IGNOU MHD- 3 ज्ञानरंजन द्वारा लिखी कहानी पिता (Gyaanaranjan Dvaara Likhee Kahaanee Pita)
पिता कहानी का परिचय (Pita
Story Introduction)
‘पिता’ ज्ञानरंजन द्वारा लिखी कहानी है, वर्तमान में यह कहानी इग्नु MHD 3 में लगाई गई है।
‘पिता’ ज्ञानरंजन की महत्वपूर्ण कहानियों में से एक है। यह कहानी रुढ़ियों से ग्रसित पिता के जिद्दी स्वभाव को रेखांकित करती है। संयुक्त परिवार के टूटने और युवाओं का शहरों की ओर रुख करने से बूढ़ों की समस्याएँ बढ़ी हैं। असहाय अवस्था में वे अकेले पड़ जाते हैं। उनकी देखरेख करने वाला कोई नहीं रह गया है। ‘पिता’ में कहानीकार का उद्देश्य इस चिरपरिचित समस्या को रेखांकित करना नहीं है बल्कि पुरानी पीढ़ी की रुढ़िवादिता को उद्घाटित करना मुख्य उद्देश्य है।
पिता बहुत ही स्वाभिमानी व्यक्ति हैं, वह अपनी वजह से किसी को तकलीफ़ नहीं देना चाहते हैं, इसलिए बेटे के कहने पर भी घर के अन्दर सोने नहीं आते बल्कि गर्मी में रात भर बाहर अकेले रहते है, सोने का प्रयास करते हैं, लेकिन सो नहीं पाते।
इस कहानी में धूमनगंज और खुल्दाबाद स्थान का उल्लेख किया गया है।
पिता कहानी के पात्र
सुधीर – पुत्र है, जो नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है। घनश्यामनगर का निवासी है, कथा का मुख्य कारण यही है।
पिता – जिद्दी हैं, जीवन की सुविधाओं से चिढ़ने वाले हैं। लंबे समय से रामायण-गीता का पाठ करने वाले हैं। कलकत्ता के हाल एंडरसन के सिले कोट पहनते थे।
देवा – सुधीर की पत्नी है।
कप्तान भाई – सुधीर का भाई है, वायुसेना में कार्यरत है। बहन का यूनिवर्सिटी का खर्चा उठाता है, जिसे पिता अपने आत्मसम्मान के लिए बाद में अपने बेटे को लौटा देते हैं। ताकि भविष्य में वह अपनी बहन पर इसके लिए एहसान न जता सके।
दादा भाई – कहानी का गौण पात्र है।
पिता कहानी का स्वरूप (Pita Story Format)
पिता संयुक्त परिवार के एक सम्मानित सदस्य हैं। उनको अकेलापन या किसी प्रकार की असुविधा नहीं उठानी पड़ती बल्कि वे स्वयं चीजों के प्रति तटस्थता और अन्यमनस्कता दिखाते हैं। परिवार उन्हें छोड़कर कहीं नहीं जाता। वह तो उनके इर्द-गिर्द सुविधाएँ जुटाने का प्रयास करता है लेकिन पिता इन प्रयासों के प्रति कोई रुचि प्रदर्शित नहीं करते।
‘पिता’ में पारिवारिक संबंधों के नए आयाम उजागर करने की कोशिश की गई है, जो अन्य कहानियों से इसे अलग करती है। आवश्यक सुविधाओं को भी फालतू खर्च समझ बैठते है। परिवारजनों के बार-बार आग्रह करने पर भी वे उन सुविधाओं का उपयोग नहीं करते।
पिता कहानी के पिता असहाय नहीं है। वे परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढाल लेते हैं। वे किसी का एहसान नहीं लेना चाहते, बेटों का भी नहीं। बहन की पढ़ाई में भाई द्वारा खर्च किए गए रुपयों का हिसाब रखते है और एक दिन उस भाई को उसने रुपयों की एक पासबुक थमा देते हैं। डर है भविष्य में उनका बेटा अपनी बहन पर अहसान न जताये। पिता को व्यावहारिकता का पूर्ण ज्ञान है।
पिता सबसे तटस्थ और असम्पृक्त रहते हैं। ध्यान देने की बात है कि यहाँ पिता को अकेलापन या असुविधा परिवार की उपेक्षा के कारण नहीं झेलनी पड़ती बल्कि पिता खुद तटस्थता का चुनाव करते हैं। चीजों के प्रति और घर के लोगों के प्रति परिवार उन्हें अकेला छोड़कर नहीं जाता बल्कि वे ही परिवार के साथ रहते हुए भी साथ नहीं रहते।
पिता कहानी की समीक्षा (Pita Plot Summary)
आज जब संयुक्त परिवार के लगातार टूटते जाने से बूढ़ों की स्थिति काफी दयनीय हो गई है, उन्हें प्रायः जीवन के अंतिम दिन अकेलेपन में बिताने पड़ रहे हैं। ‘पिता’ कहानी में पिता समूचे परिवार के साथ रहते हुए अपनी जिद के कारण अलग-थलग पड़ जाते हैं। दो पीढ़ियों में यह संघर्ष कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में अवश्य दिखाई देता है। यह हमारे समय और समाज का सत्य है इसलिए कोई भी लेखक इससे आँखे मूंदे नहीं रह सकता। बूढ़ों का रूढ़ संस्कार परिवार के साथ घुलने-मिलने नहीं देता। ‘पिता’ कहानी में पिता का अपना अलग संसार बन गया है। उसमें वे किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं सहन करते वे समूचे परिवार पर पत्थर की चट्टान की तरह भारी पड़ जाते हैं।
उनकी इच्छा के विरुद्ध कोई काम उनसे नहीं करवाया जा सकता। सत्य-असत्य का निर्धारण वे अपनी कसौटियों पर करते हैं। नयी पीढ़ी इसे मानने के लिए तैयार नहीं है अपना रास्ता वह खुद चुनती है जबकि पहले पिताओं द्वारा दिखाये गए मार्ग का अनुसरण करना एक आदर्श माना जाता था। नयी पीढ़ी ने आदर्श के इस लबादे को उतार कर फेंक दिया है तब ऐसे में दो पीढ़ियों के संबंधों में बदलाव आना लाज़मी है।
ज्ञानरंजन इन बदलते हुए संबंधों के कुशल चितेरे हैं। उनके यहाँ राजनीति हावी नहीं है बल्कि मानवीय पारिवारिक संबंधों के रेखांकन में ही उन्होंने ज्यादा दिलचस्पी दिखाई है। ऐसा करना परिस्थिति की माँग भी कही जा सकती है। ज्ञानरंजन के ही शब्दों में, “नई कहानी ने पंगु जीवन को अपने कंधों पर उठाया है वह अपने रचना-भोग से पलायन करके केवल तटस्थ नहीं रहना चाहती, वरन् वह जीवन चक्र की आदि से अन्त तक होने वाली यात्रा में एक स्वस्थ चेतना की तरह उपस्थित है। नए कहानीकारों ने कहानी की इस आधुनिक स्थिति को तीक्ष्णता से महसूस करना शुरु कर दिया है।
इस तरह ज्ञानरंजन अपनी रचना के प्रति बहुत सजग दिखाई देते हैं रचना को वे ‘कमिटमेंट’ मानते हैं। इसी अर्थ में नया लेखक प्रतिबद्ध दिखाई देता है जहाँ वह रचना के प्रति अपना सरोकार व्यक्त करता है न कि किसी विचारधारा या घोषणा पत्र के प्रति ज्ञानरंजन कहते हैं कि, ‘आज का नया कहानीकार तेजी से प्रतिबद्ध होता जा रहा है, जो प्रतिबद्ध नहीं है, उसकी घुसपैठ का खोटा सिक्का साहित्य में अब आगे चलने से रहा। आज जब समाज में चौतरफा मूल्यों का ह्रास होता दिखाई दे रहा है, एक तरह की धुंध छायी हुई है मनुष्य पराजय बोध से ग्रस्त होता जा रहा है, तब ऐसे में एक लेखक को इस पराजय बोध को स्वीकार करना पड़ता है।
पिता कहानी का निष्कर्ष (Pita Conclusion of the Story)
पिता कहानी समाजिक मुद्दे पर नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक विषय पर आधारित है। इस कहानी में पिता-पुत्र के विचार भिन्न हैं, परिणाम स्वरूप दोनों का जीवन को देखने का नज़रिया अलग है। पिता पुराने रीति-रिवाज़ या नियम पर चलकर जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। पुत्र समय के साथ परिवर्तन चाहते हैं। परिणाम स्वरूप संतानों द्वारा उपेक्षा न करने के बाद भी पिता मनौवैज्ञानिक रूप से अपनी संतानों से अलग हो जाते हैं। इसके लिए पिता का स्वाभिमान भी ज़िम्मेदार है, जिसके कारण वह अपने बेटे से भी अर्थिक सहायता नहीं लेना चाहते।
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