Study Material :  भक्ति काल के प्रमुख कवियों के काव्य-रूपों चर्चा विश्वनाथ त्रिपाठी नोट्स

Study Material :  भक्ति काल के प्रमुख कवियों के काव्य-रूपों चर्चा विश्वनाथ त्रिपाठी | A discussion on the poetic forms used by the prominent poets of the Bhakti era by Vishwanath Tripathi.

परिचय (Introduction)

विश्वनाथ त्रिपाठी की पुस्तक के अनुसार भक्तिकाल का साहित्य विविध काव्य-रूपों और शैलियों से समृद्ध है, जो इस काल की लोकोन्मुखता और कलात्मकता को प्रकट करता है। इस काल में काव्य-रूपों का चयन कवियों के दार्शनिक आधार और उनकी अभिव्यक्ति के उद्देश्यों पर निर्भर करता था। भक्तिकाल के प्रमुख कवियों के काव्य-रूपों की चर्चा निम्नलिखित आधारों पर की जा सकती है-

गेयपद परंपरा और मुक्तक काव्य (Lyrical tradition and free verse)

भक्तिकाल में ‘गेयपद’ की परंपरा अत्यंत सुदृढ़ रही है, जिसकी जड़ें सिद्धों और नाथों के साहित्य में मिलती हैं। संत नामदेव, गुरु नानक, कबीर, सूरदास, तुलसीदास और मीराबाई जैसे सभी प्रमुख कवियों ने गेयपदों में रचना की है। ये गेयपद राग-रागिनियों पर आधारित होते थे और इनमें काव्य एवं संगीत का अद्भुत समन्वय पाया जाता था। गेयपदों की पहली पंक्ति अक्सर ‘आवर्ती’ या ‘टेक’ होती थी जो केंद्रीय कथ्य को स्पष्ट करती थी। कबीर की वाणी के संग्रह ‘बीजक’ के ‘सपद’ और ‘रमैनी’ भाग गेयपदों में रचित हैं।

सूरदास के गेयपदों को ‘लीला-पद’ भी कहा जाता है, जिनमें उन्होंने कृष्ण की बाल-चेष्टाओं और प्रेम-लीला का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है। मीराबाई के पद भी इसी श्रेणी में आते हैं, जिनमें उनकी व्याकुलता और समर्पण की निश्छल अभिव्यक्ति मिलती है।

दोहा-चौपाई और कड़वकबद्धता (प्रबंध काव्य)

प्रबंध काव्यों के लिए भक्तिकाल में दोहा-चौपाई और ‘कड़वकबद्धता’ (निश्चित संख्या में चौपाइयों के बाद एक दोहा) की शैली अत्यंत लोकप्रिय रही। इस शैली का विकास मुख्य रूप से सूफी कवियों ने किया, जिनमें मलिक मुहम्मद जायसी का स्थान सर्वोपरि है। जायसी ने ‘पद्मावत’ में मसनवी शैली अपनाई, जहाँ कथा को दोहे-चौपाइयों के क्रम में बांधा गया है। गोस्वामी तुलसीदास ने इसी कड़वकबद्ध ढाँचे को ‘रामचरितमानस’ की रचना के लिए चुना और इसे कलात्मक चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया। हालांकि दोहा-चौपाई की यह परंपरा अपभ्रंश कवि स्वयंभू के ‘पउम चरिउ’ से ही चली आ रही थी। कबीर ने दोहे का प्रयोग उपदेशात्मक शैली में किया, जिसे उनके यहाँ ‘साखी’ कहा जाता है।

कवित्त-सवैया और अन्य छंद रूप

भक्तिकाल में सवैया और कवित्त को हिन्दी के अपने निजी छंदों के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। रसखान सवैया छंद में अत्यंत सिद्धहस्त थे और उनके सवैये अपनी सरलता और प्रवाह के लिए पूरे भक्ति काव्य में बेजोड़ माने जाते हैं। रहीम ने ‘बरवै’ छंद का सफलतापूर्वक प्रयोग किया, जिससे प्रभावित होकर तुलसीदास ने भी ‘बरवै रामायण’ की रचना की। नंददास ने ‘रासपंचाध्यायी’ में रोला छंद का प्रयोग किया है और उनकी पदावली को कोमल एवं सानुप्रासिक माना जाता है। इसके अतिरिक्त छप्पय, भुजंग प्रयात और हरिगीतिका जैसे छंदों का भी भक्तिकालीन कवियों ने व्यापक उपयोग किया।

तुलसीदास का काव्य-वैभव और लोक-रूप

भक्तिकाल के कवियों में तुलसीदास एकमात्र ऐसे कवि हैं जिन्होंने उस समय प्रचलित लगभग सभी काव्य-रूपों का सफलतापूर्वक उपयोग किया। उन्होंने वीरगाथा काल की छप्पय-पद्धति, विद्यापति और सूरदास की गीत-पद्धति, गंग आदि कवियों की कवित्त-सवैया पद्धति और जायसी की दोहा-चौपाई शैली में उत्कृष्ट काव्य रचा। तुलसीदास ने शास्त्रीय काव्य-रूपों के साथ-साथ लोक-साहित्य के रूपों जैसे मंगलकाव्य, नहछू, सोहर और कलयु का भी उपयोग किया, जो विवाह और पुत्र-जन्म के समय लोक में गाए जाते थे। उनकी ‘विनयपत्रिका’ व्यक्तिगत एकांतिक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति की दृष्टि से एक अनूठा भक्तिकाव्य है।

विशेष शैलियाँ: उलटबाँसियाँ और दृष्टकूट

काव्य-रूपों की विविधता के अंतर्गत कबीर की ‘उलटबाँसियाँ’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जो अंतःसाधनात्मक अनुभूतियों को असामान्य प्रतीकों में व्यक्त करती हैं। उलटबाँसियों का पूर्व रूप सिद्धों की ‘संधा भाषा’ में मिलता है। इसी प्रकार सूरदास की रचना ‘साहित्य लहरी’ में ‘दृष्टकूट’ के पद संकलित हैं, जो अपनी अर्थ-जटिलता के कारण काव्य-रूढ़ियों में निबद्ध और दुरूह माने जाते हैं। इस प्रकार भक्तिकाल का साहित्य अपनी रूपात्मक विविधताओं के कारण जन-सामान्य की भावनाओं से लेकर शास्त्रीय कलात्मकता तक के समस्त आयामों को समेटे हुए है।

निर्गुण काव्य: ज्ञानाश्रयी शाखा

भक्ति साहित्य की निर्गुण धारा की दो उपशाखाएँ हैं— ज्ञानाश्रयी शाखा और प्रेमाश्रयी शाखा। ज्ञानाश्रयी शाखा के संतों ने सूफियों की अपेक्षा ‘ज्ञान’ पर अधिक बल दिया है, इसलिए इन्हें ज्ञानाश्रयी कहा जाता है।

यद्यपि इन संतों के यहाँ भगवत्प्रेम की कमी नहीं है, लेकिन वे सूफियों की तरह प्रेम का उतना विशद चित्रण नहीं करते। इस धारा के कवि अधिकांशतः अवर्ण जातियों से थे जिन्होंने वर्ण-व्यवस्था की पीड़ा सही थी, इसलिए इनके काव्य में वर्ण-व्यवस्था पर तीव्र प्रहार मिलता है।

इन संतों पर नाथ-सिद्धों की अंतःसाधना और उनकी दुरूह प्रतीक-शैली ‘उलटबाँसी’ का गहरा प्रभाव है।

इस शाखा में गेयपद, दोहा और चौपाई का प्रयोग अधिक हुआ है, किंतु किसी भी ज्ञानाश्रयी कवि द्वारा रचित कोई प्रसिद्ध प्रबंध-काव्य उपलब्ध नहीं है।

कबीर (1398-1518 ई.) : व्यक्तित्व और दार्शनिक आधार

कबीर का जन्म 1398 ई. में हुआ माना जाता है और उनके जन्म को लेकर कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं, जैसे उनका किसी विधवा ब्राह्मणी के पेट से पैदा होना और लोकलाज के भय से लहरतारा ताल के पास छोड़ दिया जाना, जहाँ से ‘नीरू’ और ‘नीमा’ नामक जुलाहा दंपति ने उन्हें उठाया। कबीर ने स्वयं को कई बार ‘जुलाहा’ कहा है और उनकी मृत्यु 1518 ई. में मगहर (जिला बस्ती) में हुई।

वे प्रसिद्ध आचार्य रामानंद के शिष्य माने जाते हैं, यद्यपि कबीर के ‘राम’ रामानंद के ‘राम’ से भिन्न हैं। कबीर की साधना में वेदांत का अद्वैत, नाथपंथियों की रहस्य-भावना, हठयोग, कुंडलिनी योग, सहज साधना और इस्लाम का एकेश्वरवाद एवं सूफियों का प्रेमभाव सब कुछ समाहित है।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार कबीर जिस ‘वयनजीवी’ (बुनकर) जाति से थे, वह नाथपंथ से प्रभावित थी और बाद में सामूहिक रूप से मुसलमान हुई थी, जिसका प्रभाव कबीर के निराकार भाव और सामाजिक दृष्टिकोण पर स्पष्ट दिखता है।

कबीर की रचनाएँ और भाषा-शैली

कबीर की वाणी का संग्रह ‘बीजक’ कहलाता है, जिसके तीन प्रमुख भाग हैं— रमैनी, सबद और साखी।

रमैनी और सबद ‘गेयपद’ हैं जो तत्कालीन मध्यदेश की काव्य-भाषा ब्रजभाषा में रचित हैं, जबकि साखियाँ ‘दोहा’ छंद में हैं और उनमें पूर्वी प्रयोगों की अधिकता है।

कबीर अपनी कविता में साहसी जन-बोली के ठेट शब्दों का प्रयोग करते थे, जिसके कारण उन्हें ‘वाणी का डिक्टेटर’ कहा जाता है। उनकी ‘उलटबाँसियाँ’ प्रसिद्ध हैं, जो अंतःसाधनात्मक अनुभूतियों को असामान्य प्रतीकों में व्यक्त करती हैं और जिनका मूल सिद्धों की ‘संधा भाषा’ में मिलता है।

कबीर के लिए ज्ञान की आँधी सब कुछ अस्त-व्यस्त कर देने वाली है, इसलिए वे अपने साथ चलने वालों को ‘घर जलाने’ की बात करते हैं, जिसका अर्थ मोह-माया का त्याग है।

सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदना

कबीर केवल एक भक्त नहीं, बल्कि एक महान समाज-सुधारक और क्रांतिकारी रचनाकार थे। उन्होंने वर्णश्रम व्यवस्था, कर्मकांड, छुआछूत और हिंसा को चुनौती दी और शास्त्र के स्थान पर अनुभव, पर्यवेक्षण एवं बुद्धि को निर्णायक माना। वे कथनी और करनी के अंतर को देख पाने वाले यथार्थ-बोध के कवि थे।

कबीर के यहाँ निराकार राम भी मानवीय संबंधों के अवलंबन बनते हैं, जैसे वे उन्हें ‘भरतार’ (पति) या ‘हरिजननी’ (माता) के रूप में याद करते हैं। उनकी कविता में गहरी मानवीयता और सहृदयता मिलती है और वे अपने सादृश्य-विधान (उपमाओं) के लिए जुलाहा, माली, कुम्हार, लोहार और व्याध जैसे अवर्ण जातियों के व्यवसायों का उपयोग करते हैं।

कबीर काल के तीव्र बोध के कवि हैं जो भक्ति को इस काल से बचने का मार्ग बताते हैं और उनकी कविता में करुणा एवं निहत्तापन का अनूठा मेल मिलता है।

कबीर में जीवन के द्वंद्वात्मक पक्ष को समझ लेने की अद्भुत क्षमता थी।

इस परस्पर विरोधिता को न समझने पर कबीर का मर्म नहीं खुलता। जिसे जीना कहा जाता है, वह वस्तुतः जीवित रहने और मृत्यु की ओर निरंतर बढ़ते रहने की प्रक्रिया है। फिर भी लोग कुशल पूछते हैं और कुशल बताते हैं। लोग जीने का केवल एक पक्ष देखते हैं, दूसरा नहीं। कबीर इसपर व्यंग्य करते हैं, हँसते हैं और करुणा करते हैं-

कुसल-कुसल ही पूछते, कुसल रहा न कोय।

जरा मुई न भय मुआ, कुसल कहाँ ते होय।।

कबीर विशाल गतिशील बिंब प्रस्तुत करते हुए आकाश और धरती को चक्की के दो पाट बताते हैं-

चलती चाकी देखकर, दिया कबीरा रोय।

दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय॥

वे समाधि, सत्संग, गुरु-उपदेश, हरिभजन आदि की सुखानुभूति का चित्रण उत्कृष्ट इंद्रियबोधात्मक तीव्रता के साथ करते हैं—

सतगुर हमसूं रीझकर, कहा एक परसंग।

बादर बरसा प्रेम का, भीज गया सब अंग।।

कबीर सादृश्य-विधान प्रायः अवर्ण जातियों के व्यवसाय के आधार पर खड़ा करते हैं। जुलाहा, माली, कुम्हार, लोहार, व्याध, कलवर आदि के व्यवसायों का उपयोग वे प्रायः अलंकार योजना में करते हैं। यह प्रायः सभी कवियों में पाया जाता है।

रैदास (1388-1518)

रैदास भी रामानंद के शिष्य कहे जाते हैं। उन्होंने अपने एक पद में कबीर और सेन का उल्लेख किया है, जिससे स्पष्ट हो जाता है कि वे कबीर से छोटे थे।

धन्ना और मीराबाई ने रैदास का उल्लेख आदरपूर्वक किया है। यह भी कहा जाता है कि मीराबाई रैदास की शिष्या थीं।

रैदास ने अपने को एकाधिक स्थानों पर चमार जाति का कहा है-

कह रैदास खलास चमारा या ऐसी मेरी जाति विख्यात चमारा।

रैदास काशी के आसपास के थे। रैदास के पद आदि गुरुग्रंथ साहब में संकलित हैं। कुछ फुटकल पद सतबानी में भी मिलते हैं।

रैदास की भक्ति का ढाँचा निर्गुणवादियों का ही है,  उसके बाद भी उनका स्वर कबीर जैसा आक्रामक नहीं है।

रैदास वे अनन्यता पर बल देते हैं। रैदास में निरीहता के साथ-साथ कुंठाहीनता का भाव भी मिलता है।

भक्ति-भावना ने उनमें वह बल भर दिया था, जिसक आधार पर वे डंके की चोट पर घोषित कर सके कि उनके कुटुंबी आज भी बनारस के आसपास ढोर (मुर्दा पशु) ढोते हैं और दासानुदास रैदास उन्हीं का वंशज है—

जाके कुटुंब सब ढोर ढोवंत फिरहिं अजहुँ बानारसी आसपासा।

आचार सहित बिप्र करहिं डंड उति तिन तनै रविदास दासानुदासा।।

रैदास जी की भाषा सरल, प्रवाहमयी और गेयता के गुणों से पूर्ण है।

गुरु नानक (1469-1538)

गुरु नानक का जन्म 1469 में तलवंडी ग्राम, जिला लाहौर में हुआ था। इनकी मृत्यु 1538 में हुई।

उनके पिता जी का नाम कालूचंद खत्री तथा माँ जी का नाम तृप्ता था। इनकी पत्नी का नाम सुलक्षणी था।

कहते हैं कि इनके पिता ने इन्हें व्यवसाय में लगाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन इनका मन भक्ति में ही लगा।


उन्होंने हिंदू-मुसलमान, दोनों की समान धार्मिक उपासना पर बल दिया तथा वर्णाश्रम व्यवस्था और कर्मकांड का विरोध करके निर्गुण ब्रह्म की भक्ति का प्रचार भी किया।

गुरु नानक ने व्यापक देशाटन किया और मक्का-मदीना तक की यात्रा की।

लेखक ने लिखा है- कहते हैं मुगल सम्राट बाबर से भी इनकी भेंट  हुई थी।

यात्रा के दौरान साथ में इनके साथी और शिष्य रागी नामक मुस्लिम रहते थे, जो इनके द्वारा रचित पदों को गाते थे।

गुरु नानक ने सिख धर्म का प्रवर्तन किया।

गुरु नानक ने पंजाबी के साथ हिंदी में भी कविताएँ लिखीं। उनके हिंदी में ब्रजभाषा और खड़ी बोली, दोनों का मेल है।

भक्ति और विनय के पद बहुत मार्मिक हैं।

शामकता इनके व्यक्तित्व और रचना की विशेषता है।

गुरु नानक ने उलटबाँसी शैली नहीं अपनाई है।

इनके दोहों में जीवन के अनुभव उसी प्रकार गुँथे हैं, जैसे कबीर की रचनाओं में।

आदि गुरुग्रंथ साहब के अंतर्गत ‘महला‘ नामक प्रकरण में उनकी बानी संकलित है।

उसमें सबद, सलोक मिलते हैं।

गुरु नानक की रचनाएँ हैं- जपुजी, आसादीवार, रहिरास और सोहिला।

गुरु नानक की ही परंपरा में उनके उत्तराधिकारी गुरु कवि हुए-

गुरु अंगद (जन्म 1504)

 गुरु अमरदास (जन्म 1479)

गुरु रामदास (जन्म 1514)

गुरु अर्जुन (जन्म 1563),

गुरु तेगबहादुर (जन्म 1622)

और दसवें गुरु गोविंदसिंह (जन्म 1664) हैं।

गुरु गोविंदसिंह ने अनेक ग्रंथों की रचना की।

दादूदयाल (1544-1603)

कबीर की तरह दादू के जन्म और उनकी जाति के विषय में विवाद और अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं।

कुछ लोग उन्हें गुजराती ब्राह्मण मानते हैं, कुछ लोग मोची या धुनिया।

प्रो. चंद्रिकाप्रसाद त्रिपाठी और क्षितिजमोहन सेन के अनुसार दादू मुसलमान थे और उनका नाम दाऊद था।

माना जाता है, दादू बालक के रूप में साबरमती नदी में बहते हुए लोदीराम नामक नागर ब्राह्मण को मिले थे।

दादू के गुरु का भी निश्चित रूप से पता नहीं लगता। कुछ लोग मानते हैं कि वे कबीर के पुत्र कमाल के शिष्य थे।

पं. रामचंद्र शुक्ल का विचार है कि उनकी बानी में कबीर का नाम बहुत जगह आया है और इसमें कोई संदेह नहीं कि वे उन्हीं के मतानुयायी थे।

वे आमेर, मारवाड़, बीकानेर आदि स्थानों में घूमते हुए जयपुर आए।

वहीं के भराने नामक स्थान पर इन्होंने 1603 में शरीर छोड़ा।

वह स्थान दादूपंथियों का केंद्र है।

दादू की रचनाओं का संग्रह उनके दो शिष्यों संतदास और जगनदास ने हरडेवानी नाम से किया था।

रज्जब ने इसका संपादन अंगवधू नाम से किया।

दादू की कविता जन सामान्य को ध्यान में रखकर लिखी गई है, परिणाम स्वरूप सरल एवं सहज है।

दादू भी कबीर के समान अनुभव को ही प्रमाण मानते थे।

दादू की रचनाओं में भगवान के प्रति प्रेम और व्याकुलता के भाव हैं।

कबीर की भाँति उन्होंने भी निर्गुण निराकार भगवान को वैयक्तिक भावनाओं का विषय बनाया है।

उनकी रचनाओं में इस्लामी साधना के शब्दों का प्रयोग खुलकर हुआ है। उनकी भाषा पश्चिमी राजस्थानी से प्रभावित हिंदी है। इसमें अरबी-फ़ारसी के काफ़ी शब्द आए हैं, फिर भी वह सहज और सुगह हैं।

सुंदरदास (1596-1689)

सुंदरदास 6 वर्ष की आयु में दादू के शिष्य हो गए थे।

उनका जन्म 1596 में जयपुर के निकट द्यौसा नामक स्थान पर हुआ था।

दादू की मृत्यु के बाद एक संत जगजीवन राम के साथ वे 10 वर्ष की आयु में काशी चले गए।

वहाँ 30 वर्ष की आयु तक उन्होंने जमकर अध्ययन किया।

काशी लौटकर वे राजस्थान में शेखावटी के निकट फतहपुर नामक स्थान पर गए।

वे फ़ारसी भी बहुत अच्छी जानते थे।

उनका देहांत सांगामेर में 1689 में हुआ।

निर्गुण संत कवियों में सुंदरदास सर्वाधिक शास्त्रज्ञ एवं सुशिक्षित थे।

सुशिक्षित होने के कारण उनकी कविता कलात्मकता से युक्त और उनकी भाषा प्रभावशाली है।

निर्गुण संतों ने अधिकतर गेयपद और दोहे ही लिखे हैं।

सुंदरदास ने कवित्त और सवैये भी रचे हैं।

उनकी काव्य-भाषा में अलंकारों का प्रयोग सर्वाधिक हुआ।

प्रसिद्ध ग्रंथ सुंदरविलास, काव्य-कला में शिक्षित होने के कारण उनकी रचनाएँ निर्गुण साहित्य में विशिष्ट स्थान रखती हैं।

उन्होंने सामाजिक व्यवहार, लोकनीति और भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के आचार-व्यवहार पर भी उक्तियाँ कही हैं।

लोकधर्म और लोकमर्यादा की उन्होंने उपेक्षा नहीं की है।

रज्जब (1567-1689)

रज्जब (17 वीं शती) दादू के शिष्य थे, राजस्थान के थे।

इनकी कविता में सुंदरदास की शास्त्रीयता का तो अभाव है, किंतु पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, “रज्जब दास निश्चय ही दादू के शिष्यों में सबसे अधिक कवित्व लेकर उत्पन्न हुए थे।

उनकी कविताएँ भावापन्न, साफ़ और सहज हैं।

रज्जब जी कि भाषा पर राजस्थानी प्रभाव अधिक है साथ ही इस्लामी साधना के शब्द भी अपेक्षाकृत अधिक हैं।

निर्गुण संतों की ज्ञानाश्रयी शाखा के अन्य प्रसिद्ध संत-

मलूकदास (जन्म 1574)

अक्षर अनन्य (जन्म 1653)

जंभनाथ (1451)

सिंगाजी (1519)

और हरिदास निरंजनी (17 वीं शती)

कबीर के पुत्र कमाल और शिष्य धर्मदास की गणना इसी परंपरा में होती है। इनकी कविताएँ सरल और भावापन्न हैं।


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