Class 10 (NIOS) चित्रकला (Painting) अध्याय 7: घनवाद, अतियथार्थवाद तथा अमूर्त कला | Cubism, Surrealism, and Abstract Art
प्रमुख पश्चिमी कला आंदोलनों जैसे अमूर्त कला, घनवाद और अतियथार्थवाद के विकास पर केंद्रित है। इसमें पाब्लो पिकासो के योगदान की चर्चा की गई है, जिन्होंने अपनी विभिन्न कला अवधियों के माध्यम से घनवाद को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई। साल्वाडोर डाली जैसे कलाकारों के माध्यम से अतियथार्थवाद को समझाया गया है, जो अवचेतन मन और स्वप्न जैसी आकृतियों को चित्रित करते थे। साथ ही, वेसिली कांडिंस्की को अमूर्त कला के प्रणेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिन्होंने पारंपरिक आकृतियों के स्थान पर रेखाओं और रंगों को स्वतंत्र महत्व दिया। लेख का उद्देश्य इन शैलियों की विशेषताओं, प्रमुख कृतियों और आधुनिक कला के इतिहास में उनके स्थायी प्रभाव को स्पष्ट करना है।
यह अध्याय 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में कला के क्षेत्र में आए क्रांतिकारी परिवर्तनों और तीन प्रमुख कला आंदोलनों—घनवाद, अतियथार्थवाद और अमूर्त कला—के बारे में विस्तार से बताता है।
1. घनवाद (Cubism)
घनवाद चित्रकला और मूर्तिकला की एक ऐसी शैली है जिसकी शुरुआत 1907 में पेरिस में हुई थी।
- प्रमुख अवधारणा: इस शैली के नायक सेज्यां (Cezanne) थे, जिनका मानना था कि प्रकृति की हर वस्तु को बेलन (cylinder) या गोले (sphere) के रूप में देखा जाना चाहिए।
- कलाकार: इस आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण कलाकारों में पाब्लो पिकासो (Picasso), ब्राक (Braque) और लेज (Leger) के नाम प्रमुख हैं।
- विशेषताएँ: इन कलाकारों ने भावनाओं के बजाय संरचना और आकार पर अधिक जोर दिया। इसमें वस्तुओं को छोटे-छोटे अंशों में विभाजित कर दिया जाता था और उन्हें ज्यामितीय आकारों (जैसे घन) में बदल दिया जाता था। पिकासो के अनुसार, वास्तविकता प्रकृति से भी अधिक वास्तविक होती है जिसे उन्होंने अपने तरीके से परिभाषित किया।
मुख्य चित्र: ‘मैन विद वॉयलिन’ (Man with Violin)
- कलाकार: पाब्लो पिकासो (1912)।
- विवरण: यह चित्र घनवाद के विश्लेषणात्मक अध्ययन का बेहतरीन उदाहरण है। इसमें एक व्यक्ति को वॉयलिन पकड़े हुए दिखाया गया है, लेकिन उसे विभिन्न ज्यामितीय आकारों में तोड़कर फिर से टुकड़ों में इकट्ठा किया गया है। इसमें भूरे और हरे रंगों के मिश्रण का सुंदर प्रयोग किया गया है।
2. अतियथार्थवाद (Surrealism)
यह आंदोलन 1924 से 1955 तक चला, जो दादावादी (Dadaist) विद्रोह के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ था।
- प्रमुख अवधारणा: ये कलाकार अचेतन मन (subconscious mind) की कल्पनाओं और मनोविश्लेषण से प्रभावित थे। वे अपने चित्रों में सपनों या दुःस्वप्नों जैसे दृश्यों को चित्रित करते थे।
- कलाकार: जॉर्जियो डी चिरिको और साल्वाडोर डाली (Salvador Dali) इस विचारधारा के प्रसिद्ध कलाकार हैं।
- विशेषताएँ: इनके चित्रों में विषय-वस्तु अजीबोगरीब, बेतुकी और विचित्र होती थी जो वास्तविकता से दूर लगती थी।
मुख्य चित्र: ‘परसिस्टेंस ऑफ मेमोरी’ (Persistence of Memory)
- कलाकार: साल्वाडोर डाली (1931)।
- विवरण: यह चित्र युद्ध के बाद की शांति और शून्यता को दर्शाता है। चित्र में पिघलती हुई घड़ियाँ दिखाई गई हैं, जो मानव के अशांत मन और समय के लुप्त होने का प्रतीक हैं। इसमें चींटियों को एक-दूसरे के ऊपर रेंगते हुए दिखाया गया है जो सड़न या क्षय का आभास देती हैं।
3. अमूर्त कला (Abstract Art)
अमूर्त कला का अर्थ है ऐसी कला जिसमें किसी वास्तविक वस्तु का सीधा रूप दिखाई नहीं देता। इसकी शुरुआत लगभग 1910 में हुई थी।
- प्रमुख अवधारणा: कलाकार समकालीन संसार को वास्तविक रूप में चित्रित करने के बजाय अमूर्त विचारों को रूप देने का प्रयास करते थे।
- कलाकार: कांडींस्की (Kandinsky), डेलारुने और मोंड्रियन इसके पुरोगामी कलाकार माने जाते हैं।
- कांडींस्की का वर्गीकरण: उन्होंने अपनी कला को तीन श्रेणियों में बाँटा: i) प्रभाववाद, ii) कामचलाऊ प्रबंधन, और iii) संयोजन कला।
मुख्य चित्र: ‘ब्लैक लाइन्स’ (Black Lines)
- कलाकार: वैसिली कांडींस्की (1913)।
- विवरण: इस चित्र में काली रेखाओं और रंगीन धब्बों का प्रयोग किया गया है। रेखाएँ और आकार इस प्रकार चित्रित हैं जैसे किसी कंकाल में मांस ही न हो। रंगीन धब्बे ऐसे लगते हैं जैसे उन्हें ब्रश के बजाय हाथों की उंगलियों से बनाया गया हो। कांडींस्की के लिए रंगों और रेखाओं का अपना स्वतंत्र अस्तित्व और अर्थ होता था।
निष्कर्ष
इन तीनों आंदोलनों ने पश्चिमी कला की बुनियाद को बदल दिया। हालांकि इनका जन्म पश्चिम में हुआ, लेकिन भारतीय कलाकारों पर भी इनका गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। पिकासो, डाली और कांडींस्की जैसे कलाकारों ने अपनी विशिष्ट शैलियों से कला की आने वाली पीढ़ियों को नई प्रेरणा दी है।
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