Study Material : आदिकाल (1000-1400 ई.) और सामाजिक स्थिति | The Early Period (1000–1400 CE) and Social Conditions

Study Material : आदिकाल (1000-1400 ई.) और सामाजिक स्थिति | The Early Period (1000–1400 CE) and Social Conditions

परिचय

आदिकाल विविध और परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों का काल माना जाता है, जहाँ हर्षवर्धन के बाद किसी केंद्रीय सत्ता का अभाव था और छोटे-छोटे सामंतों का शासन था। इस काल में युद्ध, भूमि और नारी का हरण राजाओं पर लिखे गए काव्यों के मुख्य विषय रहे हैं।

सामंती व्यवस्था में भूमि संपत्ति का प्रमुख स्रोत थी और रक्त की शुद्धता में नारी की भूमिका निर्णायक मानी जाती थी। इस युग में आम जनता के जीवन पर राज्य की अपेक्षा विभिन्न धार्मिक मतों और संप्रदायों का गहरा प्रभाव था। साहित्य की दृष्टि से यह काल एक ‘संधिकाल’ है, जहाँ संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश के साथ-साथ उभरती हुई पुरानी हिन्दी भी अपना रूप ग्रहण कर रही थी।

आवागमन के साधनों के अभाव के कारण इस काल के साहित्य में क्षेत्रीयता का रंग अधिक गहरा दिखाई देता है। आदिकाल के अंतिम चरण तक दिल्ली के सिंहासन पर अलाउद्दीन खिलजी जैसे शासक का प्रभाव बढ़ गया था, जिसने लगभग समूचे देश पर अपना शासन स्थापित किया।

सिद्ध कवि

बौद्ध धर्म कालांतर में तंत्र-मंत्र की साधना में बदलकर वज्रयान की शाखा बन गया था, जिससे सिद्धों का संबंध था। सिद्धों की कुल संख्या 84 बताई गई है, जिनमें प्रथम सिद्ध ‘सरहपा’ (8वीं शताब्दी) को माना जाता है।

सरहपा सहज जीवन पर बहुत बल देते थे और उन्हें सहजयान का प्रवर्तक भी कहा जाता है।

सिद्धों ने अपनी रचनाओं में वर्णश्रम व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया और ‘संधा भाषा’ शैली का प्रयोग किया।

संधा भाषा वस्तुत- प्रतीकात्मक भाषा है जो अंतःसाधनात्मक अनुभूतियों की ओर संकेत करती है। सिद्धों की इसी प्रतीकात्मक शैली का प्रभाव बाद में नाथों और कबीर जैसे निर्गुण संतों की ‘उलटबाँसियों’ पर भी दिखाई पड़ता है।

नाथ कवि

नाथ संप्रदाय का समय सिद्धों के थोड़ा बाद का माना जाता है और वज्रयानी सिद्धों के साथ इनका गहरा संबंध था। नाथपंथ के प्रमुख प्रवर्तक गोरखनाथ शिव के रूप माने जाते हैं, इसलिए यह संप्रदाय स्पष्ट रूप से शैव मत से संबंधित है।

गोरखनाथ ने पतंजलि के योग को आधार बनाकर ‘हठयोग’ का प्रवर्तन किया और ब्रह्मचर्य, वाक्संयम, शारीरिक-मानसिक शुचिता तथा मद्य-मांस के त्याग पर विशेष आग्रह किया।

नाथों ने ब्राह्मणों के कर्मकांड और वर्णश्रम व्यवस्था का कड़ा विरोध किया और “जोई-जोई पिंडे सोई ब्रह्मांडे” का सिद्धांत दिया, जिसका अर्थ है कि जो शरीर में है वही ब्रह्मांड में है।

गोरखनाथ के समय को लेकर विद्वानों में मतभेद है; राहुल सांकृत्यायन उन्हें 10वीं शताब्दी का, रामचंद्र शुक्ल पृथ्वीराज चौहान के समय का और हजारीप्रसाद द्विवेदी 10वीं शताब्दी का मानते हैं।

जैन मतावलंबी कवि

जैन मत का काव्य मुख्य रूप से गुजरात, राजस्थान और दक्षिण भारत में रचा गया और यह अन्य आदिकालीन साहित्य की तुलना में अधिक प्रामाणिक रूप में उपलब्ध है।

जैन रचनाएँ दो प्रकार की हैं- पहली, जिनमें सिद्धों और नाथों की तरह उपदेश, नीति और कर्मकांड का खंडन है; और दूसरी, जिनमें पौराणिक जैन साधकों के जीवन को आधार बनाकर चरित काव्य लिखे गए हैं। 10वीं शताब्दी के प्रमुख जैन कवियों में जोइंदु और रामसिंह उल्लेखनीय हैं।

जैन आचार्य हेमचंद्र (12वीं शती) के प्राकृत व्याकरण और मेरुतुंग (13 वीं शती) के प्रबंध चिंतामणइ में जैनेतर रचनाएँ भी संकलित हैं।

अपभ्रंश के महान कवि ‘स्वयंभू’ (8वीं शती) ने रामकथा को आधार बनाकर ‘पउम चरिउ’ की रचना की, जो जायसी और तुलसी की रचनाओं की तरह कड़वकबद्ध है।

इसके अतिरिक्त पुष्पदंत (10वीं शती) ने ‘महापुराण’ की रचना की।

धनपाल और कनकामर मुनि भी इस श्रेणी के महत्वपूर्ण कवि हैं।

लौकिक काव्य और रासो साहित्य

आदिकाल में शुद्ध लौकिक श्रृंगारी काव्य भी रचे गए, जिनमें 11वीं शताब्दी की ‘राउल वेल’ (कवि रोडा कृत) और 13वीं शताब्दी की ‘संदेशरासक’ (अद्दहमाण कृत) प्रमुख हैं।

संदेशरासक किसी भारतीय भाषा में किसी इस्लाम धर्मावलंबी कवि की पहली रचना मानी जाती है।

वीरगाथा काव्य के अंतर्गत आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 12 ग्रंथों को आधार बनाया, जिनमें ‘पृथ्वीराज रासो’, ‘बीसलदेव रासो’ और ‘परमाल रासो’ (आल्हा) अत्यंत प्रसिद्ध हैं।

चंदबरदायी द्वारा रचित ‘पृथ्वीराज रासो’ आदिकाल का सर्वाधिक चर्चित महाकाव्य है, जिसकी प्रामाणिकता विवादास्पद है।

नरपति नाल्ह की ‘बीसलदेव रासो’ एक श्रृंगारी काव्य है जिसमें हिन्दी काव्य में प्रयुक्त होने वाले ‘बारहमासा’ का वर्णन सबसे पहले मिलता है।

विद्यापति और अमीर खुसरो

14वीं शताब्दी के कवियों में विद्यापति और अमीर खुसरो का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। विद्यापति ने ‘कीर्तिलता’ और ‘कीर्तिपताका’ की रचना अवहट्ट भाषा में की, जबकि उनकी प्रसिद्धि का आधार मैथिली में रचित ‘पदावली’ है।

पदावली में राधा और कृष्ण के लौकिक प्रेम का चित्रण है और इसे भक्तिकालीन सूरसागर की कोटि की रचना माना जाता है।

अमीर खुसरो अपनी बहुमुखी प्रतिभा के लिए जाने जाते हैं, जिन्होंने फारसी के साथ-साथ ‘हिन्दवी’ (पुरानी हिन्दी) में कविताएँ, पहेलियाँ और मुकरियाँ लिखीं। खुसरो का व्यक्तित्व मध्य देश की मिली-जुली संस्कृति का प्रतीक रहा है और उनकी हिन्दी आधुनिक काव्य-भाषा के रूप में पूरी तरह प्रतिष्ठित होने का संकेत देती है।

आदिकाल के अंत तक धार्मिक संप्रदायों का प्रभाव कम होने लगा था और भक्ति आंदोलन एक व्यापक लोक क्षेत्र की ओर बढ़ रहा था।

कालखंडसमयावधिप्रमुख रचनाकारप्रमुख रचनाएँसाहित्यिक विधा/धारामुख्य विशेषताएँ (Inferred)
आदिकाल (वीरगाथा काल)1000 – 1400 ई.चंदबरदायी, अमीर खुसरो, विद्यापतिपृथ्वीराज रासो, कीर्तिलता, पदावली, पहेलियाँसिद्ध साहित्य, नाथ साहित्य, जैन साहित्य, वीरगाथा काव्यसामंतवादी व्यवस्था, वीरता और श्रृंगार का मिश्रण, डिंगल-पिंगल भाषा का प्रयोग।
भक्तिकाल (पूर्व मध्यकाल)1400 – 1700 ई.कबीरदास, जायसी, तुलसीदास, सूरदासबीजक, पद्मावत, रामचरितमानस, सूरसागरनिर्गुण भक्ति (ज्ञानाश्रयी/प्रेमाश्रयी), सगुण भक्ति (राम/कृष्ण भक्ति)ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, लोकहितकारी भावना, ब्रज और अवधी भाषा की प्रधानता।
रीतिकाल (उत्तर मध्यकाल)1700 – 1850 ई.बिहारी, केशवदास, घनानंद, भूषणबिहारी सतसई, रामचंद्रिका, सुजान सागर, शिवराज भूषणरीतिबद्ध काव्य, रीतिसिद्ध काव्य, रीतिमुक्त काव्यश्रृंगारिकता, अलंकार-प्रियता, दरबारी संस्कृति और ब्रजभाषा का चरमोत्कर्ष।
आधुनिक काल (गद्य काल)1850 ई. से अब तकभारतेन्दु हरिश्चंद्र, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, निरालाभारत दुर्दशा, गोदान, कामायनी, राम की शक्ति पूजाछायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, गद्य की विविध विधाएँखड़ी बोली का प्रयोग, राष्ट्रीय चेतना, यथार्थवाद और मानवीय संवेदना।

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