Study Material : माटी की मूरतें सारांश, समीक्षा और प्रश्नोत्तर | Matee kee Mooraten Summary, Review and Q&A नेट-जेआरएफ (NET-JRF) और स्नातक/स्नातकोत्तर (BA/MA) परीक्षाओं की दृष्टि से-
माटी की मूरतें परिचय
रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित ‘माटी की मूरतें’ हिंदी रेखाचित्र साहित्य की एक कालजयी कृति है। इसमें कुल 12 रेखाचित्र संकलित हैं, जो समाज के साधारण, उपेक्षित लेकिन जीवंत पात्रों का चित्रण करते हैं।
संक्षिप्त सारांश
1. रज़िया – यह एक चूड़ीहारिन का रेखाचित्र है। लेखक ने अपने बचपन की यादों से शुरू करते हुए उसके रूप, स्वभाव और कौशल का वर्णन किया है। रज़िया बड़ी होकर एक कुशल और चपल महिला बनती है। समय बीतने पर लेखक उससे पटना में मिलते हैं, और अंत में उसकी पोती को देखते हैं, जो बिलकुल रज़िया जैसी ही दिखती है। यह रेखाचित्र मानवीय संवेदनाओं और समय के चक्र को दर्शाता है।
2. बलदेव सिंह – बलदेव सिंह गाँव के एक बलशाली, स्वाभिमानी और परोपकारी पहलवान का चित्र है। वह बंगाल से लौटकर अपने गाँव की सेवा करना चाहता है। वह न्याय के लिए लड़ता है और एक विधवा की ज़मीन बचाने के लिए लाठियों की जंग आम के पेड़ वाले विवाद में शामिल होता है। अंत में, कुछ कायरों द्वारा घात लगाकर उसकी हत्या कर दी जाती है, जो एक वीर की दुखद मृत्यु को दर्शाता है।
3. सरजू भैया – सरजू भैया लेखक के पड़ोसी हैं, जो अत्यंत दुबले-पतले लेकिन बहुत हँसोड़ और मिलनसार हैं। वे अपनी सारी संपत्ति दूसरों की मदद में लुटा देते हैं। अपनी सादगी और भोलेपन के कारण वे एक सूदखोर महाजन द्वारा ठगे भी जाते हैं। वे निस्वार्थ सेवा और मानवीय अच्छाई के प्रतीक हैं।
4. मंगर – मंगर एक स्वाभिमानी, ईमानदार और मेहनती खेतिहर मजदूर (हलवाहा) है। वह काम में बहुत निपुण है, लेकिन स्वभाव से अक्खड़ है और किसी का अपमान नहीं सहता। उसे अपने बैलों से गहरा लगाव है। वृद्धावस्था में वह बीमारी और कंगाली से जूझता है, जहाँ उसकी पत्नी भकोलिया उसका सहारा बनती है।
5. रूपा की आजी – गाँव के लोग इन्हें ‘डायन’ समझते थे, क्योंकि इनके परिवार के कई सदस्यों की अकाल मृत्यु हो गई थी। लोग उनके अंधविश्वास के कारण उनसे डरते थे। लेखक ने दिखाया है कि वे वास्तव में एक ममतामयी महिला थीं, जो बच्चों से बहुत प्यार करती थीं। उनकी मृत्यु बहुत ही दुखद होती है जब भीड़ उन्हें डायन समझकर दौड़ाती है और वे कुएँ में गिर जाती हैं।
6. देव – देव लेखक के बचपन का साथी है, जो बहुत ही साहसी और निडर है। बचपन में अमरूदों के लिए हाथ तुड़वाने या साँप से लड़ने की उसकी कहानियाँ उसकी निर्भीकता दर्शाती हैं। बड़ा होकर वह स्वतंत्रता सेनानी बनता है, और जेल में पुलिस की भयानक प्रताड़ना को बिना आह भरे सहता है।
7. बालगोबिन भगत – वे एक कबीरपंथी गृहस्थ साधु हैं। वे खेती-बाड़ी करते हुए हमेशा कबीर के पदों को गाते रहते हैं। जब उनके इकलौते बेटे की मृत्यु होती है, तो वे शोक मनाने के बजाय उत्सव मनाते हैं क्योंकि आत्मा परमात्मा से मिल गई है। वे अपनी विधवा पतोहू का पुनर्विवाह कराकर सामाजिक सुधार की मिसाल पेश करते हैं।
8. भाभी – यह लेखक की अपनी भाभी का रेखाचित्र है, जो घर में खुशियों का स्रोत थीं। संयुक्त परिवार के बिखरने पर उनके स्वभाव में कड़वाहट आती है और लेखक से उनका विवाद भी होता है। लेकिन बाहरी दुनिया के खिलाफ वे अपने देवर के प्रति हमेशा सुरक्षात्मक और प्रेमपूर्ण रहती हैं।
9. परमेसर – परमेसर एक फक्कड़, शौकीन और आवारा किस्म का पात्र है, जिसने अपनी सारी पैतृक संपत्ति गांजे और मौज-मस्ती में उड़ा दी। लेकिन गाँव के हर उत्सव (होली, दशहरा) में वह जान फूँक देता था। उसकी मृत्यु गाँव को नीरस कर देती है, क्योंकि वह सबको हँसाने वाला पात्र था।
10. बैजू मामा – बैजू मामा एक “आदतन चोर” हैं, जिन्होंने अपने जीवन के 30 साल पटना जेल में बिताए। वे कोई खूंखार अपराधी नहीं, बल्कि एक कोमल हृदय वाले व्यक्ति हैं, जिन्हें जेल के पौधों से लगाव है। उनकी छोटी-छोटी इच्छाएँ (जैसे होली पर जेल के पुए खाना) उनके मानवीय पक्ष को उजागर करती हैं।
11. सुभान खाँ – सुभान खाँ एक राजमिस्त्री हैं, और सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक हैं। वे कट्टर नमाजी हैं। लेकिन लेखक को अपने पोते जैसा प्यार करते हैं। जब गाँव में कुर्बानी को लेकर दंगा होने की संभावना होती है, तो वे मस्जिद के दरवाजे पर खड़े होकर अपनी कुर्बानी देने की बात कहते हैं ताकि शांति बनी रहे।
12. बुधिया – यह रेखाचित्र स्त्री जीवन के विभिन्न चरणों का वर्णन करता है। बचपन में वह मिट्टी के खिलौने बनाती है, जवानी में वह चपल और अल्हड़ है। लेकिन अंत में लेखक उसे गरीबी और गृहस्थी के बोझ तले दबी एक असहाय महिला के रूप में देखते हैं, जो अपने कई बच्चों का पालन-पोषण कर रही है। यह मातृत्व की वंदना का रेखाचित्र है।
समीक्षा
रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित ‘माटी की मूरतें’ हिंदी रेखाचित्र साहित्य की एक आधारस्तंभ कृति है।
1. रचना की पृष्ठभूमि और उद्देश्य
बेनीपुरी जी ने इस संग्रह के रेखाचित्रों की रचना हजारीबाग सेंट्रल जेल के एकांतवास के दौरान की थी। लेखक का मुख्य उद्देश्य इतिहास के उपेक्षित, साधारण और ग्रामीण पात्रों को साहित्य के केंद्र में लाना था। वे कहते हैं कि हम राजा-रानी और बड़े नेताओं की जीवनियाँ तो पढ़ते हैं, लेकिन अपने गाँव की ‘बुधिया’, ‘मंगर’ या ‘बालगोबिन भगत’ जैसे जीवंत पात्रों को भूल जाते हैं।
2. शीर्षक की सार्थकता – “माटी की मूरतें”
इस संग्रह का शीर्षक प्रतीकात्मक है। लेखक के अनुसार ये पात्र मिट्टी के बने हैं, मिट्टी पर आधारित हैं और इसीलिए “जिंदगी से सराबोर” हैं। बेनीपुरी जी का मानना है कि ये रेखाचित्र बौद्ध या ग्रीक-रोमन मूर्तियों की तरह केवल बाहरी सुंदरता के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि ये साधारण मिट्टी के वे पुतले हैं जिन्होंने अपने असाधारण मानवीय गुणों के कारण ‘देवत्व’ प्राप्त कर लिया है।
3. विधागत विशेषता – ‘कहानी नहीं, जीवनी’
बेनीपुरी जी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि ये “कहानियाँ नहीं, जीवनियाँ हैं”। वे इन पात्रों को चलते-फिरते आदमियों के ‘शब्द-चित्र’ मानते हैं। रेखाचित्र विधा की यह विशेषता है कि इसमें लेखक बहुत कम शब्दों में पात्र की ‘मूल रेखाओं’ को इस तरह उभारता है कि उसका संपूर्ण व्यक्तित्व पाठक के सामने सजीव हो उठता है।
4. प्रमुख पात्र और चारित्रिक विविधता
संकलन में कुल 12 रेखाचित्र हैं, जिनमें मानवीय संवेदनाओं के अलग-अलग रंग देखने को मिलते हैं-
सामाजिक समरसता – ‘सुभान खाँ’ का चरित्र सांप्रदायिक सद्भाव का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है, जो मस्जिद के दरवाजे पर बैठकर दंगा रोकने के लिए अपनी कुर्बानी देने को तैयार हो जाते हैं।
कर्मयोग और भक्ति – ‘बालगोबिन भगत’ एक कबीरपंथी साधु हैं जो गृहस्थ होकर भी कबीर के पदों को जीते हैं और संगीत के माध्यम से आत्मा-परमात्मा के मिलन का संदेश देते हैं।
साहस और वीरता – ‘बलदेव सिंह’ पहलवान की वीरता और ‘देव’ जैसे स्वतंत्रता सेनानी का अदम्य साहस और प्रताड़ना सहने की शक्ति उनके चरित्र को महान बनाती है।
श्रम का सौंदर्य – ‘मंगर’ के रेखाचित्र में लेखक ने शारीरिक श्रम से बने “काले-कलूटे” लेकिन “सुविकसित” शरीर को वास्तविक सौंदर्य माना है।
5. मानवीय संवेदना और यथार्थवाद
लेखक ने समाज की कुरीतियों और मानवीय विवशताओं का मार्मिक चित्रण किया है-
अंधविश्वास – ‘रूपा की आजी’ के माध्यम से समाज द्वारा ‘डायन’ करार दी गई एक ममतामयी वृद्धा की त्रासदी दिखाई गई है।
गरीबी और अपराध – ‘बैजू मामा’ के माध्यम से लेखक यह सवाल उठाते हैं कि क्या परिस्थितियों के कारण की गई छोटी चोरियाँ किसी व्यक्ति को वास्तव में अपराधी बनाती हैं।
6. भाषा-शैली और शिल्प
बेनीपुरी जी की भाषा चित्रात्मक और भावात्मक है। वे शब्दों के माध्यम से दृश्य उपस्थित करने में माहिर हैं। उनकी शैली में एक विशेष प्रकार की ‘लयात्मकता’ है, जैसा कि बालगोबिन भगत के संगीत या रज़िया के बचपन के वर्णन में दिखता है। वे कला का उद्देश्य जीवन को छिपाना नहीं बल्कि उसे उभारना मानते हैं।
निष्कर्ष
परीक्षा की दृष्टि से ‘माटी की मूरतें’ केवल रेखाचित्रों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह भारतीय ग्रामीण जीवन का सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक दस्तावेज है। इसमें साधारण जनों के भीतर छिपी असाधारणता को प्रतिष्ठित किया गया है, जो इसे नेट-जेआरएफ और उच्च शिक्षा की परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।
प्रश्नोत्तर जेआरएफ (NET-JRF)
प्रश्न. रामवृक्ष बेनीपुरी के शब्द-चित्रों के संग्रह ‘माटी की मूरतें’ का प्रथम प्रकाशन वर्ष क्या है?
उत्तर- वर्ष 1946 (दिवाली के समय)।
प्रश्न. ‘माटी की मूरतें’ में कुल कितने शब्द-चित्र (रेखाचित्र) संकलित हैं?
उत्तर- कुल 12 शब्द-चित्र।
प्रश्न. लेखक ने ‘माटी की मूरतें’ की रचना किस स्थान पर रहते हुए की थी?
उत्तर- हजारीबाग सेंट्रल जेल के एकांत जीवन में।
प्रश्न. ‘माटी की मूरतें’ की विषय-वस्तु किन लोगों के जीवन पर आधारित है?
उत्तर- गाँव के साधारण और उपेक्षित ग्रामीण पात्रों पर।
प्रश्न. बेनीपुरी जी के अनुसार, कला का वास्तविक कार्य क्या है?
उत्तर- जीवन को छिपाना नहीं, बल्कि उसे उभारना।
प्रश्न. रेखाचित्र: रज़िया | रज़िया के बचपन की वेशभूषा की मुख्य विशेषता क्या थी?
उत्तर- चाँदी की बालियाँ, हैकल, कंगन और बूटेंदार कमीज पहनना।
प्रश्न. रज़िया के बचपन की यादों में वह लेखक के घर किसलिए आती थी?
उत्तर- अपनी माँ के साथ चूड़ियाँ बेचने के लिए।
प्रश्न. लेखक ने रज़िया के गाँव में उसकी शादी के बारे में क्या तर्क दिया है?
उत्तर- मुसलमानों के गाँव में ही शादी हो जाती है, इसलिए वह लंबे समय तक गाँव में ही रही।
प्रश्न. रज़िया के पति का नाम क्या था?
उत्तर- हसन।
प्रश्न. बड़े होने पर रज़िया के व्यवसाय में क्या बदलाव आया?
उत्तर- वह चूड़ियों के साथ पाउडर और क्लिप जैसी आधुनिक चीज़ें भी बेचने लगी।
प्रश्न. रेखाचित्र: बलदेव सिंह | लेखक ने बलदेव सिंह की तुलना किन ऐतिहासिक व्यक्तित्वों से की है?
उत्तर- शेरशाह और शिवाजी से।
प्रश्न. बलदेव सिंह की मृत्यु का प्रमुख कारण क्या था?
उत्तर- धोखे से कायरों द्वारा किया गया प्राणघातक हमला।
प्रश्न. बलदेव सिंह की शारीरिक बनावट और स्वभाव कैसा था?
उत्तर- सैनिक जैसा भीमकाय शरीर और बच्चों जैसा निरीह स्वभाव।
प्रश्न. बलदेव सिंह की वीरता का प्रदर्शन किस शस्त्र के माध्यम से होता था?
उत्तर- लाठी और गँड़ासे के कुशल संचालन द्वारा।
प्रश्न. लेखक ने बलदेव सिंह की मृत्यु के दृश्य का वर्णन करते हुए ‘वीरगति’ के लिए किस शब्द का प्रयोग किया है?
उत्तर- सूर्यमंडल को भेदकर अमरपुरी जाना।
प्रश्न. रेखाचित्र: सरजू भैया | सरजू भैया की तुलना लेखक ने शेक्सपियर के किस नाटक के पात्र से की है?
उत्तर- ‘द मर्चेंट ऑफ वेनिस’ के शाइलॉक (सूदखोर महाजन के संदर्भ में) से।
प्रश्न. सरजू भैया के जीवन की सबसे बड़ी विडंबना क्या थी?
उत्तर- उनके केवल पाँच बेटियाँ थीं और वंश चलाने के लिए पुत्र नहीं था।
प्रश्न. सरजू भैया महाजन के चंगुल में कैसे फँस गए?
उत्तर- संकोचवश बिना कागज़ पढ़े और रुपए बाँधने के कारण अँगूठा लगा देने से।
प्रश्न. सरजू भैया का हृदय उनके _____ के ही परिमाण का था।
उत्तर- लंबे शरीर।
प्रश्न. सरजू भैया की पत्नी की मृत्यु किस अधूरी इच्छा के साथ हुई?
उत्तर- बेटा पाने के अरमान के साथ।
प्रश्न. रेखाचित्र: मंगर | मंगर की कार्यक्षमता दूसरों की तुलना में कितनी अधिक थी?
उत्तर- वह दूसरों के 10 कट्ठा खेत के मुकाबले 15 कट्ठा खेत जोत लेता था।
प्रश्न. मंगर की पत्नी का नाम क्या था?
उत्तर- भकोलिया।
प्रश्न. लेखक ने मंगर के काले शरीर की सुंदरता की तुलना किससे की है?
उत्तर- प्राकृतिक व्यायाम के हिमायती मिस्टर मूलर की आकृति से।
प्रश्न. मंगर के चरित्र की मुख्य विशेषता क्या थी?
उत्तर- कठोर परिश्रम, ईमानदारी और स्वाभिमानी स्वभाव।
प्रश्न. मंगर के अनुसार ‘अच्छी जोत’ की पहचान क्या है?
उत्तर- ऐसी महीन जोत जिसमें पहली चास में ही सिराऊ मिलना मुश्किल हो।
प्रश्न. रेखाचित्र: रूपा की आजी | गाँव वाले रूपा की आजी को क्या समझते थे?
उत्तर- डायन (जादू-टोना करने वाली)।
प्रश्न. रूपा की आजी की शारीरिक बनावट कैसी थी?
उत्तर- लंबी-गोरी और रौबदार, पुरुषों जैसा ढाँचा।
प्रश्न. गाँव वालों के अनुसार रूपा की आजी ने अपने परिवार के साथ क्या किया था?
उत्तर- माना जाता था कि वह अपने ससुर, पति, बेटे और पतोहू को खा गई।
प्रश्न. रूपा की आजी का असली नाम क्या था (यदि पाठ में उल्लेख है)?
उत्तर- पाठ में उन्हें केवल ‘रूपा की आजी’ के नाम से संबोधित किया गया है।
प्रश्न. रूपा की आजी का अंतिम जीवन कैसा बीता?
उत्तर- अपनी पोती रूपा की शादी करके वह घर छोड़ तीर्थों पर चली गईं।
प्रश्न. रेखाचित्र: देव | देव ने बचपन में किसके बगीचे से ‘विलायती अमरूद’ तोड़े थे?
उत्तर- तपेश्वर भाई के बगीचे से।
प्रश्न. देव ने बचपन में किस खतरनाक जंतु से मुकाबला किया था?
उत्तर- गेहुँअन साँप से।
प्रश्न. देव के व्यक्तित्व में गांधीवादी प्रभाव किस रूप में दिखा?
उत्तर- 20-22 मील दूर से खादी मँगाकर पहनने और आंदोलन से जुड़ने में।
प्रश्न. जेल में देव की पिटाई करने वाले इंस्पेक्टर की शारीरिक विशेषता क्या थी?
उत्तर- पाँच हाथ का भीमकाय शरीर।
प्रश्न. लेखक ने दुनिया में कितने ‘वीर’ बताए हैं (लोक मान्यता के अनुसार)?
उत्तर- साढ़े तीन वीर (भैंसा, सूअर, गेहुँअन साँप और आधा राजा रामचंद्र)।
प्रश्न. रेखाचित्र: बालगोबिन भगत | बालगोबिन भगत किस धार्मिक विचारधारा के अनुयायी थे?
उत्तर- कबीरपंथी (साहब के भक्त)।
प्रश्न. बालगोबिन भगत के गायन का प्रमुख वाद्य यंत्र क्या था?
उत्तर- खँजरी।
प्रश्न. लेखक ने बालगोबिन भगत के संगीत को क्या संज्ञा दी है?
उत्तर- सन्नाटे में कौंध उठने वाली बिजली और सोए संसार को जगाने वाला संगीत।
प्रश्न. बालगोबिन भगत की संगीत साधना का चरमोत्कर्ष कब देखा गया?
उत्तर- भादों की अँधेरी आधी रात में मूसलाधार वर्षा के बाद।
प्रश्न. रेखाचित्र: भाऊजी | लेखक ने भारतीय परिवार में ‘भाऊजी’ के स्थान की तुलना किससे की है?
उत्तर- मरुभूमि (रेगिस्तान) में ‘ओयसिस’ (नखलिस्तान) से।
प्रश्न. भाऊजी के आने से लेखक के नीरस घर में कैसा परिवर्तन आया?
उत्तर- घर आनंदकुंज बन गया और विनोद-व्यंग्य का वातावरण छा गया।
प्रश्न. भाऊजी के देहावसान के बाद लेखक की पत्नी उन्हें क्या मानती थी?
उत्तर- उनके दोनों बच्चों की ‘धर्म की माँ’।
प्रश्न. रेखाचित्र: परमेसर | परमेसर की मृत्यु किस कारण हुई?
उत्तर- अतिसार (पेचिश) के कारण, जो कच्चे शकरकंद खाने से हुआ था।
प्रश्न. परमेसर किस प्रकार के लोक-गायन के लिए प्रसिद्ध थे?
उत्तर- होरी (होली के गीत) गाने के लिए।
प्रश्न. परमेसर के चरित्र को लेखक ने क्या कहा है?
उत्तर- आवारा, लेकिन दूसरों को रोशनी देने वाली आग जैसा।
प्रश्न. रेखाचित्र: बैजू मामा| बैजू मामा का ‘अपराध’ क्या था?
उत्तर- वे एक नामी चोर (चोट्टा) थे।
प्रश्न. बैजू मामा को जेल का जीवन बाहर के जीवन से अधिक प्रिय क्यों था?
उत्तर- क्योंकि जेल में उनके लगाए और सींचे हुए फलों के पेड़-पौधे थे।
प्रश्न. बैजू मामा की रिहाई की तिथि किस त्योहार के दिन पड़ी थी?
उत्तर- होली के दिन।
प्रश्न. रेखाचित्र: सुभान खाँ | सुभान खाँ पेशे से क्या थे?
उत्तर- एक कुशल राजमिस्त्री।
प्रश्न. सुभान खाँ ने मस्जिद बनाने के लिए इमारती लकड़ी कहाँ से प्राप्त की?
उत्तर- लेखक (रामवृक्ष बेनीपुरी) के ही बगीचे से।
प्रश्न. सुभान खाँ ने साम्प्रदायिक तनाव के दौरान मस्जिद में क्या संकल्प लिया था?
उत्तर- कि वे अपनी कुर्बानी दे देंगे, लेकिन मस्जिद में गाय की कुर्बानी नहीं होने देंगे।
प्रश्न. सुभान खाँ द्वारा मस्जिद के उद्घाटन पर हिंदुओं के सत्कार के लिए क्या प्रबंध किया गया था?
उत्तर- हिंदू हलवाई द्वारा बनाई गई मिठाइयाँ और पान-इलायची।
प्रश्न. लेखक ने ‘माटी की मूरतें’ के पात्रों को ‘आसमानी देवता’ न मानकर क्या माना है?
उत्तर- गाँव के साधारण व्यक्ति जो अपने असाधारण कर्मों से देवत्व प्राप्त कर गए।
प्रश्न. रामवृक्ष बेनीपुरी की भाषा शैली को ‘माटी की मूरतें’ के संदर्भ में क्या कहा जा सकता है?
उत्तर- चित्रात्मक, ओजपूर्ण और भावप्रवण गद्य।
प्रश्न. पाठ के अनुसार, गाँव के चौपालों पर रखी ‘मिट्टी की मूरतें’ किनकी प्रतीक हैं?
उत्तर- गाँव के उन लोगों की जिन्होंने जीवन में देवत्व प्राप्त किया।
प्रश्न. रज़िया के बचपन के दृश्य में लेखक उसे क्या खाते हुए देखता है?
उत्तर- छठ के ठेकुए और कसार।
प्रश्न. बलदेव सिंह की मृत्यु पर मक्खियाँ कहाँ भिनभिना रही थीं?
उत्तर- उनके उस ललाट पर जिससे कभी तेज बरसता था।
प्रश्न. सरजू भैया के अनुसार, महाजन द्वारा अँगूठा लगवाने की घटना उनके लिए कैसी थी?
उत्तर- स्वयं को गिरवी रखने जैसी।
प्रश्न. मंगर का शरीर ‘काला-कलूटा’ होते हुए भी लेखक को कैसा लगा?
उत्तर- अत्यंत खूबसूरत और सुविकसित।
प्रश्न. रूपा की आजी के बारे में ओझाओं और तांत्रिकों ने क्या दावे किए थे?
उत्तर- कि वे उसे नंगा नचाएंगे और खून उगलवाएंगे।
प्रश्न. देव के हाथ की हड्डी टूटने पर उसकी प्रतिक्रिया क्या थी?
उत्तर- बिना आह-उफ किए लेखक से अमरूद जेब से निकालने को कहना।
प्रश्न. बालगोबिन भगत के गायन के समय कौन से पक्षी या जीव शोर मचाते थे?
उत्तर- झिल्ली (झींगुर) और दादुर (मेंढक)।
प्रश्न. भाऊजी के घर आने पर लेखक ने किस त्योहार की रौनक का वर्णन किया है?
उत्तर- होली, विजयादशमी और दिवाली की।
प्रश्न. परमेसर के आवारागर्दी के पीछे लेखक ने क्या सकारात्मक पक्ष देखा?
उत्तर- वह दूसरों को हँसाने और मनोरंजन करने के लिए ही दुनिया में आया था।
प्रश्न. बैजू मामा ने जेल के पेड़ों की सेवा कैसे की?
उत्तर- पौधे रोपना, थालों में पानी देना और निकौनी करना।
प्रश्न. सुभान खाँ की दाढ़ी का वर्णन लेखक ने किस रूप में किया है?
उत्तर- सफेद और चमकती हुई दाढ़ी।
प्रश्न. रामवृक्ष बेनीपुरी को किस उपनाम से जाना जाता है?
उत्तर- कलम का जादूगर।
प्रश्न. ‘माटी की मूरतें’ शब्द-चित्र संकलन में बेनीपुरी जी ने किस बोली के शब्दों का प्रयोग प्रचुरता से किया है?
उत्तर- खड़ी बोली के साथ-साथ ग्रामीण देशज शब्दों और मुहावरों का।
प्रश्न. बलदेव सिंह के मारे जाने से पहले उनके शिष्यों ने क्या किया?
उत्तर- वे धीरे-धीरे वहाँ से रवाना हो गए ताकि विधवा पर बोझ न रहे।
प्रश्न. मंगर की कार्यक्षमता का रहस्य क्या था?
उत्तर- लगातार मेहनत से उभरी हुई उसकी मांसपेशियाँ।
प्रश्न. रूपा की आजी के चरित्र का मानवीय पक्ष लेखक ने कब पहचाना?
उत्तर- जब उन्होंने देखा कि वह पोती के लिए सर्वस्व बेचकर तीर्थ पर चली गईं।
प्रश्न. देव के राजनीतिक विचारों में बदलाव का श्रेय लेखक किसे देते हैं?
उत्तर- स्वयं लेखक के साथ हुई देश-दशा की चर्चाओं को।
प्रश्न. बालगोबिन भगत कबीर के गीतों के अलावा और क्या गाते थे?
उत्तर- वे साहब के पदों को गाते थे।
प्रश्न. भाऊजी के रेखाचित्र में लेखक ने किस सामाजिक बुराई पर अप्रत्यक्ष प्रहार किया है?
उत्तर- भारतीय जीवन के नीरस और आनंदहीन ढाँचे पर।
प्रश्न. परमेसर के अनुसार, उधार खाने वालों से पैसा वसूलना कैसा काम था?
उत्तर- कंटाह (कठिन) काम, जैसे पीपल बनकर दूसरों की छाती पर उगना।
प्रश्न. बैजू मामा ने जेल में किन-किन फलों के पेड़ लगाए थे?
उत्तर- आम, अमरूद, नीम और जामुन।
प्रश्न. सुभान खाँ की हज यात्रा के बाद उनके विचारों में क्या परिवर्तन आया?
उत्तर- वे और भी अधिक शांतिप्रिय और साम्प्रदायिक सद्भाव के समर्थक हो गए।
प्रश्न. ‘माटी की मूरतें’ के पात्रों का चयन लेखक ने कहाँ से किया है?
उत्तर- अपने गाँव और ननिहाल की स्मृतियों से।
प्रश्न. बेनीपुरी जी के रेखाचित्रों की मुख्य विशेषता क्या है?
उत्तर- पात्रों का सजीव चित्रण और मानवीय संवेदना का मार्मिक अंकन।
प्रश्न. रेखाचित्र: बुधिया | यह पात्र संकलन के किस स्थान पर आता है?
उत्तर- यह संकलन का अंतिम (12वाँ) शब्द-चित्र है।
प्रश्न. लेखक ने ‘माटी की मूरतें’ की भूमिका में 1953 के नवीन संस्करण में किस पात्र को जोड़ने का उल्लेख किया है?
उत्तर- रज़िया को।
प्रश्न. बलदेव सिंह की मृत्यु के समय लेखक ने समाज के किस पक्ष को ‘बुजदिल’ कहा है?
उत्तर- धोखे से घात लगाकर हमला करने वाले ‘सियारों’ को।
प्रश्न. सरजू भैया की आर्थिक तबाही का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर- बाढ़ और भूकंप द्वारा खेत-घर की बर्बादी और उनकी अत्यधिक उदारता।
प्रश्न. मंगर के रेखाचित्र में ‘भकोलिया’ का व्यक्तित्व कैसा है?
उत्तर- मंगर की आदर्श जोड़ी, जो मेहनत में उसका साथ देती थी।
प्रश्न. रूपा की आजी के सफेद कपड़ों और लालिमा युक्त आँखों से क्या झलकता था?
उनका स्वाभाविक रौब और तेज।
विस्तार पूर्वक प्रश्नोत्तर
प्रश्न.1 बलदेव सिंह की मृत्यु का प्रमुख कारण क्या था?
उत्तर – रामवृक्ष बेनीपुरी की कृति ‘माटी की मूरतें’ में बलदेव सिंह का रेखाचित्र एक वीर नायक की दुखद अंत की गाथा है। उनकी मृत्यु को “कायरों द्वारा धोखे से किया गया हमला” इसलिए कहा जाता है, क्योंकि उनके दुश्मनों में उन्हें आमने-सामने की लड़ाई में हराने का साहस नहीं था।
1. पृष्ठभूमि: निर्बलों के रक्षक
बलदेव सिंह एक अत्यंत शक्तिशाली पहलवान थे, जो बंगाल के राजा के दरबार में पहलवानी करने के बाद अपने पैतृक गाँव लौटे थे। वे स्वभाव से बहुत ही सरल, मिलनसार और परोपकारी थे। उनकी मृत्यु का मुख्य कारण एक विधवा की सहायता करना था। उस विधवा के पट्टिदारों ने उसका संपत्ति हड़प ली थी। जब वह विधवा रोती हुई बलदेव सिंह के पास आई, तो उन्होंने उसे न्याय दिलाने का वचन दिया और उसके साथ उसके गाँव चले गए।
2. विवाद और न्याय
बलदेव सिंह ने विधवा के खेतों पर हल चलवाए और उसकी अमराई पर उसका कब्ज़ा वापस दिलाया। उन्होंने अपनी लाठी के बल पर और अपने प्रभाव से पट्टिदारों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। जब मामला शांत होता दिखा, तो उन्होंने अपने शिष्यों को वापस भेज दिया ताकि विधवा पर अधिक खर्च का बोझ न पड़े।
3. धोखे से घात लगाकर हमला
बलदेव सिंह के दुश्मन जानते थे कि वे उन्हें निष्पक्ष लड़ाई में कभी नहीं जीत सकते। इसलिए उन्होंने तब हमला किया जब बलदेव सिंह सबसे असहाय स्थिति में थे-
निहत्थे होना – बलदेव सिंह की आदत बहुत तड़के (मुँह-अंधेरे) शौच के लिए गाँव से दूर जाने की थी। उस दिन वे पूरी तरह निहत्थे थे और उनके हाथ में केवल एक लौटा था।
अकेले पाकर हमला – जब वे एक नीची खाई में बैठे थे, तब कायरों के एक झुंड ने, जिन्हें लेखक ने “सियारों” की संज्ञा दी है, उन पर हमला कर दिया।
क्रूरता – निहत्थे होने के बावजूद बलदेव सिंह ने हार नहीं मानी और अपने पीतल के लौटे को ही ढाल की तरह इस्तेमाल किया, लेकिन हथियारों के प्रहार से वह लौटा चूर-चूर हो गया। उन पर लाठियों, गँड़ासों और बरछों से चारों ओर से वार किए गए।
4. मृत्यु का वीभत्स रूप
जब बलदेव सिंह की लाश मिली, तो वह अत्यंत क्षत-विक्षत स्थिति में थी। उनका सिर चूर-चूर कर दिया गया था, एक आँख बाहर निकल आई थी, कंधा गँड़ासे के वार से कटकर लटक गया था और पेट की सारी आँतें बाहर निकल आई थीं।
5. लेखक की दृष्टि में “कायरता”
लेखक बेनीपुरी जी स्पष्ट करते हैं कि यदि बलदेव सिंह किसी “शेर” (वीर योद्धा) से लड़ते हुए मारे जाते, तो उन्हें कोई अफ़सोस नहीं होता। लेकिन उन्हें इस बात का दुःख था कि कुछ कायरों और बुजदिलों ने छिपकर, घात लगाकर और निहत्थे व्यक्ति पर हमला किया। उनकी मृत्यु एक योद्धा की वीरगति तो थी, लेकिन उनके हत्यारों का कृत्य घोर कायरता और कुकर्म था
प्रश्न 2. परमेसर किस प्रकार के लोक-गायन के लिए प्रसिद्ध थे?”
रामवृक्ष बेनीपुरी के रेखाचित्र ‘परमेसर’ में परमेसर को गाँव के उत्सवों और लोक-गायन की जान के रूप में चित्रित किया गया है। यद्यपि वे एक “आवारा” और “फक्कड़” पात्र थे, लेकिन लोक-गायन, विशेषकर होरी (होली के गीत) के प्रति उनका समर्पण अद्वितीय था। परमेसर के गायन और इस विषय पर विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है-
1. गायन की तैयारी और उत्साह
परमेसर के लिए गायन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक साधना थी। जैसे ही खेतों में सरसों के पीले फूल दिखाई देते, परमेसर ‘होरी’ गाना शुरू कर देते थे। वे होली के त्यौहार के लिए महीनों पहले से तैयारी करते थे, जैसे:-
अपने ‘डफ’ (एक प्रकार का वाद्य यंत्र) पर नया चमड़ा चढ़वाना।
झाल में नई डोरियाँ लगवाना और ढोलक की मरम्मत करवाना।
त्यौहार के लिए पैसे बचाकर रखना ताकि उत्सव में कोई कमी न रहे।
2. डफ वादन और नृत्य
परमेसर केवल गाते नहीं थे, बल्कि वे गायन और वादन में पूरी तरह डूब जाते थे। लेखक के अनुसार गाते समय उनके हाथ डफ पर ताल देते थे, लेकिन उनका अंग-अंग गाता और बजता प्रतीत होता था।
वे अपनी ‘होली-मंडली’ के केंद्र-बिंदु थे। उनके बिना गाँव की होली अधूरी मानी जाती थी।
नशे की मस्ती और अबीर से सराबोर होकर वे इस कदर नाचते और गाते थे कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे।
3. अन्य लोक-कलाओं में निपुणता
केवल होरी ही नहीं, परमेसर अन्य लोक-विधाओं में भी माहिर थे-
चैता – होली के बाद वे ‘चैता’ (चैत मास के गीत) भी बड़ी तन्मयता से गाते थे।
स्वांग (लोक-नाटक) – वे होली और मेलों में तरह-तरह के ‘स्वांग’ (वेश बदलकर अभिनय करना) रचते थे, जिससे लोगों का भरपूर मनोरंजन होता था।
दशहरा और ओझा गायन – दशहरे के दौरान वे गाँव में ओझाओं को इकट्ठा कर ‘भूत खिलाने’ (एक लोक अनुष्ठान) और उससे जुड़े विशेष गीतों का आयोजन करते थे।
4. जीवन का दर्शन
परमेसर का गायन उनके जीवन दर्शन से जुड़ा था। वे अपनी पैतृक संपत्ति लुटाने और गरीबी में जीने के बावजूद हमेशा मस्त रहते थे। उनके दरवाजे पर हमेशा ढोलक और झाल की आवाज सुनाई देती थी। मृत्यु के समय भी उनके होठों पर “मालिक हैं सिताराम, सोच मन काहे करे” जैसा दार्शनिक पद था, जो उनके निर्भीक और फक्कड़ स्वभाव को दर्शाता है।
निष्कर्षत – परमेसर का लोक-गायन (होरी) केवल संगीत नहीं था, बल्कि वह गाँव की जीवंतता और सामूहिक उल्लास का प्रतीक था। उनकी मृत्यु के बाद गाँव के उत्सव नीरस हो गए, क्योंकि लोक-कला का वह उत्साह उनके साथ ही समाप्त हो गया
प्रश्न 3 – रेखाचित्र ‘बैजू मामा’ में बैजू मामा का ‘अपराध’ क्या था?”
उत्तर – रामवृक्ष बेनीपुरी के रेखाचित्र ‘बैजू मामा’ में बैजू मामा का ‘अपराध’ तकनीकी रूप से चोरी था, लेकिन लेखक ने इसे एक सामान्य अपराधी की कहानी के बजाय एक अत्यंत मानवीय और मर्मस्पर्शी दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है।
1. आदतन लेकिन ‘मामूली’ चोर
बैजू मामा पटना जेल के एक ऐसे “नामी चोर” थे जिन्होंने अपने जीवन के लगभग 30 साल जेल में बिताए थे। हालांकि, वे कोई खूंखार डाकू या पेशेवर अपराधी नहीं थे। लेखक के अनुसार, उन्होंने 30 साल की जेल उन चोरियों के लिए काटी, जिनकी कुल कीमत शायद 30 रुपये भी नहीं होगी। वे कभी कोई बड़ी चोरी नहीं कर पाए और न ही उन्होंने कोई गिरोह बनाया।
2. अपराध की शुरुआत – मजबूरी और विवशता
बैजू मामा का पहला अपराध एक किसान की मजबूरी से उपजा था। उन्हें खेती के लिए बैल की जरूरत थी और उनके पास रुपये नहीं थे। उन्होंने गंगा पार से एक बैल चुराने की कोशिश की, लेकिन अपनी घबराहट और मासूमियत के कारण वे पकड़े गए। यहीं से उनके जेल जाने का सिलसिला शुरू हुआ, जो ताउम्र चलता रहा।
3. अपराध और आत्मसम्मान का चक्र
बैजू मामा जब भी जेल से छूटते, वे खाली हाथ अपने घर (भतीजों के पास) नहीं जाना चाहते थे। वे सोचते थे कि कम से कम 30 रुपये जमा करके एक गाय खरीद लें, ताकि घर वाले यह न कहें कि “यह बुड्ढा कहाँ से आ गया?” इसी ‘इज्जत’ को बचाने और 30 रुपये जुटाने के लिए वे छोटी-मोटी चोरियाँ करते जैसे – होटल से लोटा चुराना, मंदिर से कंबल या वकील साहब की शॉल और हर बार पकड़े जाते।
4. जेल के प्रति ‘अजीब’ लगाव
बैजू मामा का एक ‘अपराध’ यह भी था कि वे जेल को ही अपना घर समझने लगे थे। उन्हें जेल के उन पेड़-पौधों से गहरा लगाव था जिन्हें उन्होंने खुद लगाया और सींचा था।
एक बार उनकी रिहाई होली के दिन हो रही थी, जिस दिन जेल में ‘पुए’ और ‘खीर’ बनते हैं।
रिहाई के बाद, सिर्फ जेल के पुए खाने की इच्छा में उन्होंने उसी शाम फिर से एक बैल चुराने का नाटक किया और चिल्लाकर खुद को पकड़वा लिया ताकि वे वापस जेल जा सकें।
5. लेखक की दृष्टि में ‘अपराधी’ बैजू मामा
लेखक ने दर्शाया है कि बैजू मामा स्वभाव से चोर नहीं, बल्कि परिस्थितियों के मारे एक सरल हृदय व्यक्ति थे। वे अदालत में कभी झूठ नहीं बोलते थे और अपने अपराध को स्वीकार कर लेते थे। बेनीपुरी जी सवाल उठाते हैं कि क्या ऐसे व्यक्ति को ‘अपराधी’ की श्रेणी में रखना सही है, जिसने मानवता और प्रकृति (पेड़-पौधों) से इतना गहरा प्रेम किया हो।
निष्कर्षत- बैजू मामा का अपराध केवल कानून की नजर में चोरी था, लेकिन वास्तव में वह उनकी गरीबी, अकेलेपन और सामाजिक तिरस्कार के भय का परिणाम था।
प्रश्न 3- मंगर का शरीर ‘काला-कलूटा’ होते हुए भी लेखक को कैसा लगा?
रामवृक्ष बेनीपुरी के रेखाचित्र ‘मंगर’ में लेखक ने मंगर के शारीरिक सौन्दर्य का जो वर्णन किया है, वह परंपरागत गोरेपन के सौंदर्य बोध को चुनौती देता है। लेखक उसे एक “कलाकार की दृष्टि” से देखते हैं और उसके गठीले शरीर की सराहना करते हैं।
1. रंग बनाम बनावट (गढ़न)
लेखक स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि मंगर का रंग “काला-कलूटा” था, लेकिन इसके बावजूद वे उसे “अत्यंत खूबसूरत” मानते हैं। बेनीपुरी जी उन लोगों की सौंदर्य-रुचि पर सवाल उठाते हैं जो केवल गोरेपन (रंगसाज़ी) को ही सुंदरता समझते हैं। उनके लिए मंगर का शरीर “एक संपूर्ण सुविकसित मानव-पुतले का उत्कृष्ट नमूना” था।
2. स्वाभाविक मांस-पेशियों का विकास
मंगर एक हलवाहा था और दिन-भर कठिन परिश्रम करता था। इस लगातार मेहनत ने उसके शरीर को एक विशेष सुडौलपन दिया था-
संतुलित उभार – उसकी मांस-पेशियों में पहलवानों जैसा कृत्रिम या बेडौल उभार नहीं था।
सटीकता – उसकी जाँघें, छाती और भुजाएँ—सब में जहाँ जितनी और जैसी “गढ़न और उभार” की आवश्यकता होनी चाहिए, ठीक वैसी ही थी।
सुडौलता – उसके शरीर में न तो कहीं मांस का अतिरिक्त लोथड़ा था और न ही वह सूखी लकड़ी की तरह था।
3. प्राकृतिक व्यायाम का आदर्श
लेखक मंगर के शरीर की तुलना प्राकृतिक व्यायाम के हिमायती ‘मिस्टर मूलर’ की सुडौल आकृतियों से करते हैं। मंगर का शरीर केवल दिखावे के लिए नहीं था, बल्कि वह उसकी कार्यक्षमता और शक्ति का प्रतीक था। वह कंधे पर हल लेकर और आगे बैलों की जोड़ी को हाँकते हुए जब खेतों की ओर जाता था, तो वह एक जीवंत मूर्ति जैसा प्रतीत होता था।
4. कलाकार की दृष्टि
बेनीपुरी जी कहते हैं कि वे मंगर के इस “काले-कलूटे” लेकिन “खूबसूरत” शरीर के वर्णन के लिए माफी नहीं माँगेंगे। उनके अनुसार, श्रम से तपा हुआ और सुविकसित शरीर ही वास्तविक सौंदर्य है। मंगर का शरीर “गढ़न” का ऐसा बेजोड़ नमूना था कि वह किसी भी कलाकार को मंत्रमुग्ध कर सकता था।
निष्कर्षत- मंगर का शरीर उसकी ईमानदारी, कठिन श्रम और किसान जीवन की सादगी का प्रतिबिंब था, जिसे लेखक ने बुद्ध या ग्रीक मूर्तियों की तरह ही कलात्मक और पूजनीय माना है।
प्रश्न 4 – देव के हाथ की हड्डी टूटने पर उसकी प्रतिक्रिया क्या थी?
उत्तर – रामवृक्ष बेनीपुरी के रेखाचित्र ‘देव’ में यह घटना देव के अदम्य साहस और उसकी सहनशक्ति को दर्शाने वाला एक अत्यंत प्रभावशाली प्रसंग है-
1. घटना की पृष्ठभूमि – अमरूद की चोरी
लेखक और देव बचपन के साथी थे। गाँव में तपेसर भाई के बगीचे में एक ‘विलायती अमरूद’ का पेड़ था, जिसके फल बहुत ही स्वादिष्ट और आकर्षक थे। तपेसर भाई उसकी कड़ी रखवाली करते थे। एक दिन लेखक के उकसाने पर देव उस पेड़ से अमरूद तोड़ने के लिए चोरी-छिपे बगीचे में घुसा और गिलहरी की तरह फुर्ती से पेड़ पर चढ़ गया।
2. ऊँचाई से गिरना और चोट
अमरूद तोड़ने के लालच में देव एक बहुत ही पतली और लचीली डाली पर चला गया। डाली उसका बोझ नहीं सह सकी और ‘अरर-अरर’ करके टूट गई, जिससे देव धम्म से जमीन पर गिर पड़ा। आवाज सुनकर तपेसर भाई लाठी लेकर दौड़े, लेकिन देव हड्डी टूटने के बावजूद तुरंत खड़ा हुआ और अपनी जान बचाकर वहाँ से भाग निकला।
3. हड्डी टूटने पर अविश्वसनीय प्रतिक्रिया
जब लेखक दूसरी राह से जाकर देव से मिले, तो उन्होंने देखा कि देव के कोट की दोनों जेबें अमरूद से भरी थीं। लेखक ने गौर किया कि देव का बायाँ हाथ निर्जीव होकर झूल रहा था। वह कोहनी के पास से इस तरह टूट गया था कि हाथ के दो टुकड़े हो गए थे जो केवल खाल से जुड़े थे।
लेखक की घबराहट – लेखक यह देखकर काँप गए और बोले कि “तुम्हारी बाँह टूट गई!”।
देव का संयम – देव ने बिना किसी आह (तकलीफ की आवाज) या उफ के बहुत ही सहजता से कहा—”जेब से निकाल लो”। वह चाहता था कि लेखक उसकी जेब से वे अमरूद निकाल लें क्योंकि उसका अपना हाथ काम नहीं कर रहा था।
दर्द के प्रति दृष्टिकोण – जब लेखक ने उससे पूछा कि क्या तुम्हें दर्द नहीं हो रहा, तो देव का जवाब उसके चरित्र की दृढ़ता को स्पष्ट करता है- “होता क्यों नहीं, लेकिन चिल्लाने से क्या दर्द कम हो जाएगा?”।
4. चरित्र का महत्व
यह घटना केवल बचपन की एक शरारत नहीं है, बल्कि देव के उस निडर और साहसी व्यक्तित्व की नींव है जो आगे चलकर उसे एक महान स्वतंत्रता सेनानी बनाता है। लेखक ने दिखाया है कि जिस बालक ने बचपन में हड्डी टूटने पर ‘आह’ तक नहीं की, वही देव बड़ा होकर जेल में पुलिस की भयानक प्रताड़ना, बेंत की मार और बूटों की ठोकरें सहते हुए भी मुस्कराता रहा और उसके मुँह से दर्द की एक चीख तक नहीं निकली।
निष्कर्ष- अमरूद वाली यह घटना देव के उस ‘पत्थर जैसे’ दृढ़ चरित्र का प्रतीक है, जिसे बेनीपुरी जी ने “माटी की मूरत” के रूप में अमर कर दिया है।
प्रश्न 6 – बालगोबिन भगत के गायन के समय कौन से पक्षी या जीव शोर मचाते थे?
उत्तर – रामवृक्ष बेनीपुरी के रेखाचित्र ‘बालगोबिन भगत’ में लेखक ने उनके गायन की शक्ति और प्रभाव को दर्शाने के लिए प्राकृतिक परिवेश का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है। झिल्ली और दादुर का प्रसंग भगत के संगीत की उस निरंतरता को बताता है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी नहीं टूटती।
1. भादों की अर्धरात्रि का परिवेश
लेखक भादों (बरसात के महीने) की एक अँधेरी और तूफानी रात का वर्णन करते हैं, जब मूसलाधार वर्षा अभी-अभी थमी हो। ऐसे समय में जब सारा संसार सो रहा होता है, प्रकृति अपने शोर से जीवंत हो उठती है।
2. जीवों का कोलाहल बनाम भगत का संगीत
रात के उस सन्नाटे में दो मुख्य ध्वनियाँ गूँजती हैं-
झिल्ली (झींगुर) की झंकार – रात में झींगुरों की तेज और तीखी आवाज।
दादुर (मेंढक) की टर्र-टर्र – वर्षा के बाद मेंढकों का समूह में शोर मचाना।
लेखक कहते हैं कि यद्यपि झिल्ली और मेंढकों का यह कोलाहल बहुत भारी होता है, लेकिन यह बालगोबिन भगत के संगीत को अपने शोर में डुबो नहीं सकता। इसका अर्थ है कि भगत का आध्यात्मिक स्वर इतना प्रभावशाली और ऊँचा होता है कि वह प्रकृति के शोर को भी पार कर जाता है।
3. खँझड़ी की थाप और गायन
उस अँधेरी रात में भगत की खँझड़ी (एक छोटा वाद्य यंत्र) ‘डिमिक-डिमिक’ बजने लगती है। वे अपना प्रसिद्ध पद गाते हैं – “गोदी में पियवा, चमक उठे सखिया, चिहुँक उठे ना!” लेखक ने यहाँ एक विरोधाभास दिखाया है—जहाँ सारा संसार निस्तब्धता (चुप्पी) में सोया है, वहाँ भगत का संगीत जाग रहा होता है और दूसरों को भी जगा रहा होता है।
4. संगीत की आध्यात्मिकता
भगत के गायन के समय इन जीवों का शोर केवल एक पृष्ठभूमि की तरह काम करता है। बेनीपुरी जी ने दर्शाया है कि भगत का गायन केवल गला साफ करना नहीं था, बल्कि वह एक आध्यात्मिक साधना थी। जिस तरह आषाढ़ की रिमझिम में उनका स्वर स्वर्ग की ओर जाता प्रतीत होता था, वैसे ही भादों की रातों में वह झींगुरों और मेंढकों के शोर के बीच भी अपनी पवित्रता बनाए रखता था।
निष्कर्ष- झिल्ली और दादुर का उल्लेख यह बताने के लिए किया गया है कि बालगोबिन भगत का संगीत बाहरी दुनिया के शोर से ऊपर था और उनकी भक्ति में किसी भी प्रकार का व्यवधान डालने में असमर्थ था।
प्रश्न 6. बालगोबिन भगत कबीर के गीतों के अलावा और क्या गाते थे?”
रामवृक्ष बेनीपुरी के रेखाचित्र ‘बालगोबिन भगत’ में “साहब के पद” और “कबीर के गीत” वास्तव में एक ही आध्यात्मिक स्रोत से जुड़े हैं। भगत जी के लिए कबीर ही उनके ‘साहब’ (गुरु या आराध्य) थे, इसलिए वे कबीर की रचनाओं को अत्यंत श्रद्धा के साथ गाते थे।
1. ‘साहब’ का अर्थ
बालगोबिन भगत कबीर को अपना ‘साहब’ मानते थे। वे उन्हीं के आदेशों पर चलते थे और उन्हीं के गीतों को गाते थे। उनके लिए ‘साहब’ शब्द का प्रयोग कबीर के प्रति उनकी अटूट आस्था और समर्पण को दर्शाता है। वे अपनी खेती की पैदावार को भी सबसे पहले ‘साहब के दरबार’ (कबीरपंथी मठ) में ले जाते थे और वहाँ से जो ‘प्रसाद’ मिलता था, उसी से गुजारा करते थे।
2. गायन की विशेषता और प्रभाव
भगत जी कबीर के सीधे-सादे पदों को इस प्रकार गाते थे कि वे उनके कंठ से निकलकर सजीव हो उठते थे। उनके गायन में एक ऐसा जादू था जो पूरे गाँव को प्रभावित करता था-
आषाढ़ की रिमझिम में – जब वे खेतों में धान की रोपनी करते हुए गाते थे, तो उनके स्वर के साथ हलवाहों के पैर ताल से उठने लगते थे और रोपनी करने वालों की अँगुलियाँ एक क्रम में चलने लगती थीं।
भादों की आधी रात में – जब सारा संसार सोया होता था, तब भगत जी अपनी खँझड़ी (एक वाद्य यंत्र) बजाकर गाते थे— “गोदी में पियवा, चमक उठे सखिया, चिहुँक उठे ना!”।
3. प्रमुख पद और ऋतु-गायन
भगत जी के गायन का क्रम ऋतुओं के अनुसार चलता था-
प्रभातियाँ – कार्तिक से फागुन तक वे सुबह जल्दी उठकर नदी स्नान के बाद पोखरे के ऊँचे भिंडे पर बैठकर अपनी प्रभातियाँ (सुबह के गीत) गाते थे।
तेरी गठरी में लागा चोर – वे अक्सर कबीर का यह प्रसिद्ध पद गाते थे— “तेरी गठरी में लागा चोर, मुसाफ़िर जाग ज़रा”।
गर्मी की ‘संझा’ – गर्मियों की शाम को वे अपने घर के आँगन में प्रेमियों की मंडली के साथ ‘संझा’ (सांध्य गीत) गाते थे, जहाँ वे गाते-गाते नृत्य भी करने लगते थे।
4. मृत्यु और संगीत का दर्शन
भगत जी के लिए संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्सव था। जिस दिन उनके इकलौते बेटे की मृत्यु हुई, उस दिन भी वे विलाप करने के बजाय कबीर के पद गा रहे थे। उनका मानना था कि आत्मा परमात्मा से मिल गई है, इसलिए यह शोक का नहीं बल्कि उत्सव का समय है। उन्होंने अपनी मृत्यु के अंतिम समय तक गाना नहीं छोड़ा; जिस रात उनकी मृत्यु हुई, उस शाम भी उन्होंने गीत गाए थे, लेकिन सुबह केवल उनका ‘पिंजर’ (पार्थिव शरीर) मिला।
निष्कर्ष- बालगोबिन भगत के लिए कबीर के गीत और साहब के पद उनके जीवन का आधार थे। वे इन पदों के माध्यम से सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर ईश्वर (साहब) की भक्ति में लीन रहते थे।
प्रश्न 6. बेनीपुरी जी के रेखाचित्रों की मुख्य विशेषता क्या है?
रामवृक्ष बेनीपुरी के रेखाचित्रों की मुख्य विशेषता ‘पात्रों का सजीव चित्रण और मानवीय संवेदना का मार्मिक अंकन’ है। उनके संकलन ‘माटी की मूरतें’ के आधार पर इस विषय को निम्नलिखित बिंदुओं में विस्तार से समझा जा सकता है-
1. पात्रों की सजीवता और ‘जिंदगी से सराबोर’ चित्रण
बेनीपुरी जी का मानना है कि उनके पात्र केवल मिट्टी के पुतले नहीं हैं, बल्कि वे “जिंदगी से सराबोर” हैं। वे इन रेखाचित्रों को कहानी नहीं बल्कि “जीवनी” मानते हैं, जो चलते-फिरते आदमियों के शब्द-चित्र हैं।
कला का उद्देश्य – लेखक के अनुसार कला का काम जीवन को छिपाना नहीं बल्कि उसे उभारना है। वे पात्रों की “मूल रेखाओं” को कला के रंगों में खोने नहीं देते, जिससे पाठक को पात्र की वास्तविकता का अनुभव होता है।
उदाहरण – रज़िया के वर्णन में उसकी नीली आँखों और चपलता का ऐसा सजीव वर्णन है कि वह पाठक की आँखों के सामने खड़ी हो जाती है। इसी तरह मंगर के “काले-कलूटे” लेकिन “सुविकसित” शरीर का चित्रण उसे एक जीवंत मूर्ति बना देता है।
2. साधारण पात्रों में देवत्व की खोज
लेखक ने राजा-रानी या बड़े नेताओं के बजाय गाँव के उन साधारण लोगों को चुना है जिन्हें समाज अक्सर उपेक्षित कर देता है। वे कहते हैं कि ये पात्र किसी ‘आसमानी’ या ‘अवतारी’ देवता की मूर्तियां नहीं हैं, बल्कि गाँव के साधारण व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने असाधारण कर्मों से देवत्व प्राप्त कर लिया है।
उदाहरण – बालगोबिन भगत एक साधारण कबीरपंथी किसान हैं, लेकिन उनकी संगीत-साधना और पुत्र की मृत्यु पर उनका आध्यात्मिक दृष्टिकोण उन्हें एक ऊँचा दर्जा देता है।
3. मानवीय संवेदना का मार्मिक अंकन
बेनीपुरी जी के रेखाचित्रों में संवेदना की गहराई तब दिखती है जब वे पात्रों के भीतरी दुखों और संघर्षों को उकेरते हैं। वे समाज की कुरीतियों और पात्रों की व्यक्तिगत त्रासदियों का बहुत ही मर्मस्पर्शी चित्रण करते हैं।
सरजू भैया – वे दूसरों के उपकार के लिए खुद को इतना सुखा देते हैं कि वे केवल हड्डियों का ढाँचा रह जाते हैं। लेखक इसे “शहर के अंदेशे से दुबले काजी जी” की कहावत से जोड़कर उनकी निस्वार्थ संवेदना को प्रकट करते हैं।
रूपा की आजी – समाज उन्हें ‘डायन’ कहकर तिरस्कृत करता है, लेकिन लेखक उनकी ममतामयी संवेदना और बच्चों के प्रति उनके प्रेम को उजागर करते हैं, जो अंत में एक त्रासदी में बदल जाता है।
4. यथार्थवादी और मनोवैज्ञानिक विवरण
लेखक पात्रों के शारीरिक विवरण के साथ-साथ उनके मनोवैज्ञानिक उतार-चढ़ाव का भी अंकन करते हैं।
निष्कर्ष – बेनीपुरी जी की कलम मिट्टी (साधारण जनमानस) को सोना बनाने की कला जानती है। उनके रेखाचित्रों में भाषा केवल माध्यम नहीं है, बल्कि वह पात्रों की आत्मा की धड़कन को पकड़ने का प्रयास करती है, जो पाठकों के हृदय को गहराई से छू लेती है।
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