evaluation of Art from the 13th to the 18th Century (AD)

विषय: चित्रकला (Painting) – कक्षा 10 (NIOS) अध्याय 3: 13वीं शती (AD) से 18वीं शती (AD) तक कला का इतिहास तथा मूल्यांकन | Topic: Painting – Class 10 (NIOS) Chapter 3: History and Evaluation of Art from 13th Century (AD) to 18th Century (AD)

2वीं से 18वीं शताब्दी के बीच भारतीय कला के विकास और उसके विभिन्न स्वरूपों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। इसमें मुख्य रूप से लघुचित्र शैली, ताड़ के पत्तों पर बनी जैन पांडुलिपियों और बंगाल की टेराकोटा मंदिर वास्तुकला का विश्लेषण किया गया है। स्रोत बताते हैं कि कैसे राजनीतिक परिवर्तनों के बावजूद राजपूत, मुगल और पहाड़ी शैलियों के माध्यम से कला जीवंत बनी रही। विशेष रूप से ‘श्रृंगार’ और ‘रासलीला’ जैसी कृतियों के उदाहरण देकर उस काल की तकनीकी बारीकियों और धार्मिक विषयों को स्पष्ट किया गया है। भारतीय कला के उस महत्वपूर्ण समय की व्याख्या करता है जब देश में बड़े साम्राज्यों के पतन के बाद कला ने एक नया मोड़ लिया।

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और कला का बदलता स्वरूप

12वीं शताब्दी के बाद भारत के विभिन्न हिस्सों में शक्तिशाली राजवंशों के पतन के कारण कला को मिलने वाले बड़े संरक्षण में कमी आई। इस कारण बड़े स्तर पर मंदिरों या स्मारकों के निर्माण की परियोजनाएं कम हो गईं। हालांकि, राजस्थान, बंगाल और ओडिशा में कुछ मंदिर बने, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम थी।

इस काल की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित रहीं:

  • मुस्लिम शासकों का प्रभाव: इस युग में मुस्लिम शासकों ने अपना निर्माण कार्य मुख्य रूप से किलों और मकबरों तक सीमित रखा। उन्होंने वास्तुकला को बहुत अधिक प्रोत्साहन नहीं दिया।
  • हस्तलिपियों (Manuscripts) का विकास: बड़े स्मारकों के अभाव में कलाकारों ने सचित्र हस्तलिपियों या पांडुलिपियों पर ध्यान केंद्रित किया। ये पांडुलिपियां हिंदू, जैन और बौद्ध धर्मों से संबंधित थीं।
  • प्रमुख केंद्र: इन चित्रों के मुख्य केंद्र बंगाल, गुजरात और बिहार थे। बंगाल और बिहार में ‘पाल वंश’ के तहत बौद्ध कला फली-फूली, जबकि बिहार और गुजरात में जैन धार्मिक पांडुलिपियां ताड़ के पत्तों (Palm leaves) पर तैयार की गईं।

2. 16वीं से 19वीं शताब्दी: राजपूत और मुगल शैली

इस दौरान भारतीय चित्रकला ने फिर से ऊंचाइयां छुईं:

  • राजपूत चित्रकला: इसमें लोक-कला और अजंता की चित्रकला का मिश्रण देखने को मिलता है।
  • मुगल चित्रकला: यह फारसी (Persian) और राजपूत शैली का एक अद्भुत संगम थी। 18वीं शताब्दी के बाद भारतीय कला का धीरे-धीरे पतन होना शुरू हो गया

3. महत्वपूर्ण कलाकृतियों का विस्तृत विवरण

अध्याय में तीन प्रमुख कला रूपों का विशेष उल्लेख किया गया है:

क. ‘शृंगार’ (गुलेर शैली)

  • समय और स्थान: यह 18वीं शताब्दी की पहाड़ी शैली का चित्र है, जो कांगड़ा घाटी के पास स्थित ‘गुलेर’ नामक छोटे से राज्य में विकसित हुआ।
  • विषय वस्तु: इसमें मुख्य रूप से राधा-कृष्ण की प्रेम कथाओं, रामायण और महाभारत के दृश्यों को दर्शाया गया है।
  • चित्र का वर्णन: ‘शृंगार’ चित्र में एक दुल्हन को विवाह के लिए तैयार होते दिखाया गया है।
    • अग्रभाग में एक नौकरानी चंदन का लेप बना रही है।
    • दूसरी नौकरानी दुल्हन के पैर में पायल पहना रही है।
    • एक स्त्री आईना लेकर खड़ी है, तो दूसरी फूलों की माला बना रही है।
    • कलाकार ने दुल्हन की लज्जा और कोमल भावों को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया है।

ख. जैन लघुचित्र (कल्पसूत्र)

  • समय: 7वीं से 15वीं शताब्दी के बीच विकसित।
  • माध्यम: ये चित्र मुख्य रूप से ताड़ के पत्तों (Palm leaves) पर बनाए जाते थे।
  • विशेषताएं:
    • इन चित्रों में मानवीय आकृतियों के चेहरे प्रोफाइल (एक तरफ से) दिखाए गए हैं, लेकिन उनकी आंखें सामने की ओर बड़ी और चेहरे की रेखा से बाहर निकली हुई दिखाई देती हैं।
    • मुख्य रंगों में लाल, पीले के साथ-साथ सुनहरे और चांदी के रंगों का प्रचुर प्रयोग मिलता है।
    • यह शैली पूरी तरह लोक-शैली पर आधारित है, जिसमें आकृतियों में चपटापन और पारंपरिक अभिव्यक्ति है。

ग. रासलीला (विष्णुपुर टेराकोटा)

  • स्थान: पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले का ‘विष्णुपुर’ शहर。
  • माध्यम: ये कलाकृतियां पकी हुई मिट्टी (टेराकोटा) की टाइलों पर उकेरी गई हैं, जिन्हें मंदिरों की दीवारों पर चूने और गारे से चिपकाया गया है。
  • विषय: ये मंदिर मुख्य रूप से शिव और विष्णु (राधा-कृष्ण) को समर्पित हैं。
  • चित्र का वर्णन: ‘रासलीला’ के दृश्य में राधा-कृष्ण को गोपियों के साथ दिव्य प्रेम करते दिखाया गया है。 इसकी रचना तीन केंद्रित वृत्तों (Circles) में की गई है, जिसके केंद्र में एक गोपी के साथ राधा-कृष्ण हैं और बाकी वृत्तों में अन्य आकृतियां हाथ पकड़े खड़ी हैं।

निष्कर्ष: आपने क्या सीखा?

संरक्षकों की कमी के बावजूद कलाकारों की रचनात्मकता कभी कम नहीं हुई। 12वीं से 18वीं शताब्दी के बीच कला का स्वरूप बड़े मंदिरों से सिमटकर लघुचित्रों (Miniature paintings) तक आ गया। हालांकि ये चित्र आकार में छोटे थे, लेकिन तकनीकी और सौंदर्य की दृष्टि से इनका स्तर बहुत ऊँचा था। साथ ही, पूर्वी भारत (विशेषकर बंगाल) में टेराकोटा की कला बहुत लोकप्रिय हुई, जिसने मंदिरों को एक नया रूप दिया。

महत्वपूर्ण प्रश्न (स्व-मूल्यांकन के लिए):

  1. गुलेर चित्रकला की मुख्य विशेषता क्या है? (उत्तर: राधा-कृष्ण की प्रेम कथाएं और संवेदनशीलता)
  2. जैन लघुचित्रों में रंगों का कैसा प्रयोग हुआ है? (उत्तर: लाल, पीले, सुनहरे और चांदी के रंग)
  3. विष्णुपुर के मंदिर किस माध्यम से सजाए गए हैं? (उत्तर: पकी हुई मिट्टी या टेराकोटा की टाइलों से)

13वीं शताब्दी (AD) से 18वीं शताब्दी (AD) तक भारतीय कला का इतिहास तथा मूल्यांकन: एक अध्ययन मार्गदर्शिका

यह अध्ययन मार्गदर्शिका 12वीं से 18वीं शताब्दी के बीच भारतीय कला के विकास, विभिन्न शैलियों और महत्वपूर्ण कलाकृतियों का व्यापक विवरण प्रदान करती है। इसमें लघुचित्र कला, राजपूत और मुगल शैलियों के संगम, और बंगाल की टेराकोटा मंदिर वास्तुकला पर विशेष ध्यान दिया गया है।

लघु प्रश्नोत्तरी (Quiz)

प्रश्न 1: 12वीं शताब्दी के बाद भारत में कला के संरक्षकों की स्थिति क्या थी और इसका कला पर क्या प्रभाव पड़ा? 

12वीं शताब्दी में शक्तिशाली राजवंशों के पतन के बाद कला के संरक्षकों का अभाव हो गया, जिससे बड़े स्तर की कला परियोजनाएं रुक गईं। हालांकि, इस दौरान मुस्लिम शासकों ने अपना ध्यान किलों और मकबरों तक सीमित रखा, लेकिन पांडुलिपियों के चित्रण के माध्यम से भारतीय कला समृद्ध होती रही।

प्रश्न 2: इस कालखंड की सचित्र पांडुलिपियां किन मुख्य केंद्रों और धर्मों से संबंधित थीं? 

ये सचित्र पांडुलिपियां मुख्य रूप से हिंदू, जैन और बौद्ध धर्मों से संबंधित थीं। इनके मुख्य केंद्र बंगाल, गुजरात और बिहार थे, जहाँ पाल वंश के संरक्षण में ‘पाल शैली’ का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।

प्रश्न 3: ‘श्रृंगार’ नामक चित्र किस शैली का उदाहरण है और इसकी मुख्य विषय-वस्तु क्या है?

 ‘श्रृंगार’ विशिष्ट राजपूत चित्रकला की गुलेर शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें एक दुल्हन को विवाह के लिए तैयार होते हुए दिखाया गया है, जहाँ विभिन्न परिचारिकाएं उसे सजाने, चंदन का लेप लगाने और पायल पहनाने जैसे कार्यों में व्यस्त हैं।

प्रश्न 4: गुलेर चित्रकला शैली की दो प्रमुख विशेषताएं क्या हैं?

गुलेर शैली की प्रमुख विशेषताओं में संवेदनशील चेहरे, सौम्य व्यवहार और रंगों का कोमल मिश्रण शामिल है। कलाकार ने पात्रों की लजाती हुई और लालित्यपूर्ण भाव-भंगिमाओं का बहुत ही सजीव चित्रण किया है।

प्रश्न 5: जैन लघुचित्रों (Miniature Paintings) का विकास कब और किन क्षेत्रों में हुआ? 

जैन लघुचित्रों का विकास 7वीं शताब्दी से शुरू होकर 10वीं और 15वीं शताब्दी के दौरान पूरे भारत में हुआ। इनके प्रमुख केंद्र पंजाब, बंगाल, ओडिशा, गुजरात और राजस्थान में स्थित थे।

प्रश्न 6: जैन पांडुलिपियों में प्रयुक्त होने वाले रंगों और सामग्रियों के बारे में बताएं।

 ये पांडुलिपियां मुख्य रूप से ताड़ के पत्तों (Palm leaves) पर लिखी और चित्रित की गई थीं। इनमें लाल और पीले रंगों का विशेष प्रयोग किया गया है, साथ ही कीमती स्वर्ण और रजत रंगों का भी उपयोग मिलता है।

प्रश्न 7: जैन लघुचित्रों में मानवीय आकृतियों की शारीरिक विशेषताएं क्या हैं? 

इन चित्रों में चेहरे रूपरेखा के रूप में हैं, जिनमें आंखों को सामने से दिखाया गया है, जिसके कारण एक आंख चेहरे की रेखा से बाहर निकली हुई दिखाई देती है। आकृतियों के मुख्य भाग भी अग्रभाग की ओर होते हैं और स्त्रियों को भारी आभूषण पहने दिखाया गया है।

प्रश्न 8: बिष्णुपुर के मंदिरों की सजावट के लिए किस माध्यम का उपयोग किया गया है? 

पश्चिम बंगाल के बिष्णुपुर में मंदिरों को पकी हुई मिट्टी यानी ‘टेराकोटा’ (Terracotta) की टाइल्स से सजाया गया है। इन टाइल्स पर उभरी हुई आकृतियां धार्मिक प्रथाओं, समकालीन सामाजिक जीवन और पौराणिक कथाओं को दर्शाती हैं।

प्रश्न 9: बिष्णुपुर की ‘रासलीला’ कलाकृति की संरचना कैसी है? 

‘रासलीला’ में राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम को गोपियों के साथ दर्शाया गया है, जिसे एक वर्गाकार स्थान पर तीन संकेंद्रित वृत्तों (Concentric circles) में संयोजित किया गया है। बीच के वृत्त में राधा-कृष्ण हैं और शेष दो वृत्तों में आकृतियां एक-दूसरे का हाथ पकड़े दिखाई गई हैं।

प्रश्न 10: 16वीं से 19वीं शताब्दी के बीच राजपूत और मुगल चित्रकला में क्या अंतर और समानताएं थीं? 

राजपूत चित्रकला में लोक-चित्रकला और अजंता शैली का प्रभाव था, जबकि मुगल शैली फारसी और राजपूत शैली का मिश्रण थी। ये दोनों ही शैलियाँ इस कालखंड में काफी समृद्ध हुईं, लेकिन 18वीं शताब्दी के बाद भारतीय कला का पतन शुरू हो गया।

13वीं शताब्दी (AD) से 18वीं शताब्दी (AD) तक भारतीय कला का इतिहास तथा मूल्यांकन: एक अध्ययन मार्गदर्शिका

  1. संरक्षकों के अभाव में बड़े निर्माण कार्य रुके, लेकिन पांडुलिपि चित्रण फला-फूला।
  2. हिंदू, जैन, बौद्ध धर्म; केंद्र: बंगाल, गुजरात, बिहार।
  3. गुलेर शैली; विषय: दुल्हन का श्रृंगार।
  4. संवेदनशील चेहरे और रंगों का कोमल मिश्रण।
  5. 7वीं से 15वीं शताब्दी; क्षेत्र: पंजाब, बंगाल, ओडिशा, गुजरात, राजस्थान।
  6. ताड़ के पत्ते; रंग: लाल, पीला, स्वर्ण और रजत।
  7. चेहरे की रेखा से बाहर निकली आंख और अग्रभाग की ओर शरीर।
  8. पकी मिट्टी (टेराकोटा) की टाइल्स।
  9. वर्गाकार फ्रेम में तीन संकेंद्रित वृत्त; राधा-कृष्ण और गोपियों का चित्रण।
  10. राजपूत शैली (लोक + अजंता); मुगल शैली (फारसी + राजपूत)।

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Questions)

  1. 12वीं से 18वीं शताब्दी के बीच भारतीय कला में आए परिवर्तनों का विस्तृत विवरण दीजिए, विशेषकर संरक्षकों के प्रभाव के संदर्भ में।
  2. जैन लघुचित्र कला की तकनीकी और रूपात्मक विशेषताओं का ‘कल्पसूत्र’ के संदर्भ में विश्लेषण करें।
  3. गुलेर शैली के उद्भव और विकास की चर्चा करते हुए इसकी कलात्मक बारीकियों पर प्रकाश डालिए।
  4. पश्चिम बंगाल के बिष्णुपुर मंदिरों की टेराकोटा कला का वर्णन करें और इसकी सामाजिक-धार्मिक महत्ता स्पष्ट करें।
  5. मध्यकालीन भारत में लघुचित्रों (Miniature Paintings) के महत्व और उनकी निर्माण तकनीक पर एक विस्तृत लेख लिखिए।

शब्दावली (Glossary)

  • पांडुलिपि (Manuscript): हाथ से लिखी गई प्राचीन पुस्तकें या दस्तावेज़।
  • लघुचित्र (Miniature Painting): छोटे आकार के अत्यंत विस्तृत और बारीक चित्र।
  • टेराकोटा (Terracotta): आग में पकाकर तैयार की गई मिट्टी, जिसका उपयोग मूर्तियाँ और टाइल्स बनाने में होता है।
  • गुलेर शैली (Guler Style): पहाड़ी चित्रकला की एक प्रमुख शाखा, जो कांगड़ा घाटी के पास विकसित हुई।
  • ताड़-पत्र (Palm Leaf): प्राचीन काल में लेखन और चित्रण के लिए उपयोग किए जाने वाले ताड़ के सूखे पत्ते।
  • कल्पसूत्र (Kalpasutra): जैन धर्म की विधियों और तीर्थंकरों के जीवन पर आधारित एक महत्वपूर्ण सचित्र ग्रंथ।
  • रासलीला (Raslila): भगवान कृष्ण और राधा के दिव्य प्रेम और गोपियों के साथ उनके नृत्य का चित्रण।
  • टेंपेरा (Tempera): रंगों को चिपकाने वाले पदार्थ (जैसे गोंद) के साथ मिलाकर चित्रण करने की एक विधि।
  • पाल शैली (Pal Style): 12वीं शताब्दी के आसपास बंगाल और बिहार में पाल राजाओं के संरक्षण में विकसित कला शैली।
  • उच्चावच (Relief Work): किसी समतल धरातल पर आकृतियों को उभारकर बनाई गई नक्काशी।

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