Study Material : राम-भक्ति धारा नोट्स | Notes on the Tradition Ram-bhakti Tradition
राम-भक्ति धारा नोट्स | Ram-bhakti Tradition
राम की उपासना निर्गुण और सगुण, दोनों भक्त करते रहे हैं। अर्थात कबीर और तुलसी, दोनों करते हैं।
अंतर ‘राम’ के अर्थ को लेकर है।
कबीर के राम दशरथ के सुत नहीं, किंतु तुलसी के राम दशरथ के सुत हैं।
हिंदी क्षेत्र के भक्त कवियों का संबंध रामानंद से है।
रामानंद जी राघवानंद के शिष्य एवं रामानुजाचार्य की परंपरा के आचार्य थे।
सभी वर्गों के लोग उनके शिष्य हो सकते थे।
रामानंद पंद्रहवीं शताब्दी में विद्यमान रहे होंगे।
उनके नाम से अनेक रचनाएँ प्रचलित हैं।
उनका कोई काव्य ग्रंथ नहीं मिलता।
योग चिंतामणि भी उनकी रचना के रूप में प्रसिद्ध है, जिसमें बिंदु हठयोग की बातें हैं।
उनके नाम के दो पद गुरुग्रंथ साहब में भी संकलित हैं। किंतु उनकी वैष्णव मताब्ज भास्कर और श्रीरामार्चन पद्धति। दोनों ग्रंथ संस्कृत में हैं।
भक्ति के लिए रामानंद ने वर्णाश्रम व्यवस्था को व्यर्थ बताया।
भक्ति के लिए गरीब-अमीर, स्त्री-पुरुष, निर्गुण सगुण, सवर्ण-अवर्ण, हिंदू-मुसलमान सभी आ सकें।
रामानंद का दूसरा महत्त्व यह है कि उन्होंने लोकभाषा को महत्त्व दिया।
रामानंद के शिष्यों की सूची भक्तमाल में इस प्रकार दी हुई है-
अनंतानंद कंबीर सुखा सुरसुरा पदमावति नरहरि
पीपा भावानंद रैदास धना सेन सुरसुर की घरहरि।
‘सुरसुर की घरहरि’ अर्थात् सुरसुरानंद की घरवाली।
रामानंद ने सुरसुरानंद की पत्नी को भी दीक्षा दी।
रामानंद के शिष्य अनंतानंद थे।
इनके शिष्य कृष्णदास पयहारी हुए जिन्होंने जयपुर के निकट गलता नामक स्थान पर रामानंद संप्रदाय की गद्दी स्थापित की।
मुल्ला दाऊद और जायसी के सूफ़ी प्रबंध-काव्यों का मूल ढाँचा अपभ्रंश कवि स्वयंभू के पउम चरिउ का है, जो कड़वकबद्ध है।
स्वयंभू का पउम चरिउ पद्धड़िया छंद में है।
तुलसीदास (1532-1623) नोट्स | Tulsidas (1532–1623) Notes
गोस्वामी तुलसीदास के जन्म के विषय में एकाधिक मत हैं।
बेनीमाधव दास द्वारा रचित गोसाईं चरित और महात्मा रघुबरदास द्वारा रचित तुलसी चरित, दोनों के अनुसार तुलसीदास का जन्म 1497 में हुआ था।
शिवसिंह ‘सरोज’ के अनुसार सं. 1583 (1526) के लगभग हुआ था।
पं. रामगुलाम द्विवेदी इनका जन्म सं. 1589 (1532) मानते थे। यह निश्चित है कि ये महाकवि सोलहवीं शताब्दी में विद्यमान थे।
तुलसी का बचपन घोर दरिद्रता एवं असहायावस्था में बीता था।
उन्होंने लिखा है, “माता-पिता ने दुनिया में पैदा करके मुझे त्याग दिया। विधाता ने भी मेरे भाल (भाग्य) में कोई भलाई नहीं लिखी”-
मातु पिता जग जाइ तज्यो,
विधि हू न लिखी कछु भाल भलाई।
“जैसे कुटिल कीट को पैदा करके छोड़ देते हैं, वैसे ही मेरे माँ-बाप ने मुझे त्याग दिया”-
तनु जन्यों कुटिल कीट ज्यों तज्यो माता पिता हूँ।
तुलसी की मृत्यु सं. 1680 अर्थात् 1623 में हुई।
उनकी मृत्यु के विषय में यह दोहा प्रसिद्ध है-
संवत सोरह सौ असी असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी तुलसी तज्यो सरीर॥
उनके जन्मस्थान के विषय में काफ़ी विवाद है। कोई उन्हें सोरों का बताता है, कोई राजापुर का और कोई अयोध्या का।
ज्यादातर लोग राजापुर का ही मानते हैं।
उनकी रचनाओं में अयोध्या, काशी, चित्रकूट आदि का वर्णन है।
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 12 ग्रंथ प्रामाणिक माने जाते हैं- दोहावली, कवित्त रामायण (कवितावली), गीतावली, रामचरितमानस, रामाज्ञाप्रश्न, विनयपत्रिका, रामललानहछू, पार्वतीमंगल, जानकीमंगल, बरवै रामायण, वैराग्य संदीपिनी एवं श्रीकृष्णगीतावली। रामचरितमानस की रचना गोसाईं जी ने सं. 1631 अर्थात् 1574 में प्रारंभ की, जैसा कि उनकी इस अर्थाली से प्रकट है—
संवत सोरह सौ इकतीसा। करउँ कथा हरिपद धरि सीसा॥
तुलसी का काव्य-वैभव नोट्स | Notes on the Poetic Grandeur of Tulsidas
गोस्वामी तुलसीदास को हिंदी का जातीय कवि कहा जाता है।
उन्होंने हिंदी क्षेत्र की मध्यकाल में प्रचलित दोनों काव्य भाषाओं-ब्रजभाषा और अवधी में समान अधिकार से रचना की है।
केवल तुलसीदास की ही रचनाओं को देखकर समझा जा सकता है कि मध्यकालीन हिंदी साहित्य में किन काव्य-रूपों में रचनाएँ होती थीं।
उन्होंने वीरगाथा काव्य की छप्पय-पद्धति, विद्यापति और सूरदास की गीत-पद्धति, गंग आदि कवियों की कवित्त सवैया पद्धति, रहीम के समान दोहे और बरवै, जायसी की तरह चौपाई दोहे के क्रम से प्रबंध-काव्य रचे।
तुलसी राम के सगुण भक्त थे, लेकिन उनकी भक्ति में लोकोन्मुखता थी।
वे राम के अनन्य भक्त थे। राम ही उनकी कविता के विषय हैं।
किंतु उनके राम परमब्रह्म होते हुए भी मनुज हैं और अपने देशकाल के आदर्शों से निर्मित हैं।
तुलसी के राम ब्रह्म भी हैं और मानव भी।
रामचरितमानस में अनेक मार्मिक अवसरों पर तुलसी पाठक को टोककर सावधान कर देते हैं कि राम लीला कर रहे हैं, इन्हें सचमुच मनुष्य न समझ लेना।
तुलसी ने वाल्मीकि और भवभूति के राम को पुनः प्रतिष्ठित नहीं किया।
वे अपार मानवीय करुणा वाले हैं, ‘गरीब निवाज’ हैं, दरिद्रता रूपी रावण का नाश करने वाले और बड़वाग्नि से भी भयंकर पेट की आग को बुझानेवाले हैं।
तुलसी के राम, तुलसी के व्यक्तिगत संघर्ष और उनके युग की विषमता के आलोक में प्रकाशित हैं।
दार्शनिक धरातल पर तुलसी के यहाँ द्वंद्व राम के ब्रहात्व और मनुजत्व को लेकर है।
लौकिक धरातल पर यह द्वंद्व ‘कलिकाल’ और ‘रामराज्य’ में है।
तुलसी ने कलियुग का वर्णन विशेष रूप से कवितावली और रामचरितमानस के उत्तरकांड में किया है।
दरिद्रता, रोग, अज्ञान, कामासक्ति आदि का मार्मिक वर्णन किया है।
कवितावली में ‘लंका दहन’ के प्रसंग में आग लगने का जो वर्णन किया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।
उन्होंने राम को ‘गरीब-निवाज’ और ‘पेट की आग को बुझाने वाला’ कहा है। दरिद्रता को जगत का सबसे पीड़ादायी दुख कहा।
तुलसी की रचनाओं में हमारा देश, उसकी प्रकृति, वन-नदियाँ, पशु-पक्षी, फसलें, भाषा, मुहावरे, सौंदर्य, कुरूपता सब बिखरे हैं।
वे देश में बहुत घूमे थे और उन्हें देश से अपार प्रेम था।
तुलसी को तत्कालीन नगर-जीवन का भी पर्याप्त अनुभव रहा होगा, तथापि वे प्रधानतः किसान जीवन के कवि हैं।
चित्रकूट के कोल-किरातों का उन्होंने जो वर्णन किया है उससे लगता है कि उनसे तुलसी की गहरी आत्मीयता रही होगी।
नारी-जीवन के विविध चित्र खींचे हैं। उन्होंने नारी की निंदा भी बहुत की है, किंतु विभिन्न संदर्भों में उन्होंने नारी के प्रति अपार करुणा का भी भाव दिखलाया है।
कत बिधि सजी नारि जग माँही। पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं॥
कैकेयी-मंथरा संवाद और शूर्पनखा प्रसंग यह प्रकट करते हैं कि वे इस देश की नारियों को अनेक रूपों में जानते थे।
तुलसी नारी-निंदक ही नहीं, नारी-सौंदर्य से अत्यंत प्रभावित रचनाकार भी हैं, किंतु वे रीतिकालीन रीतिबद्ध कवियों के समान नारी को केवल भोग्यारूप में ही चित्रित नहीं करते थे। उन्होंने सीता जी की जो वंदना की है, वह कन्या, माँ और प्रिया तीनों रूपों में—
जनकसुता, जगजननी जानकी। अतिसय प्रिय करुणानिधान की॥
तुलसीदास ने तत्कालीन सामंतों की लोलुपता पर प्रहार किया है।
प्रजा-द्रोही शासक तुलसी की रचनाओं में प्रायः उनके कोपभाजन बनते हैं।
उन्होंने अकाल, महामारी के साथ-साथ प्रजा से अधिक कर वसूलने की भी निंदा की है।
यदि लोग वर्णाश्रम का पालन नहीं कर रहे हैं तो वह भी कलिकाल का प्रभाव है।
विषमताग्रस्त कलिकाल तुलसीदास का युग है, जिसमें वे दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों से रहित सर्वसुखद रामराज्य का स्वप्न बुनते हैं।
रामराज्य तुलसी की आदर्श व्यवस्था है। इसके नायक एवं व्यवस्थापक तुलसी के राम हैं।
वे राम को आदर्श राजा, पुत्र, भाई, पति, स्वामी, शिष्य; सीता को आदर्श पत्नी और हनुमान को आदर्श सेवक के रूप में चित्रित करते हैं।
राम से विमुख होकर सभी संबंध त्याज्य हैं—
तजिए ताहि कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेही।
तुलसीदास जिस प्रकार ब्रजभाषा और अवधी, दोनों भाषाओं पर समान अधिकार रखते हैं, उसी प्रकार प्रबंध और मुक्तक दोनों की रचना में भी वे कुशल हैं।
डॉ रामविलास शर्मा के अनुसार रामचरितमानस में तुलसी की करुणा समाजोन्मुख है, विनयपत्रिका में यह आत्मोन्मुख है। व्यक्तिगत एकांतिक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति की दृष्टि से विनयपत्रिका भक्ति काव्य में अनूठी है।
तुलसी विद्वान और दार्शनिक रचनाकार हैं।
वे वर्णानुप्रास के कवि हैं। उन्होंने बोली, विशेषतः अवधी शब्दों में संस्कृत शब्दावली को ऐसा घुलाया है कि पूरी पदावली अवधी के ध्वनिप्रवाह में ढल जाती है।
निर्गुण भक्त कोई लौकिक व्यवस्था का स्वप्न नहीं देखते। वे लौकिक तापों से मुक्ति केवल शून्य चक्र में ही पाते हैं।
नाभादास (16 वीं शती) नोट्स | Nabhadas (16th Century) – Notes
रामानंद के शिष्यों में से एक अनंतानंद थे। उनके शिष्य कृष्णदास पयहारी थे। ये सन् 1575 के आसपास वर्तमान थे।
उन्हीं कृष्णदास पयहारी के शिष्य प्रसिद्ध भक्त नाभादास थे।
नाभादास की रचना भक्तमाल का हिंदी साहित्य में अभूतपूर्व ऐतिहासिक महत्त्व है।
इसकी रचना नाभादास ने 1585 के आसपास की।
इसकी टीका प्रियादास ने 1712 में लिखी।
इसमें 200 भक्तों के चरित 316 छप्पयों में वर्णित हैं। इसका उद्देश्य तो जनता में भक्ति का प्रचार था, किंतु आधुनिक इतिहासकारों के लिए यह हिंदी साहित्य के इतिहास का महत्त्वपूर्ण आधार-ग्रंथ सिद्ध हुआ।
मध्यकाल में तथ्यपरकता पर कम ध्यान रहता था। वहाँ भाव प्रधान था, तथ्य गौण। फिर भी इस ग्रंथ से रामानंद, कबीर, तुलसी, सूर, मीरा आदि के विषय में अनेक तथ्यों का भी पता चलता है।
भक्तमाल के रचयिता आलोचक नहीं थे। फिर भी उन्होंने विभिन्न भक्त कवियों के विषय में जो कुछ लिखा है, उससे उनकी सारग्रहिणी प्रतिभा का संकेत मिल जाता है।
वे प्रायः विभिन्न भक्तों एवं कवियों की विशेषता ही बताकर उनके व्यक्तित्व का वास्तविक परिचय देते हैं।
नाभादास को कुछ लोग डोम जाति का मानते हैं, कुछ क्षत्रिय जाति का। कहते हैं, इनकी तुलसीदास से भेंट हुई थी।
राम-भक्ति शाखा के कुछ अन्य उल्लेखनीय कवि प्राणचंद चौहान (17 वीं शती) एवं हृदय राम (17वीं शती) हैं।
प्राणचंद चौहान ने सन् 1610 में रामायण महानाटक लिखा, जो संवाद के रूप में है।
हृदय राम ने 1613 में भाषा हनुमन्नाटक लिखा। रामचंद्रिका को ध्यान में रखें तो केशवदास रामभक्ति शाखा के कवि ठहरते हैं, यद्यपि केशवदास का साहित्य के इतिहास की दृष्टि से अधिक महत्त्व उनके आचार्यत्व में है।
रामचंद्रिका के संवाद बहुत नाटकीय हैं और उसमें विविध छंदों का प्रयोग किया गया है।
केशवदास ने रामचंद्रिका की रचना 1601 में की थी।
सगुण रामभक्ति शाखा का साहित्य सामाजिक मर्यादा और लोकमंगल का साहित्य है।
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