Ignou Study Material : समर यात्रा कहानी का सारांश | Summer Yaatra Story Summary

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कहानी का परिचय (Introduction to the Story)

अक्सर समाज में लोग कहते सुनते पाए जाते हैं, जीवन के सब दिन एक से नहीं होते। इसमें कितनी सच्चाई है? समभव: यह वाक्य सही है। इसे अपने जीवन यात्रा पर नज़र दोड़ा कर चेक किया जा सकता है। आज हम बात कर रहे हैं, ऐसी ही एक कहानी की। कहानी का नाम समर यात्रा है। यह कहानी प्रेमचंद जी द्वारा लिखी गई है, इस कहानी के केंद्र में एक वृद्ध महिला है, जिसका नाम नोहरी है। यह कहानी गाँधीवादी विचारधारा से प्रभावित है। इस कहानी में सत्याग्रहियों द्वारा स्वतंत्रता हेतु संघर्ष का चित्रण किया गया है।

समर यात्रा कहानी का सारांश (Summer Yaatra Story Summary)

इस कहानी की शुरूआत गाँव में हो रहे उत्सव से होती है। गाँव की हर झोपड़ी में उत्सव व उत्सुक्ता (curiosity) का महौल है। आज यहाँ सत्याग्रहियों का जत्था आने वाला है, परिणाम स्वरूप पूरा गाँव उनके स्वागत की तैयारियाँ कर रहा है। गाँव का हर व्यक्ति अपने घर से कुछ न कुछ समान कोदई चौधरी के यहाँ पहुँचा रहा है। दूध, घी, दही, अनाज जिसके लिए जो संभव है, कोदई चौधरी के यहाँ आकर पहुँचा देता है, क्योंकि उत्सव उन्हीं के घर में होगा।

कोदई चौधरी की भाभी जो वर्तमान में 75 साल की है, वह बहुत दुखी है। उसके घर में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो सत्याग्रहियों के स्वागत के लिए कोदई चौधरी के घर पहुँचा सके। कहानी के अनुसार एक समय में नौहरी के घर में धन भी था, और भरा पूरा परिवार भी था। वर्तमान में न ही धन बचा है, न ही उसके परिवार में कोई व्यक्ति बचा है। जब उसका हाथ पैर चलता था, तो उसका पति घर में रहता था, वह रात में फसल की देखभाल करने खेत में जाती थी। किसी भी मामले मुकदमे की पैरवी वह खुद करती थी। अब उसे ठीक से न ही दिखाई देता है, न ही सुनाई देता है।

सत्याग्रहियों के होने वाले जलसे में अपना सहयोग न दे पाने के कारण वह खुद ही दुखी है, इतने में उसका देवर कोदई चौधरी आकर उससे कहता है, तुम क्या दे रही हो? यह सुनकर नौहरी और आहत हो जाती है। परिस्थिति अनुसार उत्तर देती है।

सत्याग्रहियों का जत्था गाँव में आ गया। सब ही उनका स्वागत करने आगे आगे चले जाते हैं, नोहरी पीछे रह जाती है, कोई उस पर ध्यान नहीं देता। फिर नोहरी खुद आगे आकर खुशी से सबके बीच नृत्य करने लगती है, पहले तो सब उसे आश्चर्य से देखते हैं, फिर वह भी उसके साथ अपनी खुशी व्यक्त करने लगते हैं।

भोजन के बाद सत्याग्रह के नायक (लीडर) का भाषण शुरू होता है, इस भाषण में नायक गाँव के लोगों को पहले विश्वास दिलाता है, कि वह संसार में सबसे ज्यादा योग्य व बेहतर हैं। फिर उन्हें यह भी विश्वास दिलाता है कि क्यों वह गुलाम बने हुए हैं।

अचानक से पुलिस कांस्टेबलों के साथ आ जाती है। गाँव के सभी लोग डर के इधर-उधर भागने लगते हैं। नायक और सत्याग्रह के साथी वहीं खडे रहते हैं। कोदई चौधरी भी नायक के साथ खड़ा रहता है, उसे इन पुलिस वालों पर बहुत गुस्सा आता है, लेकिन अपने परिवार का विचार करके सारा क्रोध पी जाता है। कोदई चौधरी ने नायकों को अपने घर में ठहराया था, इसलिए पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेती है। सारे गाँव वाले सामने आ जाते हैं, और वह पुलिस वालों का विरोध करने का प्रयास करते हैं, लेकिन नायक उन्हें हिंसात्मक विरोध करने से मना कर देता है। परिणाम स्वरूप पुलिस कोदई चौधरी को लेकर चली जाती है। कोदई चौधरी के बेटे मैकू और गंगा दोनों कोदई को बचाने का असफल प्रयास करते हैं।

नोहरी सत्याग्रह के लिए सत्याग्रहियों के दल में शामिल होने की बात करती है, तो मैकू और गंगा कहते हैं हम जाएँगे। तर्क वितर्क के बाद गंगा का जाना तय हो जाता है। उन्हें ऐसा करता देख गाँव के अन्य लोग – सेवाराम, भजनसिंह, घूरे, काले खाँ इत्यादि भी सत्यग्राह के दल में शामिल हो जाते हैं। इनकी विदाई की तैयारियां होने लगती हैं, माता-पिता को अपने बच्चों के फैसले पर गर्व हो रहा था, और पत्नियाँ अपने पति के फैसले पर धैर्य बनाए रखने का प्रयास कर रही थीं।

गाँधीवादी विचारधारा से प्रभावित होकर नायक ने सब को हिंसा व क्रोध का त्याग करने का निर्देश दिया। कहानी के अंत में नोहरी भी इस दल में शामिल हो गई, लोगों ने मना किया लेकिन उसने कहा ज़िन्दगी का अंत संघर्ष करके होगा तो जीवन सफल हो जाएगा। यहीं पर कहानी समाप्त हो जाती है।

निष्कर्ष (Conclusion)

जीवन में सब दिन एक से नहीं रहते, इसकी झलक नोहरी के जीवन में देखने को मिलती है।

सत्याग्रह गाँधीजी द्वारा चलाया गया आंदोलन था, इस आंदोलन से किस प्रकार लोग जुड़े होंगे इसकी झलक इस कहानी में देखने को मिलती है। साहित्य समाज का दर्पण हैं, ऐसे में यह कहना उचित नहीं होगा कि ऐसा ही रहा होगा, लेकिन यह कहना न्यायसंगत है – कुछ ऐसा रहा होगा।


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