चित्रकला अध्याय 2: सातवीं से बारहवीं शताब्दी तक कला का इतिहास तथा मूल्यांकन | History and Evaluation of Art from the 7th to the 12th Century

Class 10 (NIOS) –  चित्रकला अध्याय 2: सातवीं से बारहवीं शताब्दी तक कला का इतिहास तथा मूल्यांकन | History and Evaluation of Art from the 7th to the 12th Century

सातवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच भारतीय कला और वास्तुकला के समृद्ध इतिहास का व्यापक विवरण प्रस्तुत करते हैं। इसमें मुख्य रूप से पल्लव, चोल, होयसल और गंग जैसे राजवंशों के दौरान विकसित हुई मंदिर निर्माण शैली और मूर्तिकला पर ध्यान केंद्रित किया गया है। पाठ में महाबलीपुरम की चट्टानों पर उकेरी गई आकृतियों, होयसल काल की सूक्ष्म पत्थर की नक्काशी और कोणार्क के सूर्य मंदिर की भव्यता का विश्लेषण किया गया है। यह सामग्री कला के माध्यम से उस युग की सांस्कृतिक प्रगति और कलाकारों की तकनीकी कुशलता को स्पष्ट करती है। इसके अतिरिक्त, छात्रों के लिए अभ्यास प्रश्न और सीखने के उद्देश्यों को भी शामिल किया गया है

गुप्तकाल के बाद का समय भारतीय इतिहास में मंदिर वास्तुकला और मूर्तिकला की प्रगति का स्वर्ण युग कहलाता है। इस दौरान दक्षिण भारत में पल्लव, चोल और होयसल राजाओं ने, तथा पूर्वी भारत में पाल, सेन और गंग वंश के शासकों ने कला को बहुत प्रोत्साहन दिया।

1. अर्जुन का चिंतन अथवा गंगावतरण (Arjun’s Penance or Descent of the Ganges)

यह पल्लव कालीन वास्तुकला का एक अद्भुत नमूना है, जो चेन्नई के पास मामल्लपुरम् (महाबलीपुरम्) में स्थित है।

  • समय और माध्यम: इसका निर्माण सातवीं शताब्दी में पल्लव काल के दौरान पत्थर पर किया गया था।
  • आकार: यह लगभग 91 फीट लंबी और 152 फीट ऊँची दो विशाल शिलाओं पर बनी एक उभरी हुई मूर्ति है।
  • विशेषताएं: इस कलाकृति में देवताओं, ऋषियों, गंधर्वों और पशु-पक्षियों के झुंड को एक साथ दिखाया गया है। मूर्तियों में एक प्रकार का स्वाभाविक प्रवाह और गति है।
  • दो मुख्य व्याख्याएँ:
    1. दो शिलाओं के बीच की दरार को गंगा की धारा माना जाता है, जिसे शिव अपनी जटाओं में रोक रहे हैं। इसी कारण इसे ‘गंगावतरण’ कहा जाता है。
    2. कुछ विद्वान इसे अर्जुन की तपस्या मानते हैं क्योंकि इसमें एक योगी को एक पैर पर खड़े होकर ध्यानमग्न अवस्था में दिखाया गया है।
  • कलाकार की सूक्ष्म दृष्टि: यहाँ एक सोता हुआ हाथी का बच्चा, बंदरों की आकृतियाँ और नाक खुजलाते हिरण को दिखाया गया है, जो उस समय के कलाकारों की गहरी समझ को दर्शाता है।

2. गोवर्धन पर्वत को उठाते हुए कृष्ण (Krishna Lifting Mount Govardhan)

होयसल राजाओं के शासनकाल (11वीं से 14वीं शताब्दी) में मंदिर वास्तुकला और मूर्तिकला में एक नई शैली का जन्म हुआ जिसे होयसल शैली कहा जाता है।

  • स्थान और समय: यह मूर्ति बेलूर में स्थित है और होयसल काल की है।
  • विशेषताएं: होयसल कला अपनी बारीक नक्काशी और जटिल सजावट के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ पत्थरों पर इतनी गहराई से नक्काशी की गई है कि मूर्तियों के अंग और आभूषण अत्यंत लयबद्ध और कोमल प्रतीत होते हैं।
  • दृश्य वर्णन: कृष्ण को केंद्र में नायक के रूप में दिखाया गया है, जो गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठाए हुए हैं। उनके चारों ओर मनुष्य और पशुओं को विभिन्न परतों में दिखाया गया है, जो एक रोचक कहानी की तरह लगता है। स्त्रियों के भारी आभूषण और विशिष्ट भारतीय केश विन्यास (बालों की बनावट) इस शैली की मुख्य पहचान है।

3. कोणार्क की सुरसुन्दरी (Surasundari of Konark)

पूर्वी भारत में गंग राजवंश के राजाओं ने ओडिशा में शानदार मंदिरों का निर्माण कराया, जिनमें कोणार्क का सूर्य मंदिर विश्व प्रसिद्ध है।

  • निर्माता और स्थान: इस मंदिर का निर्माण गंग वंश के राजा नरसिंह देव प्रथम ने 12वीं शताब्दी में ओडिशा के समुद्र तट पर कराया था।
  • मूर्तिकला की विशेषता: कोणार्क की मूर्तियाँ अपने विशाल आकार और मजबूती के लिए जानी जाती हैं। ये मूर्तियाँ अक्सर काले पत्थर से बनी होती हैं।
  • सुरसुन्दरी का वर्णन: सुरसुन्दरी एक नारी संगीतज्ञ की मूर्ति है जो आकार में साधारण मनुष्य से थोड़ी बड़ी है।
    • वह ड्रम (ढोल) बजाती हुई दिखाई गई है।
    • उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान है और अंगों में एक लय और गति है。
    • उसके सिर का थोड़ा झुकाव और आभूषणों की कोमल बनावट उसे अत्यंत मोहक और सौंदर्यपूर्ण बनाती है।

इस अध्याय से हमने क्या सीखा? (मुख्य बिंदु)

  • कला केंद्रों का स्थानांतरण: गुप्त काल के बाद कला के मुख्य केंद्र दक्षिण (पल्लव, चोल, होयसल) और पूर्वी भारत (गंग, पाल) की ओर चले गए।
  • धातु कला: चोल कलाकार कांस्य (Bronze) की मूर्तियों को ढालने में दुनिया में सबसे आगे थे।
  • पत्थर की बारीकी: होयसल और गंग वंश के समय पत्थरों पर बहुत ही जटिल और सूक्ष्म नक्काशी का काम हुआ।
  • वास्तुकला: कोणार्क का सूर्य मंदिर एक विशाल रथ के आकार में बना है जिसे घोड़े खींच रहे हैं, जो भारतीय वास्तुकला का एक महान उदाहरण है।

बच्चों, यदि आप इन तीनों मुख्य मूर्तियों—अर्जुन का चिंतन (पल्लव), गोवर्धन धारी कृष्ण (होयसल) और सुरसुन्दरी (गंग)—के बारे में अच्छे से समझ लेते हैं, तो आप इस अध्याय के सभी प्रश्नों के उत्तर आसानी से दे पाएंगे।

7वीं से 12वीं शताब्दी तक कला का इतिहास तथा मूल्यांकन: अध्ययन मार्गदर्शिका

7वीं से 12वीं शताब्दी तक कला का इतिहास तथा मूल्यांकन: अध्ययन मार्गदर्शिका

यह अध्ययन मार्गदर्शिका सातवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच भारतीय वास्तुकला और मूर्तिकला के विकास, विभिन्न राजवंशों के योगदान और प्रमुख कलाकृतियों के विश्लेषण पर आधारित है।


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