सारांश व समीक्षा : प्रेमचंद की कहानी भूत | Premchand’s Story ‘Bhoot’

सारांश व समीक्षा : प्रेमचंद की कहानी भूत | Premchand’s Story ‘Bhoot’

कहानी का परिचय

भविष्य में किसके लिए क्या छिपा है, कोई नहीं जानता। वर्तमान भविष्य का आधार हो सकता है, लेकिन भविष्य का निश्चयक नहीं हो सकता क्योंकि परिस्थिति प्रतिक्षण बदलती रहती है। आज हमारे मन में किसी के लिए जो भवनाएँ हैं भविष्य में भी वही होंगी यह जरूरी नहीं है। मुमकिन है, भवनाएँ बदलकर श्रद्धा का रूप ले लें या कुछ और हो सकता है,  भवनाएँ अनैतिक भी हो सकती हैं।

प्रकृति ने स्त्री-पुरूष के बीच सर्वप्रथम एक ही रिश्ता रखा है, दो मनाव (स्त्री-पुरुष) मनुष्य की उत्तपत्ति के लिए जरूरी है। हमने समाजिक और परिवारिक रूप में उन रिश्तो के नाम रख लिए हैं। आज हम एक ऐसी कहानी की बात कर रहे हैं, जिसमें एक पति-पत्नी ने एक छोटी बच्ची को अपनी बेटी की तरह पाला पोसकर बड़ा किया लेकिन पत्नी की मृत्यु के बाद पुरूष ने उसी बच्ची से विवाह कर लिया। प्रकृति द्वारा स्थापिर प्राकृतिक रिश्ता प्रभावी हो गया। मनुष्य के प्रयासो द्वारा बनाया पिता-पुत्री का रिश्ता कमज़ोर पड़ गया।

यह कहानी ‘प्रेमचंद’ द्वारा लिखी गई है, जिसका नाम है ‘भूत’। यह कहानी मानसरोवर भाग-4 में शामिल है।

भूत कहानी का सारांश

इस कहानी के मुख्य पात्र हैं- पंडित सीतानाथ चौबे, मंगला देवी, बिन्नी हैं। पंडित सीतानाथ चौबे के चार बेटे हैं, उनकी पत्नी का नाम मंगला देवी है। मुरादाबाद के पंडित सीतानाथ चौबे 30 साल से वकीलों के नेता हैं। उनकी पत्नी भी बड़ी सरल और घर के कामों में कुशल हैं, कम रूपए में घर चलाने वाली महिला हैं।

बचपन में ही चौबे जी के पिता की मृत्यु हो जाने के बाद उनकी माता ने कठिन परिस्थितियों में उनका पालन-पोषण और शिक्षा की। अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर चौबेजी सफल वकील बनते हैं और काफी धन-संपत्ति अर्जित कर लेते हैं।

यह कहानी ‘भूत’ मानवीय भावनाओं, सामाजिक मान्यताओं, स्वार्थ, वासना और अपराध-बोध की जटिलता को सामने लाने वाली कहानी है। कहानी के केंद्र में पंडित सीतानाथ चौबे, उनकी पत्नी मंगला देवी और उनकी पालित पुत्री बिन्नी अर्थात् विंध्येश्वरी हैं। कहानी में ‘भूत’ केवल किसी अलौकिक शक्ति का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर मौजूद अपराध-बोध और अनैतिक भावों की मानसिक यातना का भी प्रतीक है।

चौबे जी की पहली संतान बेटी हुई थी, और वह नहीं रही। उसके बाद उन्हें कोई बेटी नहीं हुई। दोनों को ही एक बेटी की कमी महसूस होती रहती है, जिस कारण एक दिन मंगला अपनी सौतेली माँ की चार साल की बेटी को अपने घर ले आती है। उसकी परवरिश करती है, चौबे जी और मंगला दोनों अपनी बेटी के अरमान बिन्नी को स्नेह देकर पूरा करते हैं।

बिन्नी धीरे-धीरे अपने वास्तविक माता-पिता को भूलकर चौबेजी और मंगला को ही अपने माता-पिता मानने लगती है। चौबेजी भी उससे बहुत स्नेह करते हैं। वह उसे अपनी बेटी कहते हैं और उसके साथ पिता-पुत्री जैसा व्यवहार करते हैं। बिन्नी के आने से चौबेजी का घर खुशियों से भर जाता है।

समय बीतता है और बिन्नी बड़ी होकर सुंदर, सुशील, कुशल और शिक्षित युवती बन जाती है। चौबेजी उसके विवाह के लिए योग्य वर खोजते हैं। एक अच्छा वर मिल जाता है और विवाह की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। लेकिन विवाह से कुछ दिन पहले ही मंगला देवी अचानक बीमार पड़ जाती हैं और तीन दिनों के भीतर उनकी मृत्यु हो जाती है। मृत्यु से पहले मंगला चौबेजी से बिन्नी के बारे में विशेष रूप से कहती हैं कि वह उसे हमेशा अपनी बेटी समझें और उसके विवाह में कोई कमी न रखें। इसी साल उसका विवाह कर दें, चौबेजी भी उनकी बात मानने का वचन देते हैं।

मंगला की मृत्यु के बाद चौबेजी का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। वह अपनी पत्नी के वियोग में टूट जाते हैं। बिन्नी उनकी सेवा करती है और उन्हें अकेलेपन से उबारने का प्रयास करती है। वह उनके लिए भोजन बनाती है, उन्हें पुराणों की कथाएँ सुनाती है, रात में उनकी सेवा करती है और उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखती है। धीरे-धीरे चौबेजी के मन में बिन्नी के प्रति पिता का भाव कमज़ोर पड़ने लगता है। अब वह उसे अपनी बेटी के रूप में देखने के बजाय एक युवती के रूप में देखने लगते हैं। यह परिवर्तन कहानी का सबसे महत्वपूर्ण और दुखद मोड़ है। जहाँ चौबे जी बिन्नी को अपनी बेटी मानते थे, अब वह उसे अपनी पत्नी के स्थान पर देखने लगे थे। उन्होंने एक दिन मंगला के सारे गहने बिन्नी को दे दिए।

चौबेजी अपने मन के इस परिवर्तन को उचित ठहराने के लिए स्वयं को समझाने लगते हैं कि बिन्नी उनकी वास्तविक बेटी नहीं है, बल्कि उनकी साली है। इसी मानसिक संघर्ष के बाद वह बिन्नी का विवाह रोक देते हैं। बिन्नी को इस बात का वास्तविक कारण पता नहीं होता। वह अब भी चौबेजी को अपने पिता के समान मानती है और उनकी सेवा को अपना कर्तव्य समझती है।

इसके बाद चौबेजी बिन्नी की माँ के पास जाते हैं। वहाँ बिन्नी की माँ उन्हें अपनी बेटी से विवाह करने के लिए तैयार करने का प्रयास करती है। वह धन या संपत्ति का लालच देने के बजाय चौबेजी की दयनीय स्थिति और अकेलेपन का हवाला देकर बिन्नी को भावनात्मक रूप से प्रभावित करती है। अंततः बिन्नी यह सोचकर विवाह के लिए तैयार हो जाती है कि उसके कारण चौबेजी का जीवन बच सकता है और वह उनकी सेवा कर सकेगी। वह अपने सुख की चिंता न करके उनके हित के लिए अपना जीवन बलिदान करने का निर्णय लेती है।

परिणाम स्वरूप जिस बिन्नी को चौबेजी वर्षों पहले बेटी बनाकर घर लाए थे, वही अब उनकी पत्नी बनकर उसी घर में आती है। विवाह के बाद बिन्नी अत्यंत संकोच और मानसिक पीड़ा में रहती है। वह अपने अतीत को भूल नहीं पाती, क्योंकि उसने चौबेजी को हमेशा पिता के समान माना है। उसके लिए यह परिवर्तन स्वाभाविक नहीं है।

लेकिन चौबे जी ने बिन्नी से विवाह के बाद के जो सुनहरे सपने देखे थे, वह वैसे पूरे नहीं होत हैं, विवाह की रात चौबेजी को खिड़की से अपनी मृत पत्नी मंगला दिखाई देती है। बिन्नी को कुछ दिखाई नहीं देता। चौबेजी इसे अपनी मानसिक अवस्था या मंगला की आत्मा का संकेत मानते हैं। थोड़ी देर बाद उन्हें फिर मंगला दिखाई देती है। बिन्नी भयभीत हो जाती है और समझती है कि मंगला की आत्मा उनके इस निर्णय से दुखी है।

इसके बाद चौबेजी के कानों में बार-बार एक आवाज़ गूँजती है—“बिन्नी तुम्हारी पुत्री है।” यह आवाज़ उनके भीतर के अपराध-बोध को और तीव्र कर देती है। उन्हें लगता है कि उन्होंने मंगला के अंतिम आदेश का उल्लंघन करके बहुत बड़ा गलत काम किया है। अंततः वह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने बुरा किया है और मंगला के आदेश की उपेक्षा करके ठीक नहीं किया। भय और मानसिक यातना से व्याकुल होकर वह वहाँ से भाग जाते हैं और बेहोश होकर गिर पड़ते हैं। बिन्नी भी अत्यंत भयभीत होकर गिर पड़ती है।

परिणाम स्वरूप कहानी का अंत चौबेजी के अपराध-बोध और मानसिक पीड़ा के साथ होता है। यह संभव नहीं कि मंगला उन्हें सच में दिखाई दे, लेकिन उनकी अंतरआत्मा उन्हें बार-बार उनके वचन को याद दिलाती है और अपराध बोध करवाती है।

कहानी की समीक्षा

‘भूत’ कहानी की समीक्षा — मुंशी प्रेमचंद

मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘भूत’ मानवीय मनोविज्ञान, नैतिकता, सामाजिक मर्यादा और अपराध-बोध की गहरी पड़ताल करने वाली कहानी है। कहानी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रेमचंद ने ‘भूत’ को केवल किसी अलौकिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसे मनुष्य के भीतर के अपराध-बोध और उसके गलत कर्मों की मानसिक यातना से जोड़ दिया है। कहानी का अंत पाठक को यह सोचने के लिए विवश करता है कि वास्तविक भूत बाहर है या मनुष्य के अपने अंतर्मन में।

1. चरित्र-चित्रण

कहानी का सबसे प्रभावशाली चरित्र पंडित सीतानाथ चौबे हैं। शुरुआत में वह परिश्रमी, सफल, पत्नी-परायण और परिवार के प्रति ज़िम्मेदार व्यक्ति दिखाई देते हैं। लेकिन उनके व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष धीरे-धीरे सामने आता है। मंगला की मृत्यु के बाद उनकी इच्छाएँ उनके विवेक पर हावी होने लगती हैं। वे अपने गलत निर्णय को उचित सिद्ध करने के लिए स्वयं को तरह-तरह से समझाते हैं।

बिन्नी का चरित्र इसके विपरीत सरल और त्यागमय है। वह चौबेजी को पिता के समान मानती है और उनकी सेवा करती है। विवाह के लिए भी वह अपने सुख के बारे में नहीं सोचती, बल्कि यह मानकर तैयार होती है कि उसके कारण चौबेजी का जीवन संभल जाएगा।

मंगला देवी कहानी में नैतिक विवेक और पारिवारिक मर्यादा की प्रतिनिधि हैं। मृत्यु के समय उनका बिन्नी को बेटी मानकर उसका विवाह कराने का आग्रह कहानी में नैतिक ज़िम्मेदारी और उनकी अधूरी ख्वाहिश को उजागर करता है।

3. मनोवैज्ञानिक पक्ष

कहानी की सबसे बड़ी शक्ति इसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है। चौबेजी का बाहरी संघर्ष जितना महत्वपूर्ण है, उससे अधिक महत्वपूर्ण उनका आंतरिक संघर्ष है। वह जानते हैं कि बिन्नी को उन्होंने बेटी के रूप में पाला है, फिर भी अपने मन में उत्पन्न नए भावों को उचित ठहराने का प्रयास करते हैं।

विवाह के बाद मंगला का दिखाई देना और आवाज़ का सुनाई देना इसी मानसिक संघर्ष को चरम पर पहुँचा देता है। इसलिए कहानी का ‘भूत’ वास्तविक आत्मा है या चौबेजी के अपराध-बोध की उपज—यह प्रश्न खुला रहता है। यह संभव नहीं है कि मंगला उन्हें सच में दिखाई दे, वह सिर्फ उनकी मानसिक स्थिति का परिणाम हैं।

4. सामाजिक और नैतिक पक्ष

प्रेमचंद ने कहानी के माध्यम से संबंधों की मर्यादा और सामाजिक नैतिकता का प्रश्न उठाया है। पिता-पुत्री के संबंध को विवाह के संबंध में बदल देना कहानी की सबसे गंभीर नैतिक समस्या है। बिन्नी के लिए यह परिवर्तन विशेष रूप से पीड़ादायक है, क्योंकि उसके मन में चौबेजी के प्रति शुरू से पिता का भाव रहा है। विवाह के बाद भी उसका संकोच और मानसिक असहजता इसी बात को स्पष्ट करता है।

साथ ही कहानी यह भी दिखाती है कि सामाजिक परिस्थितियाँ और पारिवारिक दबाव किस प्रकार किसी व्यक्ति को ऐसे निर्णय की ओर धकेल सकते हैं, जिसे वह सामान्य परिस्थिति में स्वीकार न करता।

5. शीर्षक की सार्थकता

‘भूत’ शीर्षक अत्यंत सार्थक है। कहानी के अंतिम हिस्से में मंगला का भूत दिखाई देता है, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ इससे कहीं व्यापक है। भूत का तो अर्थ यह होता है, जो बीत चुका है, वर्तमान में है ही नहीं। इसी तरह मंगला वहाँ नहीं है। चौबेजी के लिए सबसे बड़ा भूत उनका अपराध-बोध है। मंगला की आकृति और “बिन्नी तुम्हारी पुत्री है” की आवाज़ उनके भीतर दबे नैतिक सत्य को सामने लाती है।

अर्थात् भूत केवल बाहर दिखाई देने वाली आकृति नहीं, बल्कि वह मानसिक शक्ति भी है जो मनुष्य को उसके अनैतिक कार्यों से सामना कराती है।

6. भाषा-शैली

प्रेमचंद की भाषा कहानी में सरल, प्रभावशाली और वर्णनात्मक है। पात्रों के संवाद स्वाभाविक हैं और उनके माध्यम से उनके मनोभाव सामने आते हैं। विशेष रूप से अंतिम दृश्य में छोटे-छोटे संवाद, भय का वातावरण और बार-बार सुनाई देने वाली आवाज़ कहानी में तनाव पैदा करती है।

निष्कर्ष

यह सिर्फ एक कहानी थी, जिसमें प्रेमचंद ने पिता-पुत्री के सामान के संबंध में भी एक आवरण रखा है, कि बिन्नी उनकी साली है। और साली से विवाह करना कोई बड़ी बात नहीं समान्य बात है, लेकिन अगर आज हम समाचार पत्र, इत्यादि में देखें तो वर्तमान में क्या स्थिति है। जान पाएँगे, इस कहानी में जहाँ जीजा-साली का आवरण हैं, शायद हमें वह अवरण भी देखने को नहीं मिलता और वह संबंध जहाँ पिता-पुत्री के समान संबंध हैं, वह अनैतिक मनोभवों के कारण प्रभावित हो रहे हैं। विचार कीजिए


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