Study Material :  कृष्ण-भक्ति धारा नोट्स | Notes on the Krishna-Bhakti Tradition

Study Material :  कृष्ण-भक्ति धारा नोट्स | Notes on the Krishna-Bhakti Tradition

कृष्ण-भक्ति धारा नोट्स

महाप्रभु वल्लभाचार्य का जन्म 1477 में और देहांत 1530 में हुआ था। वल्लभाचार्य द्वारा प्रवर्तित मार्ग को ‘पुष्टिमार्ग’ कहते हैं।

वल्लभाचार्य के अनुसार यह सारी सृष्टि लीला के लिए ब्रह्म की आत्मकृति है।

जीव ब्रह्म का अंश है। ब्रह्म अपनी अचित्य शक्ति से जगत के रूप में भी परिणत होता है और सूर का विषय-क्षेत्र सीमित अवश्य है, किंतु सूर ने राधाकृष्ण की प्रेम-लीला और उससे परे भी रहता है।

वह सच्चिदानंद है। जड़ में सत् किंतु जीव में सत् और चित्, दोनों होते हैं।

आनंद का पूर्ण आविर्भाव पुरुषोत्तम कृष्ण में है।

वे अपने भक्तों के रंजनार्थ नित्य लीला करते हैं।

वल्लभाचार्य के अनुसार जीव तीन प्रकार के हैं-

1. ‘प्रवाह जीव’ जो सांसारिक प्रवाह में पड़े रहते हैं;

2. ‘मर्यादा जीव’ जो विधि-निषेध का पालन करते हैं और

3. ‘पुष्टि जीव’ जो भगवान का अनुग्रह प्राप्त कर लेते हैं।

वल्लभाचार्य ने भक्ति में निहित माहात्म्य या श्रद्धा के अवयव की उपेक्षा करके प्रेम के तत्त्व को ही अपनाया है।

पूर्व मीमांसा भाष्य, अणुभाष्य, श्रीमद्भागवत की टीका, अणुभाष्य एवं मीमांसा या ब्रह्मसूत्र का भाष्य।

महाप्रभु वल्लभाचार्य परम विद्वान, सत्संगी एवं परदुखकातर व्यक्ति थे।

श्रीकृष्ण की जन्मभूमि में गोवर्धन पर्वत पर श्रीनाथ जी का विशाल गोवर्धन मंदिर बनवाया और वहीं अपनी गद्दी भी स्थापित की।

इस मंदिर में श्रीकृष्ण की जो उपासना होती थी उससे हिंदी साहित्य की कृष्ण-भक्ति धारा का बहुत गहरा संबंध है।

सूरदास (1478-1583) नोट्स

हिंदी साहित्य में श्रेष्ठ कृष्णभक्त कवि सूरदास का जन्म 1478 के आसपास हुआ था। इनकी मृत्यु अनुमानतः 1583 के आसपास हुई।

भक्तमाल और चौरासी वैष्णवन की वार्ता से थोड़ी-बहुत जानकारी मिल जाती है।

आइने अकबरी और मुंशियात अबुल फजल में भी किसी संत सूरदास का उल्लेख है, किंतु वे बनारस के कोई और सूरदास प्रतीत होते हैं।

अनुश्रुति यह अवश्य है कि अकबर बादशाह सूरदास का यश सुनकर उनसे मिलने आए थे।

भक्तमाल में इनकी भदित, कविता एवं गुणों की प्रशंसा है तथा इनकी अंधता का उल्लेख है।

चौरासी वैष्णवन की वार्ता के अनुसार वे आगरा और मथुरा के बीच साधु या स्वामी के रूप में रहते थे।

वे वल्लभाचार्य के दर्शन को गए और उनसे लीलागान का उपदेश पाकर कृष्ण-चरित विषयक पदों की रचना करने लगे।

कालांतर में श्रीनाथ जी के मंदिर का निर्माण होने पर महाप्रभु वल्लभाचार्य ने इन्हें यहाँ कीर्तन का कार्य सौंप दिया था।

सूरदास जन्मांध थे। उन्होंने अपने को ‘जनम को आंधर’ कहा भी है। किंतु इसके शब्दार्थ पर नहीं जाना चाहिए।

सूर के काव्य में प्रकृति और जीवन का जो सूक्ष्म सौंदर्य चित्रित है उससे यह नहीं लगता कि वे जन्मांध थे।

उनके विषय में ऐसी कहानी भी मिलती है कि तीव्र अंतर्द्वद्व के किसी क्षण में उन्होंने अपनी आँखें फोड़ ली थीं।

उचित यही मालूम पड़ता है कि वे जन्मांध नहीं थे।

सूरदास अब अंधों को कहा जाता है। यह परंपरा सूर के अंध हो जाने के बाद से चली है। सूर का आशय ‘शूर’ से है। शूर और सती मध्यकालीन भक्तों के आदर्श थे।

शुक्ल जी ने सूर को एक ओर जयदेव, चंडीदास और विद्यापति की परंपरा से जोड़ा है, तो दूसरी ओर लोक गीतों की परंपरा से भी उन्हें जोड़ा है।

विद्यापति और सूरदास में जो निरीहता, तन्मयता मिलती है, अनुभूतियों को जिस प्रकार बाह्य प्रकृति के ताने-बाने में बुना गया है, वह लोकगीतों की विशेषता है।

लोकजीवन और साहित्य में राधा-कृष्ण की जो परंपरा पहले से चली आ रही थी, वह भक्तिकाल में प्रकट हुई।

जयदेव का गीत गोविंद, विद्यापति की पदावली, चंडीदास का काव्य और सूरदास का सूरसागर उसी परंपरा से जुड़े हैं।

सूर का काव्य-वैभव  नोट्स

सूरदास वात्सल्य और शृंगार के कवि हैं।

सूरदास ने वात्सल्य और श्रृंगार का वर्णन लोक सामान्य की भाव भूमि पर किया है।

मार्मिकता, मनोवैज्ञानिकता, स्वाभाविकता जीवन के यथार्थ में ही होते हैं। फिर यथार्थ अपने विविध आयामों को अंतस्संबंधित किए होता है। तुलसी की अपेक्षा माना जाता है, किंतु उनके वात्सल्य के विषय में यह बात नहीं कही जा सकती।

गेयपदों में सूरदास ने पूरे ब्रज की जो दारुण व्यथा उभारी है, वह व्यथा प्रभाव की दृष्टि से नाटकों और महाकाव्यों में मिलनेवाली करुणा के समान है।

सूरदास के यहाँ राधा-कृष्ण का प्रेम परिचय से विकसित होता है। वह प्रकृति और कर्मक्षेत्र की पृष्ठभूमि में पुष्पित पल्लवित होता है।

बूझत स्याम कौन तू गोरी।

कहाँ रहति, काकी है बेटी,

देखी नहीं कहूँ ब्रज-खोरी।

काहे कौ हम ब्रज-तन आवति,

खेलत रहति आपनी पौरी।

सुनत रहति स्रवननि नंद ढोटा,

करत फिरत माखन-दधि चोरी।

तुम्हारौ कहा चोरि हम लैहैं खेलन चलौ संग मिलि जोरी।

सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि, बातनि भुरइ राधिका भोरी।

सूरदास द्वारा चित्रित राधा-कृष्ण की प्रेम-लीला में मध्यकालीन पराधीन नारी के सहज एवं स्वाधीन जीवन का स्वप्न जैसे साकार हो उठा है। यह स्वप्न सर्वाधिक साक्षात रास-लीला वर्णन में होता है। सूरदास के समय अर्थात् सोलहवीं शती में ब्रज में नारियों को वह स्वाधीनता नहीं थी, जिसका वर्णन सूरसागर में मिलता है। यह सच है कि रास-लीला का साधनात्मक अर्थ भी है, जहाँ गोपियाँ साधकों की प्रतीक हैं।

गोपियाँ लोक-लाज तजकर घर की चहारदीवारी ही नहीं तोड़तीं, वे कृष्ण की बाँसुरी सुनकर उस सामाजिक व्यवस्था को भी तोड़ती हैं, जो नारियों को पराधीन रखती है।

जिस तरह तुलसी ने मध्यकालीन भारत में दैहिक, दैविक, भौतिक तापों से रहित ‘रामराज्य’ का स्वप्न देखा है, वैसे ही सूर ने कृष्ण-कथा और रास लीला के माध्यम से एक ऐसा सर्वसुखद स्वप्न देखा है, जिसमें नारी और पुरुष दोनों समान तौर पर स्वाधीन हैं।

तुलसीदास नारी पराधीनता को महसूस करते थे, उसकी पीड़ा का चित्रण कर सकते थे, किंतु सामाजिक निषेधों में अंतर्निहित अमानवीयता को सूरदास की तरह तोड़ नहीं सकते थे—

मानौ माई घन-घन अंतर दामिनि।

घन दामिनि दामिनि घन अंतर, सोभित हरि-ब्रज भामिनि।

जमुन पुलिन मल्लिका मनोहर, सरद सुहाई जामिनि।

सुंदर ससि गुन रूप-राग निधि, अंग-अंग अभिरामिनि।

रच्यौ रास मिलि रसिक राइ सौं, मुदित भई गुन ग्रामिनि।”

अवश्य ही कहीं-कहीं सूर ने रूढ़ उपमानों की झड़ी लगा दी है या अतिशयोक्ति से काम लेते हुए चमत्कार पैदा किया है। सूर के विरह-वर्णन की मार्मिकता का आधार विरहावस्था में हृदय की नाना वृत्तियों का स्वाभाविक पद्धति पर चित्रण है।

विरह-वर्णन वहाँ उत्कट है, जहाँ गोपियों की निरीह विवशता प्रकट होती है। भ्रमर-गीत में गोपियों की विदग्धता की निरीह विवशता उतनी मार्मिक नहीं जितनी कि विरह को प्रकट करनेवाली उनकी निरीह, निश्छल, अनलंकृत उक्तियों में है।

सूरदास के गेयपद मुक्तक हैं, किंतु उनमें प्रबंधात्मकता का रस है। इसलिए उन्हें गेयपद के साथ-साथ ‘लीला पद’ भी कहा जाता है। वे ब्रजभाषा के प्रथम प्रतिष्ठित कवि हैं।

सूर की एक अन्य विशेषता नवीन प्रसंगों की उ‌द्भावना है। उन्होंने कृष्ण-कथा, विशेषतः बाल-लीला और प्रेम-लीला के अंशों को नवीन मनोरंजक वृत्तों से भर दिया है, जैसे दान-लीला, मान लीला, चीरहरण आदि।

वल्लभाचार्य के पुत्र विठ्ठलनाथ ने पुष्टिमार्गी कवियों में से आठ कवियों को चुनकर उन्हें ‘अष्टछाप’ की संज्ञा दी।

ये कवि हैं सूरदास, कुंभनदास, परमानंद दास, कृष्णदास, छीतस्वामी, गोविंद स्वामी, चतुर्भुजदास और नंददास।

इनमें से प्रथम चार वल्लभाचार्य के शिष्य थे और शेष स्वयं विठ्ठलनाथ के।

नंददास (16 वीं शती) नोट्स

नंददास सोलहवीं शती के अंतिम चरण में विद्यमान थे।

भक्तमाल में लिखा है- चंद्रहास-अग्रज सुहद परम प्रेम-पथ में पगे। दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता के अनुसार ये तुलसीदास के भाई थे, किंतु अब यह बात प्रामाणिक नहीं मानी जाती।

इनके काव्य के विषय में यह उक्ति प्रसिद्ध है- ‘और कवि गढ़िया, नंददास जड़िया।’ इससे प्रकट होता है कि इनके काव्य का कला-पक्ष महत्त्वपूर्ण है।

इनकी प्रमुख कृतियों के नाम इस प्रकार हैं- रासपंचाध्यायी, सिद्धांत पंचाध्यायी, भागवत् दशम स्कंध, रुक्मिणीमंगल, रूपमंजरी, रसमंजरी, दानलीला, मानलीला आदि।

इनके यश का आधार रासपंचाध्यायी है। रासपंचाध्यायी भागवत् के ‘रासपंचाध्यायी’ अंश पर आधारित है।

यह रोला छंद में रचित है।

कृष्ण की रासलीला का वर्णन इस काव्य में कोमल एवं सानुप्रासिक पदावली में किया गया है, जो संगीतात्मकता से युक्त है—

ताही छन उडुराज उदित रस-रास सहायक,

कुंकुम-मंडित-बदन प्रिया जनु नागरि नायक।

कोमल किरण अरुन मानो बन व्यापि रही यों,

मनसिज खेल्यो फागु घुमड़ि घुरि र‌ह्यों गुलाल ज्यों।

भँवरगीत में उन्होंने रोला छंद के साथ ध्रुवक जोड़कर उसे और अधिक संगीतात्मक बना दिया है।

सिद्धांत पंचाध्यायी भक्ति सिद्धांत का परिचायक ग्रंथ है और रसमंजरी नायिका भेद का।

रूपमंजरी में इसी नाम की एक भक्त महिला का चरित्र वर्णित है।

नंददास ने अनेक काव्य-रूपों में रचना की है। वे काव्य शास्त्र से सुपरिचित कवि ज्ञात होते हैं।

कृष्णदास (16 वीं शती) नोट्स

कृष्णदास जन्मना शूद्र होते हुए भी वल्लभाचार्य के कृपा-पात्र थे और मंदिर के प्रधान हो गए थे।

इनका रचा हुआ जुगमान चरित नामक ग्रंथ मिलता है।

परमानंद दास (16वीं शती) के 835 पद परमानंद सागर में संकलित हैं।

कुंभनदास परमानंद दास के समकालीन थे।

इन्होंने फतेहपुर सीकरी के राजसम्मान से खिन्न होकर कहा था-

संतन को कहा सीकरी सो काम।

इनका कोई ग्रंथ नहीं मिलता, फुटकल पद ही मिलते हैं।

चतुर्भुजदास कुंभनदास के पुत्र थे।

इनकी तीन कृतियाँ मिलती हैं-द्वादश यश, भक्ति प्रताप और हितजु को मंगल।

छीतस्वामी सोलहवीं शती के उत्तरार्द्ध में वर्तमान थे।

इनका भी कोई ग्रंथ नहीं, केवल फुटकल पद ही उपलब्ध हैं।

गोविंद स्वामी का रचना काल सन् 1543 और 1568 के बीच रहा होगा। कहा जाता है कि इनका गाना सुनने के लिए कभी-कभी तानसेन भी आते थे। इनका भी कोई ग्रंथ नहीं मिलता।

अन्य कृष्ण-भक्त कवि नोट्स

राधा-वल्लभी संप्रदाय के प्रवर्तक हितहरिवंश का उल्लेख और थोड़ा परिचय भक्तिकाल के प्रारंभ में ही दिया जा चुका है।

इनका जन्म 1502 में हुआ था।

इनका रचनाकाल सन् 1543 से 1583 तक माना जाता है।

इन्होंने 1525 में श्रीराधावल्लभ की मूर्ति वृंदावन में स्थापित की। ये संस्कृत के विद्वान थे।

इन्होंने संस्कृत में भी अत्यंत सरस रचना की है।

हितचौरासी में इनकी कविताएँ संकलित हैं।

हितहरिवंश द्वारा प्रवर्तित संप्रदाय में राधा की भक्ति की प्रधानता है।

हितहरिवंश ने राधा-विषयक अत्यंत सरस रचनाएँ की हैं। इनकी रचनाएँ कम संख्या में उपलब्ध हैं।

मीराबाई (1498-1546) नोट्स

हिंदी की श्रेष्ठ कवयित्री मीरा का जन्म 1516 में हुआ था।

इनके व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द अनेक किंवदंतियाँ गढ़ ली गई हैं।

ये बाबर से मोर्चा लेने वाले महाराणा साँगा की पुत्रवधू और महाराणा कुमार भोजराज की पत्नी थीं।

कहा जाता है कि विवाह के कुछ वर्षों के बाद जब इनके पति का देहांत हो गया तो ये साधु-संतों के बीच भजन-कीर्तन करने लगीं।

देवर राणा विक्रमादित्य बहुत रुष्ट हुए। उन्होंने इन्हें नाना प्रकार की यातनाएँ दीं।

उन्होंने इन्हें विष तक दिया जिससे खिन्न होकर इन्होंने राजकुल छोड़ दिया। इनकी मृत्यु 1546 में द्वारिका में हुई।

मीरा भक्त थी। भक्त होना कोई बुरी बात नहीं, फिर राणा मीरा से क्यों रुष्ट थे? मीरा सवर्ण समाज की थीं और फिर राणा कुल की पुत्रवधू। सामान्य लोगों के बीच उठना-बैठना उस सामाजिक व्यवस्था को असह्य था।

जिसमें नारी पति के मरने पर या तो सती हो सकती थी या घर की चारदीवारी के भीतर वैधव्य झेलने के लिए अभिशप्त थी।

मीरा को भक्त होने के लिए लोक-लाज छोड़नी पड़ी और यही बात राणा को खलती थी।

लोक-लाज तजने की बात मीरा की कविताओं में बार-बार आती है।

मीरा ने अपने इष्ट देव गिरधर का जो रूप निर्मित किया है, वह अत्यंत मोहक है।

मीरा के रूप-चित्रण की यह भी विशेषता है कि वह प्रायः गत्वर होता है।

गिरधर नागर को प्रायः सचेष्ट अंकित किया जाता है, या तो वे मुरली बजाते हैं या मंद मंद मुस्काते हैं या मीरा की गली में प्रवेश करते हैं।

विरह मीरा के जीवन का भी सबसे बड़ा यथार्थ है और उनके काव्य का भी।

मीरा के विरह की सचाई का लक्षण यह है कि वे विरह की पीड़ा के ताप से मुक्त होना चाहती हैं। वेदना की सचाई का एक लक्षण यह है कि व्यक्ति उससे मुक्ति के लिए छटपटाए।

मुक्ति संभव न हो तो भी मनुष्य मुक्तावस्था का स्वप्न देखता है।

मीरा के यहाँ विरह-वेदना उनका यथार्थ है, तो कृष्ण से मिलन उनका स्वप्न।

मीरा के जीवन के यथार्थ की प्रतिनिधि पक्ति है-

अँसुवन जल सींचि-सौचि, प्रेम-बेलि बोई।

और उनके स्वप्न की प्रतिनिधि पंक्ति है-

सावन माँ उमग्यो म्हारो हियरा, भणक सुण्या हरि आवण री।

मीरा भक्त कवि हैं। उनकी व्याकुलता एवं वेदना उनकी कविता में निश्छल अभिव्यक्ति पाती है। मीरा की कविता में रूप, रस और ध्वनि के प्रभावशाली विंव हैं।

वे अपनी कविता में निहित वेदना को श्रोताओं और पाठकों के अनुभव के माध्यम से संप्रेषित करती हैं- घायल की गति घायल जानै और न जाने कोई का यही अभिप्राय है।

मीरा के काव्य पर निर्गुण-सगुण, दोनों साधनाओं का प्रभाव है। उन पर नाथ मत का भी प्रभाव दिखाई पड़ता है। उनके इष्ट देव तो कृष्ण ही हैं, किंतु रामकथा से संबंधित गेयपद भी उन्होंने लिखे हैं। मीरा की कविताएँ शिष्ट समाज के साथ-साथ राजस्थान के भीलों में भी बहुत लोकप्रिय हैं।

रसखान (1548-1628) नोट्स

इनका वृत्तांत दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता में मिलता है, और उससे प्रकट होता है कि ये लौकिक प्रेम से कृष्ण प्रेम की ओर उन्मुख हुए।

इनकी प्रसिद्ध कृति प्रेमवाटिका का रचनाकाल 1614 है।

कहते हैं कि वे गोसाईं विठ्ठलनाथ के शिष्य थे।

रसखान ने कृष्ण का लीलागान गेयपदों में नहीं, सवैयों में किया है।

रसखान को सवैया छंद सिद्ध था।

रसखान का कोई ऐसा सवैया नहीं मिलता जो उच्च स्तर का न हो।

रसखान सूफ़ियों का हृदय लेकर कृष्ण की लीला पर काव्य रचते हैं।

उनमें उल्लास, मादकता और उत्कृष्टता, तीनों का संयोग है।

ब्रज-भूमि के प्रति जो मोह रसखान की कविताओं में दिखई देता है, वह उनकी विशेषता है।

रसखान प्रेम-भावना की अछूती स्थितियों की योजना करते हैं।

मोर पखा सिर ऊपर राखिहों, गुंज की माल गरे पहिराँगी।

ओढ़ि पितांबर लै लकुटी बन, गोधन ग्वारनि संग फिरौंगी।

भावतो सोई मेरी रसखानि सो तेरे कहे सब स्वाँग करोंगी।

या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी।

अर्थात् सब स्वाँग किया जा सकता है, किंतु कृष्ण के अधरों पर रखी हुई मुरली को अपने अधरों पर रखने का स्वाँग नहीं किया जाएगा।

कृष्णभक्त कवियों की सुदीर्घ परंपरा है।

स्वामी हरिदास (16वीं शती)

हरीराम व्यास (16वीं शती)

सुखदास (17वीं शती)

लालचदास (16वीं शती)

नरोत्तमदास (16वीं शती)

आदि अन्य कृष्णभक्त कवि हैं।

नरोत्तमदास का सुदामा-चरित अपनी मार्मिकता और सहज प्रवाह के कारण बहुत लोकप्रिय है।

रहीम (1556-1627) नोट्स

रहीम (पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना, जन्म 1556) की गणना कृष्णभक्त कवियों में ही की जा सकती है।

रहीम ने बरवै नायिका भेद भी लिखा है, जिससे उनकी यह रचना तो निश्चित रूप से रीति काव्य की कोटि में रखी जाएगी, किंतु रहीम को भक्त हृदय मिला था।

उनके भक्तिपरक दोहे उनके व्यक्ति और रचनाकार का वास्तविक प्रतिनिधित्व करते हैं।

कहते हैं, उनके मित्र तुलसी ने बरवै रामायण की रचना रहीम के ‘बरवै’ काव्य से उत्साहित होकर की थी।

रहीम सम्राट अकबर के प्रसिद्ध सेनापति बैरम खाँ के पुत्र थे।

वे स्वयं योद्धा थे। गंग ने रहीम पर जो छप्पय लिखा है, उससे प्रकट होता है कि रहीम पराक्रमी सेनानी थे—

खलभलित सेस कवि गंग भन-अमित तेज रवि रथ खस्यो।

खानान खान बैरम सुवन जबहिं क्रोध करि तंग कस्यो॥

रहीम अरबी, फ़ारसी, संस्कृत आदि कई भाषाओं के जानकार थे।

वे बहुत उदार, दानी और करुणावान थे।

अंत में उनकी मुगल दरबार से नहीं पटी, और अनुश्रुति के अनुसार उनके अंतिम दिन तंगी में गुजरे।

रहीम की अन्य रचनाएँ हैं-रहीम दोहावली या सतसई, श्रृंगार सोरठा, मदनाष्टक और रासपंचाध्यायी।

उन्होंने खेल कौतुकम् नामक ज्योतिष का भी ग्रंथ रचा है, जिसकी भाषा संस्कृत-फ़ारसी मिश्रित है।

रहीम ने तुलसी के समान अवधी और ब्रज, दोनों में अधिकारपूर्वक काव्य-रचना की है।

रहीम के भक्ति और नीति के दोहे आज भी लोगों की जुबान पर हैं।

कृष्ण-भक्ति काव्य की विशेषताएँ नोट्स

कृष्ण-भक्ति साहित्य प्रधानतः भगवान के लोकरंजक रूप को उजागर करता है।

कृष्ण के चरित्र में सामाजिकता और लोकमंगल की भावना के समावेश का पूरा अवकाश है, किंतु हिंदी के कृष्ण-भक्त कवियों का ध्यान उधर नहीं गया।

अष्टछाप के कवियों में तत्कालीन पर्व, उत्सव, रीति-रिवाज, आभूषण, वस्त्रादि का वर्णन मिलता है।

कृष्ण-भक्ति काव्य की मधुरता ने मुसलमान कवियों को भी पर्याप्त संख्या में अपनी ओर आकृष्ट किया।

कृष्ण भक्ति काव्य की भाषा ब्रजभाषा ही रही। भक्ति प्रचार के साथ-साथ ब्रजभाषा का इतना व्यापक प्रचार हुआ कि वह शताब्दियों तक हिंदी क्षेत्र की तो प्रमुख काव्य-भाषा बनी ही रही, हिंदी क्षेत्र के बाहर सुदूरवर्ती क्षेत्रों में भी काव्य-रचना के लिए व्यवहृत हुई।

हिंदी भक्ति काव्य की सामान्य विशेषताएँ

भक्ति का शास्त्र यद्यपि दक्षिण में बना, तथापि उसका पूर्ण उत्कर्ष उत्तर में हुआ।

हिंदी साहित्य में भक्तिकाल दीर्घ व्यापी, लगभग तीन शताब्दियों तक प्रभावी रहा। शायद ही किसी अन्य भारतीय भाषा में इतनी संख्या में श्रेष्ठ कवि- कबीर, जायसी, सूर, तुलसी, मीरा आदि जैसे हुए हों।

रसखान, रहीम आदि जैसे कवि हैं,


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