Net JRF Hindi : जायसी ग्रंथावली नागमती वियोग वर्णन | Jayasi Granthawali Nagmati Disjunction Description

Net JRF Hindi : हिन्दी कविता यूनिट 5 | जायसी ग्रंथावली नागमती वियोग वर्णन

जायसी ग्रंथावली पद्मावत (Jayasi Granthawali Padmavat)

पद्मावत – 1540। इसमें कुल 57 खण्ड है, जिसमें द्वितीय खण्ड सिंघल द्वीप खण्ड है। तीसवां खण्ड नागमती वियोग खण्ड है, यही वर्तमान में एनटीए नेट के सिलेबस में है।

57 वां खण्ड पाद्मावत का अंतिम खण्ड है। इस खण्ड में नागमती और पद्मावती का सती खण्ड है। अर्थात इस खण्ड में वे दोनों सती हो जाती हैं।

पद्मावत के पात्र – रत्नसेन, पद्मावती, हीरामन तोता, नागमती (नागमती सांसारिकता का प्रतीक है), राघव चेतन (शैतान), अलाउद्दीन (माया) के प्रतीक है।

कथन – विजयदेव नारायण साही का कहना है कि “पद्मावत अपने ढंग की अकेली ट्रेजडी है” इसके साथ ही यह कहते हैं कि “जायसी पहले कवि है सूफी बाद मै”।

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शुक्ल जी के कथन –

शुक्ल जी ने पद्मावत को विप्रलम्भ (यदि नायक-नायिका में वियोगदशा में प्रेम हो तो, वहाँ विप्रलम्भ श्रृंगार होता है) प्रधान श्रृंगार काव्य कहा है।

शुक्ल – “जायसी के श्रृंगार में मानसिक पक्ष प्रधान है, शारीरिक पक्ष गौण”।
शुक्ल – नागमती का विरह वर्णन हिन्दी साहित्य में एक अद्वितीय वस्तु है।
शुक्ल – रानी नागमती विरहदशा में अपनी रानीपन बिल्कुल भूल जाती है, और अपने को साधारण नारी के रूप में देखती है।
शुक्ल – कबीर ने केवल भिन्न प्रतीत हुई परोक्ष सत्ता की एकता का आभास दिया था। प्रत्यक्ष जीवन की एकता का दृश्य सामने रखने की आवश्यकता थी, वह आवश्यकता जायसी द्वारा पूरी हुई।

बच्चन सिंह कहते हैं- “जायसी की अवधी, अवधी की अरघान (सुंगन्ध) है। यह अवधी किसी अन्य कवि में नहीं मिलेगी। तुलसी की भाषा में यह मिठास नहीं है। तुलसी की अवधी पर संस्कृत का गहरा प्रक्षेपण है। जायसी की भाषा ठेठ अवधी है”।

बच्चन सिंह कहते हैं –

“जीवन के विरुद्ध मृत्यु और मृत्यु के विरुद्ध जीवन के संघर्ष का नाम है पद्मावत”।

नोट – शुक्ल जी लिखते हैं कि पद्मावत में उल्लेख हुआ है- “इन पद्दो में जायसी के पहले के इन चार काव्यों का उल्लेख है। मुग्धावती, मृगगावती, मधुमालती, प्रेमावती। अर्थात पद्मावत में एक जगह इन चार पुस्तकों का उल्लेख किया गया है। इन चार पुस्तकों की रचना पहले हो चुकी थी।

नागमती वियोग खण्ड (Nagmati disconnection section)

आचार्य शुक्ल द्वारा संपादित पद्मावत (जायसी ग्रन्थावली) पुस्तक का 30 वाँ खण्ड नागमती वियोग वर्णन है।

इसमें नागमती का वियोग पक्ष दिखाया गया है, जब रत्नसेन पद्मावती की खोज में नागमती को छोड़कर सिंघल द्वीप (श्रीलंका) चले जाते हैं।

इस खंड में नागमती के बारहमासा वियोग वर्णन है।
इसमें अतिशयोक्ति एवं विप्रलम्भ श्रृंगार का चित्रण है।
कहीं कहीं उहात्मकता का भी चित्रण है। साथ ही हिन्दू नारी के पतिव्रता गृहस्थिक विरह का चित्रण।

निष्कर्ष (Conclusion)


रत्सेन अपनी पहली पत्नी नागमती को छोड़कर पद्मावती की खोज में सिंघलदीप (श्रीलंका) गए थे, वे एक वर्ष तक नागमती से दूर रहे। अर्थात इसमें बारह मासा का वर्णन। नायिका के विरह में परिवर्तन होता है। नायक के दूर होने से उसे मौसम तकलीफ दे रहे हैं। नागमती का वियोग वर्णन में नागमती दहाड़ मार-मार के रो रही है। प्रिय के वियोग में सामान्य स्त्री की तरह नागमती रोती है, सामान्य घरों में रहने वाली स्त्री वर्णन है। वियोग वर्णन है, संयोग वर्णन नहीं है। नागमती अपने पति का इंतज़ार करती है।


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