Study Material : हिन्दी साहित्य का सरल इतिहास – विश्वनाथ त्रिपाठी – परिचय |

Study Material : हिन्दी साहित्य का सरल इतिहास – विश्वनाथ त्रिपाठी – परिचय | A Simple History of Hindi Literature – Vishwanath Tripathi – Introduction

लेखक परिचय (About the Author)

डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी हिन्दी भाषा और साहित्य के प्राध्यापक और आलोचक के रूप में प्रसिद्ध रहे हैं।

वे हिन्दी के महान विद्वान आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के शिष्यों में से एक हैं।

उनकी प्रमुख कृतियों में ‘प्रारंभिक अवधी’, ‘हिंदी आलोचना’, ‘लोकवादी तुलसीदास’, ‘मीरा का काव्य’ और ‘कुछ कहानियाँ: कुछ विचार’ हैं।

हाल ही में प्रकाशित उनका स्मृति-आख्यान ‘नंगातलाई का गाँव’ भी काफी चर्चित और लोकप्रिय हुआ है।

उनके संपादन कार्य की बात करें तो उन्होंने आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के साथ मिलकर ‘अद्दहमाण’ (अब्दुल रहमान) के अपभ्रंश काव्य ‘संदेशरासक’ का संपादन किया।

इसके अतिरिक्त उन्होंने अजीत कुमार के साथ मिलकर ‘कविताएँ 1963’, ‘कविताएँ 1964’ और ‘कविताएँ 1965’ तथा अरुण प्रकाश के साथ मिलकर ‘हिंदी के प्रहरी: रामविलास शर्मा’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों का संपादन भी किया है।

डॉ. त्रिपाठी को उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए गोकुलचंद्र शुक्ल आलोचना पुरस्कार, डॉ. रामविलास शर्मा सम्मान और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (साहित्य सम्मान) जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने इस पुस्तक को इतने सरल तरीके से लिखा है कि कोई भी विद्यार्थी हिन्दी साहित्य के विकास को आसानी से समझ सकता है।

आमुख (भूमिका) (Preface (Introduction))

आदिकाल: वीरगाथा काव्य और प्रमुख रासो साहित्य

आदिकाल के साहित्यिक विकास में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने आदिकाल के तृतीय प्रकरण को ‘वीरगाथा काल’ की संज्ञा दी है। उनके अनुसार, इस काल की मुख्य साहित्यिक प्रवृत्ति वीरतापूर्ण गाथाओं की थी, जिसे उन्होंने 12 महत्वपूर्ण ग्रंथों के आधार पर प्रमाणित किया है।

शुक्ल जी द्वारा मान्य 12 ग्रंथ: शुक्ल जी ने वीरगाथा काल की पहचान के लिए निम्नलिखित ग्रंथों को आधार बनाया-

1. विजयपाल रासो, 2. हम्मीर रासो, 3. कीर्तिलता, 4. कीर्तिपताका, 5. खुमाण रासो, 6. बीसलदेव रासो, 7. पृथ्वीराज रासो, 8. जयचंद प्रकाश, 9. जयमयंक-जस-चंद्रिका, 10. परमाल रासो, 11. खुसरो की पहेलियाँ, और 12. विद्यापति पदावली।

ग्रंथों की उपलब्धता और संपादन-

इनमें से विद्यापति की रचनाएँ (कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पदावली) और नरपति नाल्ह की ‘बीसलदेव रासो’ प्रामाणिक रूप में उपलब्ध हैं।

कीर्तिपताका अभी तक संपादित होकर प्रकाशित नहीं हुई है।

बीसलदेव रासो का संपादन डॉ. माताप्रसाद गुप्त द्वारा किया गया है।

जगनिक द्वारा रचित ‘परमाल रासो’ आज मुख्य रूप से ‘आल्हा’ के लोकगान के रूप में जाना जाता है, जो विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में गाया जाता है।

प्रमुख रासो ग्रंथों का विवरण-

विजयपाल रासो: इसके रचयिता नल्लसिंह हैं। इसमें विजयपाल और राजा पंग के युद्ध का वर्णन है।

मिश्र बंधु इसे 14वीं शताब्दी की रचना मानते हैं।

हम्मीर रासो – यह ग्रंथ मूल रूप में उपलब्ध नहीं है, लेकिन ‘प्राकृत पैंगलम्’ में हम्मीर से संबंधित कुछ छंद मिलते हैं, जिन्हें शुक्ल जी हम्मीर रासो का अंश मानते हैं।

खुमाण रासो – इसके रचयिता दलपति विजय हैं। यद्यपि इसमें 9वीं शताब्दी के खुमाण के युद्धों का वर्णन है, लेकिन मेवाड़ के परवर्ती शासकों (जैसे महाराणा प्रताप और राजसिंह) के वर्णन के कारण इसे 17वीं शताब्दी के आसपास की रचना माना जाता है।

पृथ्वीराज रासो – एक विवादित महाकाव्य यह आदिकाल का सर्वाधिक प्रसिद्ध और विवादास्पद काव्य है, जिसके रचयिता चंदबरदायी हैं।

चंदबरदायी पृथ्वीराज चौहान के अंतरंग मित्र माने जाते हैं। इसकी प्रामाणिकता पर विद्वानों में गहरे मतभेद हैं-

अप्रामाणिक मानने वाले – डॉ. बूलर ने सर्वप्रथम इसकी तिथियों और ऐतिहासिकता पर संदेह किया था। गौरीशंकर हीराचंद ओझा और आचार्य रामचंद्र शुक्ल भी इसकी प्रामाणिकता पर संदेह करते हैं।

प्रामाणिक मानने वाले – बाबू श्यामसुंदर दास और मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या इसे प्रामाणिक मानते हैं।

ऐतिहासिक आधार – गौरीशंकर ओझा के अनुसार यह 1600 वि. सं. के आसपास लिखा गया। विश्वनाथ जी लिखते हैं- “इधर हाल में मुनि जिन विजय ने पुरातन प्रबंध संग्रह के एक अंश जयचंद प्रबंध के चार छप्पयों की ओर ध्यान आकृष्ट कराया, जो वर्तमान रासो में भी मिलते हैं। पुरातन प्रबंध संग्रह का संकलन काल संभवतः पंद्रहवीं शती है। इससे यह तो प्रकट हो गया कि पंद्रहवीं शती के पूर्व ‘चंद’ नामक कवि ने पृथ्वीराज पर कोई काव्य लिखा था, जिसके कुछ अंश वर्तमान रासो में हैं, किन्तु रासो का मूल रूप क्या रहा होगा, इसकी समस्या अभी भी बनी हुई है।”

स्वरूप – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का अनुमान है कि इसकी रचना ‘शुक-शुकी संवाद’ के रूप में हुई थी।

डॉ. माताप्रसाद गुप्त ने इसके चार पाठों (वृहत, वृहत, लघु और लघुतम) में से ‘लघुतम’ पाठ को ही इसका मूल रूप माना है।

विश्वनाथ त्रिपाठी की पुस्तक के विषय-प्रवेश आधार पर नोट्स

हिन्दी शब्द का प्रयोग हम विविध अर्थों में करते हैं और यह भारत की राजभाषा है। राजभाषा का अर्थ केवल केंद्र की सरकारी भाषा है, जबकि हिन्दी भारत की संपर्क भाषा भी है जो केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारों के बीच संवाद का माध्यम है। हिन्दी भाषी क्षेत्र के अंतर्गत हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरांचल, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य आते हैं।

इस विशाल क्षेत्र की प्रमुख बोलियाँ कुमायूँनी, गढ़वाली, हिमाचली, हरियाणवी, खड़ी बोली, ब्रजी, अवधी, बघेली, बुंदेलखंडी और भोजपुरी हैं।

इन बोलियों को हिन्दी के अंतर्गत इसलिए माना जाता है क्योंकि इनका व्याकरणिक रूप और शब्दावली अधिकांशतः समान है और इनमें परंपरा से केंद्रोन्मुख भाषा में साहित्य रचा जाता रहा है।

मध्यकाल में ब्रजी और अवधी दो प्रमुख साहित्यिक भाषाएँ थीं, जबकि आज की मानक हिन्दी का आधार खड़ी बोली है जो पश्चिमी क्षेत्र की बोली है।

साहित्य का इतिहास वर्तमान और अतीत के बीच के संबंधों की व्याख्या है।

इतिहास-लेखन की आधारभूत सामग्रियों में पुराने भवन, शिलालेख, ताम्रपत्र, सिक्के, भाषा, साहित्य, मिथक और किंवदंतियाँ शामिल हैं।

हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन की प्रमुख सामग्रियों में चौरासी वैष्णवन की वार्ता, दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, कबीर, सूर, तुलसी, जायसी, मीरा और भारतेंदु हरिश्चंद्र की रचनाएँ महत्वपूर्ण हैं। सामान्यतः हिन्दी साहित्य के इतिहास का प्रारंभ 1000 ई. के आसपास माना जाता है।

हालांकि, महापंडित राहुल सांकृत्यायन सरहपा को पुरानी हिन्दी का पहला कवि मानते हैं, जिससे हिन्दी साहित्य का इतिहास नौवीं शताब्दी से शुरू हो जाता है।

अपभ्रंश से हिन्दी में रूपांतरण की प्रक्रिया तीन प्रमुख प्रवृत्तियों के कारण हुई- 1. क्षतिपूरक दीर्घीकरण, 2. परसर्गों के प्रयोग की अधिकता और 3. तत्समीकरण। क्षतिपूरक दीर्घीकरण के उदाहरण के रूप में अपभ्रंश का ‘हत्थ’ हिन्दी में ‘हाथ’ हो गया। संस्कृत और प्राकृत में परसर्ग (कारक चिह्न) नहीं होते थे, वहाँ विभक्तियों से काम चलता था, लेकिन हिन्दी में परसर्गों का प्रयोग अधिक होने लगा। वैष्णव धर्म के प्रचार के कारण पुरानी हिन्दी में तत्सम शब्दों का पुनर्चलन बढ़ा। पंडित चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ ने अपभ्रंश रचनाओं और नाथ-सिद्धों की भाषा को ‘पुरानी हिन्दी’ कहा है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने प्रधान साहित्यिक प्रवृत्ति के आधार पर काल-विभाजन किया है। उनके अनुसार आदिकाल (वीरगाथा काल) सं. 1050 से सं. 1375 तक, पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल) सं. 1375 से सं. 1700 तक, उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) सं. 1700 से सं. 1900 तक और आधुनिक काल (गद्य काल) सं. 1900 से अब तक माना गया है।

आदिकाल के नामकरण को लेकर अन्य विद्वानों के मत भी महत्वपूर्ण हैं। ग्रियर्सन ने इसे ‘चारण काल’, मिश्र बंधुओं ने ‘प्रारंभिक काल’, राहुल सांकृत्यायन ने ‘सिद्ध सामंत काल’ और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसे ‘आदिकाल’ कहा है।

शुक्ल जी ने आदिकाल को अपभ्रंश काव्य और देशभाषा काव्य में विभाजित किया और देशभाषा काव्य को ही ‘वीरगाथा काव्य’ की संज्ञा दी।

आदिकाल को अपभ्रंश और हिन्दी का ‘संधिकाल’ भी कहा जाता है क्योंकि इसमें दोनों भाषाओं की प्रवृत्तियाँ घुली-मिली मिलती हैं। हिन्दी भाषा और साहित्य का वास्तविक स्वरूप वस्तुतः भक्तिकाल में सामने आता है।

हिन्दी साहित्य का इतिहास: कालक्रम, रचनाकार और प्रमुख कृतियाँ

कालखंडसमयावधिप्रमुख रचनाकारप्रमुख रचनाएँसाहित्यिक विधा/धारामुख्य विशेषताएँ (Inferred)
आदिकाल (वीरगाथा काल)1000 – 1400 ई.चंदबरदायी, अमीर खुसरो, विद्यापतिपृथ्वीराज रासो, कीर्तिलता, पदावली, पहेलियाँसिद्ध साहित्य, नाथ साहित्य, जैन साहित्य, वीरगाथा काव्यसामंतवादी व्यवस्था, वीरता और श्रृंगार का मिश्रण, डिंगल-पिंगल भाषा का प्रयोग।
भक्तिकाल (पूर्व मध्यकाल)1400 – 1700 ई.कबीरदास, जायसी, तुलसीदास, सूरदासबीजक, पद्मावत, रामचरितमानस, सूरसागरनिर्गुण भक्ति (ज्ञानाश्रयी/प्रेमाश्रयी), सगुण भक्ति (राम/कृष्ण भक्ति)ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, लोकहितकारी भावना, ब्रज और अवधी भाषा की प्रधानता।
रीतिकाल (उत्तर मध्यकाल)1700 – 1850 ई.बिहारी, केशवदास, घनानंद, भूषणबिहारी सतसई, रामचंद्रिका, सुजान सागर, शिवराज भूषणरीतिबद्ध काव्य, रीतिसिद्ध काव्य, रीतिमुक्त काव्यश्रृंगारिकता, अलंकार-प्रियता, दरबारी संस्कृति और ब्रजभाषा का चरमोत्कर्ष।
आधुनिक काल (गद्य काल)
1850 ई. से अब तकभारतेन्दु हरिश्चंद्र, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, निरालाभारत दुर्दशा, गोदान, कामायनी, राम की शक्ति पूजाछायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, गद्य की विविध विधाएँखड़ी बोली का प्रयोग, राष्ट्रीय चेतना, यथार्थवाद और मानवीय संवेदना।
प्रमुख साहित्यकार, उनके काल और उनकी रचनाएँ
साहित्यकार का नामकालरचना
सरहपाआदिकालदोहा-कोष
अब्दुल रहमान (अददहमाण)आदिकालसंदेशरासक
चंदबरदायीआदिकाल (वीरगाथा काल)पृथ्वीराज रासो
नरपति नाल्हआदिकाल (वीरगाथा काल)बीसलदेव रासो
जगनिकआदिकालपरमाल रासो (आल्हा)
दलपति विजयआदिकालखुमान रासो
विद्यापतिआदिकालकीर्तिलता, कीर्तिपताका, पदावली
अमीर खुसरोआदिकालपहेलियाँ, मुकरियाँ, दो सुखने
कबीरभक्तिकाल (निर्गुण धारा)बीजक (रैमैनी, सबद, साखी)
मलिक मुहम्मद जायसीभक्तिकाल (सूफी काव्य)पद्मावत, अखरावट, आखिरी कलाम
तुलसीदासभक्तिकाल (राम-भक्ति शाखा)रामचरितमानस, विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली
सूरदासभक्तिकाल (कृष्ण-भक्ति शाखा)सूरसागर, साहित्य लहरी, सूरसारावली
केशवदासरीतिकालरामचंद्रिका, कविप्रिया, रसिकप्रिया
बिहारीरीतिकाल (रीतिसिद्ध)बिहारी सतसई
घनानंदरीतिकाल (रीतिमुक्त)सुजान सागर, विरह लीला, कोकसार
भारतेंदु हरिश्चंद्रआधुनिक काल (भारतेंदु युग)भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, नील देवी, सत्य हरिश्चंद्र
अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’आधुनिक काल (द्विवेदी युग)प्रियप्रवास, चोखे-चौपदे, वैदेही वनवास
मैथिलीशरण गुप्तआधुनिक कालसाकेत, यशोधरा, भारत-भारती, जयद्रथ-वध
जयशंकर प्रसादआधुनिक काल (छायावाद)कामायनी, आँसू, लहर, झरना, चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त
प्रेमचंदआधुनिक कालगोदान, गबन, सेवासदन, रंगभूमि, कफ़न (कहानी)
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’आधुनिक काल (छायावाद)परिमल, अनामिका, गीतिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता
सुमित्रानंदन पंतआधुनिक काल (छायावाद)पल्लव, गुंजन, युगांत, ग्राम्या, लोकायतन
महादेवी वर्माआधुनिक काल (छायावाद)नीहार, नीरजा, सांध्यगीत, यामा, दीपशिखा
रामधारी सिंह ‘दिनकर’आधुनिक कालकुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी, रेणुका, हुंकार
सोर्स – हिन्दी साहित्य का सरल इतिहास
विश्वनाथ त्रिपाठी

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