Study Material : गोदान उपन्यास का सारांश | Summary of the Novel Godan
गोदान (भाग 1) सारांश – भोला से भेंट: एक अनूठा सौदा”
होरी और धनिया के बीच संघर्ष और चिंता: भाग का प्रारंभ होरीराम द्वारा अपने मालिक (रायसाहब) से मिलने जाने की तैयारी से होता है। होरी और उसकी पत्नी धनिया के बीच घर की विपन्नता, लगान चुकाने की कठिनाई और बच्चों के पालन-पोषण को लेकर तीखी लेकिन आत्मीय बातचीत होती है।
गाय पालने की लालसा: होरी के मन में लंबे समय से एक ‘पछाईं’ गाय पालने की तीव्र इच्छा है। वह मानता है कि द्वार पर गाय का होना न केवल गृहस्थी की शोभा है, बल्कि इससे उसके बेटे गोबर और परिवार को दूध भी मिलेगा।
भोला से भेंट: होरी जब रायसाहब की ड्योढ़ी की ओर जा रहा होता है, रास्ते में उसकी मुलाक़ात ‘पुरवे’ के ग्वाले भोला से होती है, जो मेले से नई गायें लेकर आ रहा था।
सगाई का वादा और गाय का सौदा: बातचीत के दौरान भोला अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद अकेलेपन का दुख प्रकट करता है। होरी उसे अपनी ससुराल में एक विधवा स्त्री से सगाई कराने का झांसा देता है। इससे खुश होकर भोला होरी को अपनी एक सुंदर ‘कबरी’ गाय 80 रुपये उधार में देने को तैयार हो जाता है।
होरी की किसान वृत्ति और सहानुभूति: होरी को पता चलता है कि भोला के पास अपने मवेशियों के लिए भूसा नहीं है। हालाँकि होरी खुद तंगी में है, फिर भी वह संकट में फंसे भोला की मदद के लिए उसे अपने पास से थोड़ा भूसा देने का वादा करता है और तत्काल गाय ले जाने से मना कर देता है।
सुखद स्वप्न के साथ समापन: भाग 1 का अंत होरी के उस सुखद अहसास के साथ होता है जिसमें वह कल्पना करता है कि जब वह ‘कामधेनु’ (कबरी गाय) उसके द्वार पर बंधेगी, तो वह दिन कितना शुभ होगा।
भाग 2: रायसाहब का व्यक्तित्व और धनुष-यज्ञ की तैयारी)
सेमरी और बेलारी का परिचय – उपन्यासकार प्रेमचंद इस भाग में होरी के गाँव ‘बेलारी’ और जमींदार रायसाहब के गाँव ‘सेमरी’ का परिचय देते हैं। दोनों के बीच पाँच मील का अंतर है।
रायसाहब अमरपाल सिंह का व्यक्तित्व – रायसाहब राष्ट्रवादी विचारों के हैं और सत्याग्रह में जेल भी जा चुके हैं, लेकिन अपनी जमींदारी और मर्यादा को निभाने के लिए उन्हें अधिकारियों और किसानों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। वे साहित्य और संगीत के प्रेमी भी हैं। एक तरफ खुद को राष्ट्रवादी दिखाते हैं, दूसरी तरफ वह ही किसानों के साथ अन्याय भी करते हैं। बेगार यानी फ्री में काम भी करवाते हैं।
धनुष-यज्ञ की तैयारियाँ – होरी जब रायसाहब की ड्योढ़ी पर पहुँचता है, तो वहाँ जेठ के दशहरे के अवसर पर होने वाले ‘धनुष-यज्ञ’ (नाटक) की बड़ी तैयारियाँ चल रही होती हैं। रायसाहब होरी को इस नाटक में ‘राजा जनक का माली’ बनने की भूमिका सौंपते हैं।
रायसाहब और होरी का संवाद – रायसाहब होरी को एकांत में ले जाकर अपने मन की व्यथा सुनाते हैं। वे धन और संपत्ति को एक ‘बेड़ी’ बताते हैं और अपने ही रिश्तेदारों की ईर्ष्या और अधिकारियों की खुशामद करने की विवशता का वर्णन करते हैं। वे यहाँ तक कहते हैं कि “हम परिस्थिति के शिकार बने हुए हैं”।
मर्यादा और यथार्थ का द्वंद्व – रायसाहब होरी से किसानों से पाँच सौ रुपये ‘शगुन’ वसूलने का प्रबंध करने को कहते हैं। संवाद के दौरान वे बड़ी नीति और धर्म की बातें करते हैं, लेकिन जब ‘बेगार’ (बिना भोजन काम करने वाले मजदूर) काम करने से मना करते हैं, तो वे तुरंत कठोर हो जाते हैं और उन्हें जबरदस्ती काम पर लगाने की बात करते हैं।
होरी की चिंता – रायसाहब की बातें सुनकर और शगुन के रुपयों की मांग जानकर होरी गहरी चिंता में डूब जाता है। वह सोचने लगता है कि घर की तंगी के बीच ‘शगुन’ के रुपये कहाँ से आएँगे।
भाग 3: परिवार का आर्थिक संघर्ष और मर्यादा का प्रश्न
खेत में संघर्ष और वैचारिक मतभेद – होरी जब अपने गाँव लौटता है, तो वह अपने बेटे गोबर और दोनों बेटियों (सोना और रूपा) को कड़ी धूप और लू में ऊख (गन्ने) के खेत में काम करते हुए देखता है। गोबर अपने पिता द्वारा जमींदारों की खुशामद करने का विरोध करता है, जबकि होरी उसे समझाता है कि गरीब की गर्दन जब दूसरों के पैरों तले दबी हो, तो अकड़कर नहीं रहा जा सकता।
भाई-बहनों का विनोद – घर लौटते समय सोना, रूपा और गोबर के बीच ‘सोना’ और ‘रूपा’ (चाँदी/रुपया) के नाम को लेकर हंसी-मजाक और नोकझोंक होती है, जो ग्रामीण जीवन के सरल आनंद को दर्शाती है।
अमीरों के दुख पर चर्चा – भोजन के समय होरी रायसाहब की व्यथा सुनाता है कि अमीर भी दुखी होते हैं। इस पर गोबर तंज कसता है कि जिनके पास मोटर, महल और नौकर हैं, उनके दुख दिखावा मात्र हैं।
भोला का आगमन और धनिया की मेहमाननवाज़ी – भोला (ग्वाला) भूसा लेने के लिए होरी के द्वार पर आता है। धनिया पहले तो मुफ्त में भूसा देने का विरोध करती है, लेकिन जब भोला उसकी प्रशंसा (उसे ‘लक्ष्मी’ कहता है) करता है, तो वह खुश होकर उसका खूब आदर-सत्कार करती है।
होरी और भोला के दुख-सुख – होरी और गोबर, भोला के घर भूसा पहुँचाने जाते हैं। रास्ते में होरी और भोला अपने-अपने परिवारों की कलह, भाइयों के अलग होने के दुख और कर्ज के बोझ के बारे में बातचीत करते हैं।
गोबर और झुनिया का प्रथम परिचय – भोला के घर पर गोबर की मुलाकात भोला की विधवा बेटी झुनिया से होती है। दोनों के बीच बातचीत होती है और उनमें आपसी आकर्षण की शुरुआत होती है।
गाय लाने का निश्चय – भाग 3 का अंत इस निश्चय के साथ होता है कि गोबर अगले दिन भोला के यहाँ से उस सुंदर ‘कबरी’ गाय को लेने जाएगा, जो होरी का बरसों पुराना सपना है।
भाग 4: ‘कामधेनु’ का आगमन और गाँव में हलचल
जब किसी के घर में कोई संपत्ति खरीदी या लाई जाती है, तो आस-पड़ोस के लोग और रिश्तेदारों को अकसर ईर्ष्या हो जाता है, और यह ईर्ष्या सबसे अधिक अपने घर के लोगों को ही होती है। ऐसी ही ईर्ष्या होरी के भाई हीरा को भी होने लगती है, जब होरी के घर गाय आती है, लेकिन वह यह नहीं समझ पाता की यह उधार की गाय है, बल्कि वह यह सोचता है कि उसके भाई ने रूपया छुपा के रखा था, और उससे यह गाय खरीद कर लाया है।
होरी की चिंता और तैयारी – होरी पूरी रात गाय के आने की प्रतीक्षा में सो नहीं पाता। वह गाय को नज़र से बचाने और उसे बाँधने के लिए घर के अंदर जगह बनाने की योजना बनाता है।
गोबर का प्रस्थान – सुबह होते ही गोबर भोला के यहाँ से ‘पछाईं’ गाय लाने के लिए निकल पड़ता है।
बाँस का सौदा और होरी का लालच – चौधरी बाँस खरीदने आता है। होरी भाइयों से हिस्सा छिपाने के लिए कम दाम, बीस रुपये प्रति सौ बांस पर सौदा करता है, लेकिन भाइयों को पंद्रह रुपए बताने की बात कहता है, जो उसके भीतर के द्वंद्व और अभाव को दर्शाता है। लेकिन हीरा की पत्नी पुनियाँ से झगड़ा होने के बाद चौधरी बाँस बीस रूपए में लेने के स्थान पर पंद्रह रूपये ही देता है।
पारिवारिक कलह और मारपीट – बाँस काटने को लेकर हीरा की पत्नी पुन्नी और चौधरी के बीच विवाद हो जाता है, जिसमें हीरा अपनी पत्नी पुन्नी को बुरी तरह पीटता है और होरी बीच-बचाव करता है।
‘कामधेनु’ का आगमन – गोबर गाँव के बच्चों के जुलूस के साथ सुंदर कबरी गाय लेकर घर पहुँचता है। होरी और धनिया की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। धनिया गाय को नज़र से बचाने के लिए काला धागा बाँधती है।
गाँव में हलचल और होरी की डींग – गाय को देखने के लिए पूरा गाँव उमड़ पड़ता है। होरी अपनी मर्यादा दिखाने के लिए पंडित दातादीन के सामने झूठ बोलता है कि उसने गाय के लिए नकद रुपये दिए हैं।
भाइयों की ईर्ष्या और होरी की व्यथा – होरी के सगे भाई, हीरा और शोभा, गाय देखने नहीं आते। जब होरी खुद उनके पास जाने का प्रयास करता है, तो वह हीरा को यह कहते सुनता है कि होरी ने भाइयों का हक मारकर पैसे छिपाए और गाय खरीदी।
धनिया और हीरा का महासंग्राम – भाइयों के आरोपों से दुखी होकर होरी गाय लौटाने चलता है, लेकिन धनिया उसे रोक लेती है। इसके बाद हीरा और धनिया के बीच भीषण विवाद होता है, जो हाथापाई तक पहुँच जाता है और धनिया हीरा को धक्का देकर गिरा देती है।
इस भाग का समापन होरी के परिवार और उसके भाइयों के बीच बढ़ते वैमनस्य और ईर्ष्या की गहरी होती खाई के साथ होता है।
भाग 5: गोबर और झुनिया का गुप्त अनुराग
गोबर और झुनिया की भेंट – गोबर खाना खाकर अहीराने पहुँचता है, जहाँ उसकी झुनिया से गहरी बातचीत होती है।
झुनिया उसे अपनी ओर आकर्षित करती है, जिससे गोबर के भीतर पहली बार यौवन और अनुराग की भावना जागृत होती है।
निबाह का वचन – गोबर झुनिया के प्रति अपनी भावनाएँ व्यक्त करता है और उसका हाथ थाम लेता है।
झुनिया उसे सचेत करती है कि प्रेम का अर्थ है जीवन भर साथ निभाना, चाहे समाज या माता-पिता को ही क्यों न छोड़ना पड़े।
गोबर उसे मरते दम तक साथ निभाने का वचन देता है।
सामाजिक लोक-लाज का द्वंद्व- गोबर जानता है कि झुनिया (एक विधवा) को रखने से बिरादरी और पंचायत का संकट खड़ा होगा। वह मातादीन और झिंगुरी सिंह जैसे उदाहरणों को याद करता है जिन्होंने समाज के बंधनों को तोड़ा है।
झुनिया की आपबीती और पाखंड का खुलासा – झुनिया गोबर को शहर के पुरुषों के अनुभवों के बारे में बताती है जो केवल “भँवरों” की तरह रस लेकर उड़ जाना चाहते हैं।
वह एक तिलक-धारी पंडित की घटना सुनाती है जिसने उसे बहकाने की कोशिश की थी और कैसे झुनिया ने उसे दूध की हांडी मार कर सबक सिखाया था।
शहरी जीवन और रिश्तों पर चर्चा – झुनिया शहर के “बड़े घरों” के पाखंड और वहाँ के पुरुषों व स्त्रियों के ढीले आचरण पर अपने विचार साझा करती है।
वह कहती है कि वह केवल एक ऐसे “भले आदमी” का साथ चाहती है जो उसे अपना समझे।
मिलन का निमंत्रण और समापन – बातचीत करते हुए दोनों गोबर के गाँव तक पहुँच जाते हैं। झुनिया गोबर के घर जाने से मना कर देती है लेकिन उसे रात में अपने घर के पीछे मिलने का संकेत देकर लौट जाती है। भाग का अंत गोबर की उस प्रसन्नता के साथ होता है जहाँ उसे लगता है जैसे वह स्वर्ग से गिर पड़ा हो।
भाग 6: धनुष-यज्ञ का आयोजन और शहरी मेहमानों का जीवन
शहरी मेहमानों का सेमरी आगमन – रायसाहब के गाँव ‘सेमरी’ में धनुष-यज्ञ के अवसर पर शहर के प्रतिष्ठित मेहमान पहुँचते हैं। इनमें ‘बिजली’ पत्र के संपादक पंडित ओंकारनाथ, बीमा एजेंट श्यामबिहारी तंखा और दर्शनशास्त्र के अध्यापक मिस्टर बी. मेहता शामिल हैं।
होरी की भूमिका – होरी पाँच रुपये शगुन के देकर इस उत्सव में शामिल होता है। उसे नाटक में ‘राजा जनक का माली’ बनने की भूमिका दी गई है, जिसे लेकर वह अत्यंत गर्व का अनुभव करता है।
वैचारिक वाद-विवाद – मिस्टर मेहता और रायसाहब के बीच जमींदारी प्रथा और साम्यवाद पर तीखी बहस होती है। मेहता, रायसाहब की दोहरी जीवनशैली (बातों में साम्यवाद और जीवन में रईसी) पर प्रहार करते हैं। रायसाहब अपनी विवशता बताते हुए धन को एक ‘बेड़ी’ कहते हैं।
मिस मालती और खन्ना का प्रवेश – बैंक मैनेजर मिस्टर खन्ना, उनकी पत्नी कामिनी खन्ना और इंग्लैंड से पढ़कर आईं आधुनिक मिस मालती का आगमन होता है। मालती अपने चंचल और वाचाल व्यक्तित्व से प्रोफेसर मेहता को छेड़ती है, जो स्वभाव से शर्मीले हैं।
ओंकारनाथ का पतन – मिर्जा खुर्शेद (काउंसिल के सदस्य) और मिस मालती के बीच एक शर्त लगती है। मालती अपने आकर्षण का जाल बिछाकर कट्टर आदर्शवादी संपादक ओंकारनाथ को ‘देहात सुधार संघ’ का लालच देकर शराब पिला देती है। ओंकारनाथ नशे में धुत होकर तमाशा करते हैं और अंत में फर्श पर गिर पड़ते हैं।
पठान का स्वाँग और बहादुरी की परीक्षा – मनोरंजन के दौरान अचानक एक ‘अफगान/पठान’ (जो वास्तव में मिस्टर मेहता का बदला हुआ रूप था) बंदूक लेकर आता है और मेहमानों को लूटने की धमकी देता है।
शहरी कायरता बनाम ग्रामीण साहस – पठान के डर से मिस्टर खन्ना, तंखा और रायसाहब जैसे शहर के ‘बड़े’ लोग कांपने लगते हैं और कायरता दिखाते हैं। तभी होरी अपनी जान पर खेलकर पठान पर झपट पड़ता है और उसे पटक देता है। होरी द्वारा पठान की दाढ़ी खींचने पर भेद खुलता है कि वह मिस्टर मेहता ही थे, जो इन ‘भले आदमियों’ की वीरता की परीक्षा ले रहे थे।
भाग 7: जंगली शिकार और मेहता-मालती का वैचारिक द्वंद्व
प्रहसन और मेहता की प्रशंसा – सेमरी में धनुष-यज्ञ के बाद रायसाहब द्वारा लिखित एक ‘प्रहसन’ (नाटक) खेला जाता है, जो एक मुकदमेबाज जमींदार पर व्यंग्य है। मिस्टर मेहता इस नाटक की यथार्थता और ग्रामीण जीवन के सटीक चित्रण से बहुत प्रभावित होते हैं।
शिकार की तैयारी – अगले दिन रायसाहब, मिस्टर खन्ना, मिस्टर तंखा, मिर्जा खुर्शेद, मिस मालती और मिस्टर मेहता शिकार के लिए निकलते हैं। मेहता के सुझाव पर कोई भी नौकर या रसोइया साथ नहीं लिया जाता ताकि सभी अपना काम स्वयं करें और ग्रामीण जीवन का अनुभव लें।
नदी पार करना और मेहता-मालती संवाद – शिकार के दौरान मेहता और मालती साथ होते हैं। एक गहरी नदी पार करते समय मेहता मालती को अपने कंधों पर बिठाकर ले जाते हैं। इस दौरान उनके बीच प्रेम और नारी के अधिकारों पर गहरी वैचारिक चर्चा होती है।
प्रेम पर वैचारिक मतभेद – मेहता प्रेम को एक ‘खूंखार शेर’ मानते हैं जो अपने अधिकार क्षेत्र में किसी का हस्तक्षेप नहीं सहता, जबकि मालती प्रेम को श्रद्धा, सेवा और आत्मा का समर्पण मानती है।
जंगली युवती का निस्वार्थ सेवाभाव – मेहता द्वारा शिकार की गई चिड़िया को बचाने के लिए एक जंगली युवती नदी में कूद पड़ती है। मेहता उसकी वीरता और स्वास्थ्य को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। वह युवती उन्हें अपनी झोपड़ी में ले जाती है और मालती के सिरदर्द के लिए धूप में तपते हुए पहाड़ी से जड़ी-बूटी लेकर आती है।
मालती का अहंकार और मेहता का विरोध – मालती उस जंगली युवती को नीचा दिखाती है और उसे अपनी गाड़ी लाने के लिए मजबूर करना चाहती है। मेहता मालती के इस अहंकारी व्यवहार की निंदा करते हैं और उस युवती की निस्वार्थ सेवा की तुलना में मालती के व्यवहार को तुच्छ पाते हैं।
खन्ना का डर और व्यापारिक चर्चा – रायसाहब और मिस्टर खन्ना शिकार के बहाने व्यापार, शुगर मिल के शेयरों और बीमा पॉलिसी पर चर्चा करते हैं। रास्ते में एक तेंदुआ देखकर खन्ना बुरी तरह डर जाते हैं और शिकार छोड़कर वापस लौटने की जिद करने लगते हैं।
मिर्जा खुर्शेद की मानवता – मिर्जा खुर्शेद एक हिरन का शिकार करते हैं, लेकिन उसकी तड़प और मरती हुई आँखों को देखकर उनका मन पिघल जाता है। वे वह हिरन एक गरीब लकड़हारे को दे देते हैं और पूरे गाँव के लिए भोज का आयोजन करते हैं।
पहली टोली – इस टोली में मिस मालती और मिस्टर बी. मेहता शामिल थे।
दूसरी टोली – इस टोली में मिस्टर खन्ना और रायसाहब (अमरपाल सिंह) थे।
तीसरी टोली – इस टोली में मिर्जा खुर्शेद और मिस्टर श्यामबिहारी तंखा शामिल थे।
भाग 9: गाय को ज़हर और हीरा का घर से पलायन
होरी और धनिया के बीच भीषण विवाद – भाग का प्रारंभ होरी और धनिया के बीच झगड़े से होता है। धनिया खुलेआम आरोप लगाती है कि होरी के भाई हीरा ने गाय को माहुर (जहर) खिलाकर मार डाला है, जो होरी ने खुद अपनी आँखो से देखा था, हीरा को गाय की नाँद के पास खड़े, जबकि होरी अपने भाई को बचाने के लिए धनिया पर हाथ उठाता है।
होरी की झूठी कसम – धनिया द्वारा चुनौती दिए जाने पर होरी अपने बेटे गोबर के माथे पर हाथ रखकर झूठी कसम खाता है कि उसने हीरा को गाय की नाँद के पास नहीं देखा था।
हीरा का पलायन – गाँव में बात फैलने पर पता चलता है कि हीरा ग्लानि और डर के कारण घर छोड़कर भाग गया है।
पुलिस की जाँच और रिश्वत का खेल – चौकीदार की रिपोर्ट पर थानेदार (दारोगा) जाँच के लिए आता है और हीरा के घर की तलाशी लेने की धमकी देता है। गाँव के मुखिया (दातादीन, झिंगुरीसिंह, पटेश्वरी और नोखेराम) इस संकट को टालने के लिए होरी को रिश्वत देने का दबाव डालते हैं। जिसके लिए होरी को अपने घर को गिर्वी रखने को मजबूर करते हैं।
धनिया का साहसी विद्रोह – होरी अपनी मर्यादा बचाने के लिए कर्ज लेकर दारोगा को रिश्वत देने चलता है, लेकिन धनिया बीच में आकर रुपए छीन लेती है और उन्हें जमीन पर बिखेर देती है। वह साफ कहती है कि घर के बच्चे भूखे मर रहे हैं और वह बेईमान देवर की इज्जत बचाने के लिए रिश्वत नहीं देगी।
गोबर का हस्तक्षेप – जब होरी गुस्से में धनिया को मारने लपकता है, तो गोबर अपनी माँ के पक्ष में खड़ा हो जाता है और अपने पिता को पीछे हटने पर मजबूर कर देता है।
दारोगा की चाल और मुखियाओं की फजीहत – धनिया की निडरता के सामने दारोगा और मुखियाओं की दाल नहीं गलती। अंत में, दारोगा तलाशी के नाम पर डरा-धमकाकर गाँव के उन्हीं मुखियाओं (पटेश्वरी, नोखेराम आदि) से ही पचास रुपए वसूल कर लेता है।
यह भाग ग्रामीण समाज में व्याप्त ईर्ष्या, झूठी मर्यादा, पुलिस के भ्रष्टाचार और उस भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक निर्धन स्त्री (धनिया) के अद्भुत साहस को दर्शाता है।
भाग 10: झुनिया का होरी के घर आगमन और मर्यादा का संकट
हीरा का लापता होना और होरी का उत्तरदायित्व – हीरा गाय को ज़हर देने के बाद घर छोड़कर भाग गया है और होरी उसकी पत्नी पुन्नी और उसके बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी भी उठा रहा है। होरी अपनी खेती के साथ-साथ पुन्नी के खेतों में भी कड़ी मेहनत करता है ताकि समाज में परिवार की मर्यादा बनी रहे।
होरी की बीमारी और धनिया के साथ सुलह – होरी को गंभीर बुखार (मलेरिया) हो जाता है और वह एक महीने तक बिस्तर पर पड़ा रहता है। इस बीमारी के दौरान धनिया और होरी के बीच का पुराना तनाव और मनमुटाव खत्म हो जाता है और वे फिर से एक-दूसरे के करीब आ जाते हैं।
झुनिया का होरी के घर आगमन – एक तूफानी रात में धनिया होरी को बताती है कि झुनिया उनके घर आई है और वह पांच महीने की गर्भवती है। गोबर उसे अपने साथ गाँव तक लाया था, लेकिन बदनामी के डर से उसे घर के पास छोड़कर खुद शहर (लखनऊ) भाग गया है।
धनिया और होरी का द्वंद्व – शुरुआत में धनिया झुनिया को कुलटा और कलंकिनी कहकर घर से निकालने पर आमादा हो जाती है ताकि परिवार की मर्यादा बची रहे। होरी भी पहले झुनिया को बाहर निकालने की बात करता है, लेकिन अंततः वह उसके प्रति सहानुभूति महसूस करने लगता है।
मर्यादा पर दया की विजय – होरी झुनिया की बेसहारा स्थिति और उसकी प्रार्थना को देखकर पिघल जाता है और घोषणा करता है कि झुनिया अब उनकी बेटी जैसी है और उनके रहते उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचाएगा।
झुनिया का घर में प्रवेश – अंत में धनिया भी झुनिया के आंसुओं और उसकी लाचारी को देखकर उसे अपनी बहू के रूप में स्वीकार कर लेती है और उसे घर के भीतर ले जाती है। भाग का अंत होरी की इस चिंता के साथ होता है कि गोबर न जाने कहाँ चला गया। क्योंकि गोबर के लखनऊँ जाने की बात घर में किसी को पता नहीं होती है।
भाग 11: पंचायत का भारी दंड और होरी की बर्बादी
सामाजिक बहिष्कार – झुनिया को घर में रखने के कारण गाँव वालों ने होरी का हुक्का-पानी बंद कर दिया और उसे जाति-बाहर कर दिया। हालाँकि, धनिया के कड़े रुख के कारण कोई उसे जबरदस्ती पानी भरने से नहीं रोक पाया।
गाँव के मुखियाओं का षडयंत्र – गाँव के रसूखदार लोग दातादीन, पटेश्वरी, झिंगुरीसिंह और नोखेराम होरी पर भारी दंड लगाने की योजना बनाते हैं। उनका मानना था कि यदि होरी को दंड नहीं दिया गया, तो समाज की मर्यादा नष्ट हो जाएगी और अन्य लोग भी ऐसे “अनीति” के काम करेंगे।
पंचायत का निर्णय – झुनिया द्वारा पुत्र को जन्म देने के अगले ही दिन पंचायत बैठती है। पंचायत होरी पर 100 रुपये नकद और तीस मन अनाज का भारी दंड (डाँड़) लगाती है।
धनिया का विरोध और होरी का समर्पण – धनिया पंचायत के इस निर्णय को अन्याय और ‘राक्षसों’ का काम बताकर डटकर विरोध करती है। इसके विपरीत, होरी लोक-लाज और बिरादरी के डर से घुटने टेक देता है। वह मानता है कि बिरादरी के बिना जीवन-मरण के संस्कार संभव नहीं हैं, इसलिए वह दंड स्वीकार कर लेता है।
होरी की आर्थिक बर्बादी – होरी अपने खलिहान का सारा अनाज जौ, गेहूँ, मटर आदि ढो-ढोकर पंचायत के नाम पर झिंगुरीसिंह के यहाँ जमा कर देता है। घर में बच्चों के खाने के लिए एक दाना भी नहीं बचता।
घर का गिरवी रखा जाना – दंड की शेष अस्सी रुपये की रकम चुकाने के लिए होरी को अपना पुश्तैनी घर झिंगुरीसिंह के पास गिरवी (रेहन) रखना पड़ता है।
मर्यादा की रक्षा – दंड भरने के बाद होरी को फिर से बिरादरी में शामिल कर लिया जाता है और उसका ‘हुक्का खुल’ जाता है। होरी इसे अपनी मर्यादा की जीत समझता है, जबकि धनिया इसे विनाश का कारण मानती है।
पोते का जन्म – इन तमाम मुसीबतों के बीच घर में नए सदस्य झुनिया के बेटे का आगमन होता है, जिसे देखकर धनिया अपनी सारी चिंताएँ भूलकर खुश होती है क्योंकि वह बच्चा बिल्कुल गोबर जैसा दिखता है।
यह भाग ग्रामीण समाज के अंधविश्वास, जातिगत कठोरता और गरीब किसान के शोषण की चरम पराकाष्ठा को दर्शाता है।
भाग 12: गोबर का घर छोड़ना और लखनऊ की
गोबर का भय और दुविधा – गोबर झुनिया को लेकर गाँव के करीब पहुँचता है, लेकिन वह लोक-लाज और विशेषकर अपनी माँ धनिया के गुस्से से बहुत डरा हुआ है। उसे डर है कि झुनिया को देखकर धनिया कहीं घर में आग न लगा दे या जहर न खा ले।
झुनिया को अकेले भेजना – अपनी कायरता और पकड़े जाने के डर से, गोबर झुनिया को अकेले घर भेज देता है और खुद पीछे से आने का बहाना बनाता है। उसका विचार है कि जब झुनिया माँ के पैरों पर गिरकर रोएगी, तो उनका दिल पिघल जाएगा।
छिपकर माता-पिता की बातें सुनना – गोबर छिपकर होरी और धनिया की बातें सुनता है। वह देखता है कि धनिया और होरी पहले तो झुनिया पर गुस्सा होते हैं, लेकिन अंततः उसकी लाचारी देखकर उसे आश्रय दे देते हैं और बेटी की तरह रखने का वचन देते हैं।
आत्म-ग्लानि और नया संकल्प – अपने माता-पिता की महानता और क्षमाशीलता देखकर गोबर को अपनी कायरता पर बहुत शर्म आती है। वह संकल्प करता है कि अब वह तभी घर लौटेगा जब वह पैसे कमाकर परिवार की मर्यादा को फिर से स्थापित कर सके और माता-पिता का बोझ हल्का कर सके।
लखनऊ की ओर प्रस्थान – गोबर रात भर होरी की मड़ैया में छिपकर सोता है और सुबह होते ही किसी को बताए बिना लखनऊ के लिए निकल पड़ता है। वह रास्ते में जंगली बेर खाकर और एक दयालु किसान से मिले गुड़-पानी से अपनी भूख मिटाता है।
कोदई और उसकी पत्नी से भेंट – रास्ते में गोबर की मुलाकात कोदई नामक युवक से होती है जो अपनी पत्नी को पीट रहा था। गोबर बीच-बचाव करता है जिससे पहले तो कोदई उससे लड़ने को तैयार हो जाता है, लेकिन बाद में गोबर की बातों से प्रभावित होकर वह शांत हो जाता है और उसे अपने घर रात बिताने का निमंत्रण देता है।
परिवर्तित गोबर – इस यात्रा और माता-पिता की उदारता के अनुभव के बाद गोबर के विचारों में भारी बदलाव आता है। वह अब एक गैर-जिम्मेदार युवक के बजाय अपने कर्तव्यों को समझने वाला व्यक्ति बनने की ओर अग्रसर होता है।
भाग 13: लखनऊ में गोबर का संघर्ष और नया जीवन
गोबर का लखनऊ आगमन – गोबर सुबह तड़के कोदई के घर से विदा लेकर लखनऊ पहुँचता है। अमीनाबाद के बाजार में मजदूरों की भारी भीड़ देखकर वह शुरू में काम मिलने को लेकर निराश हो जाता है क्योंकि उसके पास कोई औजार भी नहीं था।
मिर्जा खुर्शेद का अनूठा प्रस्ताव – मिर्जा खुर्शेद बाजार में आते हैं और मजदूरों को छह आने रोज की मजदूरी पर ‘बुढ्ढों की कबड्डी’ खेलने का आमंत्रण देते हैं। गोबर को कबड्डी खेलने के बजाय पौधों को सींचने का काम सौंपा जाता है।
कबड्डी का आयोजन और शहर के रईस – मिर्जा खुर्शेद इस कबड्डी मैच का टिकट लगाकर आयोजन करते हैं, जिसमें शहर के बड़े लोग जैसे मिस मालती, मिस्टर मेहता, खन्ना, तंखा और रायसाहब शामिल होते हैं। जहाँ मैदान में बूढ़े मजदूर कबड्डी खेल रहे थे, वहीं दर्शक दीर्घा में रईस लोग अपने व्यापारिक और राजनैतिक हितों जैसे शुगर मिल के शेयर और चुनाव पर चर्चा कर रहे थे।
मेहता और मिर्जा का मुकाबला – खेल के दौरान मिर्जा खुर्शेद और मिस्टर मेहता भी मैदान में उतरते हैं। दोनों के बीच जबरदस्त शारीरिक संघर्ष होता है। अंत में, मेहता अपनी स्फूर्ति और और मालती द्वारा मिर्जा खुर्शेद का ध्यान भंग करने से हारी हुई बाजी पलट देते हैं और विजयी होते हैं।
मेहता के विचार और मालती का मूल्यांकन – खेल के बाद मिर्जा और मेहता के बीच विवाह और स्त्रियों पर गहरी चर्चा होती है। मेहता स्पष्ट करते हैं कि वे ऐसी पत्नी चाहते हैं जो सेवा और त्याग की मूर्ति हो, और इस संदर्भ में वे खन्ना की पत्नी गोविंदी की प्रशंसा करते हैं। वे मालती को केवल मनोरंजन की वस्तु मानते हैं, जीवन-संगिनी नहीं।
मिस्टर मेहता, मिर्जा खुर्शेद के साथ बातचीत के दौरान अपनी आदर्श पत्नी के विषय में अपने विचार स्पष्ट करते हैं-
“मेरे जेहन में औरत वफ़ा और त्याग की मूर्ति है, जो अपनी बेजुबानी से, अपनी कुर्बानी से, अपने को बिल्कुल मिटाकर पति की आत्मा का एक अंश बन जाती है।”
“स्त्री पृथ्वी की भाँति धैर्यवान है, शांति-संपन्न है, सहिष्णु है। पुरुष में नारी के गुण आ जाते हैं, तो वह महात्मा बन जाता है। नारी में पुरुष के गुण आ जाते हैं, तो वह कुलटा हो जाती है।
“संसार में जो कुछ सुंदर है, उसी की प्रतिमा को मैं स्त्री कहता हूँ, मैं उससे यह आशा रखता हूँ कि मैं उसे मार ही डालूँ तो भी प्रतिहिंसा का भाव उसमें न आए। अगर मैं उसकी आँखों के सामने किसी स्त्री को प्यार करूँ तो भी उसकी ईर्ष्या न जागे। ऐसी नारी पाकर मैं उसके चरणों में गिर पडूँगा और उस पर अपने को अर्पण कर दूँगा।”
“मैं ऐसी बीबी नहीं चाहता, जिससे मैं आइंस्टीन के सिद्धांत पर बहस कर सकूँ, या जो मेरी रचनाओं के प्रूफ देखा करे। मैं ऐसी औरत चाहता हूँ, जो मेरे जीवन को पवित्र और उज्ज्वल बना दे, अपने प्रेम और त्याग से।”
कुल मिलाकर मेहता के इन वाक्यों के पुरूषों का स्वार्थ झलकता है, जब वह कहते हैं- मैं उसे मार ही डालूँ तो भी वह प्रतिहिंसा न करें, इससे पता चलता है, जीवित मूर्ति चाहिए, न कि इंसान। यह वाक्य मेहता के हैं लेकिन क्या समाज के अधिकतर पुरूष ऐसा ही नहीं चाहते? विचार कीजिए- क्या यह सही है? प्रेमचंद जी ने मेहता के माध्यम से उस दौर और कुछ हद तक वर्तमान के दौर के पुरूषों के विचारों को प्रकट किया है। वे स्त्री को देवी तो कह देते हैं, लेकिन देवी कहने के बाद देवी जैसा मान-सम्मान तो क्या इंसान जितना अधिकार भी नहीं देना चाहते। जो लोग ऐसा करते हैं, वे स्त्री को देवी कहकर उन्हें छलते हैं- गोविंदी जैसी महिला जिसका उल्लेख प्रेमचंद ने इस उपन्यास में किया है, वह भी छली जा रही है। अगर किसी महिला को खुद का आत्मसम्मान खत्म करके या खुद को खत्म करके समाज से देवी की उपधि मिलती है तो यह छलवा मात्र है, और कुछ नहीं।
गोबर को रोजगार – मिर्जा खुर्शेद गोबर के काम से खुश होकर उसे 15 रुपये महीने पर माली की स्थायी नौकरी दे देते हैं, जिससे गोबर को लखनऊ में पैर जमाने का आधार मिल जाता है।
यह भाग शहरी समाज के खोखलेपन, रईसों की मनोरंजन प्रियता और गोबर के नए जीवन के संघर्ष एवं सफलता को दर्शाता है।
भाग 14: होरी की विपन्नता और भोला का प्रतिशोध
घोर आर्थिक संकट और भुखमरी – होरी की सारी फसल ‘डाँड़’ (दंड) भरने में चली गई, जिससे घर में अन्न का एक दाना भी नहीं बचा। जेठ की गर्मी में परिवार के पाँचों सदस्यों के लिए आधे पेट भोजन का भी ठिकाना न रहा।
पुन्नी द्वारा सहायता – हीरा की पत्नी पुन्नी ने धनिया और उसके बच्चों की दुर्दशा देखकर अपने घर से अनाज लाकर उनकी मदद की। यह होरी द्वारा हीरा की अनुपस्थिति में उसकी खेती सँभालने के प्रति पुन्नी की कृतज्ञता थी। नहीं तो पुन्नी का किरदार ऐसा है कि शायद ही सहायता करती। लेकिन होरी ने उसके पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी उठा ली थी, उसके बदले यह थोड़ी सी मदद कुछ भी नहीं थी।
प्रकृति की मार – सावन में सूखा पड़ने और बाद में अत्यधिक वर्षा होने के कारण होरी की ऊख (गन्ने) की फसल बर्बाद हो गई। इससे महाजनों का कर्ज चुकाने की रही-सही उम्मीद भी खत्म हो गई।
भोला का कठोर तगादा – भोला अपनी गाय के दाम वसूलने के लिए होरी के द्वार पर आया और रुपए न होने की स्थिति में होरी के दोनों बैल खोलने की धमकी दी।
मर्यादा और दया का संघर्ष – भोला ने शर्त रखी कि यदि होरी झुनिया को घर से निकाल दे, तो वह बैल नहीं ले जाएगा। झुनिया स्वयं घर छोड़कर जाने लगी, लेकिन धनिया ने उसे अपनी शरण से निकालने से साफ मना कर दिया।
बैलों का छिन जाना – होरी ने अपनी मर्यादा और धर्म का पालन करते हुए बैल भोला के हवाले कर दिए। बैलों के जाने का अर्थ था होरी की खेती का पूरी तरह नष्ट हो जाना और उसका मजदूर बन जाना।
मुखियाओं का निष्फल हस्तक्षेप – गाँव के पटवारी और दातादीन ने भोला को रोकने की कोशिश की, लेकिन जब उन्हें पता चला कि होरी ने “धर्म” की बात आने पर खुद बैल दिए हैं, तो वे पीछे हट गए और भोला बैल लेकर चला गया।
भाग 15: मालती का वैचारिक परिवर्तन और मेहता का प्रभाव
मालती की पारिवारिक स्थिति – मालती के पिता मिस्टर कौल लकवे (फालिज) के कारण अपंग हैं और घर की सारी जिम्मेदारी मालती के कंधों पर है। वह दिन-भर मरीजों को देखने के लिए दौड़ती है ताकि अपने परिवार और बहनों (सरोज और वरदा) की शिक्षा का खर्च उठा सके।
मेहता का ‘वीमेन्स लीग’ में भाषण – मिस्टर मेहता ‘वीमेन्स लीग’ में नारीत्व और उनके अधिकारों पर एक प्रभावशाली भाषण देते हैं। वे तर्क देते हैं कि नारी पुरुष से उतनी ही श्रेष्ठ है जितना प्रकाश अंधेरे से, क्योंकि नारी में दया, क्षमा और त्याग जैसे उच्च आदर्श रचे-बसे हैं।
अधिकारों बनाम सेवा का महत्व – मेहता का मानना है कि नारियों को पुरुषों के कलह और हिंसा वाले क्षेत्र जैसे राजनीति और वोट में नहीं आना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने ‘सृजन और पालन’ के दैवीय क्षेत्र को संभालना चाहिए।
पाश्चात्य सभ्यता की नकल का विरोध – मेहता भारतीय नारियों को चेतावनी देते हैं कि वे पश्चिम की नकल करके केवल ‘तितली’ (विलासिता की वस्तु) न बनें, बल्कि सेवा-व्रत के माध्यम से अपने गौरव की रक्षा करें।
गोविंदी की सराहना – मेहता मालती के सामने खन्ना की पत्नी गोविंदी के त्याग और शील की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं, जिससे मालती को अपने व्यवहार और जीवनशैली पर पुनर्विचार करने की प्रेरणा मिलती है। मालती से लोगों को ईर्ष्या या अशुरक्षा जरूर हो सकती है, लेकिन वह गोविंदी से कहीं बेहतर है। वह दिन रात खुद संघर्ष करती है- अपनी और अपने परिवार की पूरी ज़िम्मेदारी खुद उठाती है। जहाँ पुरूष महिलाओं को विजय का साधन समझते हैं, वहाँ कोई महिला इतनी निडर और संघर्ष शील हो उन्हें यह बरदाश नहीं है। उसका खन्ना से किसी प्रकार का अनैतिक सबन्ध नहीं है क्योंकि वह स्त्री लोगो उसे भला-बुरा बोल देते हैं। अगर वह डॉक्टर होती और पुरूष होती तो अनैतिक करने पर भी लोग उसे कुछ नहीं कहते।
खन्ना मालती के प्रति गलत विचार रखता है, जो अनैतिक है और मालती और गोविंदी दोनों का अपमान है। इसमें मालती दोषी नहीं है। पुरूषों का बाहर नौकरी करना जितना आसान है महिलाओं का नौकरी करना और खुद को सबसे बचाकर रखते हुए नौकरी करना चुनौतीपूर्ण है। और मालती इसी चुनौती का सामना प्रतिदिन करती है। मालती मेहता के प्रति आकर्षित है, और उसे अपना जीवन साथी बनाना चाहती है, जो गलत नहीं है।
खन्ना और मालती का विवाद – मेहता खन्ना द्वारा अपनी पत्नी गोविंदी पर किए गए अत्याचारों की निंदा करते हैं। वे मालती को भी टोकते हैं कि वह खन्ना को बढ़ावा देकर गोविंदी के दुख का कारण बन रही है।
प्रेम पर वैचारिक मतभेद – मेहता प्रेम को एक ‘खूंखार शेर’ की तरह मानते हैं जो अपने अधिकार क्षेत्र में किसी का हस्तक्षेप नहीं सहता। इसके विपरीत, मालती प्रेम को ‘संपूर्ण आत्म-समर्पण’ और संदेह से परे मानती है।
मालती का भावनात्मक आघात – मेहता द्वारा उसके चरित्र पर किए गए संदेह और उनके कठोर विचारों से मालती बहुत दुखी होती है और बिना बात किए वहाँ से चली जाती है। उसे इस बात का दुख होता है, जैसा सब उसके बारे में सोचते हैं, वैसा मेहता भी सोच रहे हैं। जबकि वह मेहता से प्रेम करती है। लेकिन मेहता न तो मालती के प्रेम को समझ पाते हैं न ही उसके संघर्ष और त्याग को।
मेहता गोविंद द्वारा अपने पति के सारे अत्यचार सहने को त्याग और समर्पण समझते हैं, जबकि सही मायने में त्याग और सेवा तो मालती के अन्दर है, जो पहले से तो होता ही है, लेकिन मेहता से प्रेम के बाद लगातार बढ़ता ही रहता है। लेखक मालती के विषय में कहता है- वह अन्दर से मधुमक्खी है और बाहर से तितली। अर्थात वह विलास भरा जीवन जिती दिखाई देती जरूर है, लेकिन उसका सत्य मधुमक्खी की तरह है, जो सारी मेहनत दूसरो के लिए करती है।
यह अध्याय मालती के जीवन में आए उस मोड़ को दिखाता है जहाँ वह बाहरी तड़क-भड़क को छोड़कर मेहता के विचारों के प्रभाव में आंतरिक शुचिता और सेवा की ओर बढ़ने लगती है।
भाग 16: रायसाहब का कानूनी संकट और संपादक ओंकारनाथ की चुनौती
रायसाहब पर तिहरा आर्थिक दबाव – रायसाहब एक साथ तीन बड़ी समस्याओं में घिरे हैं, अपनी बेटी मीनाक्षी का विवाह, चुनाव का खर्च और अपने साले की बीस लाख की जायदाद पर अधिकार पाने के लिए कानूनी मुकदमा, जिसकी कोर्ट-फीस ही पचास हजार रुपये है।
तंखा से विवाद और विश्वासघात – चुनाव में हार की आशंका और समझौते की विफलता को लेकर रायसाहब और मिस्टर तंखा के बीच तीखी बहस होती है। तंखा अब रायसाहब के प्रतिद्वंद्वी राजा साहब का पक्ष ले रहे हैं और रायसाहब पर पुराने बकाये का आरोप लगाते हुए उनका अपमान करते हैं।
खन्ना से ऋण की याचना – रायसाहब बैंक मैनेजर खन्ना से दो लाख रुपये का कर्ज माँगते हैं। खन्ना उन्हें सचेत करते हैं कि रायसाहब पहले से ही करीब दस लाख के कर्ज में डूबे हैं और उनकी आर्थिक स्थिति ‘ज्वालामुखी के मुख’ पर खड़ी है।
दिखावे की रईसी और दान – अपनी आर्थिक तंगी के बावजूद, रायसाहब मिस्टर मेहता के प्रभाव में आकर और अपने प्रतिद्वंद्वी राजा साहब से बराबरी करने की होड़ में ‘महिला व्यायामशाला’ के लिए पाँच हजार रुपये के चंदे का वचन दे देते हैं।
नोखेराम और पटेश्वरी का षड्यंत्र – होरी से जुरमाना वसूलने पर रायसाहब की डाँट खाने के बाद, नोखेराम और पटेश्वरी बदला लेने के लिए संपादक ओंकारनाथ को एक गुमनाम पत्र भेजते हैं, जिसमें रायसाहब द्वारा किसानों पर किए जा रहे अत्याचारों का विवरण होता है।
ओंकारनाथ की धमकी और रायसाहब का दौरा – संपादक ओंकारनाथ इस खबर को छापने की धमकी देते हैं। रायसाहब उनसे मिलने पहुँचते हैं और उनके बीच ‘सिद्धांतों’ और ‘व्यावहारिकता’ पर लंबी बहस होती है।
समझौता और गुप्त टरश्वत – रायसाहब ओंकारनाथ की आर्थिक कमजोरी को ताड़ लेते हैं। वे उन्हें ‘सिद्धांतों की रक्षा’ के नाम पर सौ मुफ्त ग्राहकों का चंदा (करीब पंद्रह सौ रुपये) देने का लालच देते हैं, जिसे ओंकारनाथ अपनी दरिद्रता के कारण स्वीकार कर लेते हैं।
ओंकारनाथ का आंतरिक द्वंद्व – ओंकारनाथ अपनी पत्नी गोमती की शिकायतों और घर की गरीबी के बीच पिस रहे हैं। वे जानते हैं कि रायसाहब से मदद लेना उनके आदर्शों के विरुद्ध है, फिर भी मजबूरी में वे इस ‘दान’ को स्वीकार कर लेते हैं।
यह अध्याय उच्च वर्ग के खोखलेपन, उनकी बढ़ती हुई देनदारियों और सिद्धांतों का ढोंग करने वाले मध्य वर्ग (ओंकारनाथ) की विवशताओं को उजागर करता है।
भाग 17: मातादीन और सिलिया का अपमानजनक कांड
रायसाहब का हस्तक्षेप – गाँव में यह खबर फैल जाती है कि रायसाहब ने पंचों को बुलाकर कड़ी फटकार लगाई और होरी से वसूले गए जुरमाने की रकम उनसे वापस ले ली।
होरी की विपन्नता और भुखमरी – बैलों के न होने के कारण होरी के खेत खाली पड़े रहते हैं और घर में अनाज का एक दाना भी नहीं बचता, जिससे रूपा भूख से व्याकुल होकर पुन्नी के घर भोजन करने जाती है।
दातादीन का प्रस्ताव – पंडित दातादीन होरी के साथ आधे साझे पर खेती करने का प्रस्ताव रखते हैं और साथ ही रूपा का विवाह अपने जजमान रामसेवक से करने का सुझाव देते हैं, जो उम्र में रूपा से बहुत बड़ा है।
गन्ने की फसल और महाजनों की लूट – होरी अपनी गन्ने की फसल बेचता है, लेकिन ठाकुर झिंगुरी सिंह और नोखेराम मिलकर उसके सारे पैसे (120 रुपये) पुराने कर्ज और जुरमाने के नाम पर छीन लेते हैं और होरी खाली हाथ रह जाता है।
मातादीन और सिलिया का विवाद – मातादीन अपनी प्रेमिका सिलिया को एक सेर अनाज देने पर अपमानित करता है और कहता है कि उसका अनाज पर कोई अधिकार नहीं है।
सिलिया के परिवार का विद्रोह – सिलिया के अपमान से क्रोधित होकर उसका पिता हरख और उसके भाई मातादीन को घेर लेते हैं और उनके बीच भीषण विवाद होता है।
धर्म भ्रष्ट करने का कांड – सिलिया के भाई मातादीन का जनेऊ तोड़ देते हैं और जबरदस्ती उनके मुँह में हड्डी का टुकड़ा डाल देते हैं, जिससे मातादीन का धर्म और सामाजिक मर्यादा मिट्टी में मिल जाती है।
सिलिया का समर्पण और धनिया का आश्रय – इस अपमान के बाद मातादीन सिलिया को त्यागने की बात करता है, लेकिन सिलिया उनका साथ छोड़ने को तैयार नहीं होती। अंत में, धनिया सिलिया की दुर्दशा देखकर उसे अपने घर में आश्रय देती है।
यह अध्याय ग्रामीण समाज में व्याप्त आर्थिक शोषण और जातीय संघर्ष के साथ-साथ मानवीय संबंधों की जटिलता को प्रभावी ढंग से चित्रित करता है। और जातीय दोहरी मानसिकता को दिखाता हैं। मातादीन सीलिया से अनैतिक संबंध रखते हैं, तो उनके धर्म को कोई ठेस नहीं लगती लेकिन अगर वह उसके साथ विवाह कर लें, तो उनके धर्म को ठेस लगती है। उसका धर्म दूषित होता है, जो गलत है।
भाग 18: खन्ना और गोविंदी का गृह-कलह और पश्चाताप
पारिवारिक वैचारिक मतभेद – मिस्टर खन्ना और उनकी पत्नी गोविंदी के बीच गहरे वैचारिक मतभेद हैं। जहाँ खन्ना विलासिता, बैंक और व्यापार के आधुनिक चक्र में डूबे हैं, वहीं गोविंदी सेवा, त्याग और उच्च मानवीय संस्कारों वाली महिला हैं, जो इस अपार संपत्ति को अपनी आत्मा के लिए घातक समझती हैं।
मिस मालती को लेकर विवाद – बीमार बेटे भीष्म के इलाज के लिए खन्ना ‘मिस मालती’ को बुलाने का हठ करते हैं, जिसका गोविंदी कड़ा विरोध करती है। उनका मानना है कि मालती केवल पुरुषों के दिल का इलाज करना जानती है।
घरेलू हिंसा और अपमान – बहस बढ़ने पर खन्ना मालती के प्रति अपनी श्रद्धा और आकर्षण का बखान करते हैं, जबकि गोविंदी उन्हें सचेत करती हैं कि मालती उन्हें केवल अपना गुलाम बनाकर रखना चाहती है। इस अपमान से बौखलाकर खन्ना गोविंदी के साथ मारपीट करते हैं।
गोविंदी का गृह-त्याग और संकल्प – खन्ना द्वारा किए गए शारीरिक और मानसिक अनादर से दुखी होकर गोविंदी अपने छोटे बेटे को लेकर घर छोड़ देती हैं और आत्मनिर्भर होकर गरिमापूर्ण जीवन जीने का निश्चय करती हैं।
मेहता और गोविंदी की भेंट – चिड़ियाघर के पास एक बगीचे में गोविंदी की मुलाकात डॉक्टर मेहता से होती है। मेहता उनके धैर्य और त्याग को देखकर उन्हें ‘आदर्श नारी’ और ‘पवित्रता की प्रतिमा’ बताते हैं, जिससे गोविंदी के आहत मन को बहुत सहारा मिलता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि गोविंदी पवित्रता की प्रतिमा है, लेकिन उसका त्याग उसे आदर्श नारी बनाने के साथ-साथ अत्याचार सहने वाली महिला बनाता है, जो गलत है। उसे खन्ना के द्वारा किए गए अत्याचार और अनैतिक व्यवहार का प्रतिरोध करना चाहिए। न कि सहना चाहिए। उस समय कि महिलाओं की स्थिति लगभग यही थी, तो यथार्थ दिखाते हुए प्रेमचंद ने गोविंदी का यथार्थ चरित्र गढ़ा। वर्तमान में भी न जाने कितनी महिलाएँ हैं जो गोविंदी की ही तरह जीवन जीने को विवश हैं।
मेहता का आश्वासन – गोविंदी मेहता के सामने अपनी व्यथा प्रकट करती हैं कि कैसे मालती उनके वैवाहिक जीवन में अशांति का कारण बनी हुई है। मेहता उन्हें सांत्वना देते हैं और वचन देते हैं कि मालती अब उनके रास्ते में बाधक नहीं बनेगी। गोविंदी के साथ जो कुछ भी हो रहा है, वह इसका दोषी मालती को समझती है, जो गलता है। इसका दोषी अगर कोई व्यक्ति है,तो वह सिर्फ खन्ना है। मालती अपना वर्तमान और भविष्य मेहता के साथ देखती है, और खन्ना से मिलना बातचीत करना यह महज़ औपचारिकता है। लेकिन अपनै अनैतिक विचारों से खन्ना ने इसे गलत बनाया है।
मातृत्व का गौरव और घर वापसी – मेहता गोविंदी को समझाते हैं कि नारी केवल माता है और मातृत्व संसार की सबसे बड़ी साधना और विजय है। उनके समझाने पर गोविंदी के भीतर का मातृत्व जाग उठता है और वह अपने बच्चों के भविष्य के लिए वापस अपने घर लौट आती हैं।
यह अध्याय उच्च वर्ग के दाम्पत्य संघर्ष, मातृत्व की गौरवमयी शक्ति को प्रभावी ढंग से उजागर करता है। नारी के त्याग से ज्यादा उसकी मजबूरी को दर्शाता है।
भाग 19: गोबर की लखनऊ में उन्नति और घर वापसी की तैयारी
शहर के जीवन में बदलाव – लखनऊ में एक साल रहने के बाद गोबर अब सीधा-साधा ग्रामीण युवक नहीं रहा। उसने शहर के तौर-तरीके सीख लिए हैं, अंग्रेजी फैशन के बाल कटवाए हैं और अब वह साफ़-सुथरी कमीज और जूते पहनने लगा है।
आर्थिक सफलता और छोटा महाजन – गोबर ने शहर में कड़ी मेहनत की और अब वह गरम चाय बेचने का काम करता है, जिससे उसकी रोजाना की आमदनी ढाई-तीन रुपये है। वह न केवल अपनी जरूरतें पूरी कर रहा है, बल्कि पड़ोस के इक्केवालों और धोबियों को ब्याज पर रुपये उधार देने वाला एक ‘छोटा महाजन’ भी बन गया है।
मिर्जा खुर्शेद की स्थिति – मिर्जा साहब की आर्थिक स्थिति खराब है और वे अपनी शराब की लत के लिए गोबर से रुपये उधार माँगते हैं। गोबर, जो अब पैसों के मामले में काफी चतुर हो गया है, अपने स्वार्थ के कारण उन्हें रुपये देने से मना कर देता है।
होली पर घर जाने का निर्णय – होली का उत्सव समीप आने पर गोबर का मन अपने गाँव और परिवार की ओर खिंचता है। उसे शहर में अकेले रहने की तकलीफों का अहसास होता है और वह झुनिया को भी अपने साथ लखनऊ लाने का विचार करता है।
उपहारों की खरीदारी – वह अपने परिवार के लिए उदारतापूर्वक खरीदारी करता है। वह माता-पिता और बहनों के लिए कीमती साड़ियाँ, होरी के लिए नई धोती और चादर, रूपा के लिए जापानी गुड़िया और झुनिया के लिए श्रृंगार का सामान आइना, कंघी आदि खरीदता है। साथ ही, वह अपने बच्चे के लिए टोप और फ्रॉक भी लेता है।
प्रस्थान – वह अपने मोहल्ले वालों से विदा लेकर और अपना काम-काज उनके भरोसे छोड़कर, भूरै के इक्के पर बैठकर स्टेशन की ओर निकल पड़ता है।
यह भाग गोबर के व्यक्तिगत विकास, उसके स्वावलंबन और शहर के अनुभवों के कारण उसके स्वभाव में आए बदलावों को दर्शाता है। इसके बाद भाग 20 में वह अपने गाँव बेलारी पहुँचता है।
भाग 20: होरी की बदहाली और गोबर की सानंद वापसी
होरी की दयनीय मजदूरी – फागुन का महीना है, लेकिन होरी के जीवन में कोई उल्लास नहीं है। वह अब मजदूर बन गया है और पंडित दातादीन के यहाँ गन्ने की कटाई और बोआई की मजदूरी कर रहा है। दातादीन एक कठोर मालिक की तरह होरी से क्षमता से अधिक काम लेते हैं और उसे सुस्त होने पर डाँटते रहते हैं।
धनिया और दातादीन का विवाद – धनिया, सोना और रूपा भी गन्ने ढोने का काम कर रही हैं। जब दातादीन उन्हें दम मारने (आराम करने) पर टोकते हैं और अपमानित करते हैं, तो धनिया डटकर विरोध करती है और कहती है कि वे इंसान हैं, कोई बैल नहीं। दातादीन उसे भीख माँगने की नौबत आने की धमकी देते हैं।
होरी का बेहोश होना – हफ्तों से भरपेट भोजन न मिलने और कड़ी मेहनत के कारण होरी का शरीर जवाब दे देता है। दातादीन की घुड़कियों से बचने के लिए वह पागलों की तरह काम करता है और अंततः खेत में ही बेहोश होकर गिर पड़ता है। धनिया और गाँव वाले उसे संभालते हैं। पंडित मातादीन दया दिखाकर उसे गर्म दूध पिलाते हैं, जिससे होरी की चेतना लौटती है।
गोबर की वापसी – उसी समय गोबर लखनऊ से वापस बेलारी लौटता है। वह एक साल बाद आया है और अब वह पहले जैसा गरीब ग्रामीण युवक नहीं, बल्कि अच्छे कपड़े पहने एक ‘भलामानस’ लग रहा है। धनिया उसे देखकर निहाल हो जाती है और उसका सारा दुख गायब हो जाता है।
उपहारों की वर्षा – गोबर अपने साथ सबके लिए उपहार लाया है। वह माता-पिता और बहनों के लिए कीमती साड़ियाँ, होरी के लिए नई धोती और दुपट्टा, रूपा के लिए जापानी गुड़िया, और अपने बेटे (चुन्नू/मंगल) के लिए टोप, फ्रॉक और जूते लाया है। वह गाँव के लिए मिठाई भी लाया है।
गोबर और झुनिया का मिलन – झुनिया पहले तो गोबर से इस बात पर नाराज होती है कि वह उसे बेसहारा छोड़कर भाग गया था और एक साल तक कोई खबर नहीं ली। गोबर अपनी कायरता के लिए क्षमा माँगता है और उसे विश्वास दिलाता है कि वह अब उसे अपने साथ लखनऊ ले जाने के लिए आया है।
यह भाग होरी की गिरती हुई आर्थिक स्थिति और उसके शारीरिक पतन के विपरीत गोबर की शहरी सफलता और उसके द्वारा परिवार में लाए गए क्षणिक सुख को दर्शाता है।
भाग 21: होली का जलसा, मुखियाओं की फजीहत और गोबर का प्रस्थान
गोबर का बढ़ता प्रभाव और भव्य होली – लखनऊ से लौटे गोबर ने अपने द्वार पर होली का भव्य आयोजन किया, जिसमें बादाम और केसरयुक्त भांग तथा बढ़िया तंबाकू का प्रबंध था। इस कारण गाँव के युवा और गायक नोखेराम की चौपाल छोड़कर गोबर के यहाँ जमा हो गए, जो गाँव के शक्ति-संतुलन में बदलाव का संकेत था।
मुखियाओं का उपहास (स्वाँग) – जलसे में गिरधर और शोभा ने गाँव के शोषक मुखियाओं (झिंगुरीसिंह, नोखेराम, पटेश्वरी और दातादीन) की नकल (नकल/प्रहसन) उतारी। झिंगुरीसिंह की दो पत्नियों और उनकी महाजनी लूट (नज़राना, तहरीर आदि के नाम पर कटौती) का ऐसा मज़ाकिया चित्रण किया गया कि सारा गाँव उन पर हँसने लगा।
दातादीन और गोबर का टकराव – प्रहसन से चिढ़े दातादीन ने अगले दिन होरी पर मज़दूरी के लिए दबाव डाला। गोबर ने इसका डटकर विरोध किया और दातादीन के ३० रुपये के बदले २०० रुपये माँगने के अन्यायपूर्ण हिसाब को चुनौती दी। उसने साफ़ कहा कि वह एक रुपये सैकड़ा से अधिक ब्याज नहीं देगा।
होरी की धर्म-भीरुता – गोबर के विद्रोही रुख के विपरीत, होरी ब्राह्मण के श्राप से डर गया। उसने दातादीन के पैर पकड़ लिए और गोबर की बातों के लिए क्षमा माँगते हुए पाई-पाई चुकाने का वचन दिया। इस मुद्दे पर पिता-पुत्र के बीच गहरा वैचारिक मतभेद उभर आया।
नोखेराम की हार – नोखेराम ने होरी पर दो साल का झूठा बकाया लगान निकालकर उसे दबाना चाहा। गोबर ने सीधे उसकी चौपाल पर जाकर उसे ललकारा और रायसाहब से शिकायत करने तथा अदालत में ‘गंगाजली’ उठाकर कसम खाने की धमकी दी। गोबर के इस साहस के आगे नोखेराम को पीछे हटना पड़ा।
पारिवारिक कलह और गोबर का निर्णय – खेत में काम करते समय सोना और रूपा के बीच हुई लड़ाई में गोबर ने उन्हें पीट दिया, जिससे होरी और धनिया उससे नाराज़ हो गए। घर में बढ़ती कटुता और अपनी उपेक्षा देख गोबर ने वापस लखनऊ जाने का फैसला किया।
झुनिया और बच्चे के साथ प्रस्थान – धनिया के कड़े विरोध के बावजूद, गोबर इस बार झुनिया और अपने बच्चे (चुन्नू/मंगल) को भी अपने साथ लखनऊ ले गया। उसने होरी को 70 रुपये दिए कि इससे दातादीन का हिसाब चुकता कर देना। झुनिया और बच्चे के जाने से धनिया का मन टूट गया और वह फफक कर रो पड़ी।
यह अध्याय ग्रामीण समाज में पुरानी मान्यताओं (होरी) और नए विद्रोही विचारों (गोबर) के बीच के संघर्ष को और अधिक तीव्र रूप में प्रस्तुत करता है।
भाग 22: रायसाहब का आर्थिक संकट, तंखा का विश्वासघात और मालती का प्रभाव
रायसाहब पर तिहरा दबाव – रायसाहब एक साथ तीन बड़ी समस्याओं में घिरे हैं—अपनी बेटी मीनाक्षी का विवाह, चुनाव का भारी खर्च और अपने साले की बीस लाख की जायदाद पर अधिकार पाने के लिए कानूनी मुकदमा, जिसकी कोर्ट-फीस ही पचास हजार रुपये है।
मीनाक्षी का विवाह – रायसाहब की बेटी का विवाह कुँवर दिग्विजय सिंह से तय हुआ है, जो अत्यंत धनी और प्रभावशाली हैं, लेकिन साथ ही कई व्यसनों (शराब, जुआ आदि) में भी डूबे हुए हैं।
तंखा का विश्वासघात और अपमान – चुनाव में राजा साहब (प्रतिद्वंद्वी) के साथ समझौते की विफलता को लेकर रायसाहब और मिस्टर तंखा के बीच तीखी बहस होती है। तंखा अब राजा साहब का पक्ष ले रहा है और रायसाहब पर पुराने बकाये का आरोप लगाते हुए उनका अपमान करता है।
खन्ना से ऋण की याचना – रायसाहब बैंक मैनेजर खन्ना से दो लाख रुपये का कर्ज माँगते हैं। खन्ना उन्हें सचेत करते हैं कि रायसाहब पहले से ही करीब दस लाख के कर्ज में डूबे हैं और उनकी आर्थिक स्थिति ‘ज्वालामुखी के मुख’ पर खड़ी है।
खन्ना की मालती को लेकर व्यथा – खन्ना रायसाहब से अपना दुख साझा करते हैं कि कैसे मिस मालती अब उनसे दूर होकर डॉक्टर मेहता के करीब आ गई हैं और उनके द्वारा भेजे गए उपहारों को भी ठुकरा रही हैं।
झूठी शान और दान – अपनी भारी आर्थिक तंगी के बावजूद, रायसाहब मिस्टर मेहता के प्रभाव में आकर और अपने प्रतिद्वंद्वी राजा साहब से बराबरी करने की होड़ में ‘महिला व्यायामशाला’ के लिए पाँच हजार रुपये के चंदे का वचन दे देते हैं।
मालती का दबदबा – मालती स्वयं खन्ना के पास आती है और उन्हें ताना मारकर तथा उनकी “कंजूसी” का मजाक उड़ाकर व्यायामशाला के लिए एक हजार रुपये का चेक देने पर मजबूर कर देती है।
यह भाग उच्च वर्ग के खोखलेपन, उनकी बढ़ती हुई देनदारियों और आपसी ईर्ष्या व स्पर्धा के कारण उत्पन्न होने वाले मानसिक और आर्थिक संकट को उजागर करता है।
भाग 23: धनिया की विरह-वेदना और मातादीन का धर्म-नाश
धनिया की ममता और विरह – गोबर और झुनिया के लखनऊ चले जाने के बाद धनिया अपने पोते (चुन्नू/मंगल) की याद में व्याकुल रहती है। वह झुनिया को अपने बेटे और पोते को दूर ले जाने के लिए दोषी मानती है और उसे ‘कलमुँही’ और ‘मायाविनी’ कहकर कोसती है। होरी उसे समझाने की कोशिश करता है कि समय के साथ गोबर की सोच बदल गई है, लेकिन धनिया का दुख शांत नहीं होता।
खलिहान का दृश्य और महाजनी चर्चा – होरी खलिहान में अनाज की मूँड़ाई और ओसाई के काम में लगा हुआ है। वहाँ गाँव के मुखिया और महाजन (दातादीन, झिंगुरीसिंह आदि) जमा हैं और अपने कर्ज की वसूली कर रहे हैं। वे इस बात पर चर्चा करते हैं कि कानून चाहे कितना भी बदल जाए, महाजन हमेशा गरीबों का शोषण करने का रास्ता निकाल ही लेंगे क्योंकि “कानून और न्याय उसी का है, जिसके पास पैसा है।”
मातादीन और सिलिया का विवाद – खलिहान में ही मातादीन की प्रेमिका सिलिया अनाज ओसाने का काम कर रही है। जब सिलिया, दुलारी सहुआइन का कर्ज चुकाने के लिए अनाज के ढेर से थोड़ा हिस्सा देने लगती है, तो मातादीन उसे बुरी तरह डाँटता है। वह सिलिया को अपमानित करते हुए कहता है कि अनाज पर उसका कोई अधिकार नहीं है और वह केवल एक मजदूरिन की तरह काम कर रही है।
सिलिया के परिवार का विद्रोह – सिलिया के प्रति इस निष्ठुर व्यवहार को देखकर उसका पिता हरखू और उसके भाई मातादीन को घेर लेते हैं। वे इस बात से आक्रोशित हैं कि मातादीन सिलिया का उपभोग तो करता है, लेकिन उसे अपनी पत्नी के रूप में सम्मान और अधिकार नहीं देता।
मातादीन का धर्म-भ्रष्ट होना – भीषण विवाद के बीच सिलिया के भाई मातादीन का जनेऊ तोड़ देते हैं और उसके मुँह में जबरदस्ती हड्डी का टुकड़ा डाल देते हैं। गाँव के लोग मूकदर्शक बनकर यह तमाशा देखते रहते हैं। इस अपमानजनक कांड से मातादीन का ‘ब्राह्मण धर्म’ नष्ट हो जाता है और वह ग्लानि में डूबकर जमीन पर लेट जाता है।
सिलिया का समर्पण और धनिया का आश्रय – सिलिया का परिवार उसे पीटकर वहीं छोड़ देता है और उससे हमेशा के लिए नाता तोड़ लेता है। मातादीन भी सिलिया को ही अपनी बर्बादी का कारण मानकर उसे दुत्कार देता है। अंत में, धनिया सिलिया की चोटों और उसकी बेसहारा स्थिति को देखकर उसे अपने घर में आश्रय देती है।
यह भाग ग्रामीण समाज में व्याप्त आर्थिक शोषण, जातीय संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं के जटिल ताने-बाने को उजागर करता है।
भाग 24: सोना का विवाह और मर्यादा का द्वंद्व
सोना का विवाह और होरी की चिंता – सोना सत्रहवें साल में थी और उसका विवाह करना अनिवार्य हो गया था। होरी दो साल से इसके लिए प्रयासरत था, लेकिन झुनिया को घर में रखने के कारण बिरादरी में उनकी प्रतिष्ठा गिर गई थी, जिससे अब बिना भारी दहेज (सौ-दो सौ रुपये) के कोई कुलीन वर मिलना कठिन था।
घोर आर्थिक संकट – होरी की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी। पिछले साल की फसल ‘डाँड़’ भरने में चली गई थी और इस साल भी ऊख की फसलें विभिन्न कारणों से बर्बाद हो गई थीं।
गोबर से मदद पर विवाद – होरी चाहता था कि वह लखनऊ जाकर गोबर से आर्थिक सहायता माँगे, लेकिन धनिया गोबर के पिछले कठोर व्यवहार के कारण उससे एक पैसा भी लेने के विरुद्ध थी। होरी ‘कुश-कन्या’ (बिना दहेज का विवाह) देने पर भी विचार करता है, पर कुल-मर्यादा के कारण डरता है।
गाँव के युवाओं का व्यवहार – पटेश्वरी, झिंगुरीसिंह और नोखेराम के बेटे छुट्टियों में गाँव आए हुए थे और वे अक्सर होरी के घर के पास चक्कर लगाते थे, जिससे होरी को अपनी बेटी की सुरक्षा और सम्मान की चिंता होने लगी थी।
दुलारी सहुआइन से कर्ज – अंततः होरी दुलारी सहुआइन के पास जाता है। पहले तो वह पुराने बकाये के कारण मना करती है, लेकिन बाद में होरी की मजबूरी और उसके व्यवहार से पसीजकर दो सौ रुपये देने का वादा कर लेती है।
मथुरा से रिश्ता तय होना – सोना का विवाह सोनारी गाँव के एक संपन्न किसान गौरी महतो के बेटे मथुरा से तय होता है।
सोना का त्याग और संदेश – सोना जब सुनती है कि उसके विवाह के लिए होरी कर्ज ले रहा है, तो वह अत्यंत दुखी होती है। वह सीलिया के माध्यम से मथुरा को संदेश भेजती है कि यदि उसने एक पैसा भी दहेज लिया, तो वह उससे विवाह नहीं करेगी और अपनी जान दे देगी ताकि उसके माता-पिता और अधिक कर्ज में न डूबें।
सोनारी में विवाद – सीलिया के माध्यम से संदेश पाकर मथुरा अपने पिता गौरी महतो से दहेज न लेने के लिए लड़ता है। इस पर गौरी महतो मथुरा को जूतों से पीटते हैं, पर मथुरा अपने फैसले पर अडिग रहता है।
गौरी महतो का उदार पत्र – अंततः गौरी महतो झुक जाते हैं और होरी को पत्र लिखते हैं कि वे बिना दहेज के विवाह करने को तैयार हैं और होरी को बरात के खान-पान या दहेज की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।
धनिया की प्रतिक्रिया – गौरी महतो की इस उदारता को देखकर धनिया का स्वाभिमान जाग उठता है। वह कहती है कि जब वे भलमनसी दिखा रहे हैं, तो हमें भी अपनी मर्यादा का निर्वाह करना चाहिए और जो कुछ बन सके उन्हें देना चाहिए।
यह अध्याय दिखाता है कि कैसे सोना का साहस और मथुरा का समर्थन होरी के परिवार को एक बहुत बड़े आर्थिक संकट से उबरने में मदद करता है। लेकिन धनिया के स्वाभिमान के कारण सोना की सारी मेहनत बेकार जाती है, और वह कर्ज लेकर सोना का विवाह करते हैं।
भाग 25: भोला की दूसरी सगाई और नोहरी का बढ़ता प्रभाव
भोला की दूसरी सगाई – भोला ने अपनी ढलती उम्र में एक जवान विधवा ‘नोहरी’ से दूसरी सगाई कर ली क्योंकि घर में उसकी सेवा करने वाला कोई नहीं था।
पारिवारिक कलह और सत्ता संघर्ष – नोहरी के आने से भोला के घर का वातावरण बिगड़ गया, क्योंकि घर के नियंत्रण और मर्जी चलाने को लेकर नोहरी और भोला की बड़ी बहू (कामता की पत्नी) के बीच तीखा संघर्ष शुरू हो गया।
बेटे द्वारा पिता का अपमान – विवाद इतना बढ़ गया कि भोला के बेटे कामता ने अपने पिता को लातों से पीटा और उन्हें घर की किसी भी चीज पर अधिकार दिए बिना घर से निकाल दिया।
नोखेराम की कूटनीति और आश्रय – बेघर होने के बाद भोला कारिंदा नोखेराम के पास पहुँचे, जिसने नोहरी के आकर्षण और अपने स्वार्थ के कारण भोला को तीन रुपये महीने और सेर-भर अनाज पर अपने मवेशियों की देखभाल के लिए रख लिया।
कामता की असफलता और याचना – भोला के बिना डेयरी का काम और घर संभालना कामता के लिए असंभव हो गया, जिससे थक-हारकर वह अपने पिता से क्षमा मांगने और उन्हें वापस घर ले जाने के लिए नोखेराम के पास आया।
नोहरी का घर वापसी से इनकार – नोहरी ने कामता के साथ वापस जाने से साफ मना कर दिया क्योंकि वह अब बहू की अधीनता स्वीकार करने के बजाय स्वतंत्र रहना चाहती थी।
नोहरी का दबदबा – नोखेराम के संरक्षण में रहने के कारण गाँव में नोहरी का आतंक बढ़ गया और वह पटवारी, प्यादों और गाँव के अन्य प्रभावशाली लोगों पर भी रोब जमाने लगी।
नोखेराम और पटेश्वरी का विवाद – नोहरी द्वारा अपमान की शिकायत किए जाने पर नोखेराम ने डंडा उठाकर पटवारी पटेश्वरी लाल को सरेआम ललकारा और उन्हें गाँव के सामने अपमानित किया।
भोला की दयनीय स्थिति – भोला अब पूरी तरह से नोहरी के वश में थे; वह न तो अपनी मर्जी से कहीं जा सकते थे और न ही नोहरी के व्यवहार का विरोध कर पा रहे थे।
यह अध्याय दिखाता है कि कैसे स्त्री-मोह में पड़कर भोला ने अपनी प्रतिष्ठा और पारिवारिक गरिमा खो दी और कैसे गाँव की राजनीति में एक बाहरी स्त्री (नोहरी) ने अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया।
भाग 26: होरी की ऊख की नीलामी और गहराता आर्थिक संकट
पटेश्वरी का षड्यंत्र – पटवारी पटेश्वरी गाँव में कलह और संघर्ष को बढ़ावा देने में कुशल है। वह मूँगरू साह को उकसाता है कि होरी की ऊख (गन्ने) की फसल अच्छी है और यही सही समय है कि वह अपने पुराने कर्ज (सवा सौ रुपये) की वसूली के लिए होरी पर दावा कर दे।
मूँगरू साह की कानूनी कार्रवाई – मूँगरू साह झंझटों से बचना चाहता है, लेकिन पटेश्वरी द्वारा कोर्ट-कचहरी की सारी जिम्मेदारी लेने के आश्वासन पर वह मुकदमा दायर करने की अनुमति दे देता है।
ऊख की नीलामी – होरी को इस मुकदमे और डिक्री की खबर तब लगती है जब कुकद-अमीन कुड़की करने वाला अधिकारी उसकी ऊख नीलाम करने खेत पर पहुँचता है। होरी की खड़ी फसल 150 रुपये में नीलाम हो जाती है और मूँगरू साह ही उसे खरीद लेता है।
धनिया का आक्रोश – धनिया इस अन्याय पर भड़क उठती है और पटेश्वरी को जमकर गालियाँ देती है। उसे पूरा विश्वास है कि यह सब पटेश्वरी की ही चाल है।
होरी की विवशता – होरी अपमान और ग्लानि से भर जाता है। वह जानता है कि कानून के सामने वह बेबस है और अब उसकी फसल पर उसका कोई अधिकार नहीं रहा।
दुलारी सहुआइन का इनकार – होरी ने अपनी बेटी सोना के विवाह के लिए दुलारी सहुआइन से कर्ज की बात की थी, जो इसी ऊख की फसल पर आधारित थी। फसल नीलाम होने के बाद दुलारी ने होरी को और कर्ज देने से साफ मना कर दिया, जिससे विवाह पर संकट खड़ा हो गया।
मर्यादा और गरीबी का संघर्ष – फसल चले जाने के बाद अब होरी के पास अपनी मर्यादा बचाने का कोई रास्ता नहीं बचा है। धनिया हार मानकर कहती है कि अब सोना का विवाह बिना किसी धूम-धाम के ही करना होगा।
यह अध्याय दिखाता है कि कैसे ग्रामीण राजनीति और कानूनी पेचीदगियाँ एक गरीब किसान को पूरी तरह तबाह कर देती हैं और उसकी रही-सही उम्मीदों को भी छीन लेती हैं।
भाग 27 : मिल की हड़ताल और गोबर का घायल होना
मिल में आर्थिक संकट और कटौती – बजट में शक्कर पर ड्यूटी लगने के कारण मिल मालिकों ने घाटे की पूर्ति के लिए मजदूरों की मजदूरी घटाने का फैसला किया। मजदूरों के संघ ने इसका कड़ा विरोध किया और हड़ताल की तैयारी शुरू कर दी।
गोबर का सक्रिय नेतृत्व – गोबर हड़ताली मजदूरों में सबसे आगे था और वह मिल के मालिकों के खिलाफ लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार था।
झुनिया और गोबर का विवाद – झुनिया ने गोबर को इस खतरे से आगाह करते हुए संघर्ष से दूर रहने की सलाह दी, लेकिन गोबर ने उसकी बातों को अनसुना कर दिया और तैश में आकर उसे पीट दिया।
मजदूरों और मालिकों का संघर्ष – मिल मालिकों ने नए मजदूरों को भर्ती करने की योजना बनाई, जिसका हड़तालियों ने हिंसक विरोध किया। पुलिस की मौजूदगी में दोनों पक्षों के बीच भीषण झड़प हुई।
मिर्जा और गोबर का घायल होना – संघर्ष के दौरान संपादक ओंकारनाथ भाग निकले, लेकिन मिर्जा खुर्शेद पिट गए। मिर्जा की रक्षा करते हुए गोबर पर लाठियों की बौछार हुई, जिससे उसका सिर फट गया और हाथ की हड्डी टूट गई।
चुहिया का सहारा – घायल गोबर को घर लाया गया। इस संकट की घड़ी में पड़ोस की औरत ‘चुहिया’ ने झुनिया की बहुत मदद की और गोबर की देखभाल में हाथ बँटाया।
अस्पताल और सुधार – तीन दिनों तक बेहाल रहने के बाद गोबर को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसकी हालत में धीरे-धीरे सुधार होने लगा।
झुनिया का संघर्ष और नया रूप – गोबर के घायल होने के कारण घर का खर्च चलाने के लिए झुनिया ने बाहर जाकर घास छीलने और उसे बेचने का काम शुरू किया। इस कठोर परिश्रम और ताजी हवा ने झुनिया के स्वास्थ्य और स्वभाव में एक नया निखार ला दिया।
गोबर का पश्चाताप – अपनी लाचारी और झुनिया की निस्वार्थ सेवा देखकर गोबर के मन में अपने पिछले दुर्व्यवहार के प्रति गहरा पश्चाताप जागा और वह भविष्य में एक बेहतर इंसान बनने का संकल्प लेने लगा।
भाग 28: मिल की तबाही और खन्ना का हृदय-परिवर्तन
हड़ताल पर खन्ना के विचार – मिस्टर खन्ना मजदूरों की हड़ताल को अनुचित और बेजा मानते हैं। उनका तर्क है कि मिल एक व्यापार है, कोई सदाव्रत नहीं, और उन्हें हिस्सेदारों (Shareholders) के हितों की रक्षा करनी है। वे हड़ताल के लिए मिर्जा खुर्शेद और ओंकारनाथ जैसे नेताओं को जिम्मेदार ठहराते हैं।
मेहता का मानवीय दृष्टिकोण – डॉ. मेहता खन्ना के तर्कों का कड़ा विरोध करते हैं। वे कहते हैं कि जो मजदूर अपनी जान खपाते हैं, उनका हक रुपया लगाने वालों से ज्यादा है। वे खन्ना को मजदूरों की नर्क जैसी जीवन स्थितियों और उनके साथ किए जा रहे अन्याय के लिए फटकारते हैं।
मिल में भीषण अग्निकांड – बातचीत के दौरान ही शक्कर मिल में भीषण आग लग जाती है। खन्ना ने अभी तक मिल का बीमा (Insurance) नहीं कराया था, जिससे उनका सब कुछ दांव पर लग जाता है। देखते ही देखते पूरी मिल जलकर राख हो जाती है और फायर ब्रिगेड की कोशिशें भी नाकाम रहती हैं।
खन्ना का आर्थिक और मानसिक पतन – मिल जल जाने से खन्ना पूरी तरह तबाह हो जाते हैं। वे दस लाख के स्वामी से सीधे दिवालिया होने की कगार पर पहुँच जाते हैं। समाज में अपनी प्रतिष्ठा खोने के डर और ग्लानि से वे टूट जाते हैं और फूट-फूट कर रोने लगते हैं।
गोविंदी का आत्मिक संबल – अपनी घोर विपत्ति में खन्ना को अपनी पत्नी गोविंदी में ही सच्चा सहारा मिलता है। वही गोविंदी, जिसका उन्होंने हमेशा अपमान किया, आज उन्हें कंठ से लगा लेती है। वह उन्हें समझाती है कि धन सारे पापों की जड़ है और इसके चले जाने से उनकी आत्मा को मुक्ति और शांति मिलेगी।
त्याग और सत्य का बोध – गोविंदी खन्ना को जीवन की सार्थकता का नया पाठ पढ़ाती है। उसका मानना है कि धन खोकर अपनी आत्मा को पा लेना कोई महँगा सौदा नहीं है और अन्याय से लड़ने में ही सच्चा गौरव है। डॉ. मेहता गोविंदी के इन ऊँचे विचारों को देखकर उनके प्रति गहरी श्रद्धा से भर जाते हैं।
यह अध्याय पूंजीवाद के खोखलेपन और संकट के समय मानवीय संबंधों एवं आंतरिक शक्ति के उदय को प्रभावशाली ढंग से चित्रित करता है।
भाग 29: नोहरी का अहंकार, मातादीन का पश्चाताप और सीलिया का अपमान
नोहरी का अहंकार और दिखावा – नोहरी ने सोना के विवाह के लिए होरी को जो दो सौ रुपये उधार दिए थे, उसका वह गाँव भर में ढिंढोरा पीटती है और इसे अपनी महानता बताती है। धनिया इस ‘एहसान’ जताने की प्रवृत्ति से बहुत रुष्ट होती है और उसे खरी-खोटी सुनाती है।
भोला की दयनीय स्थिति – भोला अपनी पत्नी नोहरी के चंचल स्वभाव और अपमानजनक व्यवहार से बहुत दुखी है। बाद में गाँव में यह खबर फैलती है कि नोहरी ने सार्वजनिक रूप से भोला को जूतों से पीटा है, जिससे भोला की रही-सही मर्यादा भी समाप्त हो जाती है।
मातादीन का पश्चाताप – गंभीर बीमारी (मलेरिया) से जूझने के बाद मातादीन को अपने किए पर पछतावा होता है। वह होरी के माध्यम से सीलिया को दो रुपये भेजता है और अपने दुर्व्यवहार के लिए क्षमा मांगते हुए कहता है कि “समाज-धरम पालने से समाज आदर करता है, मगर मनुष्य-धरम पालने से ईश्वर प्रसन्न होता है”।
सीलिया का रात का सफर – मातादीन का प्रेम और सहायता पाकर सीलिया निहाल हो जाती है। वह यह ‘सुख-संवाद’ अपनी सहेली सोना को सुनाने के लिए रात में ही जान जोखिम में डालकर तैरकर नदी पार करती है और सोना के गाँव ‘सोनारी’ पहुँचती है।
मथुरा की कुचेष्टा – सोना के घर के बरोठे में सोना का पति मथुरा, सीलिया को अकेला पाकर उसे पकड़ने और छेड़खानी करने की कोशिश करता है। सीलिया उसे कड़ी फटकार लगाती है और मर्यादा की याद दिलाती है।
सोना का संदेह और गड़ाँसा कांड – सोना दोनों को बरोठे में साथ देख लेती है और उसे सीलिया और मथुरा के बीच अवैध संबंधों का संदेह होता है। वह हाथ में गड़ाँसा लेकर सीलिया को धमकी देती है और उससे सारा सच उगलवाती है।
सीलिया का निष्कासन – सीलिया जब मथुरा की बदचलनी का सारा सच बता देती है, तो सोना अपने पति को बचाने के लिए सारा दोष सीलिया पर मढ़ देती है। वह सीलिया को ‘हरजाई’ और ‘बेसवा’ कहकर अपमानित करती है और उसे अपने घर से निकाल देती है। सीलिया टूटे हुए दिल के साथ वापस लौट पड़ती है।
यह अध्याय दिखाता है कि कैसे सामाजिक मर्यादा और व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण निर्दोष पात्रों (सीलिया) को अपमान झेलना पड़ता है और कैसे संकट के समय ही मनुष्य के वास्तविक चरित्र की परीक्षा होती है। अनैतिक व्यवहार चाहे भले पुरूष ही करें, लेकिन इसका सारा दोष एक स्त्री पर ही मढ़ दिया जाता है।
भाग 30: मिल की स्थिति और मेहता-मालती का बेलारी दौरा
मिल का पुनर्निर्माण और श्रम समस्या – शक्कर मिल जलने के बाद उसे फिर से खड़ा करने की कोशिशें शुरू होती हैं। हड़ताल जारी है, लेकिन मिल मालिकों को अब नए मजदूर कम वेतन पर मिल रहे हैं, जो अकुशल होने के बावजूद बेरोजगारी के कारण काम करने को मजबूर हैं।
खन्ना और गोविंदी के संबंधों में सुधार – मालती के प्रति आकर्षण कम होने के बाद खन्ना और उनकी पत्नी गोविंदी के बीच संबंध सुधर रहे हैं। खन्ना अब जटिल समस्याओं में गोविंदी की सलाह लेने लगे हैं।
मेहता और मालती का वैचारिक परिवर्तन – डॉ. मेहता का झुकाव सेवा और कर्मयोग की ओर बढ़ गया है। उनके प्रभाव से मालती के जीवन में भी बड़ा बदलाव आया है; वह अब गरीबों का मुफ्त इलाज करती है और बनावटी शहरी जीवन के बजाय सादगी की ओर बढ़ रही है।
बेलारी गाँव की यात्रा – मेहता और मालती घूमते हुए होरी के गाँव बेलारी पहुँचते हैं। वे होरी के द्वार पर खटोले पर बैठते हैं और ग्रामीणों के सरल जीवन को समझने की कोशिश करते हैं।
ग्रामीण महिलाओं से मालती का संवाद – मालती गाँव की महिलाओं (धनिया, सिलिया, दुलारी आदि) को शिशु-पालन और स्वच्छता की शिक्षा देती है। वह ग्रामीणों की घोर दरिद्रता और महाजनों के शोषण की कहानियाँ सुनकर दुखी होती है।
मालती का आत्म-मंथन: ग्रामीण महिलाओं के कठिन परिश्रम और निस्वार्थ त्याग को देखकर मालती को अपने शहरी आडंबरों, रेशमी कपड़ों और पाउडर से सजे मुख-मंडल पर लज्जा आती है। वह उनके प्रति गहरी सहानुभूति का अनुभव करती है।
नदी तट पर नौका-विहार – रात में मेहता और मालती नदी किनारे जाते हैं। मेहता घास-फूस और टहनियों से एक अस्थायी नाव (तख्ता) बनाते हैं और दोनों नदी पार करते हैं।
प्रेम के स्वरूप पर चर्चा – नदी के किनारे मेहता और मालती के बीच प्रेम और विवाह पर गंभीर बहस होती है। मेहता प्रेम को एक ‘खूँखार शेर’ की तरह आक्रामक और संदेहपूर्ण बताते हैं, जबकि मालती इसे ‘आत्म-समर्पण’ और ‘विश्वास’ की वस्तु मानती है। मेहता की ‘पशुवत’ प्रेम की व्याख्या से मालती का हृदय आहत होता है।
यही कारण है, मालती मेहता से अत्यधिक प्रेम करने के बाद भी विवाह नहीं करती। मेहता चाहता है, उसे ऐसी पत्नी मिले जो कितने भी अनैतिक कार्य करने के बाद भी विद्रोह न करे। अर्थात वह स्वयं का आस्तित्व ही मिटा दे। मेहता ने मालती की हमेशा परीक्षा ली है, मालती भी मेहता के प्रेम में खुद को बदलने लगी। लेकिन मेहता यह पूछता है कि विवाह के बाद – “मैं तुमसे विवाह करके कल तुमसे बेवफाई करूँ तो तुम मुझे क्या सजा दोगी?” मेहता के यह प्रश्न मालती के लिए असहय थे। मालती रोती हुई वहाँ से उठ गई। शायद इसी एक प्रश्न के कारण प्रेमचंद ने उपन्यास में मालती और मेहता का विवाह नहीं कराया।
मेहता की नज़र में औरत गोविंदी जैसी होनी चाहिए, लेकिन अगर हम सही अर्थों में समझें तो मालती गोविंदी से कहीं विकसित किरदार है। गोविंदी खन्ना के अनैतिक व्यवहार को सहते हुए भी उसके साथ रहती है, यह उसकी मजबूरी है। लेकिन मालती प्रेम चाहती है- वह चाहती है, मेहता उसका उपासक हो न कि परीक्षक। मेहता जबसे मिला है मालती से तब से परीक्षा लेता आ रहा है, और आज उसकी यह आखिरी परीक्षा मालती देने से अच्छा है, उसमें बैठे ही नहीं।
भाग 31: रायसाहब का उत्कर्ष, पारिवारिक विद्रोह और मानसिक अशांति
रायसाहब की तिहरी सफलता – रायसाहब के जीवन में एक साथ तीन बड़ी सफलताएँ आईं—उन्होंने अपनी बेटी (मीनाक्षी) का विवाह धूमधाम से संपन्न किया, सालों की 20 लाख की जायदाद का मुकदमा जीत लिया और चुनाव जीतकर ‘होम मेंबर’ (मंत्री) बन गए।
‘राजा’ की पदवी और वैभव – सरकार की ओर से रायसाहब को ‘राजा’ की पदवी दी गई। उन्होंने नैनीताल, मसूरी और शिमला में अपने निजी बँगले खरीदे और उनका सम्मान ताल्लुकेदारों में सर्वोपरि हो गया।
रुद्रपाल का विद्रोह – रायसाहब के पुराने प्रतिद्वंद्वी राजा सैयद प्रताप सिंह ने अपनी कन्या का विवाह रायसाहब के बेटे रुद्रपाल से करने का प्रस्ताव रखा। रायसाहब इसके लिए बहुत उत्सुक थे, लेकिन रुद्रपाल ने इस विवाह को अस्वीकार कर दिया।
सरोज के साथ विवाह और इंग्लैंड गमन – रुद्रपाल ने खुलासा किया कि उसने मिस मालती की बहन सरोज से विवाह कर लिया है और वह उसके साथ इंग्लैंड चला गया। यही नहीं, उसने रायसाहब पर हिसाब-फहमी का मुकदमा दायर कर 10 लाख की डिग्री भी करा ली।
मीनाक्षी का वैवाहिक संघर्ष – रायसाहब की पुत्री मीनाक्षी का वैवाहिक जीवन अत्यंत दुखद रहा। उसके पति कुँवर दिग्विजय सिंह शराब और ऐयाशी में डूबे रहते थे, जिसके कारण मीनाक्षी ने उन पर गुजारे का दावा किया और उनसे अलग रहने लगी।
कुँवर साहब पर ‘हंटर’ का प्रहार – एक बार क्रोध में आकर मीनाक्षी हंटर लेकर कुँवर साहब के बँगले पर पहुँची और उन्हें तथा वहाँ मौजूद एक वेश्या को बुरी तरह पीटा। इसके बाद पति-पत्नी एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए।
तंखा का अपमान – मिस्टर तंखा ने पहले रायसाहब को चुनाव में धोखा दिया था और बाद में राजा सैयद प्रताप सिंह से भी गद्दारी की। अंततः रायसाहब और राजा साहब दोनों ने मिलकर तंखा को बुरी तरह अपमानित किया और उसे अपने पास से निकाल दिया।
रायसाहब का आत्म-अवसाद – अपार संपत्ति, पद और सम्मान पाने के बाद भी रायसाहब अंदर से टूट गए थे क्योंकि उनके बच्चों ने उनके अरमानों पर पानी फेर दिया था। वे अब भक्ति और उपासना में शांति खोजने लगे थे, लेकिन उनके मन का द्वंद्व शांत नहीं होता था।
यह अध्याय दिखाता है कि कैसे ऊँचे पदों और वैभव के पीछे पारिवारिक बिखराव और गहरी मानसिक पीड़ा छिपी हुई थी।
भाग 32: मिर्जा खुर्शेद का नया संकल्प और वेश्या-सुधार की योजना
मिर्जा खुर्शेद का हृदय-परिवर्तन – अस्पताल से निकलने के बाद मिर्जा खुर्शेद के जीवन के प्रति दृष्टिकोण में गहरा बदलाव आया है। वे अपनी जवानी की अय्याशियों और धन की बर्बादी पर पछताते हैं और अब अपना शेष जीवन सेवा में लगाना चाहते हैं।
नाटक-मंडली की योजना – मिर्जा ने नगर की वेश्याओं को संगठित कर एक नाटक-मंडली बनाने का नया काम शुरू किया है। उनका मानना है कि वेश्यावृत्ति का मुख्य कारण आर्थिक मजबूरी और सम्मानजनक आश्रय का अभाव है, जिसे यह मंडली दूर कर सकती है।
मेहता और मिर्जा के बीच वैचारिक बहस – डॉक्टर मेहता इस योजना पर शंका प्रकट करते हैं। मेहता का तर्क है कि जब तक समाज में अत्यधिक धन और भोग-लालसा मौजूद है, वेश्यावृत्ति को केवल नाटक-मंडली से समाप्त नहीं किया जा सकता। मिर्जा इसे रोजी-रोटी का सवाल बताते हैं, जबकि मेहता इसे मानसिक संस्कार और विलासिता की भूख मानते हैं।
खन्ना और मालती का बदला हुआ स्वरूप – मेहता मिर्जा को बताते हैं कि मिल जलने के बाद खन्ना अब धन के पंजे से मुक्त होकर एक बेहतर इंसान बन गए हैं। मालती के भीतर का ‘मातृत्व’ और ‘सेवा भाव’ भी जाग उठा है; वह अब बीमार गोविंदी की सेवा और खन्ना के बच्चों का पालन-पोषण कर रही है।
मालती के प्रति मेहता की श्रद्धा – मेहता स्वीकार करते हैं कि मालती अब उनके लिए केवल प्रेम की नहीं, बल्कि श्रद्धा की वस्तु बन गई है। वे मालती को ‘त्याग और पवित्रता की प्रतिमा’ के रूप में देखने लगे हैं और उससे विवाह करने के लिए स्वयं को ‘तपस्या’ की स्थिति में पाते हैं।
मिर्जा का आश्वासन – मेहता के आग्रह पर मिर्जा खुर्शेद इस कठिन समय में खन्ना से मिलने और उनके प्रति सहानुभूति प्रकट करने के लिए तैयार हो जाते हैं। यह अध्याय वेश्यावृत्ति जैसे सामाजिक प्रश्न, पात्रों के आत्मिक परिष्कार और मानवीय संवेदनाओं के महत्व को रेखांकित करता है।
भाग 33: मालती का सेवा-रूप, मेहता का समर्पण और नया जीवन-संकल्प
मेहता की आर्थिक बदहाली और मालती का हस्तक्षेप – डॉ. मेहता अपनी आय (महीने के एक हजार से अधिक) का बड़ा हिस्सा गरीब छात्रों और विधवाओं की मदद (गुप्तदान) में लुटा देते थे, जिसके कारण वे स्वयं तंगी में रहते थे और अपने मकान का किराया भी नहीं चुका पाए थे। जब उन पर कुड़की की नौबत आई, तो मालती ने कर्ज़ चुकाया और उन्हें अपने ही बंगले में रहने का प्रस्ताव दिया।
मालती का वित्तीय नियंत्रण – मालती ने मेहता की आय और व्यय का सारा भार अपने हाथों में ले लिया और उनकी ‘मुफ्तखोरी’ वाली दान-प्रथा पर नियंत्रण करने की कोशिश की, ताकि उनका जीवन व्यवस्थित हो सके।
गोबर और झुनिया का आगमन – इसी भाग में गोबर, मालती के यहाँ माली की नौकरी कर लेता है और वहीं एक कोठरी में अपने परिवार के साथ रहने लगता है।
मंगल की बीमारी और मालती का त्याग – झुनिया के बच्चे मंगल को चेचक (Smallpox) निकल आती है। मालती अपनी सुख-सुविधाओं और डॉक्टरी पेशे की व्यस्तता को छोड़कर दिन-रात बच्चे की सेवा में लग जाती है और उसे अपने ही कमरे में रखकर उसकी देखभाल करती है।
मेहता का हृदय-परिवर्तन – मालती के भीतर छिपे इस ‘मातृत्व’ और ‘निस्वार्थ सेवा’ के रूप को देखकर मेहता के मन में उसके प्रति गहरी श्रद्धा जागृत होती है। वे मालती को अब केवल प्रेमिका नहीं, बल्कि ‘श्रद्धा की देवी’ के रूप में देखने लगते हैं।
विवाह के प्रति मालती का नया दृष्टिकोण – जब मेहता विवाह का प्रस्ताव करते हैं, तो मालती उसे अस्वीकार कर देती है। (मुख्य कारण मेहता का पत्नी के लिए विचार है) उसका तर्क है कि पारंपरिक विवाह की गृहस्थी उनकी आत्माओं को एक छोटे पिंजरे में बंद कर देगी और समाज-सेवा के उनके व्यापक क्षेत्र को संकुचित कर देगी। सही मायने में यह मेहता का विचार है।
मैत्री और सेवा का संकल्प – मालती प्रस्ताव रखती है कि वे पति-पत्नी के बजाय ‘मित्र’ और ‘सहयोगी’ बनकर रहें और एक-दूसरे के जीवन को सार्थक बनाने में मदद करें। मेहता इस आदर्श को स्वीकार कर लेते हैं और अपना महान दार्शनिक ग्रंथ मालती को ही समर्पित करते हैं।
यह अध्याय मालती के चरित्र के पूर्ण परिष्कार और मेहता के साथ उसके संबंधों को एक आध्यात्मिक और सेवा-प्रधान धरातल पर ले जाने का चित्रण करता है।
भाग 34: सीलिया के बेटे की मृत्यु और मातादीन का सामाजिक विद्रोह
सीलिया के पुत्र का बचपन – सीलिया और मातादीन का पुत्र (राम/लामू) अब दो साल का हो गया है और वह अपनी अनोखी भाषा में जानवरों की आवाजों की नकल करके गाँव वालों का मनोरंजन करता है।
रूपा और राम का स्नेह – होरी की छोटी बेटी रूपा राम से बहुत प्रेम करती है और उसे अपने सजीव खिलौने की तरह पालती है, उसे नहलाती और खिलाती है।
मातादीन का प्रायश्चित और परिवर्तन – काशी के पंडितों से भारी खर्च पर ‘शुद्धि’ कराने के बाद भी मातादीन को धर्म के पाखंड से विरक्ति हो गई। उसने अपना जनेऊ उतार फेंका, पुरोहिताई छोड़ दी और एक सच्चा खेतिहर बन गया।
पितृत्व का उदय – मातादीन छिप-छिपकर होरी के घर जाकर अपने बेटे राम को देखता था और एक बार उसे गोद में लेकर अपार सुख का अनुभव करता है।
राम की दुखद मृत्यु – ओले गिरने के दौरान राम ने उन्हें बताशे समझकर खा लिया, जिससे उसे निमोनिया हो गया और तीन दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई।
मातादीन का साहस – बेटे की मृत्यु पर मातादीन ने सामाजिक लोक-लाज छोड़ दी और अकेले ही बच्चे के शव को अपनी हथेलियों पर उठाकर अंतिम संस्कार के लिए नदी तक ले गया।
सीलिया और मातादीन का स्थायी मिलन – पुत्र की मृत्यु के एक महीने बाद मातादीन सीलिया की झोपड़ी में पहुँचा और अपने पिछले दुर्व्यवहार के लिए क्षमा माँगी।
नया जीवन संकल्प – मातादीन ने घोषणा की कि वह अब ‘ब्राह्मण’ के बजाय ‘चमार’ बनकर रहेगा, क्योंकि उसकी नजर में सच्चा ब्राह्मण वही है जो अपना मानवीय धर्म पाले, न कि वह जो केवल जन्म से ऊँचा हो। अंत में, उसने सीलिया की झोपड़ी को ही अपना घर और मंदिर मान लिया।
भाग 35: होरी का नैतिक पतन और रूपा का विवाह-सौदा
होरी की दयनीय आर्थिक स्थिति – होरी के जीवन के संघर्षों में उसकी लगातार हार हो रही है और अब वह अपनी तीन बीघे जमीन बचाने के लिए अंतिम संघर्ष कर रहा है। तीन साल से लगान बाकी होने के कारण नोखेराम ने उस पर बेदखली का दावा कर दिया है।
दातादीन का प्रस्ताव – पंडित दातादीन होरी को ज़मीन बचाने का एक रास्ता बताते हैं। वे होरी की छोटी बेटी रूपा का विवाह अपने अधेड़ उम्र के अमीर जजमान रामसेवक से करने का सुझाव देते हैं। रामसेवक उम्र में होरी से मात्र कुछ ही साल छोटा और विधुर है।
मर्यादा और विवशता का द्वंद्व – होरी को पहले तो अपनी बेटी को एक बूढ़े के हाथ ‘बेचने’ के विचार से बहुत ग्लानि होती है, लेकिन ज़मीन खोने के डर से वह इस प्रस्ताव पर विचार करने को तैयार हो जाता है। धनिया भी शुरू में इसका विरोध करती है, पर अंततः गरीबी और मर्यादा की रक्षा के आगे घुटने टेक देती है।
रामसेवक का आगमन और विचार – रामसेवक बेलारी आता है। वह एक प्रभावशाली और चतुर किसान है। वह होरी को ग्रामीण समाज में होने वाले किसानों के शोषण (पटवारी, पुलिस और कारकुन द्वारा) के बारे में विस्तार से बताता है और कहता है कि सीधे रहने से काम नहीं चलता।
गोबर की वापसी – रूपा के विवाह के अवसर पर गोबर लखनऊ से बेलारी आता है। गोबर में अब पहले जैसी उद्दंडता नहीं है; वह अपने माता-पिता के प्रति विनम्र हो गया है और उनकी आर्थिक मदद करने का संकल्प लेता है।
जमीन की रक्षा और आत्मग्लानि – दातादीन होरी को दो सौ रुपये लाकर देता है ताकि वह लगान चुकाकर बेदखली रुकवा सके। ये रुपये वास्तव में रामसेवक ने दिए थे। होरी ये रुपये ले तो लेता है, लेकिन उसका मन इस अपमान से भर आता है कि उसने अपनी ज़मीन के मोह में बेटी का सौदा कर लिया।
यह भाग होरी के जीवन की उस त्रासदी को दर्शाता है जहाँ एक किसान अपनी ज़मीन बचाने के लिए अपनी सबसे बड़ी मर्यादा (बेटी की गरिमा) की बलि देने पर विवश हो जाता है।
भाग 36: होरी का महाप्रयाण और ‘गोदान’ की विडंबना
रूपा की विदाई – रूपा का विवाह संपन्न होता है और वह रोती हुई अपने ससुराल के लिए विदा हो जाती है। होरी इस पूरे उत्सव के दौरान आत्मग्लानि के कारण घर में छिपा बैठा रहता है क्योंकि उसे लगता है कि उसने अपनी ज़मीन बचाने के लिए अपनी बेटी का सौदा किया है।
गोबर की विदाई और होरी का अपराध-बोध – विवाह के बाद जब गोबर लखनऊ लौटने लगता है, तो होरी रोते हुए अपना अपराध स्वीकार करता है कि ज़मीन के मोह में उसने पाप की गठरी सिर पर लाद ली है। गोबर उसे सांत्वना देता है कि गरीबी और विपत्ति में मर्यादा और नीति की बातें केवल ढोंग हैं और होरी ने जो कुछ किया वह विवशता थी।
रूपा का सुखी जीवन और भेंट – रूपा अपने ससुराल में बहुत सुखी है और उसके पास अन्न-धन की कोई कमी नहीं है। वह अपने पिता की गाय की लालसा को याद कर अपने घर से एक गाय (‘धौरी’) होरी के पास भिजवाती है ताकि छोटा बच्चा मंगल दूध पी सके।
होरी का कठिन परिश्रम – कर्ज चुकाने और गाय खरीदने के लिए होरी कड़ी धूप और लू में सड़क पर कंकड़ ढोने की मजदूरी करने लगता है। वह दिन-भर धूप में काम करता है और रात को देर तक सुतली कातता है ताकि अधिक से अधिक पैसे जोड़ सके।
हीरा की वापसी – इसी बीच होरी का भाई हीरा कई वर्षों बाद अत्यंत दयनीय और बीमार अवस्था में वापस लौटता है। वह बताता है कि गाय की हत्या के अपराधबोध के कारण वह पागल हो गया था और पांच साल पागलखाने में रहा। उदार हृदय होरी उसे तुरंत गले लगा लेता है और पुराने सारे दुखों को भूल जाता है।
होरी की मृत्यु – जेठ की भीषण गर्मी में कंकड़ ढोने के दौरान होरी को लू (Heatstroke) लग जाती है। वह बेहोश हो जाता है और मरणासन्न अवस्था में उसे घर लाया जाता है।
अपनी अंतिम चेतना में वह धनिया से कहता है कि गाय की लालसा मन में ही रह गई और अब ये पैसे उसके क्रिया-कर्म में ही काम आएंगे।
गोदान की विडंबना – जब होरी के प्राण निकलने वाले होते हैं, तो पंडित दातादीन और अन्य ग्रामीण धनिया से ‘गोदान’ (मरने से पहले ब्राह्मण को गाय दान करना) करने को कहते हैं।
धनिया रोते हुए सुतली बेचकर कमाए हुए मात्र बीस आने पैसे लाती है और दातादीन के हाथ में रखकर कहती है कि घर में न गाय है, न बछिया, न पैसा—यही इनका गोदान है।
इसके बाद वह पछाड़ खाकर गिर पड़ती है और होरी का प्राणान्त हो जाता है। यह अध्याय होरी के उस जीवन-संघर्ष का दुखद अंत है जहाँ एक ईमानदार किसान की जीवन-भर की ‘गाय पालने’ की साध केवल बीस आने के नाममात्र के गोदान के साथ समाप्त हो जाती है।
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