Class 10 (NIOS) चित्रकला (Painting) अध्याय 9: समकालीन भारतीय कला | Samakaleen Bharateey Kala
समकालीन भारतीय कला के विकास और उसके प्रमुख कलाकारों का परिचय देता है। इसमें बताया गया है कि कैसे आधुनिक भारतीय चित्रकला पर पश्चिमी आंदोलनों और पूर्वी शैलियों दोनों का गहरा प्रभाव पड़ा है। स्रोत में कृष्ण रेड्डी की प्रिंटमेकिंग तकनीक, बिनोद बिहारी मुखर्जी के ऐतिहासिक भित्ति-चित्र और एफ.एन. सूजा के क्रांतिकारी शहरी परिदृश्यों का विशेष वर्णन किया गया है। यह लेख स्पष्ट करता है कि इन कलाकारों ने पारंपरिक भारतीय पहचान को अंतरराष्ट्रीय कला तकनीकों के साथ सफलतापूर्वक जोड़ा। अंत में, यह कोलकाता और मुंबई जैसे शहरों में उभरे विभिन्न कला समूहों के योगदान को रेखांकित करता है। इन माध्यमों से पाठकों को भारतीय कला के आधुनिक बदलावों और विविध माध्यमों की समझ मिलती है।
यह लेख कक्षा 10 (NIOS) के पाठ्यक्रम के अध्याय ‘समकालीन भारतीय कला’ पर आधारित है। इसे पढ़ने के बाद आपको इस विषय को समझने के लिए अलग से किताब देखने की आवश्यकता नहीं होगी।
समकालीन भारतीय कला की शुरुआत
भारतीय कला के इतिहास में, मुगल साम्राज्य के पतन और प्राचीन एवं मध्यकालीन कला के अंत के बाद, ब्रिटिश शासन के आगमन के साथ समकालीन भारतीय कला का जन्म हुआ। इसके शुरुआती दौर में राजा रवि वर्मा, अवनींद्रनाथ टैगोर, अमृता शेरगिल, रवींद्रनाथ टैगोर और जैमिनी राय जैसे कलाकारों ने अग्रणी भूमिका निभाई।
इन कलाकारों ने पश्चिमी कला आंदोलनों (जैसे जर्मन अभिव्यक्तिवाद, घनवाद और अतियथार्थवाद) को भारतीय आध्यात्मिकता के साथ मिलाकर एक नई पहचान बनाने की कोशिश की। जहाँ एक तरफ उन्होंने पश्चिमी तकनीकों का उपयोग किया, वहीं दूसरी ओर भारतीय परंपराओं और लोक कला की जड़ों को भी थामे रखा।
प्रमुख कला समूह और आंदोलन
भारतीय कला को नई दिशा देने के लिए कई समूहों का गठन हुआ:
- कोलकाता ग्रुप (1943): इसमें प्रदोष दास गुप्ता और परितोष सेन जैसे कलाकार शामिल थे।
- प्रगतिशील कलाकार समूह (Progressive Artists’ Group, 1947): मुंबई में स्थापित इस समूह में एफ.एन. सूजा, एस.एच. रज़ा और एम.एफ. हुसैन जैसे प्रसिद्ध कलाकार थे।
- अन्य योगदान: देवी प्रसाद राय चौधरी और सरदा उकील ने उत्तर और दक्षिण भारत में आधुनिक कला को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रमुख कृतियों का विस्तृत विवरण
1. वज़र्लपूल (Whirlpool) – कृष्ण रेड्डी (1962)
- तकनीक: यह चित्र ‘इंटैग्लियो’ (Intaglio) पद्धति से बनाया गया है। इसमें तांबे या जस्ते की प्लेट पर आकृतियाँ उकेरी जाती हैं और स्याही भरकर गीले कागज पर मशीन से छापा जाता है।
- विशेषता: कृष्ण रेड्डी अपने समय के सबसे प्रसिद्ध प्रिंट मेकर माने जाते हैं। ‘वज़र्लपूल’ (भंवर) उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति है।
- भाव: इस चित्र में प्रकृति के प्रभाव को दिखाया गया है, जहाँ सब कुछ एक अंतरिक्षीय भंवर में खो जाता है। इसमें सितारे, फूल और बादलों जैसे बिम्बों को अमूर्त रूप में पिरोया गया है।
2. मीडिवाल सेंट्स (Medieval Saints) – बिनोद बिहारी मुखर्जी (1947)
- तकनीक: यह शांतिनिकेतन के हिंदी भवन की दीवार पर बना एक भित्तिचित्र (Fresco) है। इसमें ‘फ़्रेस्को बुओनो’ तकनीक का उपयोग हुआ है, जिसमें गीले चूने के प्लास्टर पर रंगों को पानी के साथ लगाया जाता है ताकि वे दीवार का स्थायी हिस्सा बन सकें।
- कलाकार का संघर्ष: बिनोद बिहारी की आँखें बचपन से कमजोर थीं और अंत में वे पूरी तरह अंधे हो गए थे, फिर भी उनकी रचनात्मक शक्ति कम नहीं हुई।
- विशेषता: इस चित्र में भारत के विभिन्न धर्मों के संतों को दिखाया गया है। लंबी मानवीय आकृतियाँ उनकी आध्यात्मिक महानता को दर्शाती हैं। इसमें भूरे, पीले और मिट्टी के रंगों का अधिक प्रयोग हुआ है।
3. वर्ड्स एंड सिंबल्स (Words and Symbols) – के.सी.एस. पनिष्कर (1965)
- कलाकार: पनिष्कर को दक्षिण भारत में समकालीन कला आंदोलन का जनक माना जाता है। उन्होंने चेन्नई के पास ‘चोल मंडल’ नामक भारत के पहले कलाकार-ग्राम की स्थापना की।
- विशेषता: पनिष्कर ने गणितीय चिह्नों, अरबी आकृतियों, रोमन और मलयालम लिपियों का उपयोग करके एक ऐसी आकृति बनाई जो ‘जन्मपत्री’ जैसी दिखाई देती है।
- शैली: यह एक प्रयोगात्मक कार्य है जिसमें रंगों का प्रयोग बहुत कम है और स्थान को सुलेख (Calligraphy) व तांत्रिक प्रतीकों से भरा गया है।
4. लैंडस्केप इन रेड (Landscape in Red) – एफ.एन. सूजा (1961)
- कलाकार: फ्रांसिस न्यूटन सूजा प्रगतिशील कलाकार समूह के संस्थापक सदस्य थे। वे पिकासो और मातीस से बहुत प्रभावित थे।
- विशेषता: यह एक प्रयोगात्मक शहरी दृश्य है, जिसे चित्रकार ने एक रहस्यमयी जंगल की तरह दिखाने की कोशिश की है।
- रंग और रूप: जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इसमें मुख्य रूप से लाल रंग का प्रयोग हुआ है, साथ ही हरे रंग के छींटे भी दिए गए हैं। इसमें आकृतियाँ और रेखाएँ पारंपरिक नियमों को तोड़कर एक नया प्रभाव पैदा करती हैं।
निष्कर्ष
समकालीन भारतीय कला पश्चिमी और भारतीय परंपराओं के बीच एक पुल की तरह है। इन कलाकारों ने न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई, बल्कि भारतीय कला को एक नया आधुनिक अर्थ भी दिया। जहाँ पनिष्कर ने प्रतीकों का सहारा लिया, वहीं सूजा ने विद्रोह और प्रयोगों के माध्यम से समाज की कुरीतियों पर प्रहार किया। बिनोद बिहारी मुखर्जी जैसे कलाकारों ने अपनी शारीरिक अक्षमताओं को पीछे छोड़कर कला को नई ऊंचाइयां दीं।
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