सारांश व समीक्षा : कांता भारती का उपन्यास रेत की मछली | Ret Ki Machli

सारांश व समीक्षा : कांता भारती का उपन्यास रेत की मछली | Ret Ki Machli

परिचय

किसी इंसान की आत्मा जिस शरीर में रहती है, उस शरीर का स्वास्थ्य होना बहुत जरूरी है। एक स्वास्थ्य शरीर प्राप्त करने वाला इंसान ही अपने जीवन का पूरा आनन्द ले सकता है। यह प्राकृतिक स्वाभाव है, कि कोई भी इंसान अपने पूरे जीवन में हमेशा स्वास्थ्य नहीं रह सकता। कभी न कभी वह अस्वस्थ्य भी होगा ही। ऐसे में कुछ बीमारियाँ अपने स्वाभाव के अनुसार कुछ दिन में अपने आप ठीक हो जाएँगी और कुछ इलाज माँगेंगी। जो बीमारियाँ बिना इलाज के ठीक नहीं हो सकती अगर उनका इलाज समय पर न किया जाए तो वह घातक रूप ले सकती हैं, अंत में लाइलाज हो सकती हैं।

कुछ बीमारियाँ दवाइयों से पूरी तरह ठीक हो जाती हैं। अंतत: व्यक्ति का शरीर वैसा ही दिखाई देता है, जैसा वह चाहता है। लेकिन कुछ बीमारियाँ जब लाइलाज हो जाती हैं, तो उनका इलाज जड़ से करने के लिए डॉक्टर शरीर के उस हिस्से को ही शरीर से अलग कर देता है, जिस हिस्से में बीमारी है।

परिणाम स्वरूप इंसान को अपनी बीमारी का इलाज समय रहते कर लेना चाहिए। अपने शरीर के हर हिस्से को बचाएँ रखना चाहिए, लेकिन कभी अगर उसकी बीमारी लाइलाज हो जाए शरीर का कोई हिस्सा इतना ख़राब हो जाए कि वह हिस्सा पूरे शरीर को नष्ट कर देगा तब उसे शरीर के उस हिस्से को अलग करने से पीछे नहीं हटना चाहिए। चाहे वह इसके बाद अपाहिज ही क्यों न हो जाए।

यही स्थिति रिश्तो में भी होती है, अगर रिश्तों में किसी प्रकार की कोई बीमारी महसूस हो रही है, तो समय रहते ही उसे ठीक करना चाहिए, लेकिन देर हो चुकी है, तो उस रिश्ते को भी ख़ुद से ऐसे ही अलग कर देना चाहिए जैसे डाक्टर शरीर के सड़े हुए हिस्से को अलग करता है।

हम बात कर रहे हैं एक उपन्यास की जिसमें लगभग ऐसी ही स्थिति पैदा हुई। उपन्यास का नाम है- ‘रेत की मछली’ यह उपन्यास ‘कांता भारती’ जी ने लिखा है।

रेत की मछली उपन्यास का सारांश

इस कहानी के केन्द्र में हैं, कुन्तल, शोभन और मीनल। उपन्यास की शुरूआत में कुन्तल ऑफिस जाने को होती है, तभी कोई आकर दरवाज़ा खटखटाता है, और बताता है कि उसे ‘श्रीमती डेविड’ ‘युवा महिला संघ’ की सेक्रेटरी ने बुलाया है। जब कुन्तल उनके पास जाती है, तो वे कुन्तल से इस जगह को छोड़ने के लिए कहती हैं। जहाँ कुन्तल कुछ सालो से रह रही थी। इसका कारण वे बताती हैं कि इस जगह पर सिर्फ वही महिला रह सकती हैं, जो विधवा हों या अविवाहित हों। कुन्तल नहीं रह सकती क्योंकि वह तलाकशुदा है।

कुन्तल उनकी बातों से इनती आहत होती है, कि तुरन्त ही वह अपनी दोस्त कुमुद को बुलाती है। अपना समान लेकर उसके साथ उसके घर चली जाती है।

जहाँ वह सुबह ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रही थी। अब वह सारा दिन चिंतन और अपने अतीत की याद में निकाल देती है।

कुन्तल अपने जीवन के वह बेहतरीन दिन याद करती है, जब वह कुँवारी थी और अपने माता-पिता के पास रहते हुए आनन्द साहब के यहाँ नौकरी करती थी। उसी दौरान उसकी मुलाकात शोभन से होती है। कुछ मुलाकातों के बाद ही कुन्तल को शोभन से प्रेम हो जाता है, और शोभन कुन्तल से प्रेम करने का छल करता है।

कुन्तल के पिता शोभन से इस विवाह को स्वीकार नहीं करना चाहते क्योंकि वह दूसरी जाति का है। लेकिन शोभन ने आनन्द और उनकी पत्नी के जरिए संवाद करके कुन्तल को उसके साथ भाग जाने के लिए मना लिया। इसी दौरान कुन्तल की बड़ी बहन की शादी होने वाली थी। कुन्तल ने भाग जाने से पहले अपने माता-पिता को मनाने की कोशिश की। इस कोशिश में उसने भूख हड़ताल कर दी। अंतत: उसके पिता इस शादी के लिए मान गए लेकिन मजबूरी में खुशी से नहीं।

कुन्तल के पिता लेखक और लेखक में छल को समझते हैं, इसलिए उन्होंने कुन्तल को चेतावनी भी दी की भविष्य में वह तुम्हारे साथ धोखा कर सकता है, कुन्तल ले उत्तर में कहा- अगर ऐसा हुआ तो भी मैं आपके घर वापस नहीं आऊँगी।

कुन्तल की शादी शोभन से हो गई। कुछ ही दिनों में शोभन ने अपना असली रूप कुन्तल के सामने रखना शुरू कर दिया। कुन्तल ने नज़रअंदाज़ कर दिया, यही वह समय था जब कुन्तल अपने रिश्ते में आई इस बीमारी का  इलाज कर सकती थी। शोभन ने अपने जीवन की लड़कियों का ज़िक्र किया। लेकिन कुन्तल के लिए सबसे अधिक घातक बनकर सामने आती है- मीनल।

मीनल पहले शोभन को भाईया कहती है, राखी भी बाँधती है। कुन्तल के साथ भी दोस्ती का दिखावा करती है, लेकिन भाई-बहन के इस आवरण के नीचे वह धीरे-धीरे कुन्तल का घर दिमक बनकर खोखला कर रही थी।

धीरे-धीरे मीनल और शोभन के बीच अनैतिक संबंध हो जाते हैं, जिसे वह शुरू-शुरू में छिपा लेते हैं। जब-जब  कुन्तल को शक होता शोभन उसे अपने प्रेम के अभिनय से मिटा देता। मीनल का लगातार कुन्तल के घर आना-जाना बना रहता। जब वह कलकत्ता चली जाती तब रोज़ ही शोभन उसे ख़त लिखता और कुन्तल से भी ज़बरदस्ती उसे ख़त लिखवाता। ख़तो के माध्यम से मीनल ने कुन्तल के हृदय पर बहुत गहरा ज़ख्म कर दिया। इन ज़ख्मों को उसने और गहरा तब किया जब कुन्तल गर्भवती थी। इस दौरान उसके अनैतिक संबंध स्पष्ट रूप से कुन्तल के सामने आ गए।

एक साहित्यिक कार्यक्रम के बहाने से शोभन कुन्तल को लेकर कोलकत्ता जाता है, वहाँ कार्यक्रम के बाद मीनल को साथ लेकर कुछ दिनों के लिए घूमने निकल जाता है। इस यात्रा के दौरान ही जिस कमरे में कुन्तल होती है, उसी कमरे में वह मीनल को भी रखता है। जो अनैतिक कृत्य वो कुन्तल से इतने दिनों से लगातार छिपा रहा था वह अब उसके सामने ही करने लगता है। इस सब चीजों को जानकर समझकर कुन्तल को अत्यधिक मानसिक पीड़ा होती है। जिस कारण गर्भवस्था में ही उसकी तबीयत बहुत बिगड़ जाती है, मीनल शोभन का ध्यान ज़रा भी कुन्तल की तरफ़ जाने नहीं देती। कहती है- गर्भवस्था में यह समान्य बात है जबकि कुन्तल की ऐसी स्थिति बिल्कुल भी समान्य नहीं थी।

छुट्टियाँ ख़तम करके कुन्तल और शोभन इलाहाबाद आ जाते हैं। आने के बाद लगातार ख़तों का सिलसिला फिर शुरू हो जाता है। कुछ ही दिनों में पता चलता है, मीनल को टीवी है। जिसका इलाज करवाने के लिए गर्भवस्था में ही कुन्तल को लेकर शोभन कलकत्ता चला जाता है और कुछ ही दिन में मीनल को भी इलाहाबाद ले आता है। डॉक्टर कहता है- कुन्तल गर्भवती है ऐसे में टीवी का मरीज़ उसके आसपास रहना उसकी सेहत के लिए अच्छा नहीं है। लेकिन शोभन इस पर ज़रा भी ध्यान नहीं देता बल्कि कुन्तल को ही मीनल की सेवा करनी पड़ती है। यह जानते हुए कि कभी भी यह बीमारी उसे हो सकती है।

कुन्तल को नीचे के कमरे में शिफ्ट कर दिया जाता है। शोभन खुद मीनल के साथ ऊपर के कमरे में मीनल के साथ रहता है। कुन्तल के ऊपर आने से मना करता है, लेकिन कुन्तल अपने पति और उसकी मुँह बोली बहन की नज़दीकी बर्दास्त नहीं कर पाती मनोवैज्ञानिक जंग के बाद ऊपर के कमरे में चली जाती है। जाकर मीनल और शोभन को अनैतिक कृत्य करते हुए देखती है। शोभन को अपने इस कृत्य पर ज़रा भी शर्मिंदगी नहीं होती कुन्तल को भी ज़बरदस्ती वहीं बैठा लेता है और कहता है- “मीनल मै और तुम तीनों एक हो जाते हैं” शोभन जैसा घटिया इंसान इसे अपने लेखकीय सफ़र के लिए जरूरी समझता है। वह मीनल के साथ अनैतिक कृत्यों को लेखक बनने के लिए प्रेरणा बताता है।

अब तक शोभन और मीनल का जो अनैतिक संबंध छिपा हुआ था, उसे वह कुन्तल के सामने ही बनाता है। कुन्तल की मानसिक यातना इतनी बढ़ गई कि उसका समान्य प्रसव नहीं हो पाया, अर्थात ऑपरेशन से कुन्तल की बेटी पैदा होती है। शोभन और मीनल अस्पताल में भी अपनी वासना पर काबू नहीं रखते।

शोभन को साहित्यिक कार्य के लिए नैनीताल जाना पड़ता है, जहाँ वह मीनल के साथ जाना चाहता है। लेकिन सिर्फ मीनल के साथ जाने में उसकी छवि नष्ट हो जाएगी इसलिए कुन्तल को ले जाना जरूरी हो जाता है। वहाँ पर भी कुन्तल, मीनल और शोभन एक ही कमरे में रहते हैं। उस कमरे में दो बेड़ होते हैं, एक बेड़ पर कुन्तल और उसकी बेटी। दूसरे पर शोभन और मीनल।

कुछ समय बाद साहित्यिक व्यवसाय के लिए ही शोभन को इलाहाबाद से मुम्बई जाना पड़ता है। जहाँ वह कुन्तल को अपने साथ न लेजाकर मीनल को वहाँ बुला लेता है। वहाँ सब लोग मीनल को ही उस घर की मालकिन समझते हैं। कुछ दिन बाद जब कुन्तल को वहाँ बुलाता है, तब मीनल और शोभन के संबंध कुन्तल के लिए असहनीय हो जाता है तो कुन्तल मीनल से बस इतना कहती है- ‘तुम्हें शर्म नहीं आती?’ मीनल ने इस बात को अपने तरीके से शोभन को बताया। जिसके बदले में शोभन ने अपने शैतान रूप को बाहर दिखाते हुए कुन्तल को बहुत मारा-पीटा। उसका सर फट गया। इसी दौरान कुन्तल का पिता उसे लेने आता है, लेकिन कुन्तल उनके साथ नहीं जाती यह सोचकर की शायद कुछ ठीक हो जाएगा।

अब लगातार शोभन बिना किसी कारण के मीनल की बातों में आकर कुन्तल को पीटने लगा। इस तरह की शायद कुन्तल की मृत्यु ही हो जाए। इससे भी मन नहीं भरा तो उसकी जान लेने का भय दिखाकर उससे ख़त लिखवाया।

“प्रिय शोभन,

पिछले सात वर्षों में तुमने मुझे मेरे गन्दे संस्कारों से मुक्त करने का प्रयत्न किया, लेकिन तुम्हारा सारा परिश्रम व्यर्थ निकला। मैं तुम्हारे साथ रहने योग्य नहीं हैं। अपनी स्वेच्छा से यह तुम्हारा घर छोड़ रही हूँ और अब मैं कभी तुम्हारे ऑफिस या घर आकर किसी से कुछ कहूँगी नहीं वचन देती हूँ। मैं आनन्द साहब के साथ रहने जा रही हूँ।

तोरू अभी मेरा दूध पीती है इसलिए उसे ले जा रही हूँ और वचन देती हूँ कि उसके तीन साल पूरे होने से पहले उसे आपको सौंप दूँगी। अपने बारे में निर्णय लेने के लिये आप स्वतन्त्र हैं।

आपकी-

कुन्तल”

शैतान और इंसान का अंतर जब मिट जाता है, तो कुछ ऐसा ही होता है। शोभन जिसका खुद का कोई चरित्र नहीं है। समाज और साहित्य जगत के लोग उसे सही समझे इसके लिए उसने कुन्तल को मजबूर करके उससे ऐसा ख़त लिखवाया और उसे ही चरित्रहीन साबित करने की कोशिश की।

इसके बाद मजबूर होकर कुन्तल को शोभन का घर छोड़कर जाना पड़ गया। वह अपने पिता के घर नहीं जाना चाहती थी लेकिन जाना पड़ा।

उसके बाद उसने नौकरी तलाश करने की कोशिश की, लेकिन इंसान के रूप में शैतान घर से बाहर भी मौजूद थे। जिस कारण कुन्तल को नौकरी तलाश करने में समस्या आई।

शोभन को लिखे ख़त के अनुसार कुन्तल को अपनी बेटी तोरी उसे सौंपनी पड़ी। यह भी एक कानूनी समझौते के तहत हुआ। जिसमें लिखा था कि वह कभी अपनी बेटी को यह नहीं बता सकती कि वह उसकी माँ है। साल में सिर्फ एक बार ही कुन्तल तोरू को देख सकती है। वह भी शोभन की तय की गई जगह पर।

कुन्तल अपनी ज़िन्दगी की लड़ाई अकेली लड़ने के लिए इस समाज में अकेली है। शोभन से शादी के बाद वह सिर्फ मानसिक रूप से अकेली थी। लेकिन तलाक के बाद मानसिक, सामाजिक और आर्थिक हर रूप में अकेली है।

कुमुद की मदद से उसे ‘युवा महिला संघ’ की तरफ़ से रहने के लिए जो स्थान मिला था, उसे भी समाज को दोगलेपन के कारण छोड़ना पड़ा।

रेत की मछली उपन्यास की समीक्षा

इस उपन्यास में शोभन अपने अनैतिक कृत्यों की महानता दिखाने के लिए कुन्तल से कहता है- “यह तो आवश्यक है कुंतल! मेरे अपने सृजन के लिए आवश्यक है। कुंतल! तुम मुझे महान् लेखक बनाना चाहती हो ना? उसके लिए पत्नी की अतिरिक्त प्रेरणा भी तो लेनी होती है न!”

किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण के लिए प्रेरणा कोई भी हो सकता है। जरूरी नहीं कि वह सिर्फ पत्नी ही हो। लेकिन प्रेरणा के रूप में ऐसा घिनोना कृत्य! अपनी पत्नी की आँखों के सामने अपनी मुँहबोली बहन के साथ अनैतिक संबंध बनाते हुए उसे प्रेरणा का नाम देना, पशुता का प्रतीक है।

शोभन के व्यक्तित्व का दोगलापन भी देखने को मिलता है- वह कुन्तल के बिना कहीं नहीं जाता। कोलकत्ता, नैनीताल या फिर मीनल के लिए लिखे ख़त को पोस्ट करने के लिए भी उसे साथ लेकर जाता है। ताकि समाज यह देख सके कि वह कितना अच्छा पति है। अपनी पत्नी से प्रेम करता है, कोई उसका घिनौना रूप न देख सके। कुन्तल दिखाना भी चाहे तो कोई देख न पाए।

जब मीनल को शोभन की पत्नी होने का पद चाहिए होता है, तो वह हर रोज़ कुन्तल को शोभन द्वारा मानसिक के साथ शारीरिक पीड़ा भी पहुँचाने लगी थी। जब शोभन कुन्तल को पीटता तो वह तोरू को लेकर दूसरे कमरे में चली जाती। जिससे समझ में आता है, उसके अन्दर से नैतिकता ही नहीं मानवता भी ख़तम हो गई है।

शोभन को अपने लेखक होने का घमण्ड भी है, और तो और महत्वकांक्षा भी अधिक है, जिसे वह इन वाक्यों में स्पष्ट करता है- “मीनल, तुमसे सच कहता हूँ मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भारत में पैदा हुआ हूँ, अगर यूरोप में होता तो जाँ पॉल सार्त्र को भी लोग इतना बड़ा नहीं मानते।” अर्थात वह अपनी तुलना किसी दूसरे लेखक से करके खुद को उससे ज्यादा महान बताने का प्रयास करता है।

अपनी कृति आश्वत्थामा को नोबेल पुरस्कार के योग्य मानता है। वह ख़ुद ही ख़ुद को महान बताने और बनाने में लगा है। अपनी महानता बनाएँ रखने के लिए कुन्तल से झूठा ख़त लिखवाने के बाद उसने अपने जानने वालों को भी ख़त लिखे जिसमें उसने कुन्तल को चरित्रहीन और ख़ुद को पीड़ित बताया।

मीनल घृणा की पात्र है, और शोभन सज़ा का। लेकिन उपन्यास में होता इसके विपरीत है। न ही कोई मीनल से घृणा करता है, न ही शोभन को कोई सजा मिलती है।

शोभन के झूठ के कारण समाज की घृणा और ज़िन्दगी भर की सजा कुन्तल को मिलती है। वह बार-बार अपनी गृहस्थी बचाने की कोशिश करती है। कुन्तल ने अपनी गृहस्थी में आई बीमारी का इलाज खोजने की कोशिश नहीं की। वह लगातार समझौता करती रही और पीड़ित होती रही।

उसका और शोभन का रिश्ता सड़ चुका था, उसे ख़ुद ही उसे काटकर अलग कर देना चाहिए था। जब उसके पिता लेने आए थे उनके साथ चले जाना चाहिए था। अपनी बेटी के लिए भी शोभन से लड़ना चाहिए था। लेकिन हर क़दम पर उसने समझौता ही किया है। मीनल और शोभन नाम की बीमारी उसे दिन प्रतिदिन ख़तम करती रही और वह ख़तम होती रही।

शोभन के छोड़ने के बाद भी उसने नौकरी की तलाश की। अपने लिए ज़िन्दगी की नही राह चुनी। वह राह उसे पहले ही बना लेनी चाहिए थी। लेकिन शायद अपनी गर्भवस्था और तोरू के भविष्य के कारण वह ऐसा नहीं कर पाई। जैसे की समाज की बहुत सी स्त्रियाँ नहीं कर पाती। तो जब समाज की स्त्रियाँ नहीं कर पाती तो कहानी की कुन्तल कैसे करती।

पीड़ा देने वाला तब तक ही पीड़ा दे सकता है, जब तक पीड़ा सहने वाला सह रहा है। कहानी, उपन्यास या समाज की कोई भी महिला को इस तरह पीड़ा सहना बन्द कर देना चाहिए। ताकि पीड़ा देने वाले का आस्तित्व ख़तम हो जाए।

रिश्तों में कटुता या अनैतिकता आती है, तो तुरन्त उसका इलाज करना चाहिए। यदि वह लाइलाज है, तो उस रिश्ते को ही ख़तम कर देना चाहिए। नहीं तो वह पीड़ित को ही ख़तम कर देगा। इसके लिए बहुत ज़रूरी है समाज में स्त्री को पुरूष से ज्यादा पढ़ा लिखा होना। साथ ही मानसिक गुलामी से अज़ादी। कुन्तल आर्थिक और सामाजिक से ज्यादा मानसिक गुलाम है, इसलिए वह शोभन और उसके घर को छोड़ने का फैसला नहीं ले पाती है। हर औरत को सबसे पहले मानसिक गुलामी से निकलना होगा, तब भी वह दूसरी गुलामियों से सही मायने में निकल पाएगी।


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