UGC Net JRF Hindi : study material एक टोकरी भर मिट्टी कहानी की घटना सारांश व संवाद | Summary And Dialogue Of The Story Ek Tokaree Bhar Mittee
कहानी का परिचय (Introduction To The Story)
एक टोकरी भर मिट्टी कहानी सन् 1900 में लिखी गई थी।
कहानी के लेखक माधवराव सप्रे हैं।
यह कहानी बिलासपुर जिले के एक गाँव पेंड्रा से ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ पत्रिका में प्रथम बार प्रकाशित हुई। पत्रिका के संपादक माधवराव सप्रे ही थे।
देवी प्रसाद वर्मा ने एक टोकरी भर मिट्टी को हिन्दी की पहली कहानी माना है।
छत्तीसगढ़ मित्र पत्रिका छत्तीसगढ़ की पहली पत्रिका थी। यह एक मासिक पत्रिका थी।
कहानी में सिर्फ दो पात्र मुख्य हैं – जमींदार और अनाथ विधवा। गौण पात्र जमींदार का वकील और विधवा की पोती।
यह कहानी वर्ग भेद पर आधारित है। कहानी के अंत में हृदय परिवर्तन दिखाया गया है।
एक टोकरी भर मिट्टी कहानी का संक्षिप्त सारांश (Short Summary of story Ek Tokaree Bhar Mittee)
यह कहानी एक अनाथ विधवा की है, जिसके पति, बेटा और बहू की मृत्यू हो चुकी है। उसके साथ जीने के लिए सिर्फ उसकी एक पोती बची है। विधवा पर अनेकों दुखो का पहाड है, उस पर से एक दिन उसके पड़ोस के जमींदार जिसे लेखक ने श्रीमान कहकर संबोधित किया है, उसने अपने घर का हाता बनाने के लिए विधवा से झोपड़ी हटाने के लिए कहा।
विधवा के न मानने पर जमींदार ने वकीलों को रूपए खिलाएँ और कानूनी रूप से उस झोपड़ी की ज़मीन को अपना बना लिया, परिणाम स्वरूप विधवा को घर से निकलना पड़ा।
जब झोपड़ी को तोड़ने का काम चल रहा था, तब विधवा आई और उसने एक टोकरी मिट्टी अपनी झोपड़ी की मिट्टी जमींदार से माँगी, मिट्टी लेने के बाद टोकरी उठवाने के लिए जमींदार से कहा, लेकिन जमींदार वह टोकरी नहीं उठा पाया, परिणाम स्वरूप विधवा ने कहा आप एक टोकरी मिट्टी का भार नहीं उठा पा रहे हैं, इस झोपड़ी में तो कई टोकरी मिट्टी है, उसका भार आप कैसे उठा पाएँगे?
इसके बाद जमींदार का हृदय परिवर्तन हो गया, और उसने विधवा की झोपड़ी उसे वापिस कर दी। यहीं पर कहानी समाप्त हो गई।
एक टोकरी भर मिट्टी कहानी की घटना व संवाद (Incident And Dialogue Of The Story Ek Tokree Bhar Mittee)
किसी श्रीमान् जमींदार के महल के पास एक गरीब अनाथ विधवा की झोंपड़ी थी।
ज़मींदार ने महल का हाता बनवाने के लिए झोपड़ी को हटाने की कोशिश की।
विधवा का प्रिय पति और इकलौता पुत्र उसी झोंपड़ी में मर गया था।
पतोहू भी एक पाँच बरस की कन्या को छोड़कर चल बसी थी।
यही उसकी पोती इस वृद्धाकाल में एकमात्र आधार थी।
पूर्व दुख की याद आ जाती तो मारे दुख के फूट-फूट के रोने लगती थी।
श्रीमान के हाता बनाने की इच्छा जानने के बाद वह मृतप्राय हो गई थी।
विधवा ने जब ज़मीदार के कहने पर अपनी झोपड़ी नहीं हटाई तो ज़मीदार ने बाल की खाल निकालने वाले वकीलों की थैली गरम कर उन्होंने अदालत से झोंपड़ी पर अपना कब्जा करा लिया औऱ विधवा को वहाँ से निकाल दिया।
विधवा पास-पड़ोस में कहीं जाकर रहने लगी।
विधवा जब टोकरी लेकर अपनी झोपड़ी में गई तो श्रीमान ने उसे देखते ही नौकरों से कहा उसे यहाँ से हटा दो।
विधवा श्रीमान को महाराज कहकर बुलाती है।
विधवा ने कहा – जब से यह झोंपड़ी छूटी है, तब से मेरी पोती ने खाना-पीना छोड़ दिया है।
विधवा का कथन – अब मैंने यह सोचा कि इस झोंपड़ी में से एक टोकरी-भर मिट्टी लेकर उसी का चूल्हा बनाकर रोटी पकाऊँगी।
मिट्टी की टौकरी विधवा उठवाने के लिए जमींदरा के पैरों पर गिरने लगी, जमींदार को दया आ गई किसी नौकर से न कहकर वह खुद ही उसकी टोकरी उठाने आगे बढ़े।
टोकरी उठाना जमींदार की शक्ति के बाहर है।
विधवा ने कहा – महाराज, नाराज न हों, आपसे एक टोकरी-भर मिट्टी नहीं उठाई जाती और इस झोंपड़ी में तो हजारों टोकरियाँ मिट्टी पड़ी हैं। उसका भार आप जन्म-भर क्योंकर उठा सकेंगे? आप ही इस बात पर विचार कीजिए।
जमींदार साहब धन-मद से गर्वित हो अपना कर्तव्य भूल गए थे पर विधवा के उपर्युक्त वचन सुनते ही उनकी आँखें खुल गयीं। कृतकर्म का पश्चाताप कर उन्होंने विधवा से क्षमा माँगी और उसकी झोंपड़ी वापिस दे दी।
निष्कर्ष (conclusion)
यह कहानी हृदय परिवर्तन की है, यह तो सच है कि समाज में आज भी नैतिक मूल्य मौजूद हैं, जिसके आधार पर समाज चल रहा है, लेकिन यह कम ही देखने को मिलता है कि इस प्रकार का अन्याय करने वाला व्यक्ति समय रहते अपनी गलती को समझे और उसे सुधारे।
वैसे तो यह कहानी है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि साहित्य समाज का दर्पण है, अर्थात इसके कुछ अंश समाज में मौजूद हैं। हमें कहानी पढ़ते हुए आईना देखना है, और समाज को सही स्वरूप देने का विचार करना है। यह एक आदर्शवादी कहानी है।
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