Study Material :प्रेमचंद द्वारा लिखित सेवा मार्ग कहानी का सारांश | Summary of Seva Marg Story Written by Premchand

कहानी का परिचय​ (Introduction to the Story)

सामाजिक रूप से यह मनोवैज्ञानिक रूप से भी एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का कैसे दिल जाती सकता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी सारी दौलत लूटा दे, तो क्या तब भी किसी व्यक्ति का हृदय जीत सकता है। क्या समाज में सभी को धन का लालच होता है? या धन मात्र जीवन यापन के मौलिक आवश्यकता पूर्ण करने का मात्र एक माध्यम है? किसी व्यक्ति का हृदय जीतने के लिए त्याग, समर्पण, और सेवा की आवश्यकता होती है? विचार कीजिए।

हम बात कर रहे हैं, प्रेमचंद जी की लिखी कहानी सेवा मार्ग की। जिसमें नायिका नायक का हृदय जीतने के लिए हर सम्भव प्रयास करती है।

सेवा मार्ग कहानी का सारांश | Summary of Seva Marg Story

तारा कहानी की नायिका है, वह देवी माँ (ईश्वर) को प्रसन्न् करने के लिए तपस्या करती है। तपस्या करते करते वह अस्वस्थ हो जाती है, परिणाम स्वरूप वह अपनी माँ से कहती है, वह संसार से विदा हो रही है। लेकिन बारह वर्ष की तपस्या के बाद देवी प्रसन्न हो जाती हैं। वह पाषाण मूर्ति से बाहर आकर तारा से कहती हैं, जो माँगना है माँगो। तारा देवी माँ से धन-दौलत सुख सुविधाए सब कुछ माँग लेती है।

दूसरे दिन तारा सो कर उठी तो हीरे जवाहिरों, दासियाँ, सुन्दर वाटिका, बिल्लौर जड़ित हौज आदि समेत जीवन की सारी सुख सुविधाएँ उसे प्राप्त हो चुकी थीं। नवयुवक विद्युतसिंह, अग्निसिंह आज्ञाकारी उसके सामने उपस्थित हो गए। जो भी धनी लोग थे, सब उसके गुलाम हो गए हैं।

एक दिन उसकी आनन्द वाटिका में साधु आया, रमणीय स्थान पर अपना सुर अलापने लगा। बीन की तान नायिका तारा को बहुत ही मधुर लगी। वह साधु को अपने जीवन साथी के रूप में स्वीकार करना चाहती थी। वह साधु से कहती है, मैं आपकी दासी बनकर रहूँगी, लेकिन साधु ने तारा को पत्नी के रूप में स्वीकार करने से इंकार कर दिया। साधु की नज़र में धन-दौलत की कोई कीमत नहीं है, परिणाम स्वरूप वह वहाँ से चला जाता है।

तारा उसके बिना खुद को अधूरा महसूस कर रही थी, इसलिए उसने साधु का पता लगाया। उसके बाद वह फिर से दुर्गा मंदिर में गई और देवी माँ से अपनी इस समस्या का समाधान पता किय। देवी माँ ने उसे कहा प्रेम स्वर्ग सुख का मूल है, प्रेम को पाने के लिए एक ही मार्ग है – सेवा मार्ग।

यह जानने के बाद तारा ने राजभवन त्याग दिया। साधु की कुटिया में रहने के लिए चली गई। जितना सम्भव हो सकता उतना या उससे ज़्यादा ही वह साधु की सेवा करने लगी। इस दौरान वह फिर से उपवास करने लगी। पैरों में काँटे लगते तो भी वह शिकायत नहीं करती थी। उसका पूरा बदन सूख गया था। अपनी इच्छा पूरी होने के बाद जो तारा धन की विलासिनी (घमण्डी) बन गई थी, वह अब प्रेम की दासी हो जाती है।

साधु वन के जिन जीवों से प्रेम करता है, तारा उसका भी ख्याल रखती है। साधु और साधु से जुड़ी हर चीज़ से तारा अब प्रेम करने लगती है। देवी एक बार फिर उसे दर्शन देती है, तब वह देवी से कहती है – “सेवा-पारस मिल गया अब प्रेम भिक्षा भी नहीं चाहिए”। अर्थात वह साधु को पाने के लिए उसकी दासी बनकर रहती है, लेकिन उसकी सेविका बनकर उसे जो सुख मिला है, वह उसी से संतुष्ट है, अब उसे साधु का प्रेम भी नहीं चाहिए।

एक दिन साधु ने आकर तारा से कहा – “तुमने मुझे जीत लिया है। अब मैं तुम्हारा दास हूँ। योग्य वैराग्य सब न्योछावर करने को तैयार हूँ”। लेकिन तारा ने उत्तर में साधु से कहा – “अब मुझे कोई इच्छा नहीं है, सेवा की आज्ञा चाहती हूँ, बस। स्वामीजी सेवा-मार्ग पर चलकर अभिलाषाएँ समाप्त हो गईं”। यह सुनकर साधु और ज़्यादा तारा का सम्मान करने लगा परिणाम स्वरूप तारा के चरणों में अपना सर नवाया (झुकाने) और उसके बाद गंगा की ओर चला गया। यहीं पर कहानी समाप्त हो जाती है।

कहानी का निष्कर्ष (Conclusion of the Story)

इस कहानी में धन और सेवा का प्रभाव देखने को मिलता है। तारा की तपस्या पूरी होने के बाद उसे जो धन-दौलत मिलती है, उसके बाद वह विलासिनी हो जाती है, उसे धन का घमण्ड हो जाता है। धन के आगे वह अपने परिवार को भी भूल जाती है।

साधु के आने के बाद उसे एहसास होता है कि, उसे संसार का वह सुख नहीं मिला जिसकी उसे तलाश है। परिणाम स्वरूप वह अपने सुख की प्राप्ति के लिए सारी धन-दौलत त्याग कर साधु की सेवा करने लगती है। सेवा करके उसे वह सुख मिलता है, कि जिसके लिए वह सेवा करती है। उसे अब वह भी नहीं चाहिए। अर्थात कहानी के अंत में वह साधु का आग्रह भी ठुकरा देती है।

अर्थात हम सारी ज़िन्दगी धन-दौलत के पीछे भागते रहते हैं, जब हमें उस धन-दौलत सुख-सुविधाओं की प्राप्ति हो जाती है, तो हमे एहसास होता है कि संसार की सबसे बेहतरीन चीज़ सुकून की प्राप्ति तो हमें हुई ही नहीं है। अंत हम सुकून के पीछे भागते हैं – जो हमें सबसे पहले ही मिल सकता था। सेवा मार्ग अपनाकर यह सेवा चाहे परिवार की हो, या समाज की। सेवा से संतुष्टि मिलती है, वह संसार की सारी दौलत हंसिल करके भी नहीं मिलती।

यह सच है कि मौलिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए धन की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन धन की प्राप्ति ही जीवन में सुख का एकमात्र माध्यम नहीं है।


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