शिवरानी देवी द्वारा लिखित जीवनी ‘प्रेमचंद : घर में’ महान कथाकार प्रेमचंद के जीवन का एक अत्यंत आत्मीय और ईमानदार दस्तावेज़
शिवरानी देवी द्वारा लिखित जीवनी ‘प्रेमचंद : घर में’
1. बचपन और प्रारंभिक संघर्ष – प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को बनारस के पास लमही गाँव में हुआ था। उनके बचपन का नाम धनपतराय था। बचपन में ही उनकी माता का देहांत हो गया, जिसके बाद उनका जीवन संघर्षों से घिर गया। उनके पिता ने दूसरा विवाह किया, लेकिन विमाता (सौतेली माँ) के साथ उनके संबंध कभी बहुत मधुर नहीं रहे। जब वे मात्र 15 वर्ष के थे, तब उनके पिता का भी देहांत हो गया और पूरे घर की ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।
2. शिक्षा और वैवाहिक जीवन – प्रेमचंद ने घोर गरीबी में अपनी पढ़ाई जारी रखी। वे ट्यूशन पढ़ाते थे और नंगे पाँव मीलों चलकर स्कूल जाते थे। 1904 में उन्होंने इलाहाबाद से एंट्रेंस की परीक्षा उत्तीर्ण की। उनका पहला विवाह उनके पिता ने उनकी इच्छा के विरुद्ध कर दिया था, जो असफल रहा। इसके बाद 1905 में उन्होंने एक साहसिक कदम उठाते हुए बाल-विधवा शिवरानी देवी से विवाह किया, जो उस समय के समाज में एक बड़ी क्रांति थी।
३. साहित्यिक यात्रा और सरकारी नौकरी – प्रेमचंद ने अपनी लेखन यात्रा उर्दू में ‘नवाबराय’ के नाम से शुरू की थी। उनकी पहली प्रसिद्ध रचना ‘सोज़े-वतन’ को अंग्रेज़ सरकार ने ‘विद्रोही’ मानकर ज़ब्त कर लिया, जिसके बाद उन्होंने ‘प्रेमचंद’ नाम अपनाया। वे शिक्षा विभाग में सब-डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत थे, लेकिन गांधीजी के आह्वान पर 1921 में उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया।
4. सादगी और आदर्श – वे जीवन भर खुद को ‘कलम का मजदूर’ कहते रहे। उनका जीवन अत्यंत आडंबर-शून्य और सादा था। वे घर में अपनी धोती खुद धोते थे और ज़मीन पर बैठकर काम करना पसंद करते थे। वे साहित्य को समाज के विकास और मनुष्य की भावनाओं को परिष्कृत करने का माध्यम मानते थे। उनकी उदारता ऐसी थी कि वे अपनी आर्थिक तंगी के बावजूद दूसरों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते थे।
5. प्रेस और आर्थिक संकट – उन्होंने ‘हंस’ और ‘जागरण’ जैसी पत्रिकाएँ निकालीं और ‘सरस्वती प्रेस’ की स्थापना की। प्रेस को चलाने के लिए उन्हें निरंतर आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। इसी संकट को दूर करने के लिए वे 1934 में बम्बई फिल्म इंडस्ट्री में काम करने भी गए, लेकिन वहाँ के बनावटी वातावरण से तंग आकर वे जल्द ही वापस लौट आए।
6. अंतिम दिन और महाप्रयाण – जीवन के अंतिम वर्षों में वे पेट की गंभीर बीमारी से पीड़ित रहे। अपनी असहनीय पीड़ा के बावजूद वे रात-रात भर जागकर अपना अंतिम अधूरा उपन्यास ‘मंगल-सूत्र’ लिखते रहे। 8 अक्टूबर 1936 को इस महान साहित्यकार का देहांत हो गया। उनकी मृत्यु के समय भी उन्हें अपनी पत्रिका ‘हंस’ की चिंता थी, जिसे वे अपना ‘स्मारक’ मानते थे।
यह जीवनी प्रेमचंद के केवल एक लेखक होने की नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान होने की कहानी है जिसने सच्चाई, ईमानदारी और सादगी के साथ जीवन के हर तूफान का सामना किया।
प्रेमचंद के व्यक्तित्व की समीक्षा (An Assessment of Premchand’s Personality)
शिवरानी देवी द्वारा लिखित जीवनी ‘प्रेमचंद : घर में’ केवल एक महान लेखक का जीवन परिचय नहीं है, बल्कि यह उनके ‘आदमियत’ (मानवता) और उनके व्यक्तित्व के उन पहलुओं की समीक्षा है जो दुनिया की नज़रों से ओझल थे।
1. संघर्षपूर्ण बचपन और प्रारंभिक जीवन (1880–1904) – प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को लमही गाँव में हुआ था और उनका बचपन अभावों और शरारतों के बीच बीता। बचपन में ही माता (८ वर्ष की आयु में) और फिर पिता (15 वर्ष की आयु में) को खो देने के कारण उन पर समय से पहले ही घर की बड़ी ज़िम्मेदारियों का बोझ आ गया था। उन्होंने घोर गरीबी में अपनी शिक्षा जारी रखी, जहाँ वे इलाहाबाद में मात्र तीन रुपयों में अपना मासिक खर्च चलाते थे और खुद रोटियाँ पकाकर स्कूल जाते थे।
२. सामाजिक विद्रोह और वैवाहिक जीवन – प्रेमचंद का पहला विवाह असफल रहा, जिसके बाद 1905 में उन्होंने एक साहसिक और क्रांतिकारी कदम उठाते हुए बाल-विधवा शिवरानी देवी से विवाह किया। यह विवाह उस समय के ‘विधवा विवाह निषेध’ वाली सामाजिक कुप्रथा पर एक कड़ा प्रहार था। शिवरानी देवी ने उन्हें केवल एक पत्नी के रूप में नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम और वैचारिक संघर्षों में एक ‘पूरक’ के रूप में साथ दिया।
३. ‘नवाबराय’ से ‘प्रेमचंद’ तक का साहित्यिक सफर – उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा उर्दू में ‘नवाबराय’ के नाम से शुरू की, लेकिन जब अंग्रेज़ सरकार ने उनके कहानी-संग्रह ‘सोज़े-वतन’ को ज़ब्त कर लिया, तब उन्होंने ‘प्रेमचंद’ नाम अपनाया। 1913 के आसपास उन्होंने हिंदी में लिखना शुरू किया और अपनी कहानियों के माध्यम से समाज के वंचित वर्गों की आवाज़ उठाई। वे साहित्य को समाज और राजनीति के विकास का ‘बीज’ मानते थे।
४. सरकारी नौकरी का त्याग और आदर्शवाद – प्रेमचंद शिक्षा विभाग में एक अच्छे पद पर थे, लेकिन गांधीजी के आह्वान पर 1921 में उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उनका मानना था कि अफ़सर बनकर इंसान इंसान नहीं रह जाता, इसलिए उन्होंने आजीवन ‘कलम का मजदूर’ बने रहना पसंद किया। वे अत्यंत आडंबर-शून्य थे और घर में अपनी धोती स्वयं धोना या ज़मीन पर बैठकर काम करना उनकी सादगी का प्रमाण था।
५. मानवीय कमजोरियाँ और उदारता – शिवरानी देवी ने निष्पक्षता से उनकी आर्थिक प्रबंधन में ढिलाई और अत्यधिक उदारता का भी उल्लेख किया है। वे अक्सर अपनी ज़रूरतों को भुलाकर दूसरों की मदद करते थे, जिसका कई बार लोग गलत फायदा भी उठाते थे। उनमें वह ‘लौह-दृढ़ता’ नहीं थी जो चालाक दुनिया से उन्हें बचा सके।
६. अंतिम संघर्ष और मृत्यु (1936) – जीवन के अंतिम वर्षों में वे आर्थिक तंगी और पेट की गंभीर बीमारी से जूझते रहे। बम्बई फिल्म इंडस्ट्री का बनावटीपन उन्हें रास नहीं आया और वे वापस अपनी साहित्यिक दुनिया में लौट आए। अपनी मृत्यु (8 अक्टूबर 1936) से कुछ समय पहले तक, असहनीय पीड़ा में भी वे ‘मंगल-सूत्र’ उपन्यास लिखते रहे। उनके लिए उनकी पत्रिका ‘हंस’ उनका सबसे बड़ा स्मारक थी, जिसे वे हर हाल में जीवित रखना चाहते थे।
शिवरानी देवी द्वारा लिखित जीवनी ‘प्रेमचंद घर में’ महान साहित्यकार प्रेमचंद के सार्वजनिक व्यक्तित्व के पीछे छिपे उनके वास्तविक और मानवीय रूप की एक अत्यंत ईमानदार और मार्मिक समीक्षा है। यह पुस्तक केवल एक लेखक की उपलब्धियों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि एक पत्नी द्वारा अपने पति की ‘आदमियत’ (मानवता) को दुनिया के सामने लाने का एक साहसिक प्रयास है।
उद्देश्य और लेखन शैली – शिवरानी देवी ने इस जीवनी को लिखने का मुख्य उद्देश्य प्रेमचंद की मानवता और विशाल व्यक्तित्व का परिचय देना बताया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि उन्होंने किसी साहित्यिक बनावट के बिना, घटनाओं को पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ ‘ज्यों का त्यों’ प्रस्तुत किया है। बनारसीदास चतुर्वेदी के अनुसार, इस पुस्तक की शैली इतनी स्वाभाविक है कि पाठक पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है।
व्यक्तित्व का मानवीय चित्रण – जीवनी प्रेमचंद को एक ‘देवता’ के बजाय एक हाड़-मांस के इंसान के रूप में पेश करती है, जिसमें खूबियों के साथ-साथ कमज़ोरियाँ और त्रुटियाँ भी थीं। शिवरानी देवी ने उनकी अत्यधिक उदारता और आर्थिक प्रबंधन में ढिलाई जैसी कमियों को भी निष्पक्षता से दर्ज किया है। उन्हें एक ‘कलम के मजदूर’ के रूप में चित्रित किया गया है जो सादगी पसंद करते थे और घर के छोटे-छोटे काम, जैसे अपनी धोती धोना, स्वयं करते थे।
सामाजिक और क्रांतिकारी दृष्टिकोण – जीवनी प्रेमचंद के उन पहलुओं को उजागर करती है जहाँ वे समाज की रूढ़ियों से टकराते हैं। उनका एक बाल-विधवा (शिवरानी देवी) से विवाह करना उस समय के समाज में एक बहुत बड़ा विद्रोह था। इसके अतिरिक्त, गांधीजी के आह्वान पर अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा देना उनके देशप्रेम और सिद्धांतों के प्रति अडिगता को दर्शाता है।
पारिवारिक और निजी जीवन के संघर्ष – पुस्तक उनके बचपन के संघर्षों, विमाता (सौतेली माँ) के साथ तनावपूर्ण संबंधों और आर्थिक तंगी के बीच उनकी पढ़ाई के दृश्यों को सजीव करती है। शिवरानी देवी ने स्वयं को उनके साथ ‘एक ही नाव का यात्री’ बताते हुए साझा किया है कि कैसे उन्होंने साथ मिलकर जीवन के तूफानों को झेला।
साहित्यिक प्रतिबद्धता – जीवनी यह स्पष्ट करती है कि प्रेमचंद के लिए साहित्य केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि समाज सुधार का एक बीज था। वे अपनी अंतिम बीमारी के दिनों में, जब उन्हें खून की उल्टियाँ हो रही थीं, तब भी रात-रात भर जागकर ‘मंगल-सूत्र’ जैसा उपन्यास लिख रहे थे। अपनी मृत्यु के करीब पहुँचकर भी उन्हें अपनी पत्रिका ‘हंस’ की चिंता थी, जिसे वे अपना स्मारक मानते थे।
वैचारिक स्पष्टता – प्रेमचंद स्त्री-पुरुष समानता के पक्षधर थे और विधवाओं व अछूतों के प्रति समाज के व्यवहार से अत्यंत दुखी रहते थे। वे ‘हिंदुस्तानी’ भाषा के माध्यम से हिंदू-मुस्लिम एकता का सपना देखते थे। जहाँ उन्होंने एक विधवा से विवाह करके अच्छा काम किया था, वहीं अपनी पहली पत्नी को छोड़कर गलत भी किया था। उनका कहना है, अगर बीच में उनकी सौतेली माँ नहीं होती तो शायद यह रिश्ता चल भी जाता। जीवनी के अंत में वे शिवरानी देवी से बताते हैं, कि उन्होंने अपनी दो पत्नियों के अलावा भी अपनी एक उपपत्नी रख छोड़ी थी। सम्भवत: अगर प्रेमचंद जी के वश में होता तो अपने जीवन के इन दो तथ्यों को वे जरूर बदलना चाहते।
निष्कर्ष – ‘प्रेमचंद : घर में’ जीवनी साहित्य जगत के लिए एक अमूल्य दस्तावेज़ है क्योंकि यह प्रेमचंद के घरेलू जीवन की उन झाँकियों को बड़ी सहृदयता और स्पष्टता से दिखाती है जिन्हें कोई बाहरी लेखक कभी नहीं देख सकता था। यह पुस्तक हमें सिखाती है कि एक महान कलाकार होने से पहले एक महान इंसान होना कितना आवश्यक है।
प्रश्नोत्तर (Question And Answer)
प्रश्न-1 प्रेमचंद की पहली पत्नी के बारे में उनके क्या विचार थे?
उत्तर – वे उनकी सूरत और स्वभाव से खुश नहीं थे। वे अपनी पहली पत्नी के रूप-रंग और उनके स्वभाव, दोनों से ही बहुत दुखी और असंतुष्ट थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद जी जैसे साहित्यकार भी अपनी पत्नी के भौतिक स्वरूप के प्रभाव से बच नहीं सके।
सूरत के प्रति अरुचि – प्रेमचंद का यह विवाह उनके पिता द्वारा तय किया गया था और उन्होंने अपनी पत्नी को शादी के बाद विदाई के समय ही पहली बार देखा था। उन्हें देखते ही प्रेमचंद की जो प्रतिक्रिया हुई, उसका वर्णन उन्होंने इन शब्दों में किया: “मैंने उनकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया”। उन्होंने शिवरानी देवी से स्पष्ट कहा था कि वह “बदसूरत तो थी ही”।
स्वभाव और वाणी में कड़वाहट – केवल शारीरिक रूप ही नहीं, बल्कि उनकी बातचीत करने का ढंग भी प्रेमचंद को पसंद नहीं था। उनके अनुसार, सूरत के साथ-साथ उनकी “ज़बान भी मीठी न थी”, जिससे उन दोनों के बीच की दूरी और बढ़ गई थी।
पिता की ग्लानि – प्रेमचंद के पिता को भी विवाह के तुरंत बाद अपनी इस गलती का अहसास हो गया था। उन्होंने कहा था, “लालाजी ने मेरे लड़के को कुएँ में धकेल दिया… अफ़सोस! मेरा गुलाब-सा लड़का और उसकी यह स्त्री! मैं तो इसकी दूसरी शादी करूँगा”।
पारिवारिक कलह और प्रेमचंद का स्वभाव – उस समय घर में प्रेमचंद की सौतेली माँ (चाची) और उनकी पहली पत्नी के बीच लगातार झगड़े होते रहते थे। प्रेमचंद ने स्वयं को उस समय के लिए “भोंदू” कहा है, क्योंकि वे घरेलू झगड़ों को सुलझाना या किसी पर शासन करना नहीं जानते थे।
विवाह का अंत – अंततः इलाहाबाद में रहने के दौरान, आर्थिक और मानसिक तंगी के बीच एक झगड़े के बाद प्रेमचंद ने उनसे कह दिया कि “तुम अपने घर जाओ, इससे कहीं बेहतर होगा”। इसके बाद वे अपनी पहली पत्नी को वापस नहीं लाए, हालांकि बाद में शिवरानी देवी से बात करते हुए उन्होंने इस बात पर दुःख भी व्यक्त किया कि उन्होंने उस स्त्री का जीवन “मिट्टी में मिला दिया”।
प्रश्न 2 – बचपन में तीन लड़कियों के बाद जन्म होने के कारण प्रेमचंद को क्या कहा जाता था?
उत्तर – बचपन में ‘तेतर’ कहा जाता था, और इसके पीछे एक विशिष्ट पारिवारिक पृष्ठभूमि थी।
• नामकरण का कारण – प्रेमचंद अपने माता-पिता की चौथी संतान थे। उनसे पहले उनकी तीन बड़ी बहनें थीं। उत्तर भारतीय लोक परंपरा और मान्यताओं के अनुसार, लगातार तीन लड़कियों के बाद जन्म लेने वाले लड़के को ‘तेतर’ कहा जाता है। शिवरानी जी कहती हैं – “तीन लड़कियों की पीठ पर होने से आप तेतर कहलाते थे”।
• पारिवारिक संदर्भ – प्रेमचंद अपनी जीवित बड़ी बहन से लगभग 8 वर्ष छोटे थे। उनकी दो बड़ी बहनों का देहांत जल्दी हो गया था, जबकि तीसरी बहन काफी समय तक जीवित रहीं।
• बचपन के अन्य नाम – ‘तेतर’ के अलावा, जीवनी में उनके दो अन्य मुख्य नामों का भी वर्णन है-
मुंशी धनपतराय – यह नाम उनके पिता (अजायबराय) ने रखा था।
मुंशी नवाबराय – यह नाम उनके चाचा ने रखा था।
प्रश्न 3 – प्रेमचंद की माता का देहांत उनके जीवन के किस वर्ष में हुआ था?
उत्तर – आठवें वर्ष में, प्रेमचंद की माता आनन्दी देवी का देहांत तब हुआ जब प्रेमचंद मात्र आठ वर्ष के थे। यह उनके बचपन की सबसे दुखद घटनाओं में से एक थी, जिसका उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
लंबी बीमारी – प्रेमचंद की माता लंबे समय से बीमार रहती थीं। उन्हें और उनके पिता, दोनों को ही संग्रहणी (पेचिश) की बीमारी थी। अपनी मृत्यु से पहले वे लगभग छह महीने तक बीमार रहीं और बिस्तर पर रहीं।
बालक प्रेमचंद की सेवा – आठ वर्ष की अल्पायु में भी प्रेमचंद अपनी माँ की सेवा किया करते थे। वे अक्सर अपनी माँ के सिरहाने बैठकर उन्हें पंखा झला करते थे।
बचपन की एक मासूम याद – प्रेमचंद ने शिवरानी देवी को बताया था कि उस समय माँ के सिरहाने शक्कर से भरी एक बोतल रखी रहती थी। जब माँ सो जाती थीं, तो बालक प्रेमचंद चुपके से उसमें से शक्कर निकाल कर खा लिया करते थे।
अंतिम क्षण – अपनी मृत्यु के समय आनन्दी देवी ने प्रेमचंद, उनकी बहन और उनके बड़े भाई का हाथ उनके पिता (अजायबराय) के हाथ में सौंपते हुए कहा था— “ये तीनों बच्चे तुम्हारे हैं”।
माँ के जाने का प्रभाव – माँ की मृत्यु के कुछ समय बाद उनकी बड़ी बहन भी अपने घर (ससुराल) चली गईं। प्रेमचंद अपनी माँ को बहुत याद करते थे और उनके जाने के बाद वे अक्सर एकांत में बैठकर खूब रोया करते थे, क्योंकि उन्हें माँ जैसा प्यार देने वाला कोई नहीं था।
प्रश्न – 4 प्रेमचंद ने पाँच वर्ष की आयु में किस भाषा की शिक्षा शुरू की थी?
उत्तर – “उर्दू (मौलवी साहब से)
शिक्षा का प्रारंभ और भाषा – प्रेमचंद की पढ़ाई उनके जीवन के पाँचवें वर्ष में शुरू हुई थी। उन्होंने सबसे पहले मौलवी साहब से उर्दू पढ़ना शुरू किया था।
अध्ययन का परिवेश – वे अकेले नहीं पढ़ते थे, बल्कि मौलवी साहब के ‘दरवाजे’ पर गाँव के अन्य लड़कों के साथ समूह में पढ़ने जाया करते थे।
कुशाग्र बुद्धि – बचपन में प्रेमचंद शरीर से बहुत दुर्बल थे, लेकिन पढ़ाई के मामले में वे “बहुत तेज” थे।
शिक्षा का शुल्क (फीस) – जीवनी में उनकी पढ़ाई के खर्च का भी रोचक वर्णन मिलता है। एक प्रसंग के अनुसार, उनके चचेरे भाई ने एक रुपया भुनाकर उसमें से बारह आने मौलवी साहब की फीस के तौर पर दिए थे।
बाल सुलभ दिनचर्या – उस समय उनकी दिनचर्या का मुख्य हिस्सा मौलवी साहब के यहाँ पढ़ना था, जिसके साथ वे गुल्ली-डंडा खेलना और खेतों से ईख (गन्ना) या मटर की फलियाँ तोड़कर खाना जैसे शौक भी पूरा करते थे।
उर्दू भाषा से शुरू हुई यह शिक्षा उनके साहित्यिक जीवन की नींव बनी, क्योंकि उन्होंने अपने लेखन की शुरुआत भी ‘नवाबराय’ के नाम से उर्दू में ही की थी।
प्रश्न -6 बचपन में प्रेमचंद का सबसे प्रिय खेल कौन-सा था?
उत्तर – गुल्ली-डंडा प्रेमचंद के बचपन का न केवल सबसे प्रिय खेल था, बल्कि उनके दैनिक जीवन का एक अभिन्न हिस्सा भी था।
बचपन की दिनचर्या – प्रेमचंद ने स्वयं शिवरानी देवी को बताया था कि उनके बचपन का समय दो मुख्य कामों में बँटा था—मौलवी साहब के यहाँ उर्दू पढ़ना और उसके बाद गुल्ली-डंडा खेलना। वे अपनी पढ़ाई में बहुत तेज थे, लेकिन खेल के प्रति उनका उत्साह भी उतना ही अधिक था।
ग्रामीण परिवेश का आनंद – लमही और गोरखपुर में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए वे कहते थे कि गुल्ली-डंडा खेलने के साथ-साथ वे खेतों से ईख (गन्ना) तोड़कर चूसना और मटर की फलियाँ खाना बहुत पसंद करते थे। यह खेल उनके सरल और आडंबर-रहित ग्रामीण जीवन का प्रतीक था।
शारीरिक अवस्था और खेल – बचपन में प्रेमचंद बहुत दुर्बल (कमजोर) थे। इसके बावजूद, खेल के मैदान में वे बहुत सक्रिय रहते थे। उनके अनुसार, वे एक सम्मिलित परिवार में पले-बढ़े थे जहाँ वे अपने चचेरे भाइयों के साथ मिलकर खेला करते थे।
खेलों के प्रति आजीवन लगाव – प्रेमचंद का खेलों के प्रति यह प्रेम केवल बचपन तक सीमित नहीं रहा। जीवनी के अनुसार, बाद के वर्षों में भी जब वे गाँव में रहते थे, तो शाम के समय बच्चों को इकट्ठा करके उन्हें खेलने के नए-नए ढंग सिखाते थे। वे बच्चों के लिए मिट्टी और पत्तियाँ इकट्ठा कर देते थे ताकि वे खेल सकें, जो उनके भीतर के उस बालक को दर्शाता है जो कभी खेल से दूर नहीं हुआ।
गुल्ली-डंडा के प्रति उनके इसी गहरे जुड़ाव और अनुभवों ने संभवत – उन्हें आगे चलकर अपनी प्रसिद्ध कहानी ‘गुल्ली-डंडा’ लिखने की प्रेरणा दी होगी, जिसमें उन्होंने इस खेल को ‘सब खेलों का राजा’ बताया है।
प्रश्न – 7 प्रेमचंद के उस प्रिय हरकारे (डाक सेवक) का नाम क्या था जिसका उल्लेख गोरखपुर के संस्मरणों में है?
उत्तर – कज़ाकी, कज़ाकी प्रेमचंद के बचपन की स्मृतियों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और भावुक पात्र था। वह उनके पिता के डाकखाने में एक हरकारा (डाक सेवक) के रूप में काम करता था।
गहरा लगाव – कज़ाकी बालक प्रेमचंद (नवाबराय) से बहुत प्यार करता था। वह अक्सर उन्हें अपने कंधे पर बैठाकर घुमाया करता था। प्रेमचंद रोज़ाना बड़ी उत्सुकता से उसके आने की राह देखते थे।
बाल-सुलभ भेंट – कज़ाकी प्रेमचंद के लिए बाहर से ईख (गन्ना), अमरूद और गाजर जैसी चीज़ें लाता था, जिस कारण वह बालक प्रेमचंद का अत्यंत प्रिय बन गया था।
पिता के साथ वैचारिक मतभेद – एक बार प्रेमचंद के पिता ने किसी कारणवश कज़ाकी को नौकरी से निकाल दिया। प्रेमचंद के पिता उसे “पाजी” और “गधा” कहते थे, लेकिन प्रेमचंद के मन में उसके प्रति अपार सम्मान था। उन्होंने दृढ़ता से अपने पिता से कहा था कि “बाबूजी, आदमी बड़ा अच्छा था”।
प्रेमचंद की सहानुभूति और विद्रोह – कज़ाकी को निकाले जाने की घटना से प्रेमचंद इतने आहत हुए कि उन्हें रात भर नींद नहीं आई। उन्होंने मन ही मन तय किया कि बड़े होकर वे हमेशा ऐसे अच्छे लोगों को अपने साथ रखेंगे।
गुप्त सहायता – जब कज़ाकी अगले दिन नहीं आया, तो प्रेमचंद स्वयं उसके पास गए और उसे बुला लाए। कज़ाकी की आर्थिक मदद करने के लिए बालक प्रेमचंद ने अपने घर के भंडार (भंडारे) से आटा, दाल और चावल चोरी करके उसे दिए थे।
कज़ाकी का यह प्रसंग प्रेमचंद के बचपन के उस मानवीय पक्ष को उजागर करता है, जहाँ वे सामाजिक ऊँच-नीच से परे जाकर एक साधारण मेहनतकश व्यक्ति के प्रति गहरी करुणा और वफ़ादारी रखते थे। इसी स्मृति को उन्होंने बाद में अपनी प्रसिद्ध कहानी ‘कज़ाकी’ के रूप में भी अमर किया।
प्रश्न 9 – प्रेमचंद का पहला विवाह किस वर्ष हुआ था?
उत्तर – प्रेमचंद का पहला विवाह 1895 में हुआ था, जब उनकी आयु मात्र 15 वर्ष थी
पृष्ठभूमि और आयु – प्रेमचंद उस समय नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। उनका जन्म 1880 में हुआ था, इस आधार पर 15 वें वर्ष में उनका विवाह तय किया गया।
विवाह का स्थान – यह विवाह बस्ती जिले की मेंहदावल तहसील के रामपुर गाँव में हुआ था। कन्या पक्ष के लोग भी अपने क्षेत्र के ज़मींदार थे।
विवाह की तैयारियाँ – प्रेमचंद ने स्वयं बताया है कि अपनी शादी के लिए मंडप छाने के लिए बाँस उन्होंने खुद काटे थे। उनके पिता ने शादी के खर्च और गुड़ आदि खरीदने के लिए उन्हें पाँच रुपये भेजे थे।
बाल सुलभ अज्ञानता – प्रेमचंद ने इस समय के अपने व्यक्तित्व को “भोंदू” कहा है। वे बहुत ही सरल और दुनियादारी से अनजान थे। उनके पिता ने ही यह रिश्ता तय किया था और प्रेमचंद ने बिना किसी विरोध के इसे स्वीकार कर लिया था।
पहली मुलाक़ात और निराशा – उस समय की परंपरा के अनुसार, प्रेमचंद ने विवाह से पहले अपनी पत्नी को नहीं देखा था। उन्होंने पहली बार उन्हें तब देखा जब विदाई का समय आया और वे ऊँटगाड़ी से लमही पहुँचने वाले थे। उन्हें देखते ही प्रेमचंद को गहरा धक्का लगा; उन्होंने कहा, “उम्र में वह मुझसे ज्यादा थी। मैंने उनकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया”।
पिता की ग्लानि – प्रेमचंद के पिता (अजायबराय) को भी बाद में अपनी इस गलती का अहसास हुआ था कि उन्होंने अपने बेटे का विवाह एक अनुपयुक्त स्त्री से कर दिया है। यह विवाह प्रेमचंद के लिए कभी भी सुखद नहीं रहा और अंततः पारिवारिक कलह और वैचारिक मतभेदों के कारण टूट गया।
प्रश्न 10 – इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान प्रेमचंद अपना गुज़ारा कैसे करते थे?
उत्तर – इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान प्रेमचंद का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण और अभावों में बीता था। अपनी शिक्षा जारी रखने और परिवार की ज़िम्मेदारी निभाने के लिए वे अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का पूरी तरह त्याग कर देते थे।
आय और परिवार की सहायता – इलाहाबाद में प्रेमचंद को कुल दस रुपये मिलते थे (संभवतः छात्रवृत्ति या भत्ता)। वे स्वयं तंगी में होने के बावजूद, उन दस रुपयों में से सात रुपये घर भेज देते थे।
ट्यूशन और गुज़ारा – घर रुपये भेजने के बाद उनके पास मात्र तीन रुपये बचते थे। अपना खर्च चलाने के लिए वे पाँच रुपये का एक ट्यूशन करते थे। इस प्रकार, ट्यूशन और शेष रुपयों को मिलाकर वे कुल आठ रुपये में अपना मासिक गुज़ारा करते थे।
कठिन दिनचर्या – आर्थक तंगी के कारण वे किसी भी प्रकार की सहायता (जैसे रसोइया या नौकर) नहीं ले सकते थे। वे सुबह जल्दी उठकर, स्वयं हाथ-मुँह धोकर अपने लिए रोटियाँ पकाते थे और उन्हें सेंककर स्कूल जाते थे।
साहित्यिक शुरुआत – इन्हीं अभावों के बीच उनकी साहित्यिक यात्रा भी चल रही थी। इलाहाबाद में रहने के दौरान ही उन्होंने अपना ‘कृष्णा’ नाम का छोटा उपन्यास लिखा और उसे ‘इण्डियन प्रेस’ से छपवाया था।
उधार का जीवन – प्रेमचंद ने स्वयं स्वीकार किया है कि इलाहाबाद के वे दो साल “उधार-खाते में बीते” थे। वर्ष 1904 में उन्होंने अपनी परीक्षा उत्तीर्ण की थी।
प्रश्न – शिवरानी देवी और प्रेमचंद का विवाह किस वर्ष हुआ था?
उत्तर – 1906 में, शिवरानी देवी द्वारा लिखित जीवनी के आधार पर, प्रेमचंद और शिवरानी देवी का विवाह उनके जीवन की एक क्रांतिकारी घटना थी। यह न केवल दो व्यक्तियों का मिलन था, बल्कि उस समय के कट्टर समाज में एक बड़ा सामाजिक सुधार भी था।
एक साहसी निर्णय (विधवा विवाह) – शिवरानी देवी एक बाल-विधवा थीं। उनकी पहली शादी ग्यारह साल की उम्र में हुई थी और वे बहुत जल्द विधवा हो गई थीं। उस समय के समाज में विधवा विवाह को वर्जित माना जाता था, लेकिन प्रेमचंद समाज के इन बंधनों को तोड़ना चाहते थे।
विवाह की प्रक्रिया – शिवरानी देवी के पिता, मुंशी देवीप्रसाद, अपनी बेटी को सुखी देखना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए अखबार में विज्ञापन (इश्तहार) निकलवाया था। प्रेमचंद ने वह विज्ञापन पढ़ा और स्वयं पत्र लिखकर अपनी इच्छा जताई। उन्होंने पत्र में अपनी आमदनी और स्थिति के बारे में पूरी सच्चाई लिख दी थी।
पिता के साथ मुलाक़ात – प्रेमचंद स्वयं फतेहपुर के ‘सलीमपुर’ गाँव गए और शिवरानी देवी के पिता से मिले। उनके पिता प्रेमचंद की सादगी और सच्चाई से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत इस रिश्ते के लिए हाँ कर दी और प्रेमचंद को किराये के रुपये भी दिए।
गोपनीयता और विद्रोह – प्रेमचंद ने इस विवाह के बारे में अपने घरवालों को खबर नहीं दी थी क्योंकि उन्हें पता था कि वे इसका विरोध करेंगे। शिवरानी देवी इसे प्रेमचंद की “दिलेरी” मानती थीं कि उन्होंने समाज और परिवार की परवाह किए बिना एक विधवा से विवाह करने का साहस दिखाया।
विवाह का समय – यह विवाह ‘फागुन’ के महीने में हुआ था। जीवनी में सन् 1905 का भी उल्लेख मिलता है, हालाँकि इसे 1906 माना गया है। विवाह के तुरंत बाद, ‘चैत्र’ के महीने में प्रेमचंद ‘सब-डिप्टी इंस्पेक्टर’ नियुक्त हो गए थे।
प्रारंभिक दांपत्य – शिवरानी देवी ने बताया है कि शुरू में उन्हें अपने ससुराल (लमही) में काफी संघर्ष करना पड़ा क्योंकि प्रेमचंद की चाची (सौतेली माँ) और परिवार के अन्य सदस्य इस विवाह से खुश नहीं थे। प्रेमचंद ने हमेशा उनका साथ दिया और उन्हें घर की मालकिन बनाने के लिए निरंतर प्रेरित किया।
प्रश्न – विवाह के समय प्रेमचंद किस सरकारी पद पर कार्यरत थे?
उत्तर – शिवरानी देवी द्वारा लिखित जीवनी के आधार पर, प्रेमचंद के सब-डिप्टी इंस्पेक्टर (शिक्षा विभाग) के पद थे।
पद की प्राप्ति का समय – शिवरानी देवी के साथ प्रेमचंद का विवाह ‘फागुन’ के महीने में हुआ था। इसके ठीक अगले महीने, यानी ‘चैत्र’ में, उनकी नियुक्ति सब-डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पर हुई। इससे पहले वे कानपुर में 30 रुपये मासिक पर ‘मास्टर’ (शिक्षक) के रूप में कार्य कर रहे थे।
कार्य की प्रकृति – इस पद पर रहते हुए प्रेमचंद को अक्सर दौरे (inspections) पर रहना पड़ता था। उनका मुख्य काम स्कूलों का मुआयना करना और शिक्षकों के कार्य की जाँच करना था। वे अक्सर दौरे पर जाते समय अपने साथ अपना साहित्यिक सामान भी ले जाते थे और समय मिलने पर लिखते थे।
अधिकारियों के प्रति दृष्टिकोण – प्रेमचंद का स्वभाव अन्य सरकारी अफ़सरों जैसा नहीं था। वे अपने मातहतों (शिक्षकों) के साथ भाईचारे का व्यवहार करते थे। मुआयना करते समय वे कागजी कार्यवाही अक्सर शिक्षकों पर ही छोड़ देते थे ताकि उन्हें परेशानी न हो और उनकी तरक्की में कोई बाधा न आए। उनका मानना था कि अफ़सर बनकर इंसान, इंसान नहीं रह जाता, इसलिए वे ‘अफ़सरी’ करने से बचते थे।
सिद्धांत और कर्तव्य – वे सरकारी काम को सरकार का और अपने निजी लेखन को अपना काम मानते थे। वे रिश्वत या अनुचित लाभ लेने के सख्त खिलाफ थे। महोबा में तैनाती के दौरान जब वहाँ के रईसों ने उन्हें ‘नजराना’ या दस्तूरी देने की कोशिश की, तो उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि “यह मेरा सिद्धांत नहीं है”।
नौकरी से त्यागपत्र – प्रेमचंद इस पद पर लगभग 15–16 वर्षों तक रहे। अंततः 1921 में गांधीजी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर और देश सेवा की भावना के कारण उन्होंने 25 साल की इस सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के समय उनका वेतन लगभग 125 रुपये था।
यह पद उनके जीवन में आर्थिक स्थिरता लाया था, लेकिन उनके भीतर का ‘बागी’ लेखक हमेशा इस सरकारी गुलामी से मुक्त होकर पूर्णतः साहित्य की सेवा करना चाहता था।
प्रश्न – अँग्रेज़ सरकार ने ‘सोज़े-वतन’ की प्रतियों को ज़ब्त करके क्यों जला दिया था?
उत्तर – शिवरानी देवी द्वारा लिखित जीवनी के आधार पर, ‘सोज़े-वतन’ की प्रतियों को ज़ब्त किए जाने का प्रसंग प्रेमचंद के साहित्यिक और राजनीतिक जीवन का एक निर्णायक मोड़ था।
घटना का समय और स्थान – यह घटना उनकी शादी के लगभग एक साल बाद की है, जब प्रेमचंद महोबा में तैनात थे। उस समय उनके पास खुफिया पुलिस पहुँची थी और उन्हें हमीरपुर के कलेक्टर के सामने पेश होने का आदेश मिला था।
विद्रोह का आरोप – जब प्रेमचंद कलेक्टर से मिले, तो उन्होंने देखा कि कलेक्टर की मेज़ पर ‘सोज़े-वतन’ की एक प्रति रखी थी। कलेक्टर ने उनसे पूछा कि क्या यह किताब उन्होंने लिखी है। प्रेमचंद के “हाँ” कहने पर कलेक्टर ने अत्यंत कठोर शब्दों में कहा— “तुम कहानियों द्वारा विद्रोह फैला रहे हो”।
कठोर चेतावनी – कलेक्टर इस कदर नाराज़ था कि उसने यहाँ तक कह दिया— “अगर अंग्रेज़ी राज में तुम (पुराने ज़माने में) होते तो आज तुम्हारे दोनों हाथ कटवा लिये गये होते”। यह दर्शाता है कि ब्रिटिश सरकार उनकी कहानियों में छिपी देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना से कितनी डरी हुई थी।
प्रतियों की ज़ब्ती – कलेक्टर ने हुक्म दिया कि प्रेमचंद के पास उस पुस्तक की जितनी भी कॉपियाँ हैं, वे सब सरकार को सौंप दी जाएँ। इसके साथ ही उन्हें कड़ी चेतावनी दी गई कि वे भविष्य में कभी ऐसा लेखन न करें। बाद में ‘सोज़े-वतन’ की प्रतियों को सार्वजनिक रूप से जला दिया गया था।
उपनाम का जन्म – इस घटना के बाद प्रेमचंद को लगा कि सरकारी नौकरी में रहते हुए अपने असली नाम (नवाबराय) से लिखना सुरक्षित नहीं है। उन्होंने शिवरानी देवी से कहा था— “लिखूँगा क्यों नहीं? उपनाम रखना पड़ेगा”। इसी घटना के परिणामस्वरूप उन्होंने ‘नवाबराय’ छोड़कर ‘प्रेमचंद’ नाम से लिखना शुरू किया, ताकि वे अपने लेखन के माध्यम से देश सेवा जारी रख सकें।
शिवरानी देवी का सहयोग – उस समय शिवरानी देवी को साहित्य के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी, लेकिन इस घटना ने उनके भीतर भी जिज्ञासा और गर्व पैदा किया कि उनके पति का लेखन सरकार को हिला देने की शक्ति रखता है।
प्रश्न – कानपुर में प्रेमचंद किस क्रांतिकारी पत्रकार और ‘प्रताप’ के संपादक के मित्र थे?
उत्तर – गणेशशंकर विद्यार्थी
प्रेमचंद और गणेशशंकर विद्यार्थी के बीच का संबंध केवल मित्रता का नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और साझा वैचारिक उद्देश्यों का था। कानपुर प्रवास के दौरान यह संबंध और भी प्रगाढ़ हुआ।
‘प्रताप’ और साहित्यिक सहयोग – गणेशशंकर विद्यार्थी कानपुर से क्रांतिकारी पत्र ‘प्रताप’ निकालते थे। प्रेमचंद ने उनके लिए लेख लिखे और ‘प्रताप’ के कार्यालय भी गए। विद्यार्थी जी ने प्रेमचंद से लेख की मांग की थी, जिसे प्रेमचंद ने सहर्ष लिखकर भेजा था।
विद्यार्थी जी के प्रति सम्मान – प्रेमचंद, विद्यार्थी जी की कार्यक्षमता और उनकी मेहनत के बहुत बड़े प्रशंसक थे। ‘प्रताप’ के कार्यालय में उन्हें खुद अपने हाथों से बहुत सारा काम करते देख प्रेमचंद अत्यंत प्रभावित हुए थे। उन्होंने शिवरानी देवी से कहा था— “विद्यार्थी जी बड़े मेहनती हैं… इसी तरह के आदमियों की मुल्क को ज़रूरत है”।
इस्तीफे की प्रेरणा – विद्यार्थी जी को अपने पैरों पर खड़ा होकर स्वतंत्र रूप से काम करते देख प्रेमचंद के मन में भी अपनी सरकारी नौकरी छोड़ने की इच्छा प्रबल हुई थी। वे चाहते थे कि विद्यार्थी जी की तरह वे भी किसी एकांत स्थान पर बैठकर केवल साहित्य की सेवा करें।
कठिन समय में सहायता – जब प्रेमचंद के पिता का देहांत हुआ और वे नौकरी की तलाश में थे, तब गणेशशंकर विद्यार्थी के मित्रों (जैसे मारवाड़ी विद्यालय के मैनेजर श्री काशीनाथ जी) ने ही प्रेमचंद को कानपुर के मारवाड़ी विद्यालय में ‘हेडमास्टरी’ दिलाने में मदद की थी। यह जून १९२१ की बात है।
समान विचारधारा – दोनों ही महापुरुषों का उद्देश्य साहित्य के माध्यम से समाज में जागरूकता लाना और देश को स्वाधीन कराना था। विद्यार्थी जी जहाँ पत्रकारिता के माध्यम से क्रांति कर रहे थे, वहीं प्रेमचंद कथा-साहित्य के माध्यम से जनमानस को झकझोर रहे थे।
यह संबंध दर्शाता है कि प्रेमचंद अपने समय के सबसे सक्रिय और क्रांतिकारी पत्रकारों के साथ गहराई से जुड़े हुए थे, जिसने उनके लेखन और जीवन के निर्णयों को प्रभावित किया।
प्रश्न – प्रेमचंद ने सरकारी नौकरी से इस्तीफा किस वर्ष दिया था?
उत्तर – 1921 में
शिवरानी देवी द्वारा लिखित जीवनी के आधार पर, प्रेमचंद का सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा देना उनके जीवन की सबसे बड़ी और साहसी घटनाओं में से एक था। यह निर्णय केवल आर्थिक नहीं, बल्कि गहरे आदर्शों और देशभक्ति से प्रेरित था।
प्रेरणा का स्रोत (गांधीजी का प्रभाव) – यह 1921 की बात है जब महात्मा गांधी असहयोग आंदोलन के सिलसिले में गोरखपुर आए थे। प्रेमचंद उस समय बीमार थे, फिर भी वे गांधीजी का भाषण सुनने गए। उस भाषण का उन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उनके मन में सरकारी नौकरी के प्रति उदासीनता पैदा हो गई।
इस्तीफ़े के समय की स्थिति – प्रेमचंद उस समय सब-डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पर तैनात थे और उनका वेतन लगभग 125 रुपये था। उन्होंने दो साल पहले ही अपना बी.ए. पास किया था और भविष्य में उनके प्रोफेसर बनने या तरक्की पाने की पूरी संभावना थी।
आंतरिक द्वंद्व और स्वास्थ्य – इस्तीफ़े का निर्णय लेते समय प्रेमचंद बहुत बीमार थे। उनके सामने आर्थिक संकट भी था क्योंकि उनके पास न अपना घर था, न ज़मीन।
शिवरानी देवी का सहयोग – जब प्रेमचंद ने इस्तीफ़े के बारे में शिवरानी देवी से सलाह ली, तो उन्होंने पूरी दृढ़ता के साथ उनका समर्थन किया। शिवरानी देवी ने कहा कि वे जंगल में रहकर भी गुज़ारा कर लेंगी, लेकिन अँग्रेजों की दमनकारी नीतियों को अब सहन नहीं करना चाहिए। प्रेमचंद ने इसे “पापों का प्रायश्चित” माना कि वे अब तक अँग्रेजी सरकार की सेवा कर रहे थे।
त्याग और परिणाम – 15–16 साल की सरकारी नौकरी (कुल 25 साल की सेवा की संभावना में से) छोड़कर वे सरकारी मकान खाली कर अपने गाँव लमही लौट आए। इस्तीफ़े के बाद उनके पास आय का कोई स्थिर स्रोत नहीं था, फिर भी वे इस बात से खुश थे कि अब वे अपनी कलम के बल पर स्वतंत्र रूप से साहित्य-सेवा कर सकेंगे।
प्रश्न – प्रेमचंद को सरकारी नौकरी छोड़ने की अंतिम प्रेरणा महात्मा गाँधी के किस स्थान पर दिए भाषण से मिली थी?
उत्तर – गोरखपुर
ऐतिहासिक संदर्भ (गोरखपुर, 1920–21) – यह असहयोग आंदोलन का समय था। महात्मा गांधी गोरखपुर आए थे और वहाँ एक विशाल जनसभा को संबोधित किया था। उस समय प्रेमचंद बीमार थे, फिर भी वे अपने दोनों लड़कों के साथ गांधीजी का भाषण सुनने गए।
भाषण का प्रभाव – गांधीजी के ओजस्वी विचारों को सुनकर प्रेमचंद और शिवरानी देवी, दोनों बहुत प्रभावित हुए। उसी क्षण प्रेमचंद के मन में सरकारी नौकरी के प्रति गहरी उदासीनता पैदा हो गई। उन्होंने बाद में स्वीकार किया कि वे गांधीजी के उसी समय से “चेले” हो गए थे जब वे गोरखपुर आए थे।
आंतरिक द्वंद्व और त्याग – उस समय प्रेमचंद सब-डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पर थे और उनका वेतन लगभग 125 रुपये था। उन्होंने हाल ही में बी.ए. पास किया था और वे एम.ए. की तैयारी कर रहे थे, जिससे उनके ‘प्रोफेसर’ बनने और जीवन में आराम मिलने की पूरी संभावना थी। नौकरी छोड़ने का अर्थ था एक सुरक्षित भविष्य और आय के निश्चित साधन का त्याग करना।
शिवरानी देवी का समर्थन – इस्तीफ़ा देने से पहले प्रेमचंद ने शिवरानी देवी से सलाह ली। उन्होंने आर्थिक तंगी और बच्चों के भविष्य की चिंता जताते हुए पूछा कि क्या वे इस मुश्किल समय में साथ दे पाएंगी। शिवरानी देवी ने बड़ी दृढ़ता से कहा कि वे जंगल में रहकर गुज़ारा कर लेंगी, लेकिन अब अँग्रेजों की गुलामी सहना मुमकिन नहीं है।
पापों का प्रायश्चित – प्रेमचंद ने अपनी सरकारी नौकरी को “अपने पापों का प्रायश्चित” माना। उनका मानना था कि उनके पूर्वज विलासिता में डूबे रहे जिससे देश में फूट पड़ी और अँग्रेज हावी हुए। अब वे इस ‘सरकारी नीति’ और अत्याचारों को सहन करने की शक्ति खो चुके थे।
साहित्यिक प्रेरणा – गांधीजी के इसी प्रभाव और सरकारी नौकरी से मुक्ति के बाद उन्होंने अपना प्रसिद्ध उपन्यास ‘प्रेमाश्रम’ लिखा। उन्होंने स्वयं को गांधीजी का “बना-बनाया कुदरती चेला” कहा क्योंकि वे भी उन्हीं की तरह मजदूरों और काश्तकारों को सुखी देखना चाहते थे।
प्रश्न – त्याग और बलिदान के संदर्भ में प्रेमचंद ने ‘प्यास से फरजी भयो’ वाली दोहावली किस कवि की उद्धृत की है?
उत्तर – रहीम
प्रेमचंद ने रहीम के इस दोहे का उल्लेख उस समय किया था जब वे अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा देने और देश के प्रति अपने कर्तव्यों पर चर्चा कर रहे थे।
ऐतिहासिक संदर्भ (इस्तीफे के बाद की चर्चा) – यह प्रसंग वर्ष 1921 का है, जब प्रेमचंद ने गांधीजी के आह्वान पर अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी थी। जब शिवरानी देवी ने इस निर्णय को ‘त्याग, तपस्या और बलिदान’ कहा, तो प्रेमचंद ने इससे असहमति जताई। उन्होंने कहा कि यह कोई बलिदान नहीं, बल्कि उनके और उनके पूर्वजों द्वारा किए गए “पापों का प्रायश्चित” मात्र है।
दोहे का अर्थ और संदर्भ – प्रेमचंद ने कहा कि उन्हें इस अवसर पर रहीम का यह दोहा बहुत सटीक लगता है— “प्यासा (प्यादा) से फरजी भयो, टेढ़ो-टेढ़ो जाय”।
शाब्दिक अर्थ – शतरंज के खेल में जब एक साधारण प्यादा (सिपाही) आख़िरी घर तक पहुँचकर ‘फरजी’ (वज़ीर) बन जाता है, तो वह सीधा चलने के बजाय टेढ़ा-मेढ़ा और तिरछा चलने लगता है, क्योंकि उसे अपनी नई शक्ति का अहंकार हो जाता है।
प्रेमचंद का दृष्टिकोण (भारतीय मानसिकता पर कटाक्ष) – प्रेमचंद ने इस दोहे के माध्यम से उन भारतीयों पर कटाक्ष किया जो अँग्रेजी सरकार में थोड़े ऊँचे पदों पर पहुँच जाते थे। अक्सर भारतीय अधिकारी अपने ही देशवासियों पर अँग्रेजों की तुलना में अधिक कड़ा शासन और अत्याचार करते हैं।
उनके अनुसार, भारतीय पिछले 500 वर्षों से गुलामी में रहे हैं, जिससे उनकी आत्मा और मनोबल प्रभावित हुआ है। थोड़े से अधिकार मिलते ही वे ‘टेढ़े’ चलने लगते हैं।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारतीयों की इस मानसिकता को बदलने में अभी काफी समय लगेगा और केवल 10–20 वर्षों में आत्मा में सुधार होना कठिन है।
त्याग और सिद्धांत – प्रेमचंद स्वयं को उस ‘टेढ़े’ रास्ते या अँग्रेजी सत्ता के उस अहंकारपूर्ण तंत्र का हिस्सा नहीं बनाए रखना चाहते थे। उन्होंने एक ‘बागी’ और ‘साहित्य-सेवी’ के रूप में सादगीपूर्ण जीवन को चुना, क्योंकि वे मानते थे कि गुलामी की मानसिकता से मुक्ति ही वास्तविक स्वतंत्रता की ओर पहला कदम है।
प्रश्न – नौकरी छोड़ने के बाद प्रेमचंद ने किस स्थान पर रहकर चरखा प्रचार का कार्य किया?
उत्तर – लमही
सरकारी नौकरी से इस्तीफा देने के बाद प्रेमचंद अपने पैतृक गाँव लमही लौट आए थे। वहाँ उन्होंने न केवल साहित्य सृजन किया, बल्कि महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए चरखा प्रचार का सक्रिय कार्य भी किया।
उद्देश्य – प्रेमचंद का मानना था कि गाँवों में चरखे का प्रचार बढ़ने से गरीब भाइयों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा और वे आत्मनिर्भर बनेंगे।
संसाधनों का प्रबंध – चरखा बनवाने के लिए प्रेमचंद स्वयं एक स्थानीय ज़मींदार के पास गए और उनसे लकड़ी माँगी। उन्होंने ज़मींदार से कहा, “मुझे आप लकड़ी दीजिए, मैं बनवाई दूँ, और चरखें देहात में बाँटे जायें जिससे गरीब भाइयों में चरखे का प्रचार बढ़े”।
निर्माण प्रक्रिया – ज़मींदार को यह विचार पसंद आया और गाँव के लोग लकड़ी ढोकर प्रेमचंद के घर ले आए। उनके घर के दरवाजे पर एक महीने तक दो बढ़ई लगातार चरखे बनाते रहे।
नि:शुल्क वितरण और प्रशिक्षण – जब चरखे बनकर तैयार हो गए, तो प्रेमचंद ने उन्हें गाँव वालों को मुफ्त में बाँट दिया। इसके बाद लगभग दो महीने तक वे लोगों को चरखा चलाने का तरीका, सूत कातने की विधि और सूत की गुणवत्ता के बारे में जानकारी देते रहे।
साहित्यिक दिनचर्या के साथ सेवा – लमही में रहते हुए उनकी दिनचर्या बहुत अनुशासित थी। वे सुबह उठकर लिखने-पढ़ने का काम करते थे और दोपहर के समय गाँव वालों के बीच बैठकर उनकी समस्याओं पर बात करते थे और चरखा प्रचार जैसे कार्यों में समय बिताते थे।
प्रेमचंद केवल कागजों पर ही आदर्शवादी नहीं थे, बल्कि उन्होंने ज़मीनी स्तर पर भी समाज सेवा और राष्ट्रीय आंदोलनों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की थी।
प्रश्न – प्रेमचंद ने ‘हंस’ पत्रिका का संपादन और प्रकाशन कहाँ से प्रारंभ किया?
उत्तर – बनारस
‘हंस’ पत्रिका प्रेमचंद के जीवन का केवल एक साहित्यिक कार्य नहीं था, बल्कि उनके आदर्शों और सिद्धांतों का प्रतीक था।
प्रकाशन स्थल और स्वरूप – ‘हंस’ एक मासिक पत्रिका थी, जिसका प्रकाशन और संपादन प्रेमचंद ने बनारस से प्रारंभ किया था। इसी के साथ वे ‘जागरण’ नाम का एक साप्ताहिक पत्र भी निकालते थे।
प्रेमचंद का ‘स्मारक’ – प्रेमचंद इस पत्रिका के प्रति इतने भावुक थे कि उन्होंने इसे अपना “स्मारक” कहा था। अपनी अंतिम बीमारी के अत्यंत कठिन समय में भी, जब वे खून की उल्टियाँ कर रहे थे, उनके मन से ‘हंस’ का विचार नहीं गया। उन्होंने शिवरानी देवी से कहा था— “रहूँ या न रहूँ ‘हंस’ चलेगा ही। यह मेरा स्मारक होगा”।
आर्थिक संघर्ष और बलिदान – ‘हंस’ को चलाना प्रेमचंद के लिए एक बहुत बड़ा आर्थिक बोझ था। इसे जीवित रखने के लिए उन्होंने अपनी सुख-सुविधाओं और स्वास्थ्य तक का बलिदान कर दिया।
1934 के दौरान, जब पत्रिका का घाटा बढ़ गया, तो वे बम्बई (मुंबई) केवल इसलिए गए ताकि फिल्म कंपनियों के लिए लिखकर जो पैसा (लगभग 8–10 हज़ार रुपये) मिले, उसे वे ‘हंस’ और ‘जागरण’ को चलाने में लगा सकें।
वे इसे एक “बेहूदा रोग” कहते थे जिसे पालने की उन्हें आदत पड़ गई थी।
साहित्यिक उद्देश्य – उनका उद्देश्य ‘हंस’ के माध्यम से भारतीय भाषाओं को एक माला में पिरोना था। वे चाहते थे कि यह ‘भारतीय साहित्य परिषद्’ का मुखपत्र बने ताकि देश की राजनीतिक गुत्थियाँ सुलझ सकें।
अंतिम समय की चिंता – जब वे बहुत बीमार थे, तब अँग्रेजी सरकार ने ‘हंस’ के लिए जमानत (security deposit) माँगी थी। प्रेमचंद को डर था कि उनके बाद शायद उनका बेटा (धुन्नू) यह पैसे न जमा कर पाए, इसलिए उन्होंने अपनी अस्वस्थता में भी इसकी सुरक्षा की चिंता की
प्रश्न – शिवरानी देवी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लखनऊ में किस आश्रम की स्थापना और संचालन में भाग लिया था?
उत्तर – महिला-आश्रम
महिला-आश्रम का प्रसंग उनके स्वयं के क्रांतिकारी व्यक्तित्व और स्वतंत्रता संग्राम में उनकी सक्रिय भागीदारी को दर्शाता है।
स्थापना और उद्देश्य – लखनऊ में पहले कोई महिला-आश्रम नहीं था। 1930 के नमक कानून उल्लंघन के दौरान, शिवरानी देवी सहित ग्यारह स्त्रियों ने मिलकर महिला-आश्रम की स्थापना की थी। इसका मुख्य उद्देश्य स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं को संगठित करना और उन्हें सक्रिय रूप से जोड़ना था।
नेतृत्व और पद – शिवरानी देवी की सक्रियता और साहस को देखते हुए आश्रम की अन्य महिलाओं ने उन्हें ‘कप्तानी’ का पद दिया था। इसके अलावा, बाबू मोहनलाल सक्सेना ने उन्हें ‘वर्किंग कमेटी’ का सदस्य भी बनाया था।
दैनिक गतिविधियाँ – शिवरानी देवी की दिनचर्या बहुत कठिन थी। वे सुबह 12 बजे तक घर का सारा काम निपटाती थीं और उसके बाद आश्रम चली जाती थीं। वहाँ वे अन्य महिलाओं के साथ मिलकर शराब की दुकानों की पिकेटिंग (धरना) और विदेशी कपड़ों की दुकानों का विरोध करती थीं।
प्रेमचंद का दृष्टिकोण और चिंता – प्रेमचंद उनकी देशभक्ति का सम्मान करते थे, लेकिन उनके स्वास्थ्य को लेकर बहुत चिंतित रहते थे। उस समय शिवरानी देवी को अक्सर हल्का बुखार रहता था, फिर भी वे काम पर जाती थीं। प्रेमचंद उन्हें रोकने की कोशिश करते और कहते कि “क्या प्राण देने पर उतारू हो?”, जिस पर शिवरानी देवी दृढ़ता से जवाब देती थीं कि यह उनका कर्तव्य है।
गिरफ्तारी – महिला-आश्रम की गतिविधियों के दौरान ही उन्हें अन्य महिलाओं के साथ गिरफ्तार किया गया था। वे विदेशी कपड़ों की दुकानों पर पिकेटिंग कर रही थीं, जब पुलिस इंस्पेक्टर ने उन्हें वारंट दिखाया और वे हँसते हुए ‘महात्मा गांधी की जय’ के नारे लगाते हुए जेल चली गईं।
स्त्री-पुरुष समानता पर बहस – आश्रम में काम करने के दौरान पुरुषों और स्त्रियों की भागीदारी को लेकर उनके और प्रेमचंद के बीच कई बार तीखी बहस भी होती थी। शिवरानी देवी का मानना था कि यदि महिलाएँ मैदान में न आतीं, तो आंदोलन इतना सफल न होता।
प्रश्न – प्रेमचंद ने ‘प्रेमाश्रम’ उपन्यास किसकी प्रेरणा से लिखा था?
उत्तर – महात्मा गाँधी
प्रेमचंद का उपन्यास ‘प्रेमाश्रम’ (जो 1922 में प्रकाशित हुआ) महात्मा गांधी के विचारों और उनके द्वारा चलाए गए स्वाधीनता आंदोलन से गहराई से प्रेरित है।
गांधीजी का प्रभाव – प्रेमचंद महात्मा गांधी को दुनिया का सबसे महान व्यक्ति मानते थे। 1921 में गोरखपुर में गांधीजी का भाषण सुनने के बाद उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। इसी वैचारिक परिवर्तन के दौर में उन्होंने ‘प्रेमाश्रम’ की रचना की।
‘कुदरती चेला’ – प्रेमचंद ने स्वयं को गांधीजी का “बना-बनाया कुदरती चेला” कहा था। उनका मानना था कि गांधीजी जो सामाजिक सुधार (जैसे किसानों और मजदूरों का उत्थान) देश में लाना चाहते थे, प्रेमचंद अपने लेखन के माध्यम से वही कार्य पहले से ही कर रहे थे।
उपन्यास का उद्देश्य – ‘प्रेमाश्रम’ लिखने के पीछे उनका मुख्य उद्देश्य मजदूरों और काश्तकारों (किसानों) को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना और उन्हें उत्साह देना था। गांधीजी की तरह वे भी चाहते थे कि समाज का यह वर्ग सुखी और समृद्ध हो।
सांप्रदायिक एकता और राष्ट्रभाषा – इस उपन्यास के संदर्भ में प्रेमचंद ने यह भी स्पष्ट किया कि वे गांधीजी के हिन्दू-मुसलमान एकता के विचार के प्रबल समर्थक थे। वे हिन्दी और उर्दू को मिलाकर एक ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा बनाने के पक्षधर थे, जिसे आम जनता आसानी से समझ सके।
वैचारिक समानता – प्रेमचंद का मानना था कि साहित्य और समाज का संबंध अटूट है। ‘प्रेमाश्रम’ के माध्यम से उन्होंने गांधीवादी आदर्शों, जैसे अहिंसा, प्रेम और सत्याग्रह को ग्रामीण परिवेश में चित्रित करने का प्रयास किया।
प्रश्न – प्रेमचंद के अनुसार ‘हिंदुस्तानी’ भाषा का क्या अर्थ है?
उत्तर – हिंदी और उर्दू का सरल मेल
प्रेमचंद के लिए ‘हिंदुस्तानी’ भाषा केवल बातचीत का एक माध्यम नहीं थी, बल्कि वह सांप्रदायिक एकता और राष्ट्रीय पहचान का एक सशक्त माध्यम थी।
महात्मा गांधी का प्रभाव – प्रेमचंद महात्मा गांधी के विचारों के प्रबल समर्थक थे। गांधीजी की तरह वे भी हिन्दू-मुसलमानों की एकता चाहते थे और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने ‘हिंदी’ और ‘उर्दू’ को मिलाकर ‘हिंदुस्तानी’ बनाने का समर्थन किया।
आम जनता की भाषा – प्रेमचंद के अनुसार, हिंदुस्तानी वह भाषा है जिसे आम जनता (हिंदू और मुसलमान दोनों) आसानी से समझ सके। उनका मानना था कि राष्ट्रभाषा वही हो सकती है जो इन दोनों भाषाओं के मेल से बनी हो।
शब्दों का खुलापन – वे भाषा की कट्टरता के विरोधी थे। उनका तर्क था कि हिंदुस्तानी भाषा ‘आम बोल-चाल’ की होनी चाहिए। इसमें यदि हिंदी में फारसी के शब्द आ जाएँ या उर्दू में संस्कृत के, तो किसी को भी इस पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
विवाद का समाधान – प्रेमचंद का मानना था कि भाषा को लेकर चल रहा झगड़ा तभी खत्म होगा जब हिंदू और मुसलमान ‘ठंडे दिल’ से एक-दूसरे के साथ रहने का निश्चय करेंगे। जब दोनों कौमें साथ मिल जाएँगी, तो उनकी भाषा भी मिलकर ‘हिंदुस्तानी’ बन जाएगी।
साहित्यिक दृष्टिकोण – प्रेमचंद ने स्वयं शिवरानी देवी से कहा था कि वे जो कुछ भी लिखते हैं, वह ‘हिंदुस्तानी’ में ही लिखते हैं। वे साहित्य, समाज और राजनीति को एक ही माला में पिरोना चाहते थे और उनका मानना था कि जिस भाषा का साहित्य अच्छा होगा, उसका समाज भी अच्छा होगा।
पुस्तर – शिवरानी देवी की पुस्तक ‘प्रेमचंद : घर में’ की भूमिका (श्रद्धांजलि) किसने लिखी है?”
उत्तर – बनारसीदास चतुर्वेदी
शिवरानी देवी द्वारा लिखित जीवनी ‘प्रेमचंद : घर में’ की भूमिका जिसे ‘श्रद्धांजलि’ शीर्षक दिया गया है प्रसिद्ध साहित्यकार और पत्रकार बनारसीदास चतुर्वेदी ने लिखी है।
प्रेमचंद से परिचय – बनारसीदास चतुर्वेदी को प्रेमचंद के घर पर दो दिन रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। उन्होंने अपने संस्मरण ‘प्रेमचंदजी के साथ दो दिन’ में लिखा था कि प्रेमचंद का घर अत्यंत निष्कपट और आडंबर-शून्य था।
प्रेमचंद की महानता का उल्लेख – चतुर्वेदी जी ने प्रेमचंद को हिन्दी जगत का एक ‘अद्वितीय’ कलाकार माना है। उनके अनुसार, भारत की सीमा का उल्लंघन करने अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करने की क्षमता रखने वाला प्रेमचंद जैसा दूसरा कलाकार उस समय हिन्दी जगत में मौजूद नहीं था।
जीवनी की प्रशंसा – उन्होंने इस पुस्तक की सराहना इसलिए की है क्योंकि इसमें शिवरानी देवी ने प्रेमचंद के घरेलू जीवन की झाँकियों को बहुत स्पष्टता, सहृदयता और ईमानदारी के साथ दिखाया है। उन्होंने यहाँ तक कहा कि शिवरानी देवी ने प्रेमचंद की कमियों और त्रुटियों को भी छिपाया नहीं है, जो एक सच्ची जीवनी की पहचान है।
शिवरानी देवी का व्यक्तित्व – बनारसीदास चतुर्वेदी ने शिवरानी देवी को मात्र प्रेमचंद की पत्नी के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘योद्धा महिला’ के रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने उल्लेख किया है कि शिवरानी देवी ने स्वाधीनता-संग्राम में सक्रिय भाग लिया था और वे जेल भी गई थीं।
साहित्यिक महत्व – उन्होंने इस पुस्तक को इतना महत्वपूर्ण माना कि उनके अनुसार इसके कई प्रसंगों को पाठ्य-पुस्तकों में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि एक रूसी पत्रकार ने जब इस पुस्तक के कुछ अंशों का अनुवाद सुना, तो उसकी आँखों में आँसू आ गए थे।
लेखन की तिथि – यह ‘श्रद्धांजलि’ 21 जुलाई, 1956 को नई दिल्ली में लिखी गई थी। यह भूमिका पाठक को यह समझने में मदद करती है कि यह जीवनी न केवल प्रेमचंद के बारे में है, बल्कि यह शिवरानी देवी के अपने साहसी और स्पष्टवादी व्यक्तित्व का भी प्रतिबिंब है।
प्रश्न – प्रेमचंद की तुलना अक्सर किस महान रूसी लेखक से की जाती है?
उत्तर – मैक्सिम गोर्की
प्रेमचंद की तुलना महान रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की से किए जाने के कई गहरे और ऐतिहासिक कारण हैं।
असीम श्रद्धा और सम्मान – प्रेमचंद के मन में मैक्सिम गोर्की के प्रति अपार आदर था। जीवनी में उल्लेख है कि जब गोर्की की मृत्यु हुई, तो प्रेमचंद कई दिनों तक उसकी चर्चा करते रहे। जब भी गोर्की का ज़िक्र आता, उनके चेहरे पर एक दर्द सा उभर आता था। प्रेमचंद की नज़रों में गोर्की का कोई समकक्ष लेखक नहीं था।
“दैवी दुर्घटना” (मृत्यु का संयोग) – यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण संयोग था कि प्रेमचंद और मैक्सिम गोर्की दोनों का देहांत एक ही वर्ष (1936) में हुआ। इन दोनों महान साहित्यकारों की मृत्यु के बीच मात्र चार महीने का अंतर था। जीवनी में इसे एक ‘दैवी दुर्घटना’ कहा गया है।
समान विचारधारा और विषय – गोर्की की तरह प्रेमचंद भी ‘जनता के लेखक’ थे। दोनों का साहित्य शोषितों, मजदूरों और गरीबों के जीवन संघर्ष पर आधारित था। प्रेमचंद स्वयं को भी एक ‘मजदूर’ ही मानते थे और उनका मानना था कि जिस देश में मजदूरों और काश्तकारों का राज होगा, वही असली सुख का दिन होगा— जैसा कि उन्होंने रूस के संदर्भ में कहा था।
अंतर्राष्ट्रीय पहचान – प्रेमचंद की अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का प्रमाण यह है कि रूस के प्रसिद्ध अखबार ‘प्रवदा’ के भारतीय संवाददाता ने शिवरानी देवी की इस पुस्तक से ‘गोर्की’ वाले अध्याय का विशेष रूप से अंग्रेजी में अनुवाद सुना था।
साहित्यिक कद – जीवनी की श्रद्धांजलि में बनारसीदास चतुर्वेदी लिखते हैं कि प्रेमचंद हिन्दी जगत के ऐसे ‘अद्वितीय’ कलाकार थे जिनमें भारत की सीमाओं को लाँघकर अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करने की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने प्रेमचंद और गोर्की को एक ही श्रेणी का महान साहित्यकार माना है।
प्रश्न – लमही गाँव में प्रेमचंद का पुश्तैनी घर किस ज़िले में स्थित है?
उत्तर – बनारस (वाराणसी)
लमही गाँव प्रेमचंद के जीवन का न केवल जन्मस्थान था, बल्कि उनके साहित्यिक और वैचारिक विकास का केंद्र भी था।
स्थान और जन्म – प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को बनारस (वाराणसी) से चार मील दूर स्थित ‘लमही’ गाँव में हुआ था। उनके पिता अजायबराय और माता आनन्दी देवी इसी गाँव के निवासी थे।
बचपन की स्मृतियाँ – उनका बचपन लमही की गलियों में बीता, जहाँ वे गुल्ली-डंडा खेलते और अपने चचेरे भाइयों के साथ रहते थे। माँ की मृत्यु के बाद उनकी दादी उन्हें वापस लमही ले आई थीं।
संकट के समय का सहारा – 1921 में जब प्रेमचंद ने महात्मा गांधी के आह्वान पर सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिया, तो उनके पास रहने के लिए कोई निश्चित स्थान नहीं था। तब उन्होंने अपने पैतृक घर (लमही) लौटने का निर्णय लिया। उन्होंने अपनी पत्नी शिवरानी देवी से कहा था कि “लमही में रहने के लिए पुराना घर है”।
लमही में सामाजिक कार्य – नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने लमही में रहकर चरखा प्रचार का बड़ा कार्य किया। उन्होंने गाँव के बढ़इयों से चरखे बनवाए और उन्हें नि:शुल्क बाँटा ताकि ग्रामीण आत्मनिर्भर बन सकें।
साहित्यिक दिनचर्या – लमही में उनकी दिनचर्या बहुत अनुशासित थी। वे सुबह जल्दी उठकर लिखते थे और दोपहर में गाँव वालों के साथ बैठकर उनके झगड़े निपटाते, नए कानून समझाते और उनकी समस्याओं पर चर्चा करते थे। लमही के किसानों (काश्तकारों) के प्रति उनका गहरा लगाव था और वे उनके उत्थान के लिए सदैव प्रयासरत रहते थे।
स्वप्न और निर्माण – जीवन के अंतिम वर्षों में (लगभग 1934–35) प्रेमचंद ने लमही में अपना नया घर भी बनवाया था। वे चाहते थे कि वे और शिवरानी देवी शहर की भाग-दौड़ छोड़कर वहीं सुकून से रहें और साहित्य सेवा करें।
प्रश्न – प्रेमचंद ने किस वर्ष मैट्रिक (एंट्रेंस) की परीक्षा उत्तीर्ण की थी?
उत्तर – 1904 में
प्रेमचंद ने सन् 1904 में इलाहाबाद में रहते हुए अपनी एंट्रेंस (मैट्रिकल) की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। उनके जीवन का यह काल अत्यंत कठिन और आर्थिक अभावों से भरा था।
प्रश्न – प्रेमचंद ने अपनी साहित्यिक यात्रा किस भाषा के लेखन से प्रारंभ की थी?
उत्तर – उर्दू
‘नवाबराय’ के नाम से लेखन – अपनी साहित्यिक यात्रा के शुरुआती दौर में वे अपने असली नाम (धनपतराय) के बजाय ‘नवाबराय’ के नाम से उर्दू में लिखते थे। उनके शुरुआती उपन्यास जैसे ‘कृष्णा’ और प्रसिद्ध कहानी-संग्रह ‘सोज़े-वतन’ मूलतः उर्दू में ही लिखे गए थे।
‘सोज़े-वतन’ और उपनाम का परिवर्तन – 1907–08 के दौरान जब अंग्रेज़ सरकार ने उनके उर्दू कहानी-संग्रह ‘सोज़े-वतन’ को ‘विद्रोह फैलाने वाला’ मानकर ज़ब्त कर लिया और जला दिया, तब उन्हें लगा कि ‘नवाबराय’ के नाम से लिखना अब सुरक्षित नहीं है। इसी घटना के बाद उन्होंने ‘प्रेमचंद’ उपनाम अपनाया।
‘हिंदुस्तानी’ का विजन – प्रेमचंद की उर्दू पृष्ठभूमि ने उनके हिंदी लेखन को भी प्रभावित किया। वे ‘हिंदुस्तानी’ भाषा के पक्षधर थे, जो हिंदी और उर्दू का एक सरल और सुंदर मेल हो, ताकि उसे आम जनता (हिंदू और मुसलमान दोनों) आसानी से समझ सके।
प्रश्न – शिवरानी देवी ने ‘प्रेमचंद : घर में’ पुस्तक में प्रेमचंद को क्या कहकर समर्पित किया है?
उत्तर – स्वामी
समर्पण पृष्ठ पर उन्होंने प्रेमचंद को “स्वामी” कहकर संबोधित किया है। यह समर्पण न केवल उनके बीच के गहरे वैवाहिक संबंध को दर्शाता है, बल्कि प्रेमचंद के प्रति शिवरानी देवी के अगाध सम्मान और समर्पण का भी प्रतीक है।
समर्पण के शब्द – पुस्तक के शुरुआती पन्नों में शिवरानी देवी ने बहुत ही भावुक पंक्तियाँ लिखी हैं— “स्वामी, तुम्हारी ही चीज़ तुम्हारे चरणों में चढ़ाती हूँ, इस तुच्छ सेवा को अपनाना तुम्हारी दासी या रानी शिवरानी”।
संबंधों की गहराई – समर्पण में ‘दासी या रानी’ शब्दों का प्रयोग यह दर्शाता है कि उनका रिश्ता केवल पारंपरिक पति-पत्नी का नहीं था, बल्कि उसमें एक सखी और सहभागी का भाव भी था। प्रेमचंद स्वयं चाहते थे कि शिवरानी देवी घर की ‘मालकिन’ बनकर रहें।
एक ही नाव के यात्री – अपनी प्रस्तावना (‘दो शब्द’) में शिवरानी देवी लिखती हैं कि वे और प्रेमचंद तीस साल से ऊपर के जीवन में ‘एक ही नाव के यात्री’ थे। उन्होंने साथ मिलकर ज़िंदगी के तूफानों को झेला, साथ रोए और साथ हँसे।
ईमानदारी और सच्चाई – उन्होंने यह पुस्तक किसी प्रशंसा के लिए नहीं, बल्कि प्रेमचंद की मानवता और उनकी ‘आदमियत’ का परिचय देने के लिए पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ लिखी है। उनका मानना था कि उनके गुणों का बखान करना उनके व्यक्तित्व की विशालता के सामने ‘तिल का ताड़’ बनाने जैसा होगा, इसलिए उन्होंने सब बातें ज्यों की त्यों कह दी हैं।
प्रश्न – प्रेमचंद के पिता की मृत्यु के समय उनकी आयु कितनी थी?
उत्तर – 15 वर्ष
प्रेमचंद के पिता (मुंशी अजायबराय) की मृत्यु उनके जीवन का एक अत्यंत कठिन और संघर्षपूर्ण मोड़ था।
आयु और शिक्षा – जब प्रेमचंद के पिता का देहांत हुआ, तब उनकी आयु मात्र 15 वर्ष थी और वे नवीं कक्षा में पढ़ रहे थे।
घोर आर्थिक तंगी – पिता की मृत्यु के बाद उनके जीवन में गरीबी का वह दौर शुरू हुआ जिसने उन्हें जीवन के कड़वे यथार्थ से परिचित कराया। उनके पास न रहने को अपना घर था, न ज़मीन, और न ही आय का कोई निश्चित साधन।
संघर्षपूर्ण दिनचर्या – अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्हें भारी संघर्ष करना पड़ा। वे बनारस में ट्यूशन पढ़ाते थे और शहर के दूसरे कोने में पढ़ने जाते थे। वे अक्सर दिन भर भूखे रहते थे और रात को सड़क की रोशनी (कुप्पी/लैंप) के सामने बैठकर टाट बिछाकर पढ़ते थे क्योंकि घर में तेल के पैसे नहीं होते थे।
पारिवारिक परिस्थितियाँ – उनके पिता ने उनके बचपन में ही उनकी पहली शादी कर दी थी, जो उनके लिए एक बड़ी मानसिक पीड़ा का कारण बनी। पिता की मृत्यु के बाद उन्हें अपनी उस पत्नी और नाराज़ रहने वाली विमाता (चाची) के बीच संतुलन बनाने में भी काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
पिता की इस असामयिक मृत्यु ने प्रेमचंद को समय से पहले ही परिपक्व बना दिया। यही कारण है कि उनके साहित्य में ग्रामीण जीवन का संघर्ष और गरीबी का चित्रण इतना सजीव और प्रामाणिक है।
प्रश्न – प्रेमचंद ने कानपुर में किस विद्यालय में हेड-मास्टरी की थी?
उत्तर – मारवाड़ी विद्यालय
नियुक्ति का संदर्भ – सरकारी नौकरी (सब-डिप्टी इंस्पेक्टर) से इस्तीफा देने के बाद, जब प्रेमचंद अपने गाँव लमही में रह रहे थे, तब जून 1921 में उन्हें कानपुर के मारवाड़ी विद्यालय में हेड-मास्टरी का प्रस्ताव मिला।
मित्रों की भूमिका – इस पद को प्राप्त करने में उनके क्रांतिकारी मित्र और ‘प्रताप’ के संपादक गणेशशंकर विद्यार्थी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। मारवाड़ी विद्यालय के मैनेजर श्री काशीनाथ जी, विद्यार्थी जी के मित्रों में से थे और उन्हीं के माध्यम से यह तय हुआ कि प्रेमचंद इस कार्यभार को स्वीकार करें।
कार्यकाल का आरंभ – यह तय हुआ कि वे जुलाई से काम पर आ जाएँगे। 5 जुलाई 1921 को प्रेमचंद अपने परिवार (शिवरानी देवी और बच्चों) के साथ कानपुर पहुँचे। उस समय शिवरानी देवी का स्वास्थ्य ठीक नहीं था और वे गर्भवती थीं।
विद्यालय का वातावरण और लोकप्रियता – प्रेमचंद विद्यालय के छात्रों और अन्य शिक्षकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय थे। जब उन्होंने बाद में इस पद से इस्तीफा देने का निर्णय लिया, तो वहाँ के शिक्षक और छात्र उनके सम्मान में एक ‘जलसा’ (विदाई समारोह) करना चाहते थे और उन्हें अभिनंदन-पत्र देना चाहते थे।
प्रबंधन के साथ विवाद और इस्तीफा – विद्यालय के मैनेजर काशीनाथ जी को यह विदाई समारोह और अभिनंदन-पत्र देना पसंद नहीं आया। इसके बावजूद जलसा हुआ और प्रेमचंद को सम्मानित किया गया, लेकिन इस कारण मैनेजर ने विद्यालय के 4–5 अन्य मास्टरों को नौकरी से निकाल दिया।
अगला पड़ाव – मारवाड़ी विद्यालय छोड़ने के बाद प्रेमचंद स्थायी रूप से काशी (बनारस) चले गए, जहाँ उन्होंने बाबू संपूर्णानंद द्वारा संपादित पत्रिका ‘मर्यादा’ में संपादकीय कार्यभार संभाला।
प्रश्न – प्रेमचंद ने ‘हंस’ के ‘प्रेमचंद अंक’ में अपनी किस डायरी का उल्लेख किया था?
उत्तर – 25 जून 1936 की डायरी
भूमिका (श्रद्धांजलि) में बनारसीदास चतुर्वेदी ने प्रेमचंद की २५ जून १९३६ की डायरी का उल्लेख किया है। यह डायरी प्रेमचंद के जीवन के अंतिम समय की अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायक स्थिति को दर्शाती है।
ऐतिहासिक संदर्भ – यह डायरी प्रेमचंद की मृत्यु (अक्टूबर 1936) से कुछ महीने पहले की है। इसे बाद में उनकी प्रसिद्ध पत्रिका ‘हंस’ के ‘प्रेमचंद अंक’ में प्रकाशित किया गया था।
हृदय-विदारक स्थिति – बनारसीदास चतुर्वेदी लिखते हैं कि इस डायरी को पढ़कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इसमें प्रेमचंद ने अपनी उस शारीरिक पीड़ा का वर्णन किया था जब उन्हें खून की उल्टियाँ (कै) हो रही थीं और उन्हें रात भर नींद नहीं आती थी।
शिवरानी देवी का संघर्ष – डायरी में उस दृश्य का भी आभास मिलता है जहाँ शिवरानी देवी, प्रेमचंद के गिरते स्वास्थ्य को देख उन्हें लिखने से रोकने की कोशिश करती थीं। वे कई बार उनकी खाट के चारों ओर चक्कर काटतीं और उनके सिर को सहलाती रहती थीं ताकि उन्हें थोड़ा आराम मिल सके।
एक कलाकार का आदर्श – चतुर्वेदी जी के अनुसार, यह डायरी और इसमें वर्णित चित्र आने वाली पीढ़ियों के कलाकारों को सदैव प्रोत्साहित करता रहेगा कि एक सच्चा साहित्यकार अपनी अंतिम सांस तक अपने कर्म के प्रति कैसे अडिग रहता है।
प्रश्न – शिवरानी देवी ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व के किन तीन गुणों पर विशेष बल दिया है?
उत्तर – ईमानदारी, सच्चाई और सादगी
शिवरानी देवी जी ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व को दर्शाते समय ईमानदारी, सच्चाई और सादगी को आधार बनाया है।
ईमानदारी और सच्चाई (Honesty and Truthfulness) – शिवरानी देवी ने पुस्तक की भूमिका (‘दो शब्द’) में स्पष्ट किया है कि उन्होंने इस जीवनी को लिखते समय सबसे अधिक ध्यान ईमानदारी और सच्चाई पर दिया है। उन्होंने घटनाओं को सजाने या उनमें कोई बनावट लाने की कोशिश नहीं की, बल्कि जैसे-जैसे उन्हें याद आता गया, वे ज्यों की त्यों लिखती गईं। उनका मानना था कि यदि वे प्रेमचंद के गुणों का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन करतीं, तो उनके चरित्र की विशालता का सही परिचय नहीं मिल पाता। बनारसीदास चतुर्वेदी ने भी इसकी प्रशंसा करते हुए कहा है कि शिवरानी देवी ने बड़ी स्पष्टता और ईमानदारी से प्रेमचंद के घरेलू जीवन को चित्रित किया है।
सादगी (Simplicity) – प्रेमचंद का पूरा जीवन सादगी का उदाहरण था। वे स्वयं को एक ‘मजदूर’ कहते थे और उन्हें अपना काम खुद करने में कभी शर्म महसूस नहीं होती थी।
वे अक्सर अपनी धोती खुद ही धो लेते थे। इलाहाबाद में छात्र जीवन के दौरान, वे स्वयं अपने लिए रोटियाँ पकाते थे। वे आडंबर और दिखावे के सख्त विरोधी थे। जब उनके घर में 50 रुपये का फर्नीचर आया, तब भी वे ज़मीन पर बैठकर ही काम करना पसंद करते थे। उनका कहना था कि वे एक मजदूर हैं और उन्हें मोटा-झोटा खाना और पहनना ही पसंद है; उनकी ‘गद्दी’ तो ज़मीन ही है।
मानवीय त्रुटियों का स्वीकार – सच्चाई के प्रति शिवरानी देवी की निष्ठा इतनी गहरी थी कि उन्होंने प्रेमचंद की कमियों और त्रुटियों को भी नहीं छिपाया। बनारसीदास चतुर्वेदी के अनुसार, जीवनी में जिस तरह प्रकाश और छाया का संतुलन होता है, वैसे ही इसमें खूबियों के साथ-साथ उनकी मानवीय कमजोरियों का भी उल्लेख है, जिससे यह चित्र और भी सजीव हो उठा है।
प्रश्न – प्रेमचंद के अनुसार साहित्य का मुख्य उद्देश्य क्या होना चाहिए?
उत्तर – मनुष्य की भावनाओं को परिष्कृत करना और समाज का विकास करना। प्रेमचंद साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि समाज सुधार और आत्मिक विकास का एक अत्यंत शक्तिशाली माध्यम मानते थे।
साहित्य, समाज और राजनीति का अंतर्संबंध – प्रेमचंद का मानना था कि साहित्य, समाज और राजनीति एक ही माला के तीन मनकों की तरह हैं जो हमेशा साथ-साथ चलते हैं। उनका एक प्रसिद्ध विचार था कि “जिस भाषा का साहित्य अच्छा होगा, उसका समाज भी अच्छा होगा”। उनके अनुसार, जब साहित्य के प्रभाव से समाज अच्छा बनेगा, तो वहाँ की राजनीति भी मजबूरन अच्छी हो जाएगी।
परिवर्तन का ‘बीज’ – उन्होंने साहित्य को इन तीनों चीज़ों (साहित्य, समाज और राजनीति) की उत्पत्ति के लिए एक ‘बीज’ के समान माना है। उनका विश्वास था कि साहित्य और समाज का संबंध बिल्कुल अटल है और साहित्य ही समाज की दिशा तय करता है।
मानवीय भावनाओं का परिष्कार – प्रेमचंद के अनुसार, साहित्य मनुष्य के विकास का साधन है क्योंकि यह आदमी की भावनाओं को ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ बनाने की शक्ति रखता है। मनुष्य अपनी इन्हीं भावनाओं के आधार पर जीवन जीता है, इसलिए साहित्य का कार्य उन भावनाओं को परिष्कृत करना है ताकि समाज में श्रेष्ठता आए।
गरीबों और शोषितों का सुधार – प्रेमचंद का मानना था कि ‘बड़े आदमियों’ का ध्यान गरीबों की समस्याओं की ओर बहुत कम जाता है। उन्होंने साहित्य को एक ऐसा ‘जरिया’ माना जिससे इन उपेक्षित समस्याओं को सुधारा जा सके।
साहित्यिक निष्ठा का उदाहरण – उनके उपन्यास ‘प्रेमाश्रम’ का मुख्य उद्देश्य भी यही था कि मजदूर और किसान सुखी हों और साहित्य के माध्यम से उनमें उत्साह का संचार हो। वे स्वयं को ‘कलम का मजदूर’ कहते थे, जिसका कार्य समाज के कल्याण के लिए लिखना है।
प्रश्न – प्रेमचंद ने अपनी दूसरी पत्नी (शिवरानी देवी) के साथ किस सामाजिक प्रथा का विरोध किया था?
उत्तर – विधवा विवाह निषेध
प्रेमचंद का साहसिक निर्णय – प्रेमचंद के मन में विधवाओं की दुर्दशा के प्रति गहरी सहानुभूति थी। जब शिवरानी देवी के पिता (मुंशी देवीप्रसाद) ने उनकी खुशी के लिए उनके पुनर्विवाह का विज्ञापन (इश्तिहार) निकाला, तो प्रेमचंद ने स्वयं पत्र लिखकर उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा।
समाज और परिवार का विरोध – प्रेमचंद जानते थे कि एक विधवा से विवाह करने का उनका निर्णय समाज और उनके रिश्तेदारों को स्वीकार नहीं होगा। समाज के इस ‘विधवा विवाह निषेध’ के बंधन को तोड़ने के लिए उन्होंने अपनी बहादुरी (दिलेरी) का परिचय देते हुए अपने घरवालों तक को इस विवाह की सूचना नहीं दी थी। शिवरानी देवी के पिता उनकी इसी स्पष्टवादिता और साहस से बहुत प्रभावित हुए थे।
आदर्श और व्यवहार का मेल – प्रेमचंद केवल साहित्य में ही सुधारवादी नहीं थे, बल्कि उन्होंने अपने जीवन में भी उन सिद्धांतों को उतारा। उन्होंने समाज को यह संदेश दिया कि विधवाओं को भी सम्मानजनक जीवन जीने और दोबारा घर बसाने का पूरा अधिकार है।
साहित्यिक प्रेरणा – उनके कई उपन्यासों और कहानियों में विधवाओं की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया गया है। उदाहरण के लिए, उन्होंने अपनी बहन की स्थिति को देखते हुए ‘बेटोंवाली विधवा’ जैसी कहानियाँ लिखीं और समाज में विधवाओं के अधिकारों की वकालत की।
प्रश्न – शिवरानी देवी ने ‘प्रेमचंद : घर में’ जीवनी के लिए सामग्री कैसे एकत्रित की?
उत्तर – स्वयं के अनुभवों और प्रेमचंद के साथ बिताए जीवन की यादों से
तीस वर्षों का साथ – शिवरानी देवी ने अपनी भूमिका (‘दो शब्द’) में स्पष्ट किया है कि वे और प्रेमचंद तीस वर्षों से अधिक समय तक ‘एक ही नाव के यात्री’ रहे थे। उन्होंने जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख-दुख और संघर्षों को साथ-साथ जिया था। यही दीर्घकालिक साथ इस पुस्तक की सामग्री का मुख्य स्रोत बना।
स्मृति-आधारित लेखन – उन्होंने इस जीवनी के लिए सामग्री अपनी याददास्त (memory) से एकत्रित की। उन्होंने लिखा है कि जैसे-जैसे उन्हें घटनाएँ याद आती गईं, वे उन्हें लिखती गईं। उन्होंने घटनाओं को साहित्यिक रूप से सजाने या उनमें अपनी तरफ से कुछ भी जोड़ने के बजाय उन्हें ‘ज्यों की त्यों’ (जैसा हुआ वैसा ही) प्रस्तुत करने का प्रयास किया।
दैनिक वार्तालाप और जीवंत संवाद – पुस्तक की एक बड़ी विशेषता इसमें शामिल संवाद (dialogues) हैं। बनारसीदास चतुर्वेदी के अनुसार, ये वार्तालाप इतने स्वाभाविक हैं कि वे पाठक पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। ये संवाद उनके बीच हुए वास्तविक झगड़ों, बहसों और चर्चाओं की स्मृतियों से लिए गए हैं, जो प्रेमचंद के मानवीय रूप को उजागर करते हैं।
घरेलू जीवन की झाँकियाँ – शिवरानी देवी ने प्रेमचंद के सार्वजनिक जीवन के बजाय उनके घरेलू जीवन (domestic life) की छोटी-छोटी झाँकियों को एकत्रित किया। इसमें उनके खाने-पीने की आदतें, बच्चों के प्रति उनका व्यवहार, मित्रों के साथ गपशप और यहाँ तक कि उनकी आर्थिक तंगी के प्रसंग भी शामिल हैं।
ईमानदारी और सच्चाई – सामग्री जुटाते समय उन्होंने केवल प्रेमचंद की खूबियों को ही नहीं, बल्कि उनकी कमियों और मानवीय भूलों को भी शामिल किया। उन्होंने इसे एक ‘कर्तव्य’ की तरह लिया ताकि दुनिया प्रेमचंद की ‘आदमियत’ (मानवता) को जान सके।
निजी पत्र और डायरी – यद्यपि मुख्य आधार यादें थीं, लेकिन पुस्तक में प्रेमचंद द्वारा उन्हें लिखे गए पत्रों और उनकी डायरी (जैसे 25 जून 1936 की डायरी) का भी संदर्भ मिलता है, जो सामग्री को और अधिक प्रमाणिक बनाते हैं।
प्रश्न – प्रेमचंद के जीवन में ‘लमही’ और ‘कानपुर’ के बीच का संबंध किस वर्ष में प्रगाढ़ हुआ?
उत्तर – 1905 के लगभग
शिवरानी देवी द्वारा लिखित जीवनी के आधार पर, 1905 के लगभग का समय प्रेमचंद के जीवन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ था। यह वह काल था जब उन्होंने अपने विद्यार्थी जीवन के संघर्षों को पीछे छोड़कर एक पेशेवर शिक्षक और एक सामाजिक क्रांतिकारी के रूप में अपनी पहचान बनानी शुरू की।
इलाहाबाद से कानपुर का प्रस्थान – 1904 में इलाहाबाद से एंट्रेंस (मैट्रिक) की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद, प्रेमचंद दिसंबर 1904 में कानपुर आ गए। यहाँ उन्हें तीस रुपये मासिक वेतन पर ‘मास्टर’ (शिक्षक) की नौकरी मिली, जिससे उनके जीवन में पहली बार थोड़ी आर्थिक स्थिरता आई।
शिवरानी देवी से विवाह (1905) – स्पष्ट उल्लेख है कि सन् 1905 में प्रेमचंद का विवाह शिवरानी देवी के साथ हुआ। यह विवाह लमही और कानपुर के बीच के संबंध को प्रगाढ़ बनाने वाली सबसे प्रमुख घटना थी। शिवरानी देवी फतेहपुर ज़िले की थीं, लेकिन विवाह के बाद वे प्रेमचंद के साथ कानपुर में रहने लगीं।
सामाजिक विद्रोह – यह विवाह एक ‘विधवा-विवाह’ था, जो उस समय के समाज में एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी कदम था। प्रेमचंद ने लमही में अपने रूढ़िवादी परिवार को इस विवाह की सूचना नहीं दी थी, क्योंकि वे जानते थे कि वहाँ इसका विरोध होगा। यह कानपुर में उनके स्वतंत्र और प्रगतिशील जीवन की शुरुआत थी, जबकि लमही उनकी पारिवारिक जड़ों का केंद्र बना रहा।
पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ – भले ही वे कानपुर में नौकरी कर रहे थे, लेकिन उनका जुड़ाव लमही से निरंतर बना रहा। वे अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा (इलाहाबाद में रहते समय 10 में से 7 रुपये) लमही में अपने परिवार की सहायता के लिए भेजते थे। कानपुर की नौकरी ने उन्हें वह सामर्थ्य दिया कि वे लमही में रह रही अपनी विमाता और सौतेले भाई का बोझ उठा सकें।
साहित्यिक यात्रा का विस्तार – इसी कालखंड में कानपुर में रहते हुए उनकी मुलाकात क्रांतिकारी पत्रकार गणेशशंकर विद्यार्थी जैसे मित्रों से हुई और उन्होंने उर्दू में ‘नवाबराय’ के नाम से अपनी प्रसिद्ध रचनाएँ (जैसे ‘सोज़े-वतन’) लिखना शुरू किया, जिसने उन्हें एक राष्ट्रीय पहचान दी।
प्रश्न – शिवरानी देवी ने प्रेमचंद की किस कमजोरी का उल्लेख निष्पक्षता से किया है?
उत्तर – अत्यधिक उदारता और आर्थिक प्रबंधन में ढिलाई
प्रबंधन शक्ति का अभाव – जीवनी की श्रद्धांजलि में बनारसीदास चतुर्वेदी ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि प्रेमचंद में ‘प्रबन्ध-शक्ति’ (Management Skill) की कमी थी। उनमें वह ‘लौह-दृढ़ता’ (Iron firmness) नहीं थी जो एक साधारण मनुष्य को दुनिया के चालाक लोगों का शिकार बनने से बचाती है।
दूसरों की सहायता में स्वयं का नुकसान – प्रेमचंद की उदारता की कोई सीमा नहीं थी। वे अक्सर अपनी ज़रूरतों को मारकर दूसरों की मदद करते थे-
एक बार एक व्यक्ति ने उनसे झूठ बोला कि उसका कोट चोरी हो गया है। प्रेमचंद ने उसे तुरंत १५ रुपये दे दिए, जबकि उस समय उनके अपने घर में तंगी थी।
एक अन्य व्यक्ति को नौकरी पाने के लिए 100 रुपये की जमानत राशि की ज़रूरत थी। प्रेमचंद ने शिवरानी देवी से कहकर उसे 100 रुपये दिलवा दिए, यह जानते हुए भी कि वे रुपये वापस नहीं आएंगे।
आर्थिक हिसाब-किताब में ढिलाई – प्रेमचंद को पैसों का हिसाब रखने से नफरत थी। वे अक्सर अपने प्रेस और घर के खर्चों का हिसाब नहीं रखते थे। उन्होंने स्वयं शिवरानी देवी से कहा था— “रुपयों के झंझट से तो मुझे बरी रखो… मुझसे तुम पाई-पाई का हिसाब ले लो और मुझे इस हरदम की किचकिच से दूर रखो”।
लोगों द्वारा शोषण – उनकी ‘सिधाई’ (सरलता) का लोग अक्सर फायदा उठाते थे। शिवरानी देवी उन्हें टोकती थीं कि “सारा ज़माना तो आपको ठग लेता है,” लेकिन प्रेमचंद इसे अपना कर्तव्य मानते थे कि जो उनके पास सहायता के लिए आए, उसे वे खाली हाथ न भेजें।
शिवरानी देवी का नियंत्रण – प्रेमचंद की इस ‘कमजोरी’ को देखते हुए शिवरानी देवी ने धीरे-धीरे घर और प्रेस के आर्थिक प्रबंधन की पूरी ज़िम्मेदारी अपने हाथों में ले ली। वे प्रेमचंद से पैसे लेकर उन्हें जमा करती थीं ताकि भविष्य के संकटों से बचा जा सके, जिसे प्रेमचंद हँसते हुए “चोरी” कहते थे।
साहित्यिक और मानवीय दृष्टिकोण – प्रेमचंद का मानना था कि वे एक ‘मजदूर’ हैं और मजदूरों की समस्याओं को सुलझाना उनकी ज़िम्मेदारी है, भले ही इसके लिए उन्हें अपना साहित्यिक कार्य रोकना पड़े।
प्रश्न – प्रेमचंद के बचपन की ‘कान काटने’ वाली शरारत का ज़िक्र किस अध्याय में है?
उत्तर – बचपन
पहले अध्याय ‘बचपन’ में प्रेमचंद की इस प्रसिद्ध शरारत का वर्णन मिलता है
शरारत का संदर्भ – एक बार बचपन में प्रेमचंद अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर ‘नाई-नाई’ (नाई का खेल) खेल रहे थे।
घटना – खेल-खेल में प्रेमचंद ‘नाई’ बने थे। वे एक अन्य लड़के की हजामत बनाने का अभिनय कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने बाँस की एक कमानी (पट्टी) का उपयोग औज़ार के रूप में किया। हजामत बनाते समय गलती से उन्होंने उस लड़के का कान ही काट लिया, जिससे खून बहने लगा।
पकड़े जाना – जब उस घायल लड़के की माँ ने चिल्लाते हुए प्रेमचंद की माँ (आनंदी देवी) से शिकायत की, तो प्रेमचंद डर के मारे खिड़की के पास जाकर छिप गए। उनकी माँ ने उन्हें देख लिया और उन्हें पकड़कर चार झापड़ (थप्पड़) रसीद कर दिए।
प्रेमचंद का तर्क – सजा मिलने पर भी प्रेमचंद ने बड़े मासूम और शरारती अंदाज़ में अपनी सफाई दी। जब माँ ने पूछा कि कान क्यों काटा, तो उन्होंने कहा— “मैंने उसके कान नहीं काटे, बल्कि बाल बनाए हैं”। माँ के यह कहने पर कि कान से खून बह रहा है, उन्होंने उत्तर दिया कि सभी बच्चे इसी तरह खेल रहे थे।
सीख – अंत में उन्होंने माँ से वादा किया कि वे आगे से ऐसा खतरनाक खेल कभी नहीं खेलेंगे।
प्रश्न – प्रेमचंद ने अपने जीवन में कुल कितने उपन्यास लिखे थे (पूर्ण और अपूर्ण मिलाकर)?
उत्तर – लगभग एक दर्जन
साहित्यिक यात्रा का प्रारंभ – प्रेमचंद का पहला छोटा उपन्यास ‘कृष्णा’ था, जिसे उन्होंने इलाहाबाद में अपने छात्र जीवन के कठिन दिनों (1902–1904) के दौरान लिखा था। उनका दूसरा उपन्यास ‘प्रेमा’ था, जिसका नाम बाद में बदलकर ‘विभव’ रखा गया।
‘सेवा-सदन’ – इसे उन्होंने समाज की जटिलताओं को सुलझाने के उद्देश्य से लिखा था।
‘प्रेमाश्रम’ – यह उपन्यास सन् 1922 में छपा था। इसे लिखते समय वे काफी बीमार थे, फिर भी उन्होंने लेखन जारी रखा। इसका मुख्य उद्देश्य मजदूरों और किसानों की समस्याओं को उजागर करना था।
‘रंगभूमि’ – सन् 1924 के दौरान यह उपन्यास छप रहा था।
अंतिम और अधूरा उपन्यास – प्रेमचंद का अंतिम उपन्यास ‘मंगल-सूत्र’ है। इसे वे अपने जीवन के अंतिम दिनों में अत्यंत अस्वस्थ होने के बावजूद रात-रात भर जागकर लिख रहे थे। उनकी मृत्यु (8 अक्टूबर 1936) के कारण यह उपन्यास अपूर्ण रह गया।
उद्देश्य और विषय – प्रेमचंद के अनुसार उपन्यास केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि समाज सुधार के लिए होने चाहिए। उनके उपन्यासों के केंद्र में अक्सर किसान, मजदूर और शोषित वर्ग के लोग होते थे।
भाषा का प्रयोग – वे अपने उपन्यासों को अक्सर उर्दू और हिंदी दोनों में लिखते या अनुवाद करते थे ताकि वे ‘आम जनता’ तक पहुँच सकें।
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