Study Material : वास्तविक हिंदी साहित्य का प्रारंभ — भक्तिकाल (1400-1700) विश्वनाथ त्रिपाठी
भक्ति के उदय का सामाजिक आधार
भक्ति काव्य पूर्णत – भक्ति आंदोलन पर आधारित है, जो कि एक सामाजिक और वैचारिक आंदोलन माना जाता है। इस काल में भक्ति धर्म-साधना का विषय न रहकर शुद्ध रूप से भावना का विषय बन गई थी, इसीलिए विद्वानों ने इसे धर्म का रसात्मक रूप भी कहा है।
हिंदी भक्ति साहित्य की सुदृढ़ परंपरा की कड़ियाँ महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत नामदेव (जन्म 1267 ई.) से जुड़ने लगती हैं, जिन्होंने हिंदी भाषा में भी अपनी वाणी रची थी। भक्ति काल के अंतर्गत कबीर, जायसी, सूर, तुलसी, रैदास और मीरा जैसी महान प्रतिभाओं के सृजन के कारण ही इस पूरे भक्ति-युग को हिंदी साहित्य का ‘स्वर्ण-युग’ कहा जाता है।
भक्ति के उदय का सामाजिक आधार तलाशते समय आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मत अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार भारत में भक्ति-भावना के उदय का प्रमुख कारण देश में आक्रमणकारी मुसलमानों की विजय थी। यद्यपि वे इस बात को स्वीकार करते थे कि भक्ति आंदोलन का वास्तविक सूत्रपात दक्षिण भारत में हुआ था, लेकिन उनका दृढ़ विचार था कि अपने पौरुष से हताश और हतोत्साहित हिंदू जाति के लिए भगवान की भक्ति और उनकी करुणा की शरण में जाने के अतिरिक्त और कोई दूसरा मार्ग शेष नहीं था।
शुक्ल जी संभवत – उत्तर भारत की हिंदू जनता की इसी पराजित मानसिकता को रेखांकित करना चाहते थे, जिसने भक्ति के प्रचार और प्रसार के लिए एक अत्यंत अनुकूल भूमि तैयार करने का कार्य किया।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने आचार्य शुक्ल के ‘पराजित मानसिकता’ वाले तर्क का कड़ा खंडन किया है। द्विवेदी जी के अनुसार, भक्ति आंदोलन भारतीय चिंता-धारा का स्वाभाविक विकास है। उनका यह प्रसिद्ध तर्क अत्यंत महत्वपूर्ण है कि यदि भारतीय जनता की पराजित भावना ही भक्ति का कारण होती, तो भक्ति का उदय सबसे पहले उत्तर भारत में होना चाहिए था जहाँ मुसलमान आक्रमणकारी आए थे, न कि दक्षिण भारत में। द्विवेदी जी मानते हैं कि उत्तर भारत के नाथ-सिद्धों की साधना, अवतार और लीला की अवधारणा तथा जातिगत कठोरता, दक्षिण भारत से आई हुई भक्ति धारा में घुल-मिल गई।
वे कबीर की तेजस्विता को ‘पराजित मानसिकता’ के बजाय जुलाहा जाति की सामाजिक मर्यादा के प्रति असंतोष की भावना से जोड़ते हैं। उनके अनुसार, भक्ति काल का साहित्य पूरी तरह से लोकोन्मुख (जनता की ओर मुड़ा हुआ) है, जो करुणा और परदुखकातरता से युक्त है।
इसी सामाजिक आधार की व्याख्या में इरफान हबीब और रामशरण शर्मा जैसे इतिहासकारों के शोध भी महत्वपूर्ण हैं। इनके अनुसार, उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन की निर्गुण धारा के उत्थान में शिल्पियों, जाटों और किसानों की प्रमुख भूमिका रही है।
तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी में नए शासकों की सत्ता स्थापित होने से विलासिता की वस्तुओं की माँग बढ़ी, जिससे सड़कों और भवनों का निर्माण तेज हुआ। इस आर्थिक बदलाव के कारण अवर्ण शिल्पियों और कामगारों की स्थिति में सुधार आया और उनमें अपनी सामाजिक मर्यादा को ऊपर उठाने की भावना पैदा हुई। निर्गुण पंथ के संतों की भावना का सामाजिक आधार यही आर्थिक उन्नति थी।
भक्ति के सामाजिक आधार का एक और पक्ष दक्षिण भारत की परिस्थितियों से जुड़ा है। वहाँ पहली शताब्दी से ही पराक्रमी शासकों के संरक्षण में व्यापार-उद्योग और सिंचाई व्यवस्था की उन्नति हुई थी, जिससे शिल्पियों और किसानों की आर्थिक स्थिति उत्तर भारत से बहुत पहले ही बेहतर हो गई थी।
भक्ति के आद्य आचार्य रामानुज का विशिष्टाद्वैत दर्शन भक्ति का वैचारिक आधार बना, जो जगत को मिथ्या नहीं बल्कि वास्तविक मानता है। दक्षिण की महिला भक्त अंदाल को ‘दक्षिण की मीरा’ कहा जाता है, जो मीरा से कई शताब्दी पूर्व हुई थीं।
अंततः यह माना जाता है कि “भक्ति द्रविड़ उपजी, लाए रामानंद”, अर्थात् रामानुजाचार्य की परंपरा के आचार्य रामानंद ही भक्ति को उत्तर भारत में लाए और उसे लोकोन्मुख बनाकर समाज के सभी वर्गों (स्त्री-पुरुष, राजा-रंक, सवर्ण-अवर्ण) के लिए सुलभ कर दिया।
भक्ति की धाराएँ : विभिन्न संप्रदाय
भक्ति आंदोलन के दौरान भक्ति की दो प्रमुख धाराएँ प्रवाहित हुईं— निर्गुण धारा और सगुण धारा। निर्गुण और सगुण के बीच का अंतर इस बात पर नहीं है कि निर्गुण के राम गुणहीन हैं और सगुण के राम गुणों सहित हैं; बल्कि निर्गुण मत में राम को ‘गुणातीत’ माना गया है। निर्गुण और सगुण मतवाद का वास्तविक अंतर अवतार एवं लीला की अवधारणाओं को लेकर है। निर्गुण मत के भगवान कृपालु और दयावान तो हैं, लेकिन वे न तो अवतार लेते हैं और न ही लीला करते हैं, वे निराकार हैं।
इसके विपरीत, सगुण मत में ईश्वर अवतार लेते हैं, दुष्टों का दमन करते हैं और अपनी लीलाओं से भक्तों का मनोरंजन करते हैं। सगुण मत के प्रमुख आराध्य राम और कृष्ण हैं। हालांकि, दोनों धाराओं में ‘भगवद्विषयक रति’ (ईश्वर के प्रति प्रेम) और ‘अनन्यता’ जैसे लक्षण समान रूप से पाए जाते हैं।
भक्ति काल में चार प्रमुख वैष्णव संप्रदायों का विशेष महत्व है, जिनके आचार्यों ने भक्ति को दार्शनिक आधार प्रदान किया। पहला श्रीसंप्रदाय है, जिसके आचार्य रामानुजाचार्य थे। इसी परंपरा में आगे चलकर रामानंद हुए, जिन्होंने भक्ति के मार्ग को अत्यंत उदार बनाया।
रामानंद ने संस्कृत के बजाय हिन्दी को अपने मत के प्रचार का माध्यम बनाया और वर्णश्रम व्यवस्था की संकीर्णता को तोड़कर सवर्ण-अवर्ण, स्त्री-पुरुष और राजा-रंक सभी को अपना शिष्य बनाया। उनके प्रसिद्ध बारह शिष्यों में कबीर, रैदास, धन्ना और पीपा जैसे नाम शामिल हैं।
दूसरा ब्रह्म संप्रदाय है, जिसके प्रवर्तक मध्वाचार्य थे और चैतन्य महाप्रभु पहले इसी संप्रदाय में दीक्षित हुए थे।
तीसरा रुद्र संप्रदाय है, जिसके प्रवर्तक विष्णुस्वामी थे। यह संप्रदाय हिन्दी में वल्लभाचार्य के ‘पुष्टि मार्ग’ के रूप में जीवित रहा, जहाँ कृष्ण की उपासना और प्रेमलक्षणा भक्ति पर बल दिया गया। सूरदास और अष्टछाप के कवि इसी संप्रदाय के प्रभाव में रहे। चौथा सनकादि संप्रदाय है, जिसके प्रवर्तक निम्बार्काचार्य थे, जिनका संबंध आगे चलकर राधा की प्रधानता वाले ‘राधावल्लभी संप्रदाय’ से जुड़ा।
भक्ति आंदोलन में सूफी साधना का भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। सूफी संत यद्यपि इस्लाम के अनुयायी थे, लेकिन उनकी साधना पद्धति भारतीय अद्वैतवाद से मेल खाती थी। उन्होंने ‘अनलहक’ (मैं ही ब्रह्म हूँ) की घोषणा की। सूफी साधना के अनुसार मनुष्य के चार विभाग होते हैं— नफ़्स (इंद्रिय), अक्ल (बुद्धि), कल्ब (हृदय) और रूह (आत्मा)।
इसमें नफ़्स और अक्ल को दबाकर हृदय की साधना द्वारा रूह की प्राप्ति पर बल दिया जाता है। भारत में सूफी साधना के चार प्रमुख संप्रदाय प्रसिद्ध हुए— चिश्ती, सोहरावर्दी, कादरी और नक्शबंदी। मुल्ला दाऊद और मलिक मुहम्मद जायसी इस परंपरा के महान कवि हैं, जिन्होंने हिन्दू घरों में प्रचलित लोक-कथाओं को अपने काव्य का आधार बनाया।
इन संप्रदायों के अतिरिक्त भक्ति काल में कुछ स्वतंत्र मत भी प्रभावी थे। महाराष्ट्र के संत नामदेव और पंजाब के गुरु नानक ने हिन्दी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया। नामदेव की रचनाओं में सगुणोपासना और निर्गुणोपासना दोनों के दर्शन होते हैं, जबकि गुरु नानक ने निर्गुण ब्रह्म की भक्ति का प्रचार किया और वर्णश्रम व्यवस्था का विरोध किया।
भक्ति का यह प्रभाव तत्कालीन संगीत और कलाओं में भी देखा जा सकता है, जहाँ स्वामी हरिदास जैसे भक्त संगीतकार हुए और मूर्तिकला एवं नृत्य का मुख्य विषय राधा-कृष्ण की लीलाएँ बन गईं। भक्ति साहित्य के प्रसार के कारण मध्यदेश की काव्य भाषा के रूप में ब्रजभाषा और अवधी पूरे देश में प्रतिष्ठित हुईं, यहाँ तक कि सुदूर दक्षिण और पूर्व के रचनाकारों ने भी ब्रजभाषा में साहित्य रचना की।
सूफी साधना
भक्ति आंदोलन की व्यापकता में सूफी संतों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो यद्यपि इस्लाम मतानुयायी थे, किंतु अपने दर्शन और साधना-पद्धति के कारण इस आंदोलन में गणनीय रहे हैं।
सूफी संत इस्लाम के एकेश्वरवाद को मानते हुए भी भारतीय अद्वैतवाद के निकट दिखाई देते हैं और उन्होंने ‘अनलहक’ (मैं ब्रह्म हूँ) की घोषणा की है।
सूफी साधना के अनुसार मनुष्य के चार प्रमुख विभाग माने गए हैं— नफ़्स (इंद्रिय), अक्ल (बुद्धि या माया), कल्ब (हृदय) और रूह (आत्मा)।
इस साधना में नफ़्स और अक्ल को दबाकर हृदय की साधना द्वारा रूह की प्राप्ति पर बल दिया जाता है, जहाँ निर्मल हृदय-रूपी दर्पण में परम सत्ता का प्रतिबिंब आभासित होता है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने मलिक मुहम्मद जायसी जैसे सूफी कवियों को कबीर, सूर और तुलसी की कोटि में ही रखा है।
हिन्दी के प्रथम सूफी कवि मुल्ला दाऊद (1379 ई.) माने जाते हैं और भारत में सूफी साधना के चार प्रमुख संप्रदाय प्रसिद्ध हुए— चिश्ती, सोहरावर्दी, कादरी और नक्शबंदी।
सूफी कवियों ने प्राय अवधी भाषा का प्रयोग किया और हिंदू घरों में प्रचलित लोक-कथाओं को अपने काव्य का आधार बनाकर उनमें भारतीय संस्कृति और ‘प्रेम की पीर’ की व्यंजना की है।
अन्य मत और भक्ति का प्रभाव
आधुनिक हिन्दी क्षेत्र के बाहर के कवियों में महाराष्ट्र के संत नामदेव (13वीं शती) और पंजाब के गुरु नानक (15वीं शती) का हिन्दी साहित्य में बड़ा योगदान है।
नामदेव की रचनाओं में सगुणोपासना और निर्गुणोपासना दोनों के दर्शन होते हैं, जबकि गुरु नानक देव सिक्ख संप्रदाय के प्रथम गुरु थे जिनका दृष्टिकोण कबीर से काफी मिलता-जुलता था, यद्यपि उनके स्वर में कबीर जैसी प्रखरता के स्थान पर सौम्यता थी।
भक्ति के इन विभिन्न छोटे-छोटे संप्रदायों में कुछ सामान्य लक्षण अनिवार्य रूप से मिलते हैं, जैसे भगवद्विषयक रति, अनन्यता, पूर्ण समर्पण, सदाचार और प्राणिमात्र पर करुणा।
भक्ति का प्रभाव केवल साहित्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मध्यकाल की संगीत, मूर्ति, चित्र और नृत्य जैसी समस्त सांस्कृतिक गतिविधियों में देखा जा सकता है।
इस काल के प्रसिद्ध संगीतकार स्वामी हरिदास स्वयं एक भक्त थे और विभिन्न कलाओं का मुख्य विषय राधा-कृष्ण की लीलाएँ ही रहीं।
भक्ति साहित्य के अखिल भारतीय प्रसार के कारण मध्यदेश की भाषा (ब्रज और अवधी) पूरे देश में प्रतिष्ठित हुई और इसमें जायसी, रहीम एवं रसखान जैसे मुसलमान रचनाकारों ने भी अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
‘भक्ति साहित्य के रूपात्मक स्रोत: भाषा, काव्य-रूप और छंद’
भक्ति आंदोलन एक अखिल भारतीय आंदोलन था जिसका परिणाम यह हुआ कि लगभग पूरे देश में मध्यदेश की काव्य भाषा हिन्दी-ब्रजभाषा का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ।
संत नामदेव और गुरु नानक देव ने अपनी मूल भाषाओं (मराठी और पंजाबी) के साथ-साथ ब्रजभाषा में भी रचनाएँ कीं।
डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार पंद्रहवीं से सत्रहवीं शती के बीच व्यापारिक मंडियों और नगरों के विकास ने मध्यदेश की भाषा के प्रसार के लिए अनुकूल स्थितियाँ तैयार की थीं।
भक्तिकालीन हिन्दी काव्य की प्रमुख भाषा ब्रजभाषा रही है, क्योंकि यह प्राचीन काल से ही मध्यदेश की काव्य भाषा रही शौरसेनी का विकसित रूप थी।
ब्रजभाषा की लोकप्रियता का मुख्य श्रेय कृष्ण-भक्ति काव्य और सूरदास जैसे महान कवियों को जाता है, जिसके कारण यह ब्रज क्षेत्र के बाहर भी काव्य-भाषा के रूप में स्वीकृत हुई और सुदूर दक्षिण एवं पूर्व (बंगाल-असम में ‘ब्रजबुलि’) तक इसका प्रभाव फैला।
भक्तिकाल की दूसरी महत्वपूर्ण भाषा अवधी है, जिसका प्रयोग मुख्य रूप से राम-भक्ति और सूफी कवियों द्वारा किया गया।
यद्यपि अवधी ब्रजभाषा जितनी व्यापक नहीं थी, लेकिन जायसी और तुलसीदास की रचनाओं ने इसे साहित्यिक ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। इनके अतिरिक्त शुद्ध खड़ी बोली का प्रयोग इस काल में केवल अमीर खुसरो की पहेलियों आदि में मिलता है, लेकिन इसका कोई निरंतर साहित्यिक सिलसिला नहीं रहा।
इस काल में एक मिश्रित रूप ‘सधुक्कड़ी’ भी प्रचलित था, जो पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, ब्रज और कहीं-कहीं अवधी का पंचमेल था।
काव्य-रूपों की दृष्टि से भक्तिकाल में ‘गेयपद’ और ‘दोहा-चौपाई’ की प्रधानता रही है।
गेयपदों की परंपरा सिद्धों से प्रारंभ होकर नामदेव, नानक, कबीर, सूर, तुलसी और मीरा तक विस्तृत रही, जिसमें काव्य और संगीत का अद्भुत समन्वय मिलता है।
दोहा-चौपाई में निबद्ध ‘कड़वकबद्धता’ प्रबंध काव्यों की प्रमुख शैली रही, जिसका प्रयोग जायसी के ‘पद्मावत’ और तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा।
दोहे की परंपरा अपभ्रंश से चली आ रही थी और कबीर की ‘साखी’ इसी परंपरा का हिस्सा है।
भक्ति काव्य में प्रयुक्त होने वाले छंदों में छप्पय, सवैया, कवित्त, भुजंग प्रयात, बरवै और हरिगीतिका प्रमुख हैं। इनमें से ‘सवैया’ और ‘कवित्त’ को हिन्दी के अपने निजी छंद माना जाता है, जो भक्तिकाल में ही पूरी तरह प्रतिष्ठित हुए।
गोस्वामी तुलसीदास एक ऐसे विलक्षण कवि थे जिन्होंने मध्यकाल में प्रचलित लगभग सभी काव्य-रूपों और छंदों का प्रयोग अपनी रचनाओं में किया।
उन्होंने न केवल शास्त्रीय छंदों बल्कि मंगलकाव्य, नहछू और सोहर जैसे लोक-साहित्य के रूपों का भी उपयोग किया जो उस समय समाज में विवाह और पुत्र-जन्म के समय गाए जाते थे।
इस प्रकार भक्तिकाल का साहित्य विविध काव्य-रूपों और कलात्मकता से युक्त होकर जन-सामान्य की करुणा और संवेदना को व्यक्त करने वाला एक सशक्त माध्यम बना।
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