Net JRF Hindi :  दुनिया का अनमोल रतन कहानी का सारांश | Duniya Ka Anamol Ratan Kahanee ka Saransh

Net JRF Hindi Unit 7 :  दुनिया का अनमोल रतन कहानी का सारांश

प्रेमचंद का साहित्यिक परिचय (Literary introduction of Premchand)

नवाबराय अर्थात प्रेमचंद की कहानी दुनिया का सबसे अनमोल रतन है। यह कहानी नवाबराय (प्रेमचंद) की उर्दू में रचति प्रारंभिक दौर की कहानी है। यह कहानी जमाना पत्रिका में 1907 में प्रकाशित हुई है। दयानारायण निगम इसके संपादक थे।

उसके बाद यह कहानी जमाना प्रेस, कानपुर से प्रकाशित सोजेवतन कहानी संग्राह में संकलित की गई है। सोजेवतन प्रेमचंद का कहानी संग्राह है। सोजेवतन (1908) में नवाबराय की पाँच कहानियाँ संकलित हुई हैं। जो इस प्रकार हैं-

1) इश्के दुनिया हुब्बे वतन (सांसारिक प्रेम और देशप्रेम)
2) दुनिया का सबसे अनमोल रतन
3) यही मेरा वतन
4 शेख मखमूर
5 सिल-ए-मातम (शोक का पुरस्कार)

विद्वानों ने कहा- (Scholars said)

अली जावेद जैदी ने नवाबराय लिखित दुनिया का सबसे अनमोल रतन को 1906 में प्रकाशित बताते हुए, उसे उनकी पहली कहानी माना है। अमृतराय ने “कलम का सिपाही” में दुनिया का सबसे अनमोल रतन क प्रकाशन काल 1907 बताया है। गोपालराय के अनुसार यह सुचनाएँ विवादास्पद हैं।

प्रेमचंद ने सोजेवतन के दीबाचा (भमिका) में लिखा है – हरेक कौम का इल्म-ओ-अदब अपने जमाने की सच्ची तसवीर होता है। जो ख़यालात कौम के दिमागों को मुतहर्रिक (सक्रिय) करते हैं और जो जज़्बात कौम के दिलों में गूँजते हैं, वो नस्त और नज़्म (गद्य, पद्य) के सफ़ों में ऐसी सफ़ाई में नज़र आते हैं, जैसे आइने में सूरत। …अब हिन्दुस्तान के कौमी ख़याल न बलोगीत (बालिगपन) के ज़ीने पर एक कदम और बढ़ाया है और हुब्बे वतन के जज़्बात लोकों के दिलों में उभरने लगे हैं। क्यूँकर मुमकिन था कि इसका असर अदब पर न पड़ता? यह चंद कहानियाँ इसी असर का आगाज़ हैं औऱ यकीन है कि जूँ जूँ हमारे ख़याल वसीह (विस्तृत) होते जाएँगे, इसी रंग के लिटरेचर को रोज़ अफ्जों (प्रतिदिन बढ़ना) फ़रोग (उन्नत) होता जाएगा। हमारे मुल्क को ऐसी किताबों की अशद ज़रूरत है, जो नई नस्ल के जिगर पर हुब्बे वतन (देशप्रेम) का नक्शा जमाएँ।

जमाना के सितम्बर-अक्टूबर 1908 (विज्ञापन में) के अंक में स्पष्ट कहा गया-

“ऐसे किस्से, जिनमें सोजेवतन की चाशनी हो, जिनमें हुब्बेवतन एक-एक हर्फ से टपके, इस वक्त का मादूम है। इस किताब में पाँच किस्से लिखे गए हैं और सब दर्देवतन के जज्बात से पूरे हैं। मुमकिन नहीं कि इन्हें पढ़कर नाज़रीन के दिल में वतन की उल्फत का पाक जज़्बा मौजज़न न हो जाए”।

गोपालराय लिखते हैं – इन कहानियों (सोजेवतन की कहानियाँ) के माध्यम से नवाबराय ने औपनिवेशिक शासन से मुक्ति की भारतीय आकांक्षा को व्यक्त किया था, जो औपनिवेशिक शाशन की नज़र में राजद्रोह था। यद्यपि नवाबराय ने अपने देशप्रेम को प्रच्छन्न रूप से व्यक्त करने की सावधानी बरती थी, पर किसी सरकारी नौकरी में देशप्रेम का भाव ही हो, यह औपनिवेशिक शासन को बर्दाश्त न था। इस अपराध के लिए नवाबराय को प्रशासन (हम्मीर पुर के कलेक्टर) द्वारा तलब किया गया था। और सोजेवतन की जब्ती के आदेश के साथ-साथ उनके लेखन पर भी पाबंदी लगा दी गई थी।

दुनिया का अनमोल रतन कहानी परिचय (Duniya Ka Anamol Ratan Story Introduction)

कहानी के प्रमुख पात्र-

दिलफ़रेब – हुस्न की देवी और मीनोसवाद की मलिका है।
दिलफ़िगार – दिलफ़रेब का सच्चा और जांबज़ आशिक है।

प्रमुख घटनाएँ

1 काले चोर को फाँसी।
2 नाज़नीन का अपने शौहर के साथ सती होना।
3 सच्चे देशभक्त का वतन पर कुर्बान होना।

दुनिया का अनमोल रतन कहानी का सारांश (Duniya Ka Anamol Ratan Kahanee ka Saransh)

यह कहानी देशप्रेम के उद्देश्य से लिखी गई है, इस उद्देश्य की सिद्धि लेखक ने प्रेमप्रसंग के माध्यम से की है।

दिलफ़रेब (इटली) मीनोसवाद की मल्लिका है, दिलफ़िगार को उससे प्रेम हो जाता है, परिणाम स्वरूप जब वह अपनी मुहब्बत का इज़हार दिलफ़रेब से करता है, तो वह उसे अपने प्रेमी के रूप में स्वीकार करने से पहले दुनिया की सबसे अनमोल चीज़ लाने को कहती है।

दिलफ़िगार अनमोल चीज़ की तलाश में चला जाता है। सबसे पहले उसे काला चोर मिलता है, जो सैकड़ो आदमियों का कातिल है, उसे फाँसी होनी थी। परिणाम स्वरूप वह एक बच्चे से मिलने की आखरी इच्छा व्यक्त करता है, जब वह बच्चे से मिलने जाता है, तो अपना बचपन याद करता है, और उसकी आँखो से आँसू निकल आते हैं, जिसे दिलफ़िगार लपक कर अपने हाथों में ले लेता है। आँसू की उस बूँद को लेकर वह दिलफ़रेब के पास जाता है, लेकिन दिलफ़रेब उसे सबसे अनमोल रतन मनने से मना कर देती है, और दिलफ़िगार को दोबारा रतन की तलाश में भेज देती है।

दूसरी बार दिलफ़िगार का समना एक चिता से होता है, जिसमें एक युवती के पति की मृत्यु हो गई है, परिणाम स्वरूप वह अपने पति के साथ जलने के लिए चिता पर बैठी है। उनकी चिता जलने के बाद दिलफ़िगार उनकी चिता की राख दिलफ़रेब के लिए ले जाता है, लेकिन वह उसे भी सबसे अनमोल रतन मानने से इंकार कर देती है।

इस बार दिलफ़िगार बहुत निराश हो जाता है, और आत्महत्या करने के लिए पहाड़ पर चला जाता है। तभी एक बुज़ुर्ग हरा अमामा बाँधे एक हाथ में तसबीह और दूसरे हाथ मे लाठी लिए आता है, और दिलफ़िगार को कहता है, तुझे वह अनमोल रतन यहाँ से पूर्व की तरफ हिंदुस्तान में मिलेगी।

बहुत लम्बा सफर तय करके दिलफ़िगार हिन्दुस्तान पहुँचता है,
एक दिन शाम के वक़्त देखता है कि बहुत सारी लाशें बिना कफ़न की पड़ी हैं, और एक सिपाही घायल अवस्था में नीचे पड़ा है।

दिलफ़िगार ने कपड़े का एक चिथड़ा उसके घाव पर रख दिया ताकि खून रूक जाएँ, लेकिन पहले उस घायल सिपाही ने इसे अपना दुश्मन समझा, दिलफ़िगार सिपाही के विचार को भापते हुए बता देता है कि मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूँ, मैं एक भटका हुआ राही हूँ। परिणाम स्वरूप सिपाही कहता है, कि मैं तुम्हारा सत्कार नहीं कर सकता और दिलफ़िगार को अपने पास बैठा लेता है।

यह सिपाही एक सच्चा देशभक्त है, जो देश के लिए लड़ते-लड़ते घायल हो गया है, और दिलफ़िगार से बात करते-करते मृत्यू को प्राप्त हो जाता है। उसके शरीर के खून का आख़री कतरा दिलफ़िगार अपने हाथों में लेता है, और इसे सबसे अनमोल रतन मानकर अपने वतन लौट जाता है।

जब वह दिलफ़रेब के पास सिपाही के खून का कतरा लाता है, तो इस बार वह दिलफ़िगार का प्रेम स्वीकार कर लेती है और खुद को उसकी दासी मान लेती है। अपनी दुआ की पुरी होने पर खुश होती है। यहीं पर कहानी समाप्त हो जाती है।

कहानी के परीक्षा उपयोगी प्रमुख कथन (Important statements of the story which are useful for examination)

दिल-फ़रेब ने उससे कहा था कि, अगर तू मेरा सच्चा आशिक है तो जा और दुनिया की सबसे बेश-बहा (अनमोल रत्न) शय लेकर मेर दरबार में आ। तब मैं तुझे अपनी गुलामी में क़बूल करूँगी। अगर तुझे वो चीज़ न मिले तो ख़बरदार। इधर का रूख़ न करना बर्ना दार (फाँसी) पर खिंचवा दूँगी।

बद-किस्मत काला चोर फाँसी से उतरा। हज़ारों आँखें उसी पर गड़ी हुई थीं। वो उस लड़के के पास आय और उसे गोद में उठा कर प्यार करने लगा। उसे उस वक़्त वो ज़माना याद आया जब वह ख़ुद ऐसा ही भोला भाला, ऐसा ही खुस-ओ-ख़ुर्रम (निश्चल) और आलाइशात-ए-दुनयवी से ऐसा ही पाक-ओ-साफ़ था। माँ गोदियों में खिलाती थी। बाप बलाएँ लेता था और सारा कुनबा जानें वारा करता था।

आह। काले चोर के दिल पर इस वक़्त अय्याम-ए-गुज़िश्ता (बीता समय) की याद का इतना असर हुआ कि उसकी आँखों से, जिन्होंने नीम-बिस्मिल (बीच का समय) लाशों को तड़पते देखा और न झपकी थीं, आँसू का एक क़तरा टपक पड़ा। दिल-फिगार ने लपक कर इस दर्रीकता को हाथ में ले लिया। और उसके दिल ने कहा – बेशक ये शय दुनिया की सब से अनमोल चीज़ है, जिस चीज़ पर तख़्त-ए-ताऊस (मयूर सिंहासन) और जाम-ए-जम और आब-ए-हयात और ज़र-ए-परवेज़ (सूर्य की किरणें) सब तसद्दुक (न्योछावर) हैं।

दिल-फ़िगार ने एक अजब उम्मीद-ए-नीम के आलम में वो क़तरा पेश किया और उसकी सारी कैफ़ियत निहायत ही मोअस्सिर लहजे में बयान की। दिल-फ़रेब ने कुल रूदाद ब-ग़ौर सुनी। और तोहफ़ा हाथ में लेकर ज़रा देर तक ग़ौर कर के बोली, दिल-फ़िगार बेशक तूने दुनिया की एक बेश-क़ीमत चीज़ ढूँढ निकाली। तेरी हिम्मत को आफ़रीं और तेरी फ़रासत (ज्ञान) को मर्हबा। मगर यह दुनिया की सब से बेश-क़ीमत चीज़ नहीं। इसलिए तू यहाँ से जा और फिर कोशिश कर। शायद अब की तेरे हाथ दर-ए-मक़दूर लगे और तेरी क़िस्मत में मेरी गुलामी लिखी हो।

अपने अहद के मुताबिक़ मैं तुझे दार पर खींचवा सकती हूँ। मगर मैं तेरी जान-बख्शी करती हूँ। इसलिए कि तुझ में वो औसाफ़ मौजूद हैं जो मैं अपने आशिक़ में देखना चाहती हूँ और मुझे यक़ीन है कि तू ज़रूर कभी सुर्ख़-रू होगा।

देखता है कि संदल की चिता बनी हुई है और उस पर एक नाज़नीन शहाने जोड़े पहने, सोलहों सिंगार किए बैठी हुई है। उसके ज़ानू पर उसके प्यारे शौहर की लाश है। हज़ारों आदमी हल्क़ा बाँधे खड़े हैं और फूलों की बरखा कर रहे हैं। यकायक चिता में से ख़ुद-ब-ख़ुद एक शोला उठा। सती का चेहरा उस वक़्त एक पाक जज़्बे से मुनव्वर हो रहा था। मुबारक शोले उसके गले लिपट गए। और दम-ज़दन (पल भर) में वो फूल सा जिस्म तूदा-ए-ख़ाकिस्तर हो गया। माशूक़ ने अपने तईं आशिक़ पर निसार कर दिया। और दो फ़िदाइयों की सच्ची, लाफ़ानी और पाक मुहब्बत का आख़िरी जल्वा निगाह-ए-ज़ाहिर से पिन्हाँ (दूर) हो गया। जब सब लोग अपने घरों को लौटे तो दिल-फ़िगार चुपके से उठा और अपने गिरेबान-ए-चा-दामन में ये तूदा-ए-ख़ाक (राख) समेट लिया। और इस मुश्त-ए-ख़ाक को दुनिया की सब से गिराँ-बहा (अनमोल) चीज़ समझता हुआ कामरानी के नश्शे में मख़मूर कूचा-ए-यार- की तरफ़ चला।

दिल-फ़रेब के आशिक़-ए-जाँ-बाज़ को फ़ौरन दरबार में बुलाया और उस चीज़ के लिए, जो दुनिया की सब से बेश-बहा जिंस थी, हाथ फैला दिया। दिल-फ़िगार ने जुरअत कर के इस साइद-ए-सीमीं (नाज़ुक कलाई) का बोसा ले लिया और वो मुश्त-ए-ख़ाक उस में रख कर वो सारी कैफ़ियत निहायत दिल-सोज़ अंदाज़ में कह सुनाई औऱ माशूक़ा-ए-दिल-पज़ीर के नाज़ुक लबों से अपनी क़िस्मत का मुबारक और जाँ-फ़ज़ा फ़ैसला सुनने के लिए मुंतज़िर हो बैठा। दिल-फ़रेब ने इस मुश्त-ए-खाक को आँखों से लगा लिया और कुछ देर तक दरिया-ए-तफ़क्कुर (सोच के सागर में) में ग़र्क़ (डूबना) रहने के बाद बोली। ऐ आशिक़ ऐ जाँ-निसार दिल-फ़िगार। बेशक ये ख़ाक-ए-कीमिया- सिफ़त जो तू लाया है, दुनिया की निहायत बे-शक़ीमत चीज़ है। और मैं तेरी सिद्क़-ए-दिल से ममनून हूँ कि तू ने ऐसा बेश-बहा तोहफ़ा मुझे पेश-कश किया। मगर दुनिया में इस से भी ज़्यादा गिराँ-क़द्र कोई चीज़ है। जा उसे तलाश कर और तब मेरे पास आ। मैं तह-ए-दिल से दुआ करती हूँ कि ख़ुदा तुझे कामयाब करे।

“इतने में क़रीब से कराहने की आवाज़ आई। दिल-फ़िगार उस तरफ़ फिरा तो देखा कि एक क़ौमी हैकल शख़्स, जिस का मर्दाना चेहरा ज़ोफ़ जाँ-कंदनी से ज़र्द (पीला) हो गया है। ज़मीन पर सर-निगूँ पड़ा है। सीने से ख़ून का फव्वारा जारी है। मगर शमशीर-ए-आबदार का क़ब्ज़ा पंजे से अलग नहीं हुआ। दिल-फ़िगार ने एक चीथड़ा लेकर दहान-ए-ज़ख़्म पर रख दिया ताकि ख़ून रूक जाए और बोला।

“ऐ जवान मर्द तू कौन है? जवान मर्द ने यह सुनकर आँखें खोलीं और दिलेराना लहजे में बोला- क्या तू नहीं जानता कि मैं कौन हूँ? क्या तू ने आज इस तलवार की काट नहीं देखी? मैं अपनी माँ का बेटा और भारत का लख़्त-ए-जिगर हूँ। यह कहते कहते उसके तेवरों पर बल पड़ गए।

ज़र्द चेहरा खुशम-गीं हो गया और शमशीर-ए-आबदार फिर अपना जौहर दिखाने के लिए चमक उठी। दिल-फ़िगार समझ गया कि ये इस वक़्त मुझे दुश्मन ख़्याल कर रहा है। मुलाएमत से बोला – ऐ जवान मर्द। मैं तेरा दुश्मन नहीं हूँ। एक आवारा वतन ग़ुर्बत-ज़दा मुसाफ़िर हूँ। इधर भुलता आ निकला। बराह-ए-करम मुझ से यहाँ की मुफ़स्सिल कैफ़ियत बयान कर। ये सुनते ही ज़ख़्मी सिपाही निहायत शीरीं लहजे में बोला – अगर तू मुसाफ़िर है तो आ और मेरे ख़ून से तर पहलू में बैठ जा क्योंकि यही दो उंगल ज़मीन है जो मेरे पास बाक़ी रह गई है और जो सिवाए मौत के कोई नहीं छीन सकता।

अफ़सोस है कि तू यहाँ ऐसे वक़्त में आया। जब हम तेरी मेहमान नवाज़ी करने के क़ाबिल नहीं। हमारे बाप दादा का देस आज हमारे हाथ से निकल गया। और इस वक़्त हम बे-वतन हैं। मगर (पहलू बदल) हम ने हमाल-आवर ग़नीम को बता दिया कि राजपूत अपने देश के लिए कैसी बे-जिगरी से जान देता है।

यह आसपास जो लाशें तू देख रहा है। यह उन लोगों की हैं जो इस तलवार के घाट उतरे हैं, (मुस्कुरा कर) और गो कि मैं बे-वतन हूँ। मगर ग़नीमत है कि हरीफ़ के हल्क़े के मर रहा हूँ। (सीने के ज़ख़्म से चीथड़ा निकाल कर) क्या तू ने ये मरहम रख दिया। ख़ून निकलने दे। इसे रोकने से क्या फ़ायदा?

क्या मैं अपने ही वतन में ग़ुलामी करने के लिए ज़िंदा हूँ? नहीं, ऐसी ज़िंदगी से मरना अच्छा। इस से बेहतर मौत मुम्किन नहीं।

जवान मर्द की आवाज़ मध्य हो गई। अज़ा ढीले हो गए। ख़ून इस तरह से बहा कि अप ख़ुद-ब-ख़ुद बंद हो गया। रह रह कर एक आद बूँद टपक पड़ता था। आख़िर कार सारा जिस्म बेदम हो गया। क़ल्ब की हरकत बंद हो गई। और आँखें मुँद गईं. दिल-फ़िगार ने समझा अब काम तमाम हो गया कि मरने वाले ने आहिस्ता से कहा- भारत माता की जय” और उसके सीने से आख़री क़तरा ख़ून निकल पड़ा।

एक सच्चे मुहिब-ए-वतन और देस-भगत ने हुब्ब-उल-वतनी का हक़ अदा कर दिया। दिल-फ़िगार इस नज़ारे से बेहद मुतास्सिर हुआ। और उसके दिल ने कहा, बेशक दुनिया में इस क़तरा ख़ून से बेश-क़ीमत शय नहीं हो सकती। उसने फ़ौरन उस रश्क-ए-लाल-ए-रमानी को हाथ में ले लिया। और उस दिलेर राजपूत की बिसालत पर अश अश करता हुआ आज़िम-ए-वतन हुआ।

वही सख़्तियाँ झेलता हुआ बिल-आख़िर एक मुद्दत-ए-दराज़ में मलिका अक़्लीम-ए-ख़ूबी और दर-ए-सदफ़-ए-महबूबी के दर-ए-दौलत पर जा पहुँचा औऱ पैग़ाम दिया कि दिल-फ़िगार सुर्ख़-रू-ओ-कामगार लौटा है और दरबार-ए-गहर-बार में हाज़िर होना चाहता है। दिल-फ़रेब ने उसे फौरन हाज़िर होने का हुक्म दिया। ख़ुद हस्ब-ए-मामूली पर्दा-ए-ज़र निगार के पसे-पुश्त बैठी और बोली, दिल-फ़िगार। अब की तू बहुत दिनों के बाद वापिस आया है। ला दुनिया की सब से बेश-क़ीमत चीज़ कहाँ है?

दिल-फ़िगार ने पंजा-ए-हिनाई का बोसा लेकर वह क़तरा-ए-ख़ून उस पर रख दिया। और उसकी मुशर्रह कैफ़ियत पुर-जोश लहजे में कह सुनाई। वो ख़ामोश भी न होने पाया था कि यकायक वो वर्दा-ए-ज़र निगार हट गया और दिल-फ़िगार के रू-ब-रू एक दरबार हुस्न-ए-आरास्ता नज़र आया। जिस में एक नाज़नीन-ए-रश्क-ए-ज़ुलेख़ा थी।

दिल-फ़रेब ब-सद-शान-ए-रानाई मस्नद-ज़रीं कार पर जल्वा-अफ़रोज़ थी।

दिल-फ़िगार ये तिलिस्म-ए-हुस्न देख कर मुतहय्यर हो गया और नक़्श-ए-दीवार की तरह सकते में आ गया कि दिल-फ़रेब मस्नद से उठी और कई क़दम आगे बढ़ कर उसके हम-आगोश हो गई। रक़सान-ए-दिल-नवाज़ ने शादयाने गाने शुरू किए। हाशिया-नशीनान-ए-दरबार ने दिल-फ़िगार की नज़रें गुज़ारीं औऱ माह-ओ-खुरशीद को ब-इज्जत तमाम मस्नद पर बैठा दिया।

जब नग़्मा-ए-दिल-पसंद बंद हुआ तो दिल-फ़रेब खड़ी हो गई और दस्त-बस्ता हो कर दिल-फ़िगार से बोली, – ऐ आशिक़-ए-जाँनिसार दिल-फ़िगार। मेरी दुआएँ तीर-ब-हदफ़ हुईं और ख़ुदा ने मेरी सुन ली और तुझे कामयाब-ओ-सुर्ख़-रू किया। आज से तू मेरा आक़ा है और मैं तेरी कनीज़ ना-ची।

यह कह कर उसने मुरस्सा सन्दूकचा मँगाया औऱ उसमें से एक लौह निकाला जिस पर आब-ए-ज़र से लिखा हुआ था।

वो आख़िरी क़तरा-ए-ख़ून जो वतन की हिफ़ाज़त में गिरे, दुनिया की सबसे बेश-कीमत शय है।


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